भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 170

हरिवंशपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः १४७


धर्मसत्यमयः श्रीमान् क्रमविक्रमसत्कृतः ।
प्रायश्चित्तनखो धीरः पशुजानुर्महाभुजः ॥ ३१ ॥
धर्म और सत्य उनका स्वरूप है। वे श्रीसम्पन्न तथा क्रम (गति) और विक्रम (पराक्रम) के द्वारा सम्मानित हैं। प्रायश्चित्त उनके नख और पशु उनके घुटने हैं। वे धीर तथा विशाल भुजाओंसे युक्त हैं ॥ ३१ ॥

उद्गात्रन्त्रो होमलिङ्गः फलवीजमहौषधिः ।
वाय्वन्तरात्मा मन्त्रस्फिग्विकृतः सोमशोणितः ॥ ३२ ॥
उद्गाता अन्त्र (आँत), होम लिङ्ग तथा बड़ी-बड़ी ओषधियाँ उनके अण्डकोश और वीर्य हैं। वायु अन्तरात्मा, मन्त्र नितम्ब और निचोड़कर निकाला हुआ सोमरस ही उनका रक्त है ॥ ३२ ॥

वेदस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यातिवेगवान् ।
प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरार्चितः ॥ ३३ ॥
वेदी ही कंधा, हविष्य गन्ध तथा हव्य और कव्य उनका प्रचण्ड वेग है। प्राग्वंश (यजमान-गृह) उनका शरीर है। वे परम कान्तिमान् और नाना प्रकारकी दीक्षाओंसे सम्पन्न हैं ॥ ३३ ॥

दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान् ।
उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ॥ ३४ ॥
दक्षिणा ही उनका हृदय है। महान् सत्र (लंबे काल-तक चलनेवाले यज्ञ) उन महान् योगीका स्वरूप है। वेदोंका स्वाध्याय उनके ओठोंका आभूषण है और प्रवर्ग्य नामक कर्मकी आवृत्ति ही उनका भूषण है ॥ ३४ ॥

नानाच्छन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः ।
छायापत्नीसहायो वै मेरुशृङ्ग इवोच्छ्रितः ॥ ३५ ॥
अनेक प्रकारके छन्दोंकी गति उनका मार्ग है और वे गोपनीय उपनिषदरूपी आसनपर विराजमान रहते हैं। जलमें पड़नेवाली छाया (परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उस समय उनकी सहायिका थी और वे मेरुपर्वतके शिखरके समान ऊँचे जान पड़ते थे ॥ ३५ ॥

महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ।
एकार्णवजले भ्रष्टामेकार्णवगतः प्रभुः ॥ ३६ ॥
दंष्ट्रया यः समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया ।
सहस्रशीर्षो देवादि श्चकार पृथिवीं पुनः ॥ ३७ ॥
उन सहस्रों सिरवाले भगवान् वराहने, जो देवताओंके आदिकारण हैं, एकार्णवके जलमे प्रवेश करके उसमें डूबी हुई पर्वत, वन और काननोंसहित समुद्रतककी सारी पृथ्वीको अपनी दाढ़से ऊपर उठाकर सम्पूर्ण लोकोंके हितकी कामनासे पुनः उसे जलके ऊपर स्थिरतापूर्वक स्थापित कर दिया ॥


एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना ।
उद्धृता पृथिवी सर्वा सागराम्बुधरा पुरा ॥ ३८ ॥
इस प्रकार प्रकट होकर समस्त प्राणियोंका हित चाहनेवाले यज्ञात्मा भगवान् वराहने समुद्र-जलको धारण करनेवाली समूची पृथ्वीका पूर्वकालमें उद्धार किया था ॥ ३८ ॥

वाराह एष कथितो नारसिंहमतः शृणु ।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ ३९ ॥
यह वाराह-अवतारकी कथा कही गयी। इसके बाद नरसिंह-अवतार हुआ, उसका वर्णन सुनो। उस अवतारमें भगवान्ने नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपु नामक दैत्य-का वध किया था ॥ ३९ ॥

पुरा कृतयुगे राजन् सुरारिर्बलदर्पितः ।
दैत्यानामादिपुरुषश्चचार तप उत्तमम् ॥ ४० ॥
दश वर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च ।
जपोपवासनिरतः स्थानमौनदृढव्रतः ॥ ४१ ॥
राजन् ! पहले सत्ययुगमें देवताओंका शत्रु हिरण्यकशिपु समस्त दैत्योंका आदि पुरुष था। उसे अपने बलका बड़ा घमंड था। उसने साढ़े ग्यारह हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। वह सदा जप और उपवासमे संलग्न रहता था। दृढ़ आसन लगाकर मौनावलम्बनपूर्वक दृढ़ताके साथ उत्तम व्रतका पालन करता था ॥ ४०-४१ ॥

ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चानघ ।
ब्रह्मा प्रीतोऽभवत् तस्य तपसा नियमेन च ॥ ४२ ॥
निष्पाप नरेश ! तदनन्तर उसके इन्द्रिय-संयम, मनो-निग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या और शौच-संतोषादि नियमोंके पालनसे ब्रह्माजी उसके ऊपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ४२ ॥

तं वै स्वयम्भूर्भगवान् स्वयमागत्य भूपते ।
विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ॥ ४३ ॥
भूपाल ! स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी हंससे युक्त सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा स्वयं वहाँ पधारे ॥ ४३ ॥

आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्देवदैवतैः सह ।
रुद्रैर्विश्वेस्सहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥ ४४ ॥
दिशाभिर्विदिशाभिश्च नदीभिः सागरैस्तथा ।
नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्च महाग्रहैः ॥ ४५ ॥
देवर्षिभिस्तपोवृद्धैः सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा ।
राजर्षिभिः पुण्यतमैर्गन्धर्वाप्सरोगणैः ॥ ४६ ॥
उनके साथ आदित्य, वसु, साध्य, मरुद्गण, अन्य देवगण, रुद्रगण, विश्वेदेव, यक्ष, राक्षस, किन्नर, दिशाएँ, विदिशाएँ, नदियों, समुद्र, नक्षत्र, मुहूर्त, आकाशचारी महान् ग्रह, तपस्यामें बढ़े-चढ़े देवर्षि, सिद्ध, सप्तर्षि, परम पुण्यात्मा राजर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराएं भी थीं ॥ ४४-४६ ॥

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