विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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इदं पुराणं परमं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम् ॥ १६॥
हन्त ते कथयिष्यामि विष्णोर्दिव्यां कथां शृणु।
जनमेजय ! यह पवित्र एवं श्रेष्ठ पुराण वेदोंके समान सम्मानित है। तुम पवित्र एवं मौन होकर इसे सुनो। मैं बड़े हर्षके साथ तुमसे भगवान् विष्णुकी यह दिव्य कथा कहता हूँ। इसे श्रवण करो ॥ १६½ ॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
धर्मसंस्थापनार्थाय तदा सम्भवति प्रभुः ॥ १७॥
भारत ! जब-जब धर्मका ह्रास होता है, तब-तब प्रभु धर्मको दृढ़ रूपमें स्थापित करनेके लिये अवतार ग्रहण करते हैं ॥ १७ ॥
तस्य ह्येका महाराज मूर्त्तिर्भवति सत्तमा ।
नित्यं दिविष्ठा या राजंस्तपश्चरति दुष्करम् ॥ १८॥
राजन् ! महाराज ! उनकी एक श्रेष्ठतम सात्त्विकी मूर्ति है, जो दिव्यलोकमें रहकर सदा दुष्कर तप करती है ॥ १८ ॥
द्वितीया चास्य शयने निद्रायोगमुपाययौ ।
प्रजासंहारसर्गार्थं किमध्यात्मविचिन्तकम् ॥ १९॥
उनकी दूसरी मूर्ति प्रजाके संहार और सृष्टिके लिये योगनिद्राका आश्रय ले शेषशय्यापर शयन करती है। वह योगनिद्रा अध्यात्मचिन्तकोंकी समाधिसे भी उत्कृष्ट है ॥ १९॥
सुप्त्वा युगसहस्रं स प्रादुर्भवति कार्यवान् ।
पूर्णे युगसहस्रे तु देवदेवो जगत्पतिः ॥ २० ॥
पितामहो लोकपालाश्चन्द्रादित्यौ हुताशनः ।
ब्रह्मा च कपिलश्चैव परमेष्ठी तथैव च ॥ २१ ॥
देवाः सप्तर्षयश्चैव त्र्यम्बकश्च महायशाः ।
वायुः समुद्राः शैलाश्च तस्य देहं समाश्रिताः ॥ २२॥
एक सहस्र चतुर्युगोंतक शयन करके वे सृष्टिसंचालनके कार्यसे पुनः विभिन्न (देवता आदिके) रूपोंमें प्रकट होते हैं। सहस्र युग पूर्ण हो जानेपर वे देवाधिदेव जगदीश्वर विष्णु ही पितामह ब्रह्मा, इन्द्रादि लोकपाल, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, कपिल, परमेष्ठी (दक्ष), देवता, सप्तर्षि और महायशस्वी त्रिनेत्रधारी शिव आदिके रूपमें प्रादुर्भूत होते हैं। वायु, समुद्र और पर्वत—ये सब-के-सब उन्हींके विराट् रूपका आश्रय लेकर स्थित हैं ॥ २०-२२ ॥
सनत्कुमारश्च महानुभावो
मनुर्महात्मा भगवान् प्रजाकरः ।
पुराणदेवोऽथ पुराणि चक्रे
प्रदीप्तवैश्वानरतुल्यतेजाः ॥ २३ ॥
महान् प्रभावशाली सनत्कुमार और प्रजाकी सृष्टि करने-वाले ऐश्वर्यशाली महात्मा मनु भी उन्हींके स्वरूप हैं। प्रदीप्त अग्निके समान तेजस्वी उन पुराणदेव श्रीहरिने ही समस्त देहधारियोंके शरीरोंकी रचना की है ॥ २३ ॥
येन चार्णवमध्यस्थौ नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
नष्टे देवासुरगणे प्रणष्टोरगराक्षसे ॥ २४ ॥
योद्धुकामौ सुदुर्धर्षौ दानवौ मधुकैटभौ ।
हतौ प्रभवता तेन तयोर्दत्त्वामृतं वरम् ॥ २५ ॥
महाप्रलयके समय जब कि देवता, असुरगण, नाग तथा राक्षस आदि समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो गये थे, एकार्णवके जलमें दो अत्यन्त दुर्धर्ष दानव प्रकट हुए। उनके नाम थे मधु और कैटभ । वे दोनों युद्ध चाहते थे । सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने ही उन दोनोंको मोक्षका अनुपम वर देकर मार डाला था ॥ २४-२५ ॥
पुरा कमलनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि ।
पुष्करे गत्र सम्भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा ॥ २६ ॥
पूर्वकालमें जब कमलनाभ भगवान् विष्णु समुद्रके जलमें शयन कर रहे थे, उनकी नाभिसे एक कमल प्रकट हुआ, जिसमें पहले ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवताओंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २६॥
एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः ।
पुराणे कथ्यते यत्र वेदः श्रुतिसमाहितः ॥ २७॥
पुराणमें यह परमात्मा विष्णुका पौष्कर नामका अवतार या सर्ग कहा जाता है । पुराण वह विद्या है, जिसमें मन्त्र एवं ब्राह्मण-भागकी श्रुतियोंसे सम्पन्न सम्पूर्ण वेद ही प्रतिष्ठित हैं (पुराणोंमें वेदार्थका ही विस्तार किया गया है) ॥ २७ ॥
वाराहस्तु श्रुतिमुखः प्रादुर्भावो महात्मनः ।
यत्र विष्णुः सुरश्रेष्ठो वाराहं रूपमास्थितः ।
महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ॥ २८ ॥
उन परमात्माका जो वाराह नामक अवतार है, वह श्रुतिमे वर्णित है। उस अवतारके समय सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णुने वाराहरूप धारणकर पर्वत और वनसहित समुद्रतककी सारी पृथ्वीका जलसे उद्धार किया था ॥ २८ ॥
वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः ।
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ॥ २९ ॥
चारों वेद उनके चार चरण और यूप उनकी दाढ़ें हैं। यज्ञ दाँत और श्येनचित् आदि चिति (इष्टिका-चयन) मुख है। साक्षात् अग्नि ही उनकी जिह्वा, कुशा रोमावलि और ब्रह्म मस्तक है। उनका तप महान् है ॥ २९ ॥
अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदाङ्गः श्रुतिभूषणः ।
आज्यनासः स्रुवातुण्डः सामघोषस्वनो महान् ॥३०॥
दिन और रात्रि उनके नेत्र हैं, वे दिव्यस्वरूप हैं । वेद उनका अङ्ग और श्रुतियाँ आभूषण हैं । हविष्य (घृत) नासिका, स्रुवा थूथुन और सामवेदका गम्भीर घोष ही उनका स्वर है। वे महान् हैं ॥ ३० ॥