विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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आहुकश्चाहुकी चैव ख्यातौ ख्यातिमतां वरौ ।
इमां चोदाहरन्त्यत्र गाथां प्रति तमाहुकम् ॥ २० ॥
ख्यातिप्राप्त लोगोंमें श्रेष्ठ वे दोनों आहुक और आहुकीके नामसे प्रसिद्ध हुए। इन आहुकके सम्बन्धमें (मनुष्य) इस गाथाको गाया करते हैं ॥ २० ॥
श्वेतेन परिवारेण किशोरप्रतिमो महान् ।
अशीतिचर्मणा युक्तः स नृपः प्रथमं यजेत् ॥ २१ ॥
वह तरुण घोड़ेके समान उत्साही राजा जब अपने विशुद्ध परिवारके साथ चलते थे, तब उनके (काठके बने) राज-सिंहासनको अस्सी मनुष्य उठाया करते थे ॥ २१ ॥
नापुत्रवान् नाशतदो नासहस्रशतायुषः ।
नाशुद्धकर्मा नायज्वा यो भोजमभितो यजेत् ॥ २२ ॥
उन भोजके साथ उन्हें घेरकर चलनेवाले लोगोंमें ऐसा कोई नहीं था, जो पुत्रहीन हो अथवा सैकड़ोंकी दक्षिणा देनेवाला न हो अथवा सैकड़ों-सहस्रों वर्षोंकी आयुवाला न हो अथवा अशुद्ध कर्म करनेवाला हो तथा यज्ञ करने-वाला न हो ॥ २२ ॥
पूर्वस्यां दिशि नागानां भोजस्येत्यनुमोदनम् ।
सोपासङ्गानुकर्षाणां ध्वजिनां सवरूथिनाम् ॥ २३ ॥
रथानां मेघघोषाणां सहस्राणि दशैव तु ।
रूप्यकाञ्चनकक्षाणां सहस्राणि दशापि च ॥ २४ ॥
पूर्व-दिशामें राजा भोज (आहुक) का अभिनन्दन करनेके लिये चाँदी और सोनेकी साँकलोंसे बाँधे जानेवाले दस हजार हाथी आते थे तथा उपासङ्ग (जुआ), अनुकर्ष (रथके नीचेका काष्ठ) और वरूथ (रथत्राण कवच) वाले एवं मेघोंकी भाँति घोष करनेवाले ध्वजाधारी दस हजार रथ उनका स्वागत करनेके लिये आते थे ॥ २३-२४ ॥
तावन्त्येव सहस्राणि उत्तरस्यां तथा दिशि ।
आ भूमिपालान् भोजाः स्वानुपतिष्ठन्किङ्किणीकिणः ॥ २५ ॥
उतने ही हजार रथ और हाथी उत्तर तथा अन्य दिशाओंमें भी राजा आहुकका अभिनन्दन करनेके लिये आते थे। भोजवंशी यादव सब सामन्तोंको वशमें करके आहुककी उपासना करते थे। राजा आहुकने उन सबके रथ सोनेकी घंटियों-घूँघुरुओंवाले बनवा दिये थे ॥ २५ ॥
आहुकीं चाप्यवन्तिभ्यः स्वसारं ददुरन्धकाः ।
आहुकस्य तु काश्यायां द्वौ पुत्रौ सम्प्रसूवतः ॥ २६ ॥
देवकश्चोग्रसेनश्च देवपुत्रसमावुभौ ।
अन्धकवंशीयोंने आहुककी बहिन आहुकीको अवन्तिके राजवंशमें ब्याह दी। आहुकके काशिराजकी पुत्रीमें देवकुमारों-के समान सुन्दर देवक और उग्रसेन नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २६½ ॥
देवकस्याभवन्पुत्राश्चत्वारस्त्रिदशोपमाः ॥ २७ ॥
देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः ।
देवकके देवकुमारों-जैसे देववान्, उपदेव, सुदेव और देवरक्षित नामके चार पुत्र थे ॥ २७½ ॥
कुमार्यः सप्त चाप्यासन् वसुदेवाय ता ददौ ॥ २८ ॥
देवकी शान्तिदेवा च सुदेवा देवरक्षिता ।
वृकदेव्युपदेवी च सुनाम्नी चैव सप्तमी ॥ २९ ॥
उन्हींके देवकी, शान्तिदेवा, सुदेवा, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी और सातवीं सुनाम्नी—इस प्रकार सात पुत्रियाँ थीं; देवकने उन सबका विवाह वसुदेवजीके साथ कर दिया था ॥
नवोग्रसेनस्य सुतास्तेषां कंसस्तु पूर्वजः ।
न्यग्रोधश्च सुनामा च कङ्कः शङ्कुः सुभूमिपः ॥ ३० ॥
राष्ट्रपालोऽथ सुतनुरानाधृष्टिश्च पुष्टिमन् ।
तेषां स्वसारः पञ्चाऽऽसन् कंसा कंसवती तथा ॥ ३१ ॥
सुतनू राष्ट्रपाली च कङ्का चैव वराङ्गना ।
उग्रसेनः सहापत्यो व्याख्यातः कुकुरोद्भवः ॥ ३२ ॥
उग्रसेनके नौ पुत्र थे, उनमें कंस सबसे बड़ा था। शेषके नाम इस प्रकार हैं—न्यग्रोध, सुनामा, कङ्क, सुभूमिप शङ्कु, राष्ट्रपाल, सुतनु, अनाधृष्टि और पुष्टिमान्। इनकी कंसा, कंसवती, सुतनू, राष्ट्रपाली और कङ्का नामकी पाँच सुन्दराङ्गी बहिनें थीं। इस प्रकार कुकुरवंशमें उत्पन्न हुए उग्रसेन और उनकी संतानका वर्णन किया गया ॥ ३०-३२ ॥
कुकुराणामिमं वंशं धारयन्नमितौजसाम् ।
आत्मनो विपुलं वंशं प्रजावानाप्नुयान्नरः ॥ ३३ ॥
जो मनुष्य इन अमिततेजस्वी कुकुरोंके वंशका वर्णन सुनता है, वह संतान पाता है तथा उसके वंशकी बड़ी वृद्धि होती है ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें (बभ्रुवंश-वर्णन-विषयक) सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥