भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

हरिवंशपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः १४९


प्राप्त होगा । (फल-भोगके द्वारा) जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब भगवान् विष्णु स्वयं ही उसका वध करेंगे॥६३॥

एतच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे वाक्यं पङ्कजसम्भवात्।
स्वानि स्थानानि दिव्यानि जग्मुस्ते वै मुदान्विताः॥ ६४॥

कमलयोनि ब्रह्माजीके मुखसे यह बात सुनकर समस्त देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने दिव्य स्थानोंको चले गये ॥ ६४ ॥

लब्धमात्रे वरे चापि सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥ ६५॥

वह वर पाते ही दैत्य हिरण्यकशिपु समस्त प्रजाको कष्ट देने लगा; क्योंकि ब्रह्माजीके उस वरदानसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया था ॥ ६५ ॥

आश्रमेषु महाभागान् मुनीन् वै शंसितव्रतान्।
सत्यधर्मरतान् दान्तान् पुरा धर्षितवांस्तु सः ॥ ६६॥

सबसे पहले आश्रमोंमें रहनेवाले उत्तम व्रतके पालक, सत्य-धर्मपरायण तथा जितेन्द्रिय महाभाग मुनियोंको उसने पीड़ा देना आरम्भ किया ॥ ६६ ॥

देवांस्त्रिभुवनस्थांस्तु पराजित्य महासुरः।
त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ॥ ६७॥

तीनों लोकोंमें रहनेवाले देवताओंको हराकर त्रिलोकीके राज्यको अपने वशमें करके वह महान् असुर दानव स्वर्गमें रहने लगा ॥ ६७ ॥

यदा वरमदोन्मत्तो न्यवसद् दानवो दिवि ।
यज्ञियान् कृतवान् दैत्यान् देवांश्चैवाप्ययज्ञियान् ॥ ६८॥

वरदानके मदसे उन्मत्त हुआ वह दानव जब देवलोकमें निवास करता था, उन दिनों उसने दैत्योंको तो यज्ञका भागी बनाया और देवताओंको उससे वञ्चित कर दिया ॥

आदित्याश्च ततो रुद्रा विश्वे च मरुतस्तथा ।
शरण्यं शरणं विष्णुमुपाजग्मुर्महाबलम् ॥ ६९॥
वेदयज्ञमयं ब्रह्म ब्रह्मदेवं सनातनम् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च प्रभुं लोकनमस्कृतम् ।
नारायणं विभुं देवाः शरणं शरणागताः ॥ ७०॥

तब आदित्य, रुद्र, विश्वेदेव और मरुद्गण आदि मिलकर शरणागतवत्सल, वेद एवं यज्ञस्वरूप, ब्रह्माजीके भी आराध्यदेव, सनातन ब्रह्मरूप महाबली भगवान् विष्णुकी शरणमें गये । भूत, वर्तमान और भविष्य जिनका स्वरूप है, जो सब कुछ करनेमें समर्थ तथा समस्त लोकोंद्वारा वन्दित हैं, उन्हीं सर्वव्यापी नारायणकी उन शरणागत देवताओंने शरण ली॥६९-७०॥

देवा ऊचुः
त्रायस्व नोऽद्य देवेश हिरण्यकशिपोर्भयात् ।
त्वं हि नः परमो धाता ब्रह्मादीनां सुरोत्तम ॥ ७१ ॥

देवता बोले---देवेश्वर ! आप हिरण्यकशिपुके भयसे अब हमारी रक्षा करें । सुरश्रेष्ठ ! आप हम ब्रह्मा आदि देवताओंके भी परम पालक हैं ॥ ७१ ॥

त्वं हि नः परमो देवस्त्वं हि नः परमो गुरुः ।
उत्फुल्लाम्बुजपत्राक्षः शत्रुपक्षभयंकरः ।
क्षयाय दितिवंशस्य शरण्यस्त्वं भवस्व नः ॥ ७२ ॥

आप ही हमारे परम देवता और आप ही हमारे परम गुरु हैं । आपके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान शोभा पाते हैं । आप शत्रुपक्षको भय देनेवाले हैं । प्रभो ! आप दैत्योंके विनाशके लिये हमारे शरणदाता हों ॥ ७२ ॥

विष्णुरुवाच
भयं त्यजध्वममरा ह्यभयं वो ददाम्यहम् ।
तथैवं त्रिदिवं देवाः प्रतिपत्स्यथ माचिरम् ॥ ७३ ॥

भगवान् विष्णुने कहा--देवताओ ! भय छोड़ दो । मैं तुम्हें अभय देता हूँ । तुम शीघ्र ही पहलेकी भाँति स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे ॥ ७३ ॥

एष तं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ।
अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ॥ ७४ ॥

जो वरदान पाकर घमंडमें भर गया है तथा जो देवेश्वरोंके लिये अवध्य हो गया है, उस दितिपुत्र दानवराज हिरण्यकशिपुको उसके सेवकोंसहित मार डालता हूँ ॥ ७४ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदशेश्वरान् ।
हिरण्यकशिपो राजन्नाजगाम हरिः सभाम् ॥ ७५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन् ! यों कहकर भगवान् विष्णुने उन देवेश्वरोंको तो विदा कर दिया और स्वयं हिरण्यकशिपुके सभाभवनमें पधारे ॥ ७५ ॥

नरस्य कृत्वाधंतनुं सिंहस्यार्धतनुं प्रभुः ।
नार्सिंहेण वपुषा पाणि निष्पिष्य पाणिना ॥ ७६ ॥

उस समय उन प्रभुने अपना आधा शरीर मनुष्यका-सा बना लिया था और आधा सिंहका-सा । इस प्रकार नृसिंहरूप धारण करके वे एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए वहाँ आये ॥ ७६ ॥

जीमूतघनसंकाशो जीमूतघननिःस्वनः ।
जीमूतघनदीप्तौजा जीमूत इव वेगवान् ॥ ७७ ॥

उनके शरीरका वर्ण सजल मेघके समान श्याम था । उनका शब्द भी जलपूर्ण मेघकी गर्जनाके समान ही गम्भीर था । उनके उद्दीप्त तेज और वेग भी बरसनेवाले बादलके ही तुल्य थे ॥ ७७ ॥

दैत्यं सोऽतिबलं दीप्तं दृप्तशार्दूलविक्रमम् ।
दृप्तैर्दैत्यगणैर्गुप्तं हतवानेकपाणिना ॥ ७८ ॥