विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ हरिवंशपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः १४३
अग्नि देवताओंके प्राण हैं और मधुसूदन अग्निके भी प्राण हैं। (ये अग्निके प्राण बनकर अग्निके द्वारा क्या करते हैं, इसको स्पष्ट करते हुए कहते हैं, अग्निके द्वारा पृथक् किये हुए अन्नके साररूप) रससे रक्त बनता है (और उससे क्रमशः वीर्य बनकर गर्भ रहता है, इस प्रकार वह अग्निके प्राण बनकर अग्निके द्वारा सारा सृष्टिकार्य चलाते हैं) और रक्तसे मांस बनता है ॥ ४८ ॥
मांसात्तु मेदसो जन्म मेदसोऽस्थीनि चैव हि ।
अस्थ्नो मज्जा समभवन्मज्जातः शुक्रमेव च ॥ ४९ ॥
मांससे मेद (चर्बी) की उत्पत्ति होती है और मेदसे अस्थियोंकी उत्पत्ति होती है, हड्डियोंसे मज्जा बनती है और मज्जासे वीर्यकी उत्पत्ति होती है ॥ ४९ ॥
शुक्राद् गर्भः समभवद् रसमूलेन कर्मणा ।
तत्रापां प्रथमो भागः स सौम्यो राशिरुच्यते ॥ ५० ॥
गर्भोष्मसम्भवोऽग्निर्यो द्वितीयो राशिरुच्यते ।
शुक्रं सोमात्मकं विद्यादार्तवं विद्धि पावकम् ॥ ५१ ॥
रसमूल कर्मके द्वारा वीर्यसे गर्भ रहता है, उसमें प्रथम भाग जलका अंश (वीर्य होता है, वह श्वेत होनेसे) सौम्य होता है, जलप्रधान सोमका अंश होता है और गर्भकी गरमी-से अर्थात् जठराग्निसे उत्पन्न हुआ (रक्तरूप) जो दूसरा भाग उसमें रहता है, वह (रक्त-राशि) अग्निका अंश कहलाता है। (इस प्रकार) वीर्यको सोमका अंश और रज-को अग्निका अंश समझना चाहिये ॥ ५०-५१ ॥
भागौ रसात्मकौ ह्येषां वीर्ये च शशिपावकौ ।
कफवर्गे भवेच्छुक्रं पित्तवर्गे च शोणितम् ॥ ५२ ॥
कफस्य हृदयं स्थानं नाभ्यां पित्तं प्रतिष्ठितम् ।
(पूर्वोक्त रीतिसे) ये दोनों रसके ही भाग हैं, क्योंकि शशि और पावक अर्थात् शुक्र और शोणित इन रस आदिके ही सार हैं। (अब जगत्के अग्निषोमात्मकस्वरूपको सिद्ध करते हैं) शुक्र (वीर्य) कफवर्गमें है और रक्त पित्तवर्गमें है। (वीर्यके आश्रयसे रहनेवाले और जिसका देवता सोम है, ऐसे) कफका स्थान हृदय है। (रक्तके आश्रयसे रहनेवाले और जिसका देवता अग्नि है, ऐसे) पित्तका स्थान नाभि है ॥ ५२½ ॥
देहस्य मध्ये हृदयं स्थानं तन्मनसः स्मृतम् ।
नाभिकोष्ठान्तरं यत् तु तत्र देवो हुताशनः ॥ ५३ ॥
देहके मध्यमें जो हृदय है, वही मनका स्थान कहलाता है और नाभिकोष्ठके भीतर (वाणीका अधिष्ठातृ-देवता) अग्नि रहता है ॥ ५३ ॥
मनः प्रजापतिर्ज्ञेयः कफः सोमो विभाव्यते ।
पित्तमग्निः स्मृतं ह्येतदग्नीषोमात्मकं जगत् ॥ ५४ ॥
(मनका अधिष्ठातृ-देवता प्रजापति होनेके कारण) मनको प्रजापति समझना चाहिये, कफको सोम समझना चाहिये और पित्तको अग्नि कहा गया है। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् अग्नीषोमात्मक है ॥ ५४ ॥
एवं प्रवर्तिते गर्भे वर्द्धितेऽम्बुदसन्निभे ।
वायुः प्रवेशं संचक्रे सङ्गतः परमात्मना ॥ ५५ ॥
जैसे धुएँ, ज्योति, जल और पवनसे मेघ बढ़ता है, उसी प्रकार गर्भ भी अन्न, अग्नि, जल और प्राणसे बढ़ता है, अतएव अचेतन है, उसके बढ़नेपर (प्राणवायुका सहचर होनेसे जीवरूप) वायु ईश्वरके साथ उसमें प्रवेश करता है (और उसीके साथ उत्क्रमण करता है) ॥ ५५ ॥
ततोऽङ्गानि विसृजति बिभर्ति परिवर्द्धयन् ।
स पञ्चधा शरीरस्थो भिद्यते वर्द्धते पुनः ॥ ५६ ॥
देहमें प्रवेश करनेके अनन्तर वह (प्राणोपाधिक) जीव (सिर आदि) अङ्गोंको रचता है और उनको बढ़ाता हुआ उनको पुष्ट भी करता रहता है। वह (प्राणके पाँच प्रकारका होनेसे स्वयं भी) पाँच भागोंमें बँटकर बढ़ता रहता है ॥ ५६ ॥
प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ।
प्राणः स प्रथमं स्थानं वर्द्धयन् परिवर्तते ॥ ५७ ॥
वे पाँच भेद इस प्रकार हैं—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। इनमें प्राण प्रथम-स्थान (हृत्-पिण्ड-हृदय) को पुष्ट करता हुआ चलता रहता है ॥ ५७ ॥
अपानः पश्चिमं कायमुदानोर्ध्वं शरीरिणः ।
व्यानो व्यायच्छते येन समानः संनिवर्तयेत् ।
भूतावाप्तिस्ततस्तस्य जायतेन्द्रियगोचरात् ॥ ५८ ॥
अपान प्राणीके (जङ्घासे लेकर चरणतक) अधः-शरीर-को और उदान प्राणीके (जङ्घाओंसे ऊपरके) ऊर्ध्व-शरीरको बढ़ाता है और व्यान व्यायाम अर्थात् बल-साध्य कर्म करता है (अतएव वह शरीरकी सब संधियोंमें वर्तमान रहता है) और समान (नाभिमें रहकर) खायी और पीयी हुई वस्तुओंको