विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वैः सुरैस्तथा ।
ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचर-गुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यसे इस प्रकार बोले—॥ ४७ ॥
प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ ४८ ॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दैत्यराज ! तुम मेरे भक्त हो। तुम्हारी इस तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो और मनोवाञ्छित भोग प्राप्त करो' ॥ ४८ ॥
हिरण्यकशिपुरुवाच
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ।
न मानुषाः पिशाचाश्च निहन्युर्मां कथंचन ॥ ४९ ॥
ऋषयो वा न मां शापैः क्रुद्धा लोकपितामह ।
शपेयुस्तपसा युक्ता वरमेतं वृणोम्यहम् ॥ ५० ॥
हिरण्यकशिपु बोला—लोकपितामह ! मुझे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच किसी तरह मार न सकें। तपस्वी ऋषि-महर्षि कुपित होकर मुझे शाप न दें, मैं आपसे यही वर माँगता हूँ ॥ ४९-५०॥
न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन वा ।
न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न चान्येन मे वधः ॥ ५१ ॥
न शस्त्रसे, न अस्त्रसे, न पर्वत अथवा वृक्षसे, न सूखे-से, न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो ॥ ५१ ॥
पाणिप्रहारेणैकेन सभृत्यबलवाहनम् ।
यो मां नाशयितुं शक्तः स मे मृत्युर्भविष्यति ॥ ५२ ॥
जो मेरे सेवक, सेना और वाहनोंसहित मुझे एक ही थप्पड़से मार डालनेमें समर्थ हो, उसीके हाथसे मेरी मृत्यु हो ॥ ५२ ॥
भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हुताशनः ।
सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश ॥ ५३ ॥
मैं ही सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, नक्षत्र और दसों दिशाओंके रूपमें स्थित रहूँ ॥ ५३ ॥
अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः ।
धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किं पुरुषाधिपः ॥ ५४ ॥
मैं ही काम और क्रोधका अधिष्ठाता होऊँ। मैं ही वरुण, इन्द्र, यम, धनाध्यक्ष कुबेर, यक्ष एवं किम्पुरुषोंका स्वामी होऊँ ॥ ५४ ॥
एवमुक्तस्तु दैत्येन स्वयम्भूर्भगवान्स्तदा ।
उवाच दैत्यराजं तं प्रहसन् नृपसत्तम ॥ ५५ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस दैत्यके यों कहनेपर स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा ठठाकर हँस पड़े और उस समय उस दैत्यराजसे इस प्रकार बोले ॥ ५५ ॥
ब्रह्मोवाच
एते दिव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः ।
सर्वान् कामानिमांस्तात प्राप्स्यसि त्वं न संशयः ॥ ५६॥
ब्रह्माजीने कहा—तात ! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दे दिये। तुम इन सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ५६ ॥
एवमुक्त्वा तु भगवाञ्जगामाकाशमेव हि ।
वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ ५७ ॥
यों कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमें स्थित, ब्रह्मर्षिगणों-से सेवित वैराजपद नामक ब्रह्मधामको चले गये ॥ ५७ ॥
ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनयस्तथा ।
वरप्रदानं श्रुत्वा ते पितामहमुपस्थिताः ॥ ५८ ॥
तदनन्तर देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि वह वरदान सुनकर पितामह ब्रह्माजीके पास गये ॥ ५८ ॥
विभुं विज्ञापयामासुर्देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥ ५९ ॥
वहाँ पहुँचकर इन्द्र आदि देवताओंने भगवान् ब्रह्मासे अपने मानसिक भयको इस प्रकार सूचित किया ॥ ५९ ॥
देवा ऊचुः
वरेणानेन भगवन् बाधयिष्यति नोऽसुरः ।
ततः प्रसीद भगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम् ॥ ६० ॥
भवान् हि सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः ।
स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥ ६१ ॥
देवता बोले—भगवन् ! इस वरके प्रभावसे तो वह असुर हमलोगोंको सदा ही महान् कष्ट पहुँचाता रहेगा। अतः आप प्रसन्न होइये और उसके वधका भी कोई उपाय सोचिये; क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्यके निर्माता, अव्यक्तप्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं ॥ ६०-६१ ॥
ततो लोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः ।
प्रोवाच भगवान् वाक्यं सर्वान् देवगणांस्तदा ॥ ६२ ॥
उस समय देवताओंका यह लोकहितकारी वचन सुन-कर उन प्रजापतिदेव भगवान् ब्रह्माने समस्त देवताओंसे इस प्रकारकी बात कही—॥ ६२ ॥
अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् ।
तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति ॥ ६३ ॥
'देवताओ ! उस असुरको अपनी तपस्याका फल अवश्य