विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१४४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे · [ हरिवंशे
समान करता है (यथास्थान पहुँचा देता है)। इस प्रकार प्राणके कर्मोंका विभाग होनेके अनन्तर जीवको इन्द्रियोंके विषय (रूप आदि) के द्वारा उनके आश्रय (अग्नि आदि) भूतोंका साक्षात्कार होता है ॥ ५८ ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । तस्येन्द्रियाणि विप्राणि स्वं स्वं योगं प्रचक्रिरे ॥ ५९ ॥
(इसका कारण यह है कि) पृथ्वी, जल, तेज, वायु और पाँचवाँ आकाश—ये सब इन्द्रियोंके रूपमें परिणत होकर शरीरके अन्तर्गत अपने-अपने नेत्र-गोलक आदि स्थानोंमें प्रविष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार वे अपने-अपने सजातीयको ग्रहण करते हैं (अर्थात् पार्थिव घ्राणेन्द्रिय पृथ्वीके गुण गन्धको ग्रहण करती है, जलीय रसनेन्द्रिय जलके गुण रसको ग्रहण करती है, तैजस चक्षु तेजके गुण रूपको ग्रहण करती है, वायवीय त्वगिन्द्रिय वायुके गुण स्पर्शको ग्रहण करती है और आकाशीय श्रोत्रेन्द्रिय आकाशके गुण शब्दको ग्रहण करती है) ॥ ५९ ॥
पार्थिवं देहमाहुस्तं प्राणात्मानं च मारुतम् । छिद्राण्याकाशयोनीनि जलात् स्रावः प्रवर्तते ॥ ६० ॥
देहको अर्थात् इकट्ठे हुए कठिनांशको पृथ्वीका विकार कहते हैं, प्राणको वायुका, शरीरमें स्थित नौ छिद्रोंको आकाशका विकार कहते हैं और शरीरसे निकलनेवाले (मूत्र, पसीना वीर्य, आदि) सभी स्राव जलके विकार हैं ॥ ६० ॥
ज्योतिश्चक्षुश्च तेजात्मा तेषां यन्ता मनः स्मृतः । ग्रामाश्च विषयाश्चैव यस्य वीर्यात् प्रवर्तिताः ॥ ६१ ॥
चक्षुरिन्द्रिय तेजःस्वरूप है, इन सब पृथ्वी आदिके (सम्मिलित) तेजका अंश मन है, यह सभी इन्द्रियोंका नियामक है—इन सबको वशमें रखता है (मनके संयोगसे ही ये सब कार्यक्षम होती हैं)। इस मनके वीर्य-शक्तिसे ही (रूप आदिके आश्रय) पृथ्वी आदिका समूह और गन्ध आदि विषय प्रत्यक्ष होते हैं अथवा ग्राम-नगर आदि सब मनके लगनेपर ही बनाये जाते हैं ॥ ६१ ॥
इत्येवं पुरुषः सर्वान् सृजँल्लोकान् सनातनान् । कथं लोके नैधनेऽस्मिन् नरत्वं विष्णुरागतः ॥ ६२ ॥
पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु इस प्रकार इन सनातन लोकोंको रचते रहते हैं। ऐसे विष्णु भगवान् इस मरणशील संसारमें मनुष्य क्यों बने ? ॥ ६२ ॥
एष मे संशयो ब्रह्मन्नेवं मे विस्मयो महान् । कथं गतिर्गतिमत्तामापन्नो मानुषीं तनुम् ॥ ६३ ॥
ब्रह्मन् ! मुझे यही संदेह और बड़ा भारी विस्मय हो रहा है कि गतिमानोंको भी गति देनेवाले भगवान्ने मनुष्य-शरीर किसलिये धारण किया ? ॥ ६३ ॥
श्रुतो मे स्वस्य वंशस्य पूर्वेषां चैव सम्भवः । श्रोतुमिच्छामि विष्णोस्तु वृष्णीनां च यथाक्रमम् ॥
मैंने अपने वंशकी और अपने पूर्वजोंकी उत्पत्ति सुन ली, अब मैं विष्णुकी और वृष्णिवंशियोंकी उत्पत्तिको क्रमानुसार सुनना चाहता हूँ ॥ ६४ ॥
आश्चर्यं परमं विष्णोर्देवैर्दैत्यैश्च कथ्यते । विष्णोरुत्पत्तिमाश्चर्यं ममाचक्ष्व महामुने ॥ ६५ ॥
महामुने ! देवता और दैत्य विष्णुको परम अचरजभरा बताते हैं, अतः आप विष्णुकी अचरजसे भरी हुई उत्पत्तिका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ६५ ॥
एतदाश्चर्यमाख्यानं कथयस्व सुखावहम् । प्रख्यातबलवीर्यस्य विष्णोरमिततेजसः । कर्म चाश्चर्यभूतस्य विष्णोस्तत्त्वमिहोच्यताम् ॥ ६६ ॥
आप बल और वीर्यके लिये प्रसिद्ध अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके इस सुख देनेवाले आश्चर्यजनक आख्यानको सुनाइये और आश्चर्यस्वरूप विष्णुके कर्मोंको तथा तत्त्वको भी मुझे सुनाइये ॥ ६६ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि वराहोत्पत्तिवर्णने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें वराहोत्पत्तिवर्णनविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥