विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः १२९
उपवाह्यात्सृञ्जय्यां भजमानाद् विजज्ञिरे ॥ ५ ॥
उन्हीं भजमानके सृञ्जयकी दूसरी पुत्री उपवाह्याकासे अयुताजित्, सहस्राजित्, शताजित् और दाशक नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ५ ॥
यज्वा देवावृधो राजा चचार विपुलं तपः ।
पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम स्यादिति निश्चितः ॥ ६ ॥
यज्ञ करनेवाले राजा देवावृधने 'मेरे सर्वगुणसम्पन्न पुत्र हो' इस निश्चयके साथ बड़ा भारी तप किया ॥ ६ ॥
संयुज्यात्मानमेवं तु पर्णाशाया जलं स्पृशन् ।
सदोपस्पृशतस्तस्य चकार प्रियमापगा ॥ ७ ॥
वे राजा अपने चित्तमें ऐसा निश्चय करके पर्णाशा नदीके जलमें खड़े होकर तप करते थे। अपने जलमें सदा खड़े रहने-वाले राजाका नदीने प्रिय करना चाहा ॥ ७ ॥
चिन्तयाभिपरीता सा जगामैकाभिनिश्चयम् ।
कल्याणमन्वान्नरपतेस्तस्य सा निम्नगोत्तमा ॥ ८ ॥
नाध्यगच्छत तां नारीं यस्यामेवंविधः सुतः ।
जायेत् तस्मात् स्वयं हन्त भवाम्यस्य सहव्रता ॥ ९ ॥
उसको ऐसी कोई स्त्री नहीं दीखी, जिसके द्वारा ऐसा पुत्र उत्पन्न हो सके। तब चिन्तासे व्याप्त होकर नदियोंमें श्रेष्ठ पर्णाशाने उस राजाका कल्याण करनेके लिये एकान्तमें यह विचार किया कि 'मैं ही इनकी सहचारिणी बन जाऊँ' ८-९
अथ भूत्वा कुमारी सा बिभ्रती परमं वपुः ।
वरयामास नृपतिं तामियेष च स प्रभुः ॥ १० ॥
तदनन्तर उसने कुमारी बनकर श्रेष्ठ रूप धारण करके राजाको वरना चाहा और राजाने भी उसको पत्नी बनाना चाहा ॥ १० ॥
तस्यामाधत्त गर्भं च तेजस्विनमुदारधीः ।
अथ सा दशमे मासि सुषुवे सरितां वरा ॥ ११ ॥
पुत्रं सर्वगुणोपेतं बभ्रुं देवावृधान्नृपात् ।
तदनन्तर उन महाबुद्धिमान् राजाने उसमें तेजस्वी गर्भ-को स्थापित किया, तब उस नदियोंमें श्रेष्ठ पर्णाशाने राजा देवावृधके वीर्यसे दसवें महीनेमें सर्वगुणसम्पन्न बभ्रु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ११ ॥
अत्र वंशे पुराणज्ञा गायन्तीति परिश्रुतम् ॥ १२ ॥
गुणान् देवावृधस्याथ कीर्तयन्तो महात्मनः ।
यथैवाग्रे समं दूरात् पश्याम च तथान्तिके ॥ १३ ॥
सुना है कि इस वंशके प्राचीन इतिहासको जाननेवाले लोग महात्मा देवावृधके गुणोंका इस प्रकार कीर्तन करते थे; 'महात्मा देवावृधको हम जैसे दूर देशमे देखते थे, वैसे ही उनको समीपमें देखते थे अर्थात् उनको योगवलसे अनेक रूप धारण कर सर्वत्र एक रूपमें विराजमान देखते थे' ॥ १२-१३ ॥
बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः ।
षष्टिश्च षट् च पुरुषाः सहस्राणि च सप्त च ॥ १४ ॥
एतेऽमृतत्वं सम्प्राप्ता बभ्रुर्देवावृधावपि ।
बभ्रु मनुष्योंमे श्रेष्ठ हैं और देवावृध देवताके समान हैं, सात हजार छाछठ पुरुषोंसहित बभ्रु और देवावृध अमृतत्वको प्राप्त हो गये अर्थात् संग्रामभूमिमें अपने प्राणोंको त्यागकर ब्रह्मलोकमें पहुँच गये ॥ १४ ॥
यज्वा दानपतिर्विद्वान् ब्रह्मण्यः सुदृढायुधः ॥ १५ ॥
कीर्तिमांश्च महातेजाः सात्त्वतानां महावरः ।
तस्यान्ववायः सुमहान् भोजा ये मार्त्तिकावताः ॥ १६ ॥
राजा बभ्रु दानियोंमें श्रेष्ठ, यज्ञ करनेवाले, विद्वान् और ब्राह्मणभक्त थे। उनके आयुध बड़े दृढ़ थे। वे कीर्तिमान्, महातेजस्वी तथा सात्त्वतवंशियोमे परम श्रेष्ठ थे। उन बभ्रुका वंश बहुत बड़ा है, मार्त्तिकावतभोज उनकी ही संतानोंमें हैं ॥ १५-१६ ॥
अन्धकात् काश्यदुहिता चतुरोऽलभतात्मजान् ।
कुकुरं भजमानं च शमिं कम्बलबर्हिषम् ॥ १७ ॥
अन्धकसे काशिराज (दृढ़ाश्व) की पुत्रीके द्वारा कुकुर, भजमान, शमि और कम्बलबर्हिष नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १७ ॥
कुकुरस्य सुतो धृष्णुर्धृष्णोस्तु तनयस्तथा ।
कपोतरोमा तस्याथ तैत्तिरिस्तनयोऽभवत् ॥ १८ ॥
कुकुरके पुत्र धृष्णु और धृष्णुके पुत्र कपोतरोमा हुए तथा उनके पुत्र तैत्तिरि हुए ॥ १८ ॥
जज्ञे पुनर्वसुस्तस्मादभिजित् तु पुनर्वसोः ।
तस्य वै पुत्रमिथुनं बभूवाभिजितः किल ॥ १९ ॥
तैत्तिरिके पुत्र पुनर्वसु हुए, पुनर्वसुके पुत्र अभिजित् हुए; उन अभिजित्के एक पुत्र और एक पुत्री-ये दो जुड़वाँ संतानें हुईं, ऐसी बात सुनी जाती है ॥ १९ ॥
म० इ० ५-