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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

हरिवंशपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः १४९


प्राप्त होगा । (फल-भोगके द्वारा) जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब भगवान् विष्णु स्वयं ही उसका वध करेंगे॥६३॥

एतच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे वाक्यं पङ्कजसम्भवात्।
स्वानि स्थानानि दिव्यानि जग्मुस्ते वै मुदान्विताः॥ ६४॥

कमलयोनि ब्रह्माजीके मुखसे यह बात सुनकर समस्त देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने दिव्य स्थानोंको चले गये ॥ ६४ ॥

लब्धमात्रे वरे चापि सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥ ६५॥

वह वर पाते ही दैत्य हिरण्यकशिपु समस्त प्रजाको कष्ट देने लगा; क्योंकि ब्रह्माजीके उस वरदानसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया था ॥ ६५ ॥

आश्रमेषु महाभागान् मुनीन् वै शंसितव्रतान्।
सत्यधर्मरतान् दान्तान् पुरा धर्षितवांस्तु सः ॥ ६६॥

सबसे पहले आश्रमोंमें रहनेवाले उत्तम व्रतके पालक, सत्य-धर्मपरायण तथा जितेन्द्रिय महाभाग मुनियोंको उसने पीड़ा देना आरम्भ किया ॥ ६६ ॥

देवांस्त्रिभुवनस्थांस्तु पराजित्य महासुरः।
त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ॥ ६७॥

तीनों लोकोंमें रहनेवाले देवताओंको हराकर त्रिलोकीके राज्यको अपने वशमें करके वह महान् असुर दानव स्वर्गमें रहने लगा ॥ ६७ ॥

यदा वरमदोन्मत्तो न्यवसद् दानवो दिवि ।
यज्ञियान् कृतवान् दैत्यान् देवांश्चैवाप्ययज्ञियान् ॥ ६८॥

वरदानके मदसे उन्मत्त हुआ वह दानव जब देवलोकमें निवास करता था, उन दिनों उसने दैत्योंको तो यज्ञका भागी बनाया और देवताओंको उससे वञ्चित कर दिया ॥

आदित्याश्च ततो रुद्रा विश्वे च मरुतस्तथा ।
शरण्यं शरणं विष्णुमुपाजग्मुर्महाबलम् ॥ ६९॥
वेदयज्ञमयं ब्रह्म ब्रह्मदेवं सनातनम् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च प्रभुं लोकनमस्कृतम् ।
नारायणं विभुं देवाः शरणं शरणागताः ॥ ७०॥

तब आदित्य, रुद्र, विश्वेदेव और मरुद्गण आदि मिलकर शरणागतवत्सल, वेद एवं यज्ञस्वरूप, ब्रह्माजीके भी आराध्यदेव, सनातन ब्रह्मरूप महाबली भगवान् विष्णुकी शरणमें गये । भूत, वर्तमान और भविष्य जिनका स्वरूप है, जो सब कुछ करनेमें समर्थ तथा समस्त लोकोंद्वारा वन्दित हैं, उन्हीं सर्वव्यापी नारायणकी उन शरणागत देवताओंने शरण ली॥६९-७०॥

देवा ऊचुः
त्रायस्व नोऽद्य देवेश हिरण्यकशिपोर्भयात् ।
त्वं हि नः परमो धाता ब्रह्मादीनां सुरोत्तम ॥ ७१ ॥

देवता बोले---देवेश्वर ! आप हिरण्यकशिपुके भयसे अब हमारी रक्षा करें । सुरश्रेष्ठ ! आप हम ब्रह्मा आदि देवताओंके भी परम पालक हैं ॥ ७१ ॥

त्वं हि नः परमो देवस्त्वं हि नः परमो गुरुः ।
उत्फुल्लाम्बुजपत्राक्षः शत्रुपक्षभयंकरः ।
क्षयाय दितिवंशस्य शरण्यस्त्वं भवस्व नः ॥ ७२ ॥

आप ही हमारे परम देवता और आप ही हमारे परम गुरु हैं । आपके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान शोभा पाते हैं । आप शत्रुपक्षको भय देनेवाले हैं । प्रभो ! आप दैत्योंके विनाशके लिये हमारे शरणदाता हों ॥ ७२ ॥

विष्णुरुवाच
भयं त्यजध्वममरा ह्यभयं वो ददाम्यहम् ।
तथैवं त्रिदिवं देवाः प्रतिपत्स्यथ माचिरम् ॥ ७३ ॥

भगवान् विष्णुने कहा--देवताओ ! भय छोड़ दो । मैं तुम्हें अभय देता हूँ । तुम शीघ्र ही पहलेकी भाँति स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे ॥ ७३ ॥

एष तं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ।
अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ॥ ७४ ॥

जो वरदान पाकर घमंडमें भर गया है तथा जो देवेश्वरोंके लिये अवध्य हो गया है, उस दितिपुत्र दानवराज हिरण्यकशिपुको उसके सेवकोंसहित मार डालता हूँ ॥ ७४ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदशेश्वरान् ।
हिरण्यकशिपो राजन्नाजगाम हरिः सभाम् ॥ ७५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन् ! यों कहकर भगवान् विष्णुने उन देवेश्वरोंको तो विदा कर दिया और स्वयं हिरण्यकशिपुके सभाभवनमें पधारे ॥ ७५ ॥

नरस्य कृत्वाधंतनुं सिंहस्यार्धतनुं प्रभुः ।
नार्सिंहेण वपुषा पाणि निष्पिष्य पाणिना ॥ ७६ ॥

उस समय उन प्रभुने अपना आधा शरीर मनुष्यका-सा बना लिया था और आधा सिंहका-सा । इस प्रकार नृसिंहरूप धारण करके वे एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए वहाँ आये ॥ ७६ ॥

जीमूतघनसंकाशो जीमूतघननिःस्वनः ।
जीमूतघनदीप्तौजा जीमूत इव वेगवान् ॥ ७७ ॥

उनके शरीरका वर्ण सजल मेघके समान श्याम था । उनका शब्द भी जलपूर्ण मेघकी गर्जनाके समान ही गम्भीर था । उनके उद्दीप्त तेज और वेग भी बरसनेवाले बादलके ही तुल्य थे ॥ ७७ ॥

दैत्यं सोऽतिबलं दीप्तं दृप्तशार्दूलविक्रमम् ।
दृप्तैर्दैत्यगणैर्गुप्तं हतवानेकपाणिना ॥ ७८ ॥

१५०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंश

यद्यपि दैत्य हिरण्यकशिपु अत्यन्त बलवान्, तेजस्वी, दर्पमें भरे हुए सिंहके समान पराक्रमी तथा बलाभिमानी दैत्योंद्वारा सुरक्षित था, तो भी भगवान् नृसिंहने उसे एक ही थप्पड़से मारकर यमलोक पहुँचा दिया ॥ ७८ ॥

नृसिंह एष कथितो भूयोऽयं वामनोऽपरः ।
यत्र वामनमाश्रित्य रूपं दैत्यविनाशकृत् ॥ ७९ ॥

यह नृसिंहावतारकी कथा कही गयी । अब दूसरे वामन-अवतारका वर्णन सुनो, जिसमें वामनरूप धारण करके भगवान्ने दैत्योंका विनाश किया था ॥ ७९ ॥

बलेर्बलवतो यज्ञे वलिना विष्णुना पुरा ।
विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्याः क्षोभितास्ते महासुराः ॥ ८० ॥

पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णु (वामनरूप धारणकर ) बलवान् बलिके यज्ञमें गये और वहाँ उन्होंने अपने तीन ही पगोंसे ( त्रिलोकीको नापकर ) किसीसे क्षुब्ध न होनेवाले बड़े-बड़े असुरोंको क्षुब्ध कर डाला ॥ ८० ॥

विप्रचित्तिः शिविः शङ्कुरयःशङ्कुस्तथैव च ।
अयःशिराः शङ्कुशिरा हयग्रीवश्च वीर्यवान् ॥ ८१ ॥
वेगवान् केतुमांनुग्रः सोमव्यग्रो महासुरः ।
पुष्करः पुष्कलश्चैव वेपनश्च महारथः ॥ ८२ ॥
बृहत्कीर्तिर्महाजिह्वः साश्वोऽश्वपतिरेव च ।
प्रह्रादोऽश्वशिराः कुम्भः संह्लादो गगनप्रियः ।
अनुह्लादो हरिहरौ वराहः शंकरो रुजः ॥ ८३ ॥
शरभः शलभश्चैव कुपनः कोपनः क्रथः ।
वृहतकीर्तिर्महाजिह्वः शङ्कुकर्णो महास्वनः ॥ ८४ ॥
दीर्घजिह्वोऽर्कनयनो मृदुचापो मृदुप्रियः ।
वायुर्यविष्ठो नमुचिः शम्बरो विज्वरो महान् ॥ ८५ ॥
चन्द्रहन्ता क्रोधहन्ता क्रोधवर्धन एव च ।
कालकः कालकेयश्च वृत्रः क्रोधो विरोचनः ॥ ८६ ॥
गरिष्ठश्च वरिष्ठश्च प्रलम्बन नरकावुभौ ।
इन्द्रतापनवातापी केतुमान् बलदर्पितः ॥ ८७ ॥
असिलोमा पुलोमा च वाकलः प्रमदो मदः ।
खस्रमः कालवदनः करालः कौशिकः शरः ॥ ८८ ॥
एकाक्षश्चन्द्रहा राहुः संह्रादः सुमरः खनः ।
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा परिघपाणयः ॥ ८९ ॥
महाशिलाप्रहरणाः शूलहस्ताश्च दानवाः ।
अश्मयन्त्नायुधोपेता भिन्दिपालायुधास्तथा ॥ ९० ॥
शूलोलूखलहस्ताश्च परश्वधधरास्तथा ।
पाशमुद्गरहस्ता वै तथा मुसलपाणयः ॥ ९१ ॥
नानाप्रहरणा घोरा नानावेषा महाजवाः ।
कूर्मकुक्कुटवक्त्राश्च शशोल्लूकमुखास्तथा ॥ ९२ ॥
खरोष्ट्रवदनाश्चैव वराहवदनास्तथा ।
भीमा मकरवक्त्राश्च क्रोष्टुवक्त्राश्च दानवाः ।
आखुद्दुर्दुरवक्त्राश्च घोरा वृकमुखास्तथा ॥ ९३ ॥
मार्जारगजवक्त्राश्च महावक्त्रास्तथापरे ।
नक्रमेषाननाः शूरा गोऽजाविमहिषाननाः ॥ ९४ ॥
गोधामल्यकवक्त्राश्च क्रौञ्चवक्त्राश्च दानवाः ।
गरुडाननाः खड्गमुखा मयूरवदनास्तथा ॥ ९५ ॥
गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बराः ।
चीरसंवृतदेहाश्च तथा वल्कलवाससः ॥ ९६ ॥
उष्णीषिणो मुकुटिनस्तथा कुण्डलिनोऽसुराः ।
किरीटिनो लम्बशिखाः कम्बुग्रीवाः सुवर्चसः ।
नानावेषधरा दैत्या नानामाल्यानुलेपनाः ॥ ९७ ॥
खान्ययुधानि संगृह्य प्रदीप्तान्यतितैजसा ।
क्रममाणं हृषीकेशमुपावर्तन्त सर्वशः ॥ ९८ ॥

जिस समय भगवान् हृषीकेश अपने डग बढ़ा रहे थे, उस समय विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कूरय और शङ्कु, अयःशिरा तथा शङ्कुशिरा, पराक्रमी हयग्रीव, वेगवान्, केतुमान्, उग्र, महान् असुर सोमव्यग्र, पुष्कर और पुष्कल तथा महारथी वेपन, बृहत्कीर्ति, महाजिह्व तथा अश्वसहित अश्वपति, प्रह्लाद, अश्वशिरा, कुम्भ, संह्राद, गगनप्रिय, अनुह्लाद, हरि और हर, वराह, शंकर, रुज, शरभ तथा शलभ, कुपन, कोपन, क्रथ, बृहत्कीर्ति, महाजिह्व, शङ्कुकर्ण, महास्वन, दीर्घजिह्व, अर्कनयन, मृदुचाप, मृदुप्रिय, वायु, यविष्ठ, नमुचि, शम्बर, महाकाय विज्वर, चन्द्रहन्ता, क्रोधहन्ता एवं क्रोधवर्धन, कालक तथा कालकेय, वृत्र, क्रोध, विरोचन, गरिष्ठ और वरिष्ठ, प्रलम्ब और नरक नामक दो दैत्य, इन्द्रतापन और वातापि, बलाभिमानी केतुमान्, असिलोमा तथा पुलोमा, वाकल, प्रमद, मद, खस्रम, कालवदन, कराल, कौशिक, शर, एकाक्ष, चन्द्रहा, राहु, संह्राद, सुमर और खन आदि दैत्य चारों ओरसे भगवान्‌को घेरकर खड़े हो गये। उनमेंसे किसीके हाथमें शतघ्नी (बंदूक) थी और किसीके हाथमें चक्र। बहुततेरे अपने हाथोंमें परिघ लिये खड़े थे। कुछ दानव बड़ी-बड़ी शिलाओंसे प्रहार करते थे। कितनोंके हाथोंमें शूल थे। कितने ही पत्थरके गोले फेंकनेवाले यन्त्ररूपी आयुधसे सम्पन्न थे। बहुततेरे भिन्दिपाल नामक अस्त्रका प्रयोग करते थे। कितने ही दैत्योंने अपने हाथोंमें शूल, ऊखल, फरसे, पाश, मुद्गर और मुसल ले रखे थे। इस प्रकार वे भाँति-भाँतिके आयुध धारण किये हुए थे। उनके वेष भी कई तरहके थे। वे सब-के-सब महान् वेगशाली और भयंकर थे। किन्हींके मुख कछुओं और मुर्गोंके समान थे तो किन्हींके खरहे और घुघूओंके सदृश। कितने ही दानवोंके मुख गदहे, ऊँट, सूअर, मगर और सियारोंके समान थे। वे सभी बड़े भयानक जान पड़ते थे। कुछ घोर रूपधारी दैत्योंके मुख चूहों और मेढकोंके समान थे। कितनोंके मुख भेड़ियोंसे मिलते-जुलते थे। किन्हींके मुख बिलाव-जैसे थे तो किन्हींके हाथियोंके समान। कोई-कोई इससे भी बड़े मुखवाले थे।

हरिवंशपर्व] एकचत्वारिंशोऽध्यायः १५१


बहुतोंके मुख नक्र (नाके), मेढ़े, बैल, बकरे, मेड़, भैंसे, गोह, साही, क्रौंच (कुरर), गरुड़, गैंडे और मोरोंके मिलते-जुलते थे। कुछ दैत्योंने गजराजके चमड़े ओढ़ रखे थे और कितनोंने वस्त्रकी जगह काले मृगचर्मको ही लपेट रखा था। बहुतोंके शरीर चीरसे ढके थे, और कितने ही वल्कल वस्त्र पहने थे; किन्हींके मस्तकपर पगड़ी शोभा पाती थी और किन्हींके मुकुट। कितने ही असुर किरीट और कुण्डलोंसे सुशोभित थे, किन्हींके सिरपर लंबी शिखाएँ शोभा पाती थीं। बहुत-से दैत्योंकी गर्दनें शङ्खके समान थीं। वे अत्यन्त तेजस्वी दैत्य नाना प्रकारके वेष धारण किये भाँति-भाँतिकी मालाओं और चन्दनोंसे अलंकृत थे। वे अत्यन्त तेजसे चमकते हुए अपने-अपने आयुध लिये खड़े थे ॥ ८१--९८॥

प्रमथ्य सर्वान् दैतेयान् पादहस्ततलैः प्रभुः।
रूपं कृत्वा महाभीमं जहाराशु स मेदिनीम् ॥ ९९ ॥

उन सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ने महाभयानक रूप धारण करके समस्त दैत्योंको लातों और थप्पड़ोंसे मथ डाला और शीघ्र ही इस पृथ्वीको उनसे छीन लिया ॥ ९९ ॥

तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे।
नभः प्रक्रममाणस्य नाभ्यां किल समास्थितौ ॥ १००॥

कहते हैं—जब वे भूमिको नाप रहे थे, उस समय चन्द्रमा और सूर्य उन विराट्रूपधारी भगवान्‌के स्तनोंके बीचमें आ गये थे और जब वे आकाश (स्वर्गलोक) को नापने लगे, तब चन्द्रमा और सूर्य उनकी नाभिमें आ गये ॥ १००॥

परं प्रक्रममाणस्य जानुदेशे स्थितावुभौ।
विष्णोरतुलवीर्यस्य वदन्त्येवं द्विजातयः ॥ १०१॥

वे अतुलपराक्रमी भगवान् विष्णु जब स्वर्गसे भी ऊपर-के (मह, जन, तप और सत्य नामक) लोकोंको नाप रहे थे, उस समय सूर्य और चन्द्रमा उनके दोनों घुटनोंमें स्थित दिखायी दिये--इस प्रकार ब्राह्मणलोग कहते हैं ॥ १०१ ॥

हृत्वास पृथिवीं कृत्स्नां जित्वा चासुरपुंगवान्।
ददौ शक्राय त्रिदिवं विष्णुर्बलवतां वरः ॥ १०२॥

इस प्रकार बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीविष्णुने सारी पृथ्वीका अपहरण करके बड़े-बड़े असुरोंको हराकर स्वर्गलोकका राज्य इन्द्रको दे दिया ॥ १०२ ॥

एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मनः।
वेदविद्भिर्द्विजैरेवं कथ्यते वैष्णवं यशः ॥ १०३॥

जनमेजय ! इस प्रकार मैंने तुम्हें परमात्मा श्रीहरिके वामन नामक अवतारकी कथा सुनायी। वेदवेत्ता ब्राह्मण इसी तरह भगवान् विष्णुके यश (लीला-चरित्र) का वर्णन करते हैं ॥ १०३ ॥


भूयो भूतात्मनो विष्णोः प्रादुर्भावो महात्मनः।
दत्तात्रेय इति ख्यातः क्षमया परया युतः ॥ १०४ ॥

इसके बाद भूतात्मा परमात्मा विष्णुका फिर जो अवतार हुआ, वह दत्तात्रेयके नामसे विख्यात है। भगवान् दत्तात्रेय बड़े ही क्षमाशील थे ॥ १०४ ॥

तेन नष्टेषु वेदेषु प्रक्रियासु मखेषु च।
चातुर्वर्ण्यं तु संकीर्णे धर्मे शिथिलतां गते ॥ १०५॥
अभिवर्धति चाधर्मे सत्ये नष्टेऽनृते स्थिते।
प्रजासु शीर्यमाणासु धर्मे चाकुलतां गते ॥ १०६॥

उस समय वेद लुप्त हो गये थे, वैदिकी प्रक्रिया और यज्ञ भी नष्टप्राय हो गये थे, चारों वर्णोंमें संकरता आ गयी थी, धर्म शिथिल हो चला था, अधर्म बड़े जोरोंके साथ बढ़ रहा था। सत्य मिटता जा रहा था और सब ओर असत्यका बोलबाला था। प्रजा क्षीण हो रही थी और धर्म पाखण्डसे मिश्रित हो गया था ॥ १०५-१०६ ॥

सहयज्ञक्रिया वेदाः प्रत्यानीता हि तेन वै।
चातुर्वर्ण्यमसंकीर्णं कृतं तेन महात्मना ॥ १०७॥

ऐसे समयमें भगवान् दत्तात्रेयने यज्ञों और क्रियाओंसहित वेदोंका पुनरुद्धार किया और चारों वर्णोंको पृथक्-पृथक् करके उन्हें व्यवस्थित रूप दिया ॥ १०७ ॥

तेन हैहयराजस्य कार्तवीर्यस्य धीमतः।
वरदेन वरो दत्तो दत्तात्रेयेण धीमता ॥ १०८॥

वरदायक एवं ज्ञाननिष्ठ भगवान् दत्तात्रेयने हैहयवंशी बुद्धिमान् राजा कार्तवीर्यको यह वर दिया था—॥ १०८ ॥

एतत् बाहुद्वयं यत्ते मृधे मम कृतेऽनघ।
शतानि दश बाहूनां भविष्यन्ति न संशयः ॥ १०९॥

‘निष्पाप नरेश ! ये जो तुम्हारी दो भुजाएँ हैं, मेरे वरदानके प्रभावसे युद्धके समय निस्सन्देह एक हजार भुजाओंके रूपमें परिणत हो जायँगी ॥ १०९ ॥

पालयिष्यसि कृत्स्नां च वसुधां वसुधाधिप।
दुर्निरीक्ष्योऽरिवृन्दानां धर्मज्ञश्च भविष्यसि ॥ ११०॥

‘पृथ्वीनाथ ! तुम सारी पृथ्वीका पालन करोगे, शत्रुओंके समुदाय तुम्हारी ओर बड़ी कठिनतासे देख सकेंगे तथा तुम धर्मके ज्ञाता होओगे’ ॥ ११० ॥

एष ते वैष्णवः श्रीमान् प्रादुर्भावोऽद्भुतः शुभः।
कथितो वै महाराज यथाश्रुतमरिंदम ॥ १११॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज ! मैंने जैसा सुना था, उसके अनुसार तुमसे भगवान् विष्णुके इस अद्भुत, शुभ एवं तेजस्वी अवतारका वर्णन किया है ॥ १११॥

भूयश्च जामदग्न्योऽयं प्रादुर्भावो महात्मनः।

१५२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

यन्न बाहुसहस्रेण विस्मितं दुर्जयं रणे।
रामोऽर्जुनमनीकस्थं जघान नृपतिं प्रभुः ॥११२॥

फिर परमात्मा श्रीहरिका जमदग्निनन्दन परशुरामके रूपमें अवतार हुआ। उस अवतारमें भगवान् परशुरामने सेनाके बीचमें खड़े हुए उस राजा अर्जुनका वध किया था, जो अपनी सहस्र भुजाओंके कारण घमंडमें भरा रहता था और समराङ्गणमें शत्रुओंके लिये दुर्जय बना हुआ था ॥

रथस्थं पार्थिवं रामः पातयित्वार्जुनं भुवि।
धर्षयित्वा यथाकामं क्रोशमानं च मेघवत् ॥११३॥
कृत्स्नं बाहुसहस्रं च चिच्छेद भृगुनन्दनः।
परश्वधेन दीप्तेन ज्ञातिभिः सहितस्य वै ॥११४॥

राजा अर्जुन रथपर बैठा था, परंतु भृगुनन्दन परशुरामजीने उसे धरतीपर गिरा दिया और इच्छानुसार छातीपर चढ़कर चमकते हुए फरसेसे उसकी सम्पूर्ण सहस्रों भुजाएँ काट डालीं। यद्यपि वह जाति-भाइयों एवं कुटुम्बीजनोंके साथ था, तो भी उसकी यह दशा हो गयी। उस समय कार्तवीर्य मेघके समान गम्भीर स्वरमें जोर-जोरसे चीखता-चिल्लाता रहा ॥ ११३-११४ ॥

कीर्णा क्षत्रियकोटीभिर्मेरुमन्दरभूषणा।
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥११५॥

उन्होंने मेरु और मन्दराचलसे विभूषित समस्त पृथ्वीपर करोड़ों क्षत्रियोंकी लाशें बिछा दीं तथा इक्कीस बार भूतलको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया ॥ ११५ ॥

कृत्वा निःक्षत्रियां चैव भार्गवः सुमहातपाः।
सर्वपापविनाशाय वाजिमेधेन चेष्टवान् ॥११६॥

पृथ्वीको क्षत्रियहीन करके महातपस्वी भृगुनन्दन परशुरामने अपने सम्पूर्ण पापोंका नाश (प्रायश्चित्त) करनेके लिये अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ ११६ ॥

तस्मिन् यज्ञे महादाने दक्षिणां भृगुनन्दनः।
मारीचाय ददौ प्रीतः कश्यपाय वसुंधराम् ॥११७॥

जिसमें बड़ा भारी दान दिया जाता है, उस अश्वमेध यज्ञमें भृगुनन्दन परशुरामने प्रसन्न होकर मरीचिकुमार कश्यपको दक्षिणारूपसे यह सारी पृथ्वी दे दी थी ॥ ११७ ॥

वारुणांस्तुरगाञ्छीघ्रान् रथं च रथिनां वरः।
हिरण्यमक्षयं धेनूर्गजेन्द्रांश्च महामनाः।
ददौ तस्मिन् महायज्ञे वाजिमेधे महायशाः ॥११८॥

महायशस्वी, महामनस्वी, रथियोंमें श्रेष्ठ परशुरामने उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें वरुणके यहाँसे प्राप्त हुए शीघ्रगामी घोड़े, रथ, अक्षय सुवर्णराशि, धेनु और गजराज भी दानमें दिये थे ॥ ११८ ॥

अद्यापि च हितार्थाय लोकानां भृगुनन्दनः।
चरमाणस्तपो दीप्तं जामदग्न्यः पुनः पुनः।
तिष्ठते देववद् धीमान् महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ॥११९॥

आज भी समस्त लोकोंके हितके लिये बारंबार तीव्र तपस्या करते हुए भृगुकुलनन्दन जमदग्निकुमार बुद्धिमान् परशुराम उत्तम महेन्द्रपर्वतपर देवताओंके समान निवास करते हैं ॥ ११९ ॥

एष विष्णोः सुरेशस्य शाश्वतस्याव्ययस्य च।
जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥१२०॥

जनमेजय ! समस्त देवताओंके स्वामी सनातन एवं अविनाशी पुरुष परमात्मा विष्णुके इस परशुराम नामक अवतारका वर्णन किया गया ॥ १२० ॥

चतुर्विंशे युगे चापि विश्वामित्रपुरस्सरः।
राज्ञो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः ॥१२१॥

चौबीसवें त्रेतायुगमें भगवान् विष्णु राजा दशरथके पुत्र कमलनयन श्रीरामके रूपमें प्रकट हुए और कुछ कालतक विश्वामित्रके अनुयायी रहे ॥ १२१ ॥

कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वरः।
लोके राम इति ख्यातस्तेजसा भास्करोपमः ॥१२२॥

उस समय सर्वसमर्थ महाबाहु भगवान् अपनेको चार रूपोंमें प्रकट करके स्वयं श्रीराम नामसे विख्यात हुए। वे श्रीराम सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ १२२ ॥

प्रसादनार्थं लोकस्य रक्षसां निधनाय च।
धर्मस्य च विवृद्धयर्थं जज्ञे तत्र महायशाः ॥१२३॥

महायशस्वी श्रीराम सब लोगोंको प्रसन्न रखने, राक्षसोंको मारने और धर्मकी वृद्धि करनेके लिये उस समय अवतीर्ण हुए थे ॥ १२३ ॥

तमप्याहुर्मनुष्येन्द्रं सर्वभूतपतेस्तनुम्।
यस्मै दत्तानि शस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता ॥१२४॥
वधार्थं देवशत्रूणां दुर्धराणि सुरैरपि।

ज्ञानी पुरुष उन नरेन्द्र श्रीरामको समस्त भूतोंके स्वामी भगवान् विष्णुका अवतार-विग्रह बताते हैं, जिन्हें परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने देव-द्रोही असुरोंका वध करनेके लिये ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिन्हें धारण करना देवताओंके लिये भी कठिन था ॥ १२४ १/२ ॥

यज्ञविघ्नकरो येन मुनीनां भावितात्मनाम् ॥१२५॥
मारीचश्च सुबाहुश्च बलेन बलिनां वरौ।
निहतौ च निराशौ च कृतौ तेन महात्मना ॥१२६॥

महात्मा श्रीरामने पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंके यज्ञमें विघ्न डालनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ मारीच और सुबाहुको अपने

हरिवंशपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः [ १५३


बाणोंका निशाना बनाया और उनकी आशा पूर्ण होने नहीं दी॥ १२५-१२६ ॥

वर्तमाने मखे येन जनकस्य महात्मनः।
भग्नं माहेश्वरं चापं क्रीडता लीलया पुरा ॥१२७॥

पूर्वकालमें जब महात्मा राजा जनकके यहाँ यज्ञ हो रहा था, उस समय उन्हीं श्रीरामने खेल-सा करते हुए महा-देवजीके धनुषको अनायास ही तोड़ डाला था ॥ १२७ ॥

यः समाः सर्वधर्मज्ञश्चतुर्दश वनेऽवसत्।
लक्ष्मणानुचरो रामः सर्वभूतहिते रतः॥ १२८॥

वे सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे। उन्होंने लक्ष्मणको साथ ले चौदह वर्षों-तक वनमें निवास किया ॥ १२८ ॥

रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेति प्रथिता जनैः।
पूर्वोचिता तस्य लक्ष्मीर्भर्तारमनुगच्छति ॥१२९॥

उस समय उनके साथ मूर्तिमती लक्ष्मी भी थीं, जो लोगोंमें 'सीता' के नामसे प्रसिद्ध थीं। वे उनकी पूर्वोचित पत्नी थीं और पतिके पीछे-पीछे वनमें गयी थीं॥ १२९॥

चतुर्दश तपस्तप्त्वा वने वर्षाणि राघवः।
जनस्थाने वसन् कार्यं त्रिदशानां चकार ह ॥१३०॥

चौदह वर्षोंतक वनमें तपस्या करके जनस्थानमें निवास करते हुए रघुनन्दन श्रीरामने देवताओंका अभीष्ट कार्य सिद्ध किया ॥ १३० ॥

सीतायाः पदमन्विच्छंल्लक्ष्मणानुचरो विभुः।
विराधं च कबन्धं च राक्षसौ भीमविक्रमौ।
जघान पुरुषव्याघ्रौ गन्धर्वौ शापविक्षतौ ॥१३१॥

उन भगवान् श्रीरामने (रावणके द्वारा अपहृत) सीताका पता लगाते हुए लक्ष्मणके साथ जाकर भयानक-पराक्रमी राक्षस विराध और कबन्धको मार डाला। वे दोनों वास्तवमे पुरुषसिंह गन्धर्व थे, किंतु शाप-ग्रस्त होकर राक्षस हो गये थे॥ १३१॥

हुताशनाकॆन्दुसडिद्धनाभैः प्रतप्तजाम्बूनदचित्रपुङ्खैः।
महेन्द्रवज्राशनितुल्यसारैः शरैः शरीरेण वियोजितौ बलात् ॥१३२॥

इन राक्षसोंपर श्रीरामचन्द्रजीने ऐसे बाणोंद्वारा प्रहार किया, जो अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, बिजली और मेघके समान प्रकाशित होते थे, जिनके विचित्र पंख तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए थे और जो इन्द्रके वज्र तथा विद्युत्-के समान शक्तिशाली थे। उन बाणोंद्वारा उन्होंने बलपूर्वक उन दोनों राक्षसोंको शरीरसे विलग कर दिया ॥ १३२ ॥

सुग्रीवस्य कृते येन वानरेन्द्रो महाबलः।
वाली विनिहतो युद्धे सुग्रीवश्चाभिषेचितः ॥१३३॥

श्रीरामने अपने मित्र सुग्रीव (की भलाई) के लिये युद्धमें महाबली वानरराज वालीको मार डाला और उसके राज्यपर सुग्रीवका अभिषेक कर दिया ॥ १३३ ॥

देवासुरगणानां हि यक्षगन्धर्वभोगिनाम्।
अवध्यं राक्षसेन्द्रं तं रावणं युद्धदुर्मदम् ॥१३४॥
युक्तं राक्षसकोटीभिर्नीलाञ्जनचयोपमम्।
त्रैलोक्यरावणं घोरं रावणं राक्षसेश्वरम् ॥१३५॥
दुर्जयं दुर्धरं दृप्तं शार्दूलसमविक्रमम्।
दुर्निरीक्ष्यं सुरगणैर्वरदानेन दर्पितम् ॥१३६॥
जघान सचिवैः सार्द्धं ससैन्यं रावणं युधि।
महाभ्रघनसङ्काशं महाकायं महाबलम् ॥१३७॥

उन दिनों राक्षसराज रावण देवता, असुर, यक्ष, गन्धर्व और नागोंके लिये अवध्य हो रहा था। युद्धमें वह उन्मत्त होकर लड़ता था। करोड़ों राक्षस उसके सहायक थे। उसका शरीर काले अञ्जनके ढेरके समान था। त्रिलोकीको रुलाने-वाला वह भयंकर राक्षसराज रावण दुर्जय और दुर्धर्ष था। उसका पराक्रम सिंहके समान था। उसका घमंड बहुत बढ़ा हुआ था। वरदानके कारण वह और भी घमंडी हो गया था। देवताओंके लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था। उसका शरीर मेघोंकी घटाके समान काला था। भगवान् श्रीरामने उस महाकाय महाबली रावणका युद्धमें मन्त्रियों तथा सेनाओंसहित संहार कर डाला ॥ १३४-१३७ ॥

तमागस्कारिणं घोरं पौलस्त्यं युधि दुर्जयम्।
सभ्रातृपुत्रसचिवं ससैन्यं क्रूरनिश्चयम् ॥१३८॥
रावणं निजघानाशु रामो भूतपतिः पुरा।

पुलस्त्य-पौत्र रावण भयानक अपराधी था, उसका प्रत्येक निश्चय क्रूरतासे पूर्ण होता था; युद्धमें उसपर विजय पाना कठिन था। तो भी सम्पूर्ण भूतोंके पालक भगवान् श्रीरामने पूर्वकालमें उसे भाई, पुत्र, मन्त्री और सेनाओंसहित शीघ्रता-पूर्वक मार डाला ॥ १३८ ॥

मधोश्च तनयो दृप्तो लवणो नाम दानवः ॥१३९॥
हतो मधुवने वीरो वरदृप्तो महासुरः।
समरे युद्धशौण्डेन तथा चान्येऽपि राक्षसाः ॥१४०॥

उन्हीं दिनो मधुवन (मथुरा) में लवण नामक दानव रहता था, जो मधुका पुत्र था। वह महान् असुर वीर तो था ही, मनोवाञ्छित वर पा जानेके कारण और भी घमंडमे भर गया था। वह श्रीरामके ही स्वरूपभूत शत्रुघ्नके हाथसे मारा गया। युद्धकुशल श्रीराम (तथा उनके भाइयों) ने समराङ्गणमे और भी बहुत-से राक्षसोंका सहार किया ॥ १३९-१४० ॥

१५४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

एतानि कृत्वा कर्माणि रामो धर्मभृतां वरः। दशाश्वमेधाञ्जारूढ्यानाजहार निरर्गलान् ॥१४१॥ इन सब (पराक्रमपूर्ण) कर्मोंका सम्पादन करके धर्मत्माओं- में श्रेष्ठ श्रीरामने तीनगुनी दक्षिणासे युक्त दस अश्वमेध यज्ञ किये, जो बिना किसी विघ्न बाधाके पूर्ण हो गये ॥ १४१ ॥

नाश‍्रूयन्ताशुभा वाचो नाकुलं मारुतो ववौ । न वित्तहरणं त्वासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥१४२॥ श्रीरामचन्द्रजी जब राज्यका शासन करते थे, उन दिनों कहीं अशुभ बातें नहीं सुनी जाती थीं, वायु प्रचण्ड वेगसे नहीं चलती थी तथा कोई किसीके धनका अपहरण नहीं करता था ॥ १४२ ॥

पर्यदेवन्न विधवा नानर्थाश्चाभवंस्तदा । सर्वमासीज्जगद् दान्तं रामे राज्यं प्रशासति ॥१४३॥ श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कभी विधवाओंका करुण क्रन्दन नहीं सुना गया। कहीं भी अनर्थपूर्ण घटनाएँ नहीं घटित हुईं। सारे जगत्के लोग (मन और इन्द्रियोंका संयम रखकर) विनीत एवं अनुशासित रहते थे॥ १४३ ॥

न प्राणिनां भयं चापि जलानलनिघातजम् । न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥१४४॥ श्रीरामके राज्यकालमें प्राणियोंको जल और अग्निसे मृत्युका भय कभी नहीं होता था और वृद्धोंको बालकोंकी प्रेतक्रिया नहीं करनी पड़ती थी ॥ १४४ ॥

ब्रह्म पर्यचरत् क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः । शूद्राश्चैव हि वर्णांस्त्रीञ्छुश्रूषन्त्यनहंकृताः । नार्यो नात्यचरन् भर्तॄन् भार्या नात्यचरन् पतिः ॥१४५॥ क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी परिचर्या करते थे, वैश्य क्षत्रियोंके प्रति श्रद्धा रखते थे और शूद्र अहंकार छोड़कर ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवा करते थे । श्रीरामके राज्यमें स्त्रियाँ अपने पतिको छोड़कर दूसरे किसी पुरुषमें आसक्त नहीं होती थीं और पुरुष भी अपनी पत्नीके सिवा दूसरी किसी स्त्रीपर आसक्तिपूर्ण दृष्टि नहीं डालते थे ॥ १४५ ॥

सर्वमासीज्जगद् दान्तं निर्दस्युरभवन्मही । राम एकोऽभवद् भर्त्ता रामः पालयिताभवत् ॥१४६॥ उस समय सारा जगत् जितेन्द्रिय था । पृथ्वीपर डाकुओंका कहीं नाम भी नहीं था। एकमात्र श्रीराम ही सबके स्वामी और संरक्षक थे ॥ १४६ ॥

आयुर्वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः । अरोग‍ाः प्राणिनश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥१४७॥ श्रीरामके शासनकालमें मनुष्योंकी आयु हजारों वर्षकी होती थी । वे सहस्रों पुत्रोंके पिता होते थे और किसी भी प्राणीको रोग नहीं सताता था ॥ १४७ ॥

देवतानामृषीणां च मनुष्याणां च सर्वशः । पृथिव्यां समवायोऽभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥१४८॥ भगवान् श्रीराम जब यहाँ राज्यशासन करते थे, उन दिनों इस भूतलपर देवता, ऋषि और मनुष्योंका सब ओर समागम होता रहता था ॥ १४८ ॥

गाथा अप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । रामे निबद्धतत्त्वार्था माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥१४९॥ श्रीरामके विषयमें 'वे ही परम तत्त्व हैं' ऐसी दृढ़ आस्था रखनेवाले पुराणवेत्ता पुरुष इस प्रसङ्गमें निम्नाङ्कित गाथाएँ गाया करते हैं, जो उन बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीके माहात्म्यको सूचित करती हैं—॥ १४९ ॥

श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्तास्यो मितभाषिता । आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥१५०॥ दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च । अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥१५१॥ 'श्रीरामचन्द्रजीका वर्ण श्याम था, वे सदा तरुण दिखायी देते थे, उनके नेत्र (कुछ-कुछ) लालिमा लिये हुए थे, मुखसे तेज बरसता रहता था, वे बहुत कम बोलते थे, उनकी लंबी भुजाएँ घुटनोंतक पहुँचती थीं, उनका मुख बड़ा सुन्दर था, कंधे सिंहके-से जान पड़ते थे, महाबाहु श्रीरामने अयोध्याके अधिपति होकर ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया था॥ १५०-१५१ ॥

ऋक्सामयजुषां घोषो ज्याघोषश्च महात्मनः । अव्युच्छिन्नोऽभवद्राज्ये दीयतां भुज्यतामिति ॥१५२॥ 'उनके राज्यमें सदा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदका घोष सुनायी देता था। धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचनेसे उसकी टंकार-ध्वनि भी सदा श्रवणगोचर होती रहती थी तथा दान देने और भोजन करानेका उपदेश कभी बंद नहीं होता था ॥ १५२ ॥

सत्त्ववान् गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा । अति चन्द्रं च सूर्यं च रामो दाशरथिर्बभौ ॥१५३॥ 'दशरथनन्दन श्रीराम सत्त्ववान् और गुणवान् होनेके साथ ही सदा अपने तेजसे देदीप्यमान रहते थे। उनकी सूर्य और चन्द्रमासे भी अधिक शोभा होती थी ॥ १५३ ॥

ईजे क्रतुशतैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः । हित्वायोध्यां दिवं यातो राघवः समहाबलः ॥१५४॥ 'श्रीरघुनाथजीने पर्याप्त एवं उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त सैकड़ों पवित्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। अन्तमें वे अयोध्याके महान् जन-समुदायको साथ ले अपनी उस पुरीको छोड़कर साकेत धामको पधारे' ॥ १५४ ॥

हरिवंशपर्व ]एकचत्वारिंशोऽध्यायः१५५

एवमेष महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलनन्दनः ।
रावणं सगणं हत्वा दिवमाचक्रमे प्रभुः ॥ १५५॥
इस प्रकार इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले ये महाबाहु भगवान् श्रीराम दलवलसहित रावणका संहार करके अपने परमधामको चले गये ॥ १५५ ॥

वैशम्पायन उवाच
अपरः केशवस्यायं प्रादुर्भावो महात्मनः ।
विख्यातो माथुरे कल्पे सर्वलोकहिताय वै ॥ १५६॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—(जनमेजय !) इसके बाद परमात्मा भगवान् केशवका 'श्रीकृष्ण' नामक अवतार माथुर कल्प (मथुराकाण्ड) में हुआ, जो सर्वत्र विख्यात है। भगवान्‌का यह अवतार सम्पूर्ण जगत्‌के हितके लिये हुआ था॥

यत्र शाल्वं च मैन्दं च द्विविदं कंसमेव च ।
अरिष्टमृषभं केशिं पूतनां दैत्यदारिकाम् ॥ १५७॥
नागं कुवलयापीडं चाणूरं मुष्टिकं तथा ।
दैत्यान् मानुषदेहस्थान् सूदयामास वीर्यवान् ॥ १५८॥
इस अवतारमें परम पराक्रमी हरिने शाल्व, मैन्द, द्विविद, कंस, अरिष्ट, ऋषभ, केशी, दैत्य-कन्या पूतना, कुवलयापीड हाथी, चाणूर तथा मुष्टिक आदि मनुष्य-शरीरधारी दैत्योंका संहार किया था ॥ १५७-१५८ ॥

छिन्नं बाहुसहस्रं च बाणस्याद्भुतकर्मणः ।
नरकश्च हतः संख्ये यवनश्च महाबलः ॥ १५९॥
इसके अतिरिक्त उन्होंने अद्भुत कर्म करनेवाले बाणासुरकी सहस्र भुजाएँ काट डालीं, युद्धमें नरकासुरका नाश किया और महाबली कालयवनको भस्म करा दिया ॥ १५९॥

हृतानि च महीपानां सर्वरत्नानि तेजसा ।
दुराचाराश्च निहताः पार्थिवाश्च महीतले ॥ १६०॥
इतना ही नहीं, उन्होंने अपने तेजसे भूमिपालोंके सभी रत्न छीन लिये और भूतलके दुराचारी राजाओंको मौतके घाट उतार दिया ॥ १६० ॥

नवमे द्वापरे विष्णुरष्टाविंशे पुराभवत् ।
वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरस्सरः ॥ १६१॥
(यहाँतक जो सात अवतार बताये गये, उनमें मत्स्य-कच्छप अवतारोंका भी अन्तर्भाव करके उन्हें नौ समझना चाहिये।) अट्ठाईसवें द्वापरमें भगवान् विष्णुका यह (श्रीकृष्ण नामक) नवम अवतार हुआ था। इससे कुछ पहले ही उनका दसवाँ अवतार भी हो गया था, जो जातूकर्ण्यके साथ प्रकट हुआ था। वह वेदव्यासके नामसे प्रसिद्ध है॥

एको वेदश्चतुर्धा तु कृतस्तेन महात्मना ।
जनितो भार‌तो वंशः सत्यवत्याः सुतेन च ॥ १६२॥
उन सत्यवतीपुत्र महात्मा व्यासने एक वेदके चार विभाग किये और उन्होंने ही भरतवंशकी लुप्त हुई परम्पराको पुनः प्रचलित किया ॥ १६२ ॥

एते लोकहितार्थाय प्रादुर्भावा महात्मनः ।
अतीताः कथिता राजन् कथ्यन्ते चाप्यनागताः ॥ १६३॥
राजन् ! समस्त जगत्‌का कल्याण करनेके लिये प्रकट हुए परमात्मा श्रीहरिके जो उक्त (दस) अवतार बीत गये हैं, उनकी चर्चा यहाँ की गयी। अब उनके भविष्यमें होनेवाले अवतार बताये जाते हैं ॥ १६३ ॥

कल्किर्विष्णुयशा नाम शाम्भले ग्रामके द्विजः ।
सर्वलोकहितार्थाय भूयश्चोत्पत्स्यते प्रभुः ॥ १६४॥
(भावी अवतारोंमें पहले 'बुद्ध' का प्राकट्य होगा।) इसके बाद विष्णुयशा नामसे प्रसिद्ध कल्कि अवतार होनेवाला है। भगवान् विष्णु शाम्भल नामक ग्राममें सम्पूर्ण जगत्‌के हितके लिये पुनः एक ब्राह्मणके रूपमें प्रकट होंगे ॥ १६४ ॥

दशमे भाव्यसम्पन्नो याज्ञवल्क्यपुरस्सरः ।
क्षपयित्वा च तान् सर्वान् भाविनाथेन चोदितान् १६५
गङ्गायमुनयोर्मध्ये निष्ठां प्राप्स्यति सानुगः ।
पूर्वोक्त दशम अवतारका समय बीत जानेपर याज्ञवल्क्य ऋषिको साथ लेकर प्रकट होनेवाला यह अवतार भावी प्रयोजन (दुष्टोंके संहार और धर्मकी संस्थापना) को सिद्ध करनेकी शक्तिसे सम्पन्न होगा। भगवान् कल्कि भवितव्यतासे प्रेरित होकर अधर्मके पथपर चलनेवाले उन समस्त पापाचारियोंका संहार करके अपने अनुयायियोंसहित गङ्गा और यमुनाके मध्यवर्ती देशमें अपने अवतारकार्यको समाप्त करेंगे ॥

ततः कुले व्यतीते तु सामात्ये सहसैनिके ॥ १६६॥
नृपेष्वथ प्रणष्टेषु तदा त्वप्रग्रहाः प्रजाः ।
तदनन्तर मन्त्री और सैनिकोंसहित राजवंशके विनष्ट हो जानेपर जब कोई शासक नरेश नहीं रह जायगा, तब सारी प्रजा बेलगाम होकर स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो जायगी ॥१६६ १/२॥

क्षणे विनिवृत्ते च हत्वा चान्योन्यमाहवे ॥ १६७॥
परस्परहृतस्वाश्च निराक्रन्दाः सुदुःखिताः ।
रक्षाकी राजकीय व्यवस्था समाप्त हो जानेपर लोग (आपसमें लड़ेंगे और) उस युद्धमें एक दूसरेको मारकर नष्ट हो जायेंगे। आपसमें एक-दूसरेका धन लूटकर असहाय एवं अत्यन्त दुःखी हो जायेंगे ॥ १६७ १/२ ॥

एवं कष्टमनुप्राप्ताः कलिसंध्यांशके तदा ।
प्रजाः क्षयं प्रयास्यन्ति सार्द्धं कलियुगेन ह ॥ १६८॥
उस समय कलियुगका संध्यांश बीत रहा होगा, उन दिनों इस प्रकार कष्टमें पड़ी हुई सारी प्रजा कलियुगके साथ ही नष्ट हो जायगी—ऐसी बात कही जाती है ॥ १६८ ॥

१५६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

क्षीणे कलियुगे तस्मिंस्ततः कृतयुगं पुनः ।
प्रपत्स्यते यथान्यायं स्वभावादेव नान्यथा ॥ १६९ ॥
कलियुगके समाप्त हो जानेपर फिर स्वभावसे ही सत्ययुगकी यथोचितरूपसे प्रवृत्ति होगी, दूसरे किसी प्रकारसे नहीं ॥

एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगुणैर्युताः ।
प्रादुर्भावाः पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ १७० ॥
राजन् ! ये तथा और भी भगवान्‌के बहुत-से दिव्य अवतार हुए हैं, जो देवोचित गुणोंसे सम्पन्न थे। ब्रह्मवादी मुनियोंने पुराणोंमे उनका गान किया है ॥ १७० ॥

यत्र देवाश्च मुह्यन्ति प्रादुर्भावानुकीर्तने ।
पुराणं वर्तते यत्र वेदश्रुतिसमाहितम् ॥ १७१ ॥
भगवान्‌के इन अवतारोंका वर्णन करनेमें देवता भी चकरा जाते हैं—इस विषयमे पुराण ही प्रमाण है, जिसका वैदिक श्रुतियोंद्वारा समर्थन होता है ॥ १७१ ॥

एतदुद्देशमात्रेण प्रादुर्भावानुकीर्तनम् ।
कीर्तितं कीर्तनीयस्य सर्वलोकगुरोः प्रभोः ॥ १७२ ॥
सम्पूर्ण जगत्‌के गुरु तथा कीर्तन करनेयोग्य सर्वशक्तिमान् भगवान्‌के अवतारोंका यह वर्णन संक्षेपसे ही किया गया है ॥ १७२ ॥

प्रीयन्ते पितरस्तस्य प्रादुर्भावानुकीर्तनात् ।
विष्णोरतुलवीर्यस्य यः शृणोति कृताञ्जलिः ॥ १७३ ॥
अनुपम-शक्तिशाली भगवान् विष्णुके अवतारोंकी वारंवार चर्चा करनेसे पितरोंको प्रसन्नता होती है। जो हाथ जोड़कर आदरपूर्वक इस अवतार-कथाको सुनता है, उसके पितरोंको भी अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है ॥ १७३ ॥

एतास्तु योगेश्वरयोगमायाः
श्रुत्वा नरो मुच्यति सर्वपापैः ।
ऋद्धिं समृद्धिं विपुलांश्च भोगान्
प्राप्नोति सर्वं भगवत्प्रसादात् ॥ १७४ ॥
जो मनुष्य योगेश्वर भगवान् श्रीहरिकी योगमाया द्वारा प्रकट हुए अवतारोंकी इन लीला-कथाओंको सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा भगवान्‌की कृपासे शीघ्र ही उसे ऋद्धि, समृद्धि एवं प्रचुर भोग—सबकी प्राप्ति हो जाती है ॥ १७४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि प्रादुर्भावानुसंग्रहो नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें अवतारोंका संग्रहनामक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥


द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

भगवान् विष्णुके ईश्वरत्वका वर्णन एवं अद्भुततारकामय संग्रामकी कथा

वैशम्पायन उवाच

विश्वत्वं शृणु मे विष्णोर्हरित्वं च कृते युगे ।
वैकुण्ठत्वं च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषु च ॥ १ ॥
ईश्वरत्वं च तस्येदं गहनां कर्मणां गतिम् ।
सम्प्रत्यतीतां भव्यां च शृणु राजन् यथातथम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! अब तुम मुझसे सत्ययुगमे विष्णुके विश्वत्वको (उनके अभयदायक आश्वासक रूपको), हरित्वको (पापहारी रूपको), देवताओंमे भगवान्‌के वैकुण्ठत्वको (सर्वसमर्थताको) और पुरुषोंमें उनके श्रीकृष्णत्वको (सच्चिदानन्दताको) तथा उनके ईश्वरत्वको (दण्ड देने और कृपा करनेकी सामर्थ्यको) और उनके भूत, भविष्य एवं वर्तमान कर्मों (लीलाओं) की गहन गति (दुर्बोध स्वरूप) को यथार्थरूपसे सुनो ॥ १-२ ॥

अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो यत्रैव भगवान् प्रभुः ।
नारायणो ह्यनन्तात्मा प्रभवोऽव्यय एव च ॥ ३ ॥
वे सर्वशक्तिमान् प्रभु अव्यक्त होनेपर भी (अवतार-विग्रह धारण करते समय) अपनी मूर्तिको प्रकट किये रहते हैं, वे नारायण, अनन्तस्वरूप, सबके उत्पत्तिस्थान और अव्यय (अविनाशी) हैं ॥ ३ ॥

एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत् कृते युगे ।
ब्रह्मा शक्रश्च सोमश्च धर्मः शुक्रो वृहस्पतिः ॥ ४ ॥
कृतयुगमे ये नारायणरूप होकर हरि—मोक्षदायक बने और ये ही ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, धर्म, शुक्र और वृहस्पति-के रूपमे प्रकट हुए ॥ ४ ॥

अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दनः ।
एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रादवरजोऽभवत् ॥ ५ ॥
इसके अनन्तर ये यादवनन्दन (श्रीकृष्णरूपसे अवतार लेनेवाले भगवान्) ही विष्णुके नामसे अदितिके पुत्र बनकर उत्पन्न हुए। उस जन्ममे ये इन्द्रके छोटे भाई बने थे ॥ ५ ॥

प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्याः पुत्रजन्म तत् ।
वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम् ॥ ६ ॥
देवताओंके शत्रु दैत्य, दानव और राक्षसोंका संहार करनेके लिये भगवान् विष्णु अदितिके यहाँ पुत्र बनकर उत्पन्न हुए। यह उन विभुका प्रसाद (वरदान) रूप जन्म था ॥ ६ ॥

हरिवंशपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः १५७


प्रधानात्मा पुरा ह्येष ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः।
सोऽसृजत् पूर्वपुरुषः पुरा कल्पे प्रजापतीन् ॥ ७ ॥
सृष्टिके आदिमे इन प्रधानात्मा—प्रकृतिके संचालक प्रभुने ही ब्रह्माको उत्पन्न किया और इन्हीं पुराणपुरुषने पूर्वकल्पमें (मरीचि आदि) प्रजापतियोंकी सृष्टि की ॥ ७ ॥

ते तन्वानास्तनूस्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान् ।
तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ८ ॥
उन प्रजापतियोंने (कश्यप आदिके रूपसे) अपने स्वरूपका विस्तार करके श्रेष्ठ ब्रह्मवंशों (गोत्रों) को उत्पन्न किया और उन महात्माओंसे सनातन वेद अनेक शाखाओंमे विभक्त हो गया ॥ ८ ॥

एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोर्नामानुकीर्तनम् ।
कीर्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ९ ॥
लोकोंमे कीर्तनीय आश्चर्यमय विष्णुके इस (वेदरूप) नामकीर्तनका उल्लेख मेरे द्वारा किया जा रहा है, तुम इसे सुनो ॥

वृत्ते वृत्रवधे तात वर्तमाने कृते युगे ।
आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः ॥१०॥
तात ! वर्तमान सत्ययुगमें वृत्रासुरका वध हो चुकनेपर त्रिलोकीमें प्रसिद्ध तारकामय संग्राम हुआ ॥ १० ॥

तत्रासन् दानवा घोराः सर्वे संग्रामदर्पिताः ।
घ्नन्ति देवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान् ॥ ११ ॥
उस समय सब-के-सब दानव संग्राममें दर्प भरे एवं भयकर दिखायी देते थे । उन्होंने यक्ष, राक्षस और सर्पों-सहित समस्त देवताओंको मारना आरम्भ कर दिया था ॥११॥

ते वध्यमाना विमुखाः क्षीणप्रहरणा रणे ।
त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं हरिम् ॥ १२ ॥
मार खाते-खाते जब उनके आयुध क्षीण हो गये, तब वे रणसे विमुख हो गये और सबकी रक्षा करनेवाले नारायणदेव श्रीहरिके ही मनसे शरण हो गये ॥ १२ ॥

एतस्मिन्नन्तरे मेघा निर्वाणाङ्गारवर्षिणः ।
सार्कचन्द्रग्रहगणं छादयन्तो नभस्तलम् ॥ १३ ॥
इसी बीचमे मेघ तपे हुए लोहेके समान ज्वालारहित अँगारे बरसाने लगे । वे सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रहोंसहित आकाशको ढकते हुए दिखायी देते थे ॥ १३ ॥

चञ्चद्विद्युद्गणाविद्धा घोरा निर्ह्रादकारिणः ।
अन्योऽन्यवेगाभिहताः प्रववुः सप्त मारुताः ॥ १४ ॥
कौधती हुई बिजलियोंसे व्याप्त हो वे भयंकर बादल बड़े जोरसे गर्जने और परस्पर वेगसे टकराने लगे; क्योकि उस समय प्रवह आदि सात प्रकारकी हवाएँ चल रही थीं ॥ १४ ॥

दीप्ततोयाशनीपातैर्वज्रवेगानिलाकुलैः ।
ररास घोरैरुत्पातैर्दह्यमानमिवाम्बरम् ॥ १५ ॥
बिजली और तपे हुए जलके गिरने तथा वज्रके समान वेगवाली वायुके चलने आदि भयंकर उत्पातोंसे जलता हुआ-सा आकाश मानो कराहने लगा ॥ १५ ॥

पेतुरुल्कासहस्राणि मुहुराकाशगान्यपि ।
न्युब्जानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च ॥ १६ ॥
उस समय हजारो उल्काएँ गिरती और फिर आकाशमे पहुँच जाती थीं तथा विमान नीचेको मुख करके गिरते और फिर उलटे ही उड़ जाते थे ॥ १६ ॥

चतुर्युगान्तपर्याये लोकानां यद् भयं भवेत् ।
तादृशान्येव रूपाणि तस्मिन्नुत्पातलक्षणे ॥ १७ ॥
हजार चतुर्युगोंके अन्तमे होनेवाले प्रलयके समय लोकों-को जो भय प्राप्त होता है, इस उत्पातके समय भी वैसे ही चिह्न दीखने लगे ॥ १७ ॥

तमसा निष्प्रभं सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ।
तिमिरौघपरिक्षिप्ता न रेजुश्च दिशो दश ॥ १८ ॥
सारा संसार अन्धकारसे व्याप्त हो जानेके कारण प्रभाहीन प्रतीत होने लगा; कुछ भी सूझता न था । अन्धकारसमूहसे आच्छादित हुई दसो दिशाएँ ज्ञात ही नहीं होती थीं ॥१८॥

निशेव रूपिणी काली कालमेघावगुण्ठिता ।
द्यौर्न भात्यभिभूताऽर्का घोरेण तमसा वृता ॥ १९ ॥
जैसे काले मेघोके घिर आनेपर अमावास्याकी रात्रि मूर्ति-मती-सी दीख पड़ती है, वैसे ही अन्धकारसे सूर्यके तिरोहित होनेपर घोर अन्धकारसे भरा हुआ आकाश शोभायमान नहीं लगता था ॥ १९ ॥

तान् घनौघान् सतिमिरान् दोर्भ्यामुत्क्षिप्य स प्रभुः ।
वपुः संदर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः ॥ २० ॥
उस समय श्यामवर्ण भगवान् श्रीहरिने अपनी दोनों भुजाओंद्वारा अन्धकारसे व्याप्त उन मेघसमूहोंको ऊपरकी ओर ठेलकर अपने दिव्य स्वरूपका साक्षात्कार कराया ॥ २० ॥

बलाहकाञ्जननिभं बलाहकतनूरुहम् ।
तेजसा वपुषा चैव कृष्णं कृष्णमिवाचलम् ॥ २१ ॥
दीप्तपीताम्बरधरं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।
धूमान्धकारवपुषा युगान्ताग्निमिवोत्थितम् ॥ २२ ॥
चतुर्द्विगुणपीनांसं बलाकापङ्क्तिभूषणम् ।
चामीकरकराकारैरायुधैरुपशोभितम् ॥ २३ ॥
चन्द्रार्ककिरणोद्द्योतं गिरिकूटं शिलोच्चयम् ।
नन्दकानन्दितकरं शराशीविषधारिणम् ॥ २४ ॥
शक्तिचित्रं हलोदग्रं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
विष्णुशैलं क्षमामूलं श्रीवृक्षं शार्ङ्गधन्विनम् ॥ २५ ॥
हर्यश्वरथसंयुक्तं सुपर्णध्वजशोभिते ।
चन्द्रार्कचक्ररुचिरे मन्दराक्षधृतान्तरे ॥ २६ ॥

१५८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


अनन्तरश्मिसंयुक्ते ददृशे मेरुकूबरे।
तारकाचित्रकुसुमे ग्रहनक्षत्रबन्धुरे ॥ २७ ॥
भयेष्वभयदं व्योम्नि देवा दैत्यपराजिताः।
ददृशुस्ते स्थितं देवं दिव्यलोकमये रथे ॥ २८ ॥

भगवान्‌के श्रीविग्रहका वर्ण मेघ और अञ्जनके समान था। उनके केश भी मेघके समान (काले) थे। उनका शरीर तो काले पर्वतके समान कृष्णवर्ण था ही, उससे तेज भी कृष्णवर्ण निकल रहा था। वे चमकता हुआ पीताम्बर धारण किये हुए थे और तपे हुए सुवर्णके आभूषण पहने थे। उस समय वे ऐसे लगते थे, जैसे धूमके समान अन्धकारमय शरीरसे आवेष्टित होकर प्रलयकालकी अग्नि प्रकट हुई हो। वे (अष्टभुज होनेके कारण) आठ मांसल बाहुमूलोंसे सुशोभित थे। चमकते हुए आभूषणोंसे युक्त उनका श्रीविग्रह ऐसी शोभा देता था, जैसे बगुलोंकी पंक्तिसे विभूषित मेघ हों। वे सुवर्णकी बनी मूठवाले आयुधोंसे सुशोभित तथा चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंसे दमकते हुए पर्वतके समान अचल थे। कटिप्रदेशमें मैनसिलके समान पीले रंगका नारा बाँधे हुए थे।* उनका एक हाथ नन्दक नामके खड्गसे सुशोभित था, वे दूसरे हाथमें सर्पाकार (लहरदार) बाण धारण किये हुए थे। शक्तिसे उनकी विचित्र शोभा हो रही थी। तीसरे हाथमें हल लिये रहनेके कारण वे बहुत ऊँचे दिखायी दे रहे थे। अन्य तीन हाथोंमें उन्होंने शङ्ख, चक्र और गदा धारण कर रखी थी। एक हाथमें उनके शार्ङ्ग (सींगका बना) धनुष था। भगवान् विष्णु एक पर्वतके समान दीख रहे थे। उनके अङ्गोंमें जो श्री हैं, वे ही वृक्ष स्थानीय थीं। जैसे पर्वतका मूलभाग क्षमा (पृथ्वी) पर प्रतिष्ठित है, उसी तरह श्रीहरिकी प्रीतिका मूल क्षमाभाव है। भयके अवसरोंपर अभयदान देनेवाले पर्वतके समान अटल भगवान् विष्णुको दैत्योंसे हारे हुए देवताओंने आकाशके बीच दिव्यलोकमय रथमें बैठे देखा। उस रथमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे। वह गरुड़की ध्वजासे शोभित था। सूर्य और चन्द्रमारूपी पहियोंसे वह सुन्दर दिखायी देता था। उसके भीतरी भागको मन्दराचलरूपी धुरेने धारण कर रखा था। भगवान् शेष ही उसमें रश्मि (लगाम) बने हुए थे। मेरु पर्वत उसका कूबर (आगेका भाग) था। तारे ही उसमें रंग-बिरंगे फूलोंके रूपमें सजे थे तथा ग्रह-नक्षत्र उसमें डोरीके रूपमें लगे थे ॥ २१–२८ ॥

ते कृताञ्जलयः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः।
जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणं गताः ॥ २९ ॥

उस समय इन्द्र आदि समस्त देवताओंने जय-जय शब्दका उच्चारण किया और हाथ जोड़कर शरण देनेवाले विष्णु-भगवान्‌की शरण ग्रहण की ॥ २९ ॥

स तेषां ता गिरः श्रुत्वा विष्णुर्दयितदेवतः।
मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां महामृधे ॥ ३० ॥

विष्णुको देवता प्रिय हैं, अतएव उन्होंने देवताओंकी उस वाणीको सुनकर महायुद्धमें दानवोंके नाश करनेका अपने मनमें विचार किया ॥ ३० ॥

आकाशे तु स्थितो विष्णुः सोत्तमे पुरुषोत्तमः।
उवाच देवताः सर्वाः सप्रतिज्ञमिदं वचः ॥ ३१ ॥

उत्तम आकाशमें विराजमान उन पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने सब देवताओंसे प्रतिज्ञापूर्वक यह बात कही—॥ ३१ ॥

शान्तिं भजत भद्रं वो मा भैष्ट मरुतां गणाः।
जिता मे दानवाः सर्वे त्रैलोक्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ ३२ ॥

‘देवताओ ! तुम्हारा कल्याण हो ! अब तुम शान्त हो जाओ, डरो मत। मेरे द्वारा सारे दानव जीत लिये गये—यों समझना चाहिये। (अब) तुम त्रिलोकीका राज्य अपना ही मानो और उसपर अधिकार करो’ ॥ ३२ ॥

ते तस्य सत्यसंघस्य विष्णोर्वाक्येन तोषिताः।
देवाः प्रीतिं परां जग्मुः प्राप्येवामृतमुत्थितम् ॥ ३३ ॥

सत्यप्रतिज्ञ भगवान् विष्णुके वाक्यसे आश्वासित हो देवता अत्यधिक प्रसन्न हुए, मानो उनको क्षीरसागरसे प्रकट हुआ अमृत मिल गया ॥ ३३ ॥

ततस्तमः संहियते विनेशुंश्च वलाहकाः।
प्रववुश्च शिवा वाताः प्रसन्नाश्च दिशो दश ॥ ३४ ॥

उस समय अन्धकार दूर हो गया, मेघ विलीन हो गये; सुखदायक वायु चलने लगी और दसों दिशाएँ निर्मल हो गयीं ॥ ३४ ॥

सुप्रभाणि च ज्योतींषि चन्द्रं चक्रुः प्रदक्षिणम्।
दीप्तिमन्ति च तेजांसि चक्रुरर्कं प्रदक्षिणम् ॥ ३५ ॥

सुन्दर प्रभावाले नक्षत्र चन्द्रमाकी और प्रकाशमान ग्रह सूर्यकी प्रदक्षिणा करने लगे ॥ ३५ ॥

न विग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रसन्नाश्चापि सिन्धवः।
नीरजस्का बभुर्मार्गा नाकमार्गादयस्त्रयः ॥ ३६ ॥

ग्रहोंने आपसमें टकराना छोड़ दिया, नदियोंका जल निर्मल हो गया तथा देवयान, पितृयान और मोक्षमार्ग नामक तीनों मार्ग भी रज (धूल या रजोगुण) से रहित हो गये ॥ ३६ ॥

यथार्थमूहूः सरितो नापि चुक्षुभिरेऽर्णवाः।
आसञ्छुभानीन्द्रियाणि नराणामन्तरात्मसु ॥ ३७ ॥


* यहाँ नीलकंठजीने शिलाका अर्थ मैनसिल और उच्चयका अर्थ नीवीबन्ध या नारा किया है।

हरिवंशपर्व ] त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः [ १५९

नदियाँ ठीक ढंगसे बहने लगीं, समुद्रोंका क्षुब्ध होना बंद हो गया, मनुष्योंके मनोंमें इन्द्रियोंको शुभ कार्योंमें लगानेकी इच्छा होने लगी ॥ ३७ ॥

महर्षयो वीतशोका वेदानुच्चैरधीयते । यज्ञेषु च हविः स्वादु शिवमश्नन्ति पावकः ॥ ३८ ॥

महर्षि शोकरहित होकर उच्चस्वरसे वेदध्वनि करने लगे, अग्निदेव भी यज्ञोंमें पवित्र और स्वादु हविका भक्षण करने लगे ॥ ३८ ॥

प्रवृत्तधर्माः संवृत्ता लोका मुदितमानसाः । प्रीत्या परमया युक्ता देवदेवस्य भूपते । विष्णोः सत्यप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधने गिरम् ॥ ३९ ॥

पृथ्वीनाथ ! सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले देवपूज्य भगवान् विष्णुके द्वारा की गयी शत्रुनाशकी प्रतिज्ञा सुनकर प्राणी अपने मनमें प्रसन्न होकर परम प्रीतिसे यज्ञ आदि धर्मानुष्ठानमें प्रवृत्त हो गये ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्चर्यतारकामये द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्चर्यतारकामय संग्रामविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥


त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

देवताओंके साथ युद्धके लिये उद्यत हुई दैत्यसेनाका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

ततो भयं विष्णुमयं श्रुत्वा दैतेयदानवाः ।
उद्योगं विपुलं चक्रुर्युद्धाय युधि दुर्जयाः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर मुख्यतः भगवान् विष्णुकी ओरसे भय प्राप्त हुआ है, यह सुनकर रण-दुर्जय दैत्यों और दानवोंने युद्धके लिये बड़ा भारी उद्योग किया ॥ १ ॥

मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वान्तरमव्ययम् ।
चतुश्चक्रं विक्रमन्तं सुकल्पितमहायुधम् ॥ २ ॥
किङ्किणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम् ।
खचितं रत्नजालैश्च हेमजालैश्च भूषितम् ॥ ३ ॥
स्वक्षं रथवरोद्वग्नं सूपस्थानमगोपमम् ।
ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिभिश्च विराजितम् ।
दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरनिनादितम् ॥ ४ ॥
गदापरिघसम्पूर्णं मूर्तिमन्तमिवार्णवम् ।
हेमकेयूरवलयं स्वर्णमण्डलकूवरम् ॥ ५ ॥
सपताकध्वजोदग्रं सादित्यमिव मन्दरम् ।
गजेन्द्राभोदसद्दशं लम्बकेसरवर्चसम् ॥ ६ ॥
युक्तमृक्षसहस्रेण सहस्राम्बुदनादितम् ।
दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम् ॥ ७ ॥
अध्यतिष्ठद्रणाकाङ्क्षी मेरुं दीप्तमिवांशुमान् ।

मयासुर एक सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हुआ, जिसका विस्तार बारह सौ हाथका था। उसमें चार पहिये लगे थे। वह रथ टूटने या बिगड़नेवाला नहीं था। कैसी ही विषम भूमि क्यों न हो, उसमें वह आगे बढ़ जाता था। उस रथमें बड़े-बड़े आयुध सुन्दर ढंगसे सजाकर रखे गये थे। उसमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं, जिनसे मधुर ध्वनिका विस्तार होता रहता था। रथके ऊपरी भागमें उसकी रक्षाके लिये चीतेकी खाल मढ़ी गयी थी। उस रथमें भाँति-भाँतिके रत्न जड़े गये थे तथा सोनेकी जालियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उसका धुरा बहुत अच्छा था। वह रथ अच्छी श्रेणीके रथोंमें भी सबसे अच्छा था। उसकी बैठक बड़ी सुन्दर थी। वह देखनेमें पर्वत-जैसा जान पड़ता था। उसमें जीव-जन्तुओंके चित्र अङ्कित थे। भाँति-भाँतिके पक्षियोंके चित्र भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके भीतर दिव्यास्त्र और तरकस रखे गये थे। उस रथसे मेघगर्जनाके समान गम्भीर घर्घर-शब्द होता रहता था। गदाओं और परिघोंसे परिपूर्ण वह विशाल रथ मूर्तिमान् समुद्र-सा जान पड़ता था। उस रथमें जहाँ-जहाँ संधिस्थलोंको बाँध रखनेके लिये पट्टियाँ लगी थीं, वहाँ-वहाँ वे पट्टिकाएँ सुवर्ण निर्मित केयूर और वलयके सदृश शोभा पाती थीं। उसका कूवर सोनेका मण्डल-सा जान पड़ता था। ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित वह ऊँचा रथ सूर्यमण्डलसे विभासित मन्दराचल-सा जान पड़ता था। दूरसे देखनेपर उसका रंग बड़े-बड़े गजराजों, मेघोंकी घटाओं तथा भालुओंके समान जान पड़ता था। उसमें एक हजार रीछ जुते हुए थे। उसकी घरघराहट सहस्रों मेघोंकी गर्जनाको तिरस्कृत किये देती थी। वह दीप्तिमान् दिव्य रथ आकाशमें भी चल सकता था और शत्रु-पक्षके रथोंको तोड़-फोड़ डालनेमें समर्थ था। युद्धकी आकांक्षा रखनेवाला मयासुर उस रथपर सवार हुआ मानो अंशुमाली सूर्य दीप्तिमान् मेरु पर्वतपर आरूढ़ हुए हों॥

तारस्तु क्रोशविस्तारमायसं वायसध्वजम् ॥ ८ ॥
शैलोत्करसमाकीर्णं नीलाञ्जनचयोपमम् ।
काललोहाष्टचरणं लोहेषायुगकूवरम् ।
तिमिराङ्गारकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम् ॥ ९ ॥
लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम् ।

१६० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

आयसैः परिघैः कीर्णं क्षेपणीयैस्तथाश्मभिः ॥ १० ॥ प्रासैः पाशैश्च विततैरवसक्तैश्च मुद्गरैः । शोभितं त्रासनीयैश्च तोमरैः सपरश्वधैः ॥ ११ ॥ उद्यन्तं द्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मन्दरम् । युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम् ॥ १२ ॥

तारनामक दैत्य लोहेके बने हुए उत्तम रथपर आरूढ हुआ, जिसका विस्तार एक कोसका था; उसके ऊपर कौएके चिह्नसे सुशोभित ध्वजा फहरा रही थी। उसके भीतर शिलाखण्डोंके समूह भरे हुए थे। वह नीली कज्जलराशिके समान प्रतीत होता था। उसमें काले लोहेके आठ पहिये लगे थे। उसके ईपादण्ड (हरसे या बम), जुआ और कूबर भी लोहेके ही बने हुए थे। उसकी कान्ति काले कोयलेके समान काली थी, वह अपनी घरघराहटसे गरजता हुआ मेघ-सा जान पड़ता था। उसके ऊपर लोहेकी बहुत बड़ी जाली लगी हुई थी, जिसमें झरोखे शोभा पाते थे। वह रथ लोहेके परिघों तथा फेंकने योग्य पत्थरोंके गोलोंसे भरा था। बहुत-से भाले, विस्तृत पाश, बहुसंख्यक लटकते हुए मुद्गर, डरावने तोमर और फरसे उसकी शोभा बढ़ाते थे। वह शत्रुओंके लिये दूसरे मन्दराचलकी भाँति उदित हुआ था, उस श्रेष्ठ रथमें एक हजार गधे जुते हुए थे ॥ ८-१२ ॥

विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः । प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः ॥ १३ ॥

क्रोधमें भरा हुआ विरोचन नामक दैत्य हाथमें गदा लिये उस सेनाके मुहानेपर खड़ा हो गया। वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था, मानो कान्तिमान् शिखरसे युक्त कोई पर्वत खड़ा हो ॥ १३ ॥

युक्तं हयसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः । स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः ॥ १४ ॥

दानव हयग्रीव शत्रुओंकी सेनाको कुचल डालनेमें समर्थ था। उसने एक हजार घोड़ोंसे जुते हुए रथको अपना वाहन बनाया ॥ १४ ॥

व्यायतं बहुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन् महत् । वराहः प्रमुखे तस्थौ सावरोह इवाचलः ॥ १५ ॥

वराह नामक दानव कई हजार हाथ लंबा विशाल धनुष टंकारता हुआ दैत्य-सेनाके अग्रभागमें खड़ा हो गया, उस समय वह वरोहों (जटाओं) से युक्त बरगदके समान प्रतीत होता था ॥ १५ ॥

खरस्तु विक्षरन् दर्पान्नेत्राभ्यां रोषजं जलम् । स्फुरद्दन्तौष्ठवदनः संग्रामं सोऽभ्यकाङ्क्षत ॥ १६ ॥

खर नामक दैत्य अपने नेत्रोंसे रोषजनित आँसू बहाता हुआ बड़े दर्पके साथ आया और युद्धकी इच्छासे डट गया, उस समय उसके दाँत, ओठ और मुख क्रोधसे फड़क रहे थे ॥ १६ ॥

त्वष्टा त्वष्टादशहयं यानमास्थाय दानवः । व्यूहितो दानवैर्व्यूहैः परिचक्राम वीर्यवान् ॥ १७ ॥

त्वष्टा नामक बलशाली दानव अठारह घोड़ोंसे जुते हुए रथपर सवार होकर आया और व्यूहमें खड़े हुए दानवोंके साथ स्वयं भी व्यूहका एक अङ्ग बनकर सब ओर घूमने लगा ॥

विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः । श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ १८ ॥

विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत सफेद कुण्डलोंसे विभूषित हो युद्धके लिये सामने आकर डट गया, वह श्वेत-पर्वतके समान दिखायी देता था ॥ १८ ॥

अरिष्टो बलिपुत्रस्तु वरिष्ठोऽद्रिशिलायुधैः । युद्धायातिष्ठदायस्तो धराधर इवापरः ॥ १९ ॥

बलिक्रा ज्येष्ठ पुत्र अरिष्ट पर्वतीय शिलाखण्डोंको आयुधके रूपमें धारण किये शत्रुओंका सामना करनेके लिये खड़ा हुआ, उसने युद्धकी कलामें विशेष परिश्रम किया था। वह दूसरे पर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ १९ ॥

किशोरस्त्वतिसंरम्भात् किशोर इव चोदितः । अभवद् दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः ॥ २० ॥

किशोर नामक दैत्य चाबुकसे हाँके गये बछेड़ेके समान बड़े हर्ष और उत्साहके साथ आकर दैत्यसेनाके मध्यभागमें खड़ा हो गया। वह नवोदित सूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥

लम्बस्तु लम्बमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः । दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान् ॥ २१ ॥

लम्ब नामक दानव बरसनेके लिये झुके हुए मेघोंकी काली घटाके समान काला दिखायी देता था, उसके वस्त्र और आभूषण बड़े-बड़े थे। दैत्य-सेनाके व्यूहमें खड़ा होकर वह कुहासेसे ढँके हुए सूर्यके समान सुशोभित होता था ॥

स्वर्भानुर्वक्रयोधी तु दशनौष्ठेक्षणायुधः । हसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे स महाग्रहः ॥ २२ ॥

वक्र रीतिसे युद्ध करनेवाला राहु नामक महान् ग्रह हँसता हुआ आकर दैत्य-सेनाके मुहानेपर डट गया। वह अपने दाँतों, नेत्रों और ओठोंसे भी आयुधका काम लेता था ॥ २२ ॥

अन्ये हयगता भान्ति नागस्कन्धगताः परे । सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहर्क्षगताः परे ॥ २३ ॥

कुछ दानव घोड़ोंपर सवार दिखायी देते थे और कुछ गजराजोंकी पीठपर। दूसरे बहुत-से दैत्य सिंह, व्याघ्र, सूअर और रीछोंपर चढ़े हुए थे ॥ २३ ॥

-हरिवंशपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः [ १६१


केचित् खरोष्ट्रयातारः केचित् तोयदवाहनाः।
नानापक्षिगताश्चान्ये केचित् पवनवाहनाः ॥ २४ ॥
कोई गधों और ऊँटोंपर चढ़कर जा रहे थे, तो कोई बादलोंको ही अपना वाहन बनाये हुए थे। दूसरे दैत्य नाना प्रकारके पक्षियोंपर बैठे थे और कितने ही दानव वायुके सहारे ही उड़ रहे थे ॥ २४ ॥

पत्त्यश्चापरे दैत्या भीषणा विकृताननाः।
एकपादा द्विपादाश्च नर्दन्तो युद्धकाङ्क्षिणः ॥ २५ ॥
दूसरे विकराल मुखवाले भीषण दैत्य पैदल ही चल रहे थे। किन्हींके एक पैर थे तो किन्हींके दो पैर, वे सभी युद्धकी अभिलाषासे गरज रहे थे ॥ २५ ॥

प्रस्वेदमाना बहवः स्फोटयन्तश्च ते भुजान्।
दृप्तशार्दूलनिर्घोषा नेदुर्दानवपुङ्गवाः ॥ २६ ॥
बहुत-से दानवराज उछलते-कूदते और ताल ठोंकते हुए बलोन्मत्त सिंहोंके समान दहाड़ रहे थे ॥ २६ ॥

ते गदापरिघैरुग्रैर्धनुर्व्यायामशालिनः।
बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयन्ति स्म देवताः ॥ २७ ॥
धनुष खींचनेके परिश्रमसे सुशोभित होनेवाले वे दैत्य अपनी गदाओं, भयंकर परिघों तथा परिघ जैसी मोटी एवं बलिष्ठ भुजाओंद्वारा देवताओंको डाँट बता रहे थे ॥ २७ ॥

प्रासैः पाशैश्च खड्गैश्च तोमराङ्कुशपट्टिशैः।
चिक्रीडुस्ते शतघ्नीभिः शतधारैश्च मुद्गरैः ॥ २८ ॥
वे भालों, पाशों, खड्गों, तोमरों, अंकुशों, पट्टिशों, शतघ्नियों और सौ धारवाले मुद्गरोंसे खेल रहे थे ॥ २८ ॥

गण्डशैलैश्च शैलैश्च परिघैश्चोत्तमायुधैः।
चक्रैश्च दैत्यप्रवराश्चक्रुरानन्दितं बलम् ॥ २९ ॥
वे श्रेष्ठ दैत्यवीर पहाड़ोंसे टूटकर गिरी हुई बड़ी-बड़ी चट्टानों, शैल-शिखरों, परिघों, चक्रों तथा अन्य उत्तमोत्तम आयुधोंसे अपनी सेनाको आनन्दित कर रहे थे ॥ २९ ॥

एवं तद् दानवं सैन्यं सर्वं युद्धबलोत्कटम्।
देवताभिमुखं तस्थौ मेघानीकमिवोत्थितम् ॥ ३० ॥
इस प्रकार युद्धके लिये बलाभिमानसे उन्मत्त हुई वह दानवोंकी सम्पूर्ण सेना मेघोंकी घिरी हुई घटाके समान देवताओंके सम्मुख डटकर खड़ी थी ॥ ३० ॥

तदद्भुतं दैत्यसहस्रगाढं वाय्वग्नितोयाम्बुदशैलकल्पम्।
बलं रणौघाम्युदयावकीर्णं युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे ॥ ३१ ॥
वह अद्भुत दैत्य-सेना सहस्रों दैत्यवीरोंसे ठसाठस भरी थी। वायु, अग्नि, जल, मेघ एवं पर्वतमालाओंके समान दिखायी देती थी। युद्धके प्रवाहको बढ़ानेके लिये सब ओर फैली हुई थी और लड़नेकी इच्छासे उन्मत्त हुई-सी प्रतीत होती थी ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥


चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः

आश्चर्यतारकामय संग्राममें देवसेनाकी युद्धके लिये तैयारी

वैशम्पायन उवाच
श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तरस्तात विग्रहे।
सुराणां सर्वसैन्यस्य विस्तरं वैष्णवं शृणु ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—तात ! उस युद्धके समय दैत्य-सेनाका जो विस्तार था, वह तुमने सुन लिया। अब देवताओंकी सम्पूर्ण सेनाका विस्तार, जो भगवान् विष्णुके आश्रित है, सुनो ॥ १ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महाबलौ।
सबलाः सानुगाश्चैव संनह्यन्त यथाबलम् ॥ २ ॥
आदित्य, वसु, रुद्र और महाबली अश्विनीकुमार—ये अपने दल-बल और अनुयायियोंको साथ ले यथाशक्ति युद्ध करनेके लिये कवच आदिसे सुसज्जित हो गये ॥ २ ॥

पुरुहूतस्तु पुरतो लोकपालः सहस्रदृक्।
ग्रामणीः सर्वदेवानामारुरोह सुरद्विपम् ॥ ३ ॥
सबसे पहले समस्त देवताओंके नेता सहस्र नेत्रधारी इन्द्र देवताओंके हाथी ऐरावतपर आरूढ़ हुए ॥ ३ ॥

सव्ये चास्य रथः पार्श्वे पक्षिप्रवरवेगवान्।
सुचारुचक्रचरणो हेमवज्रपरिष्कृतः ॥ ४ ॥
उनकी बायीं ओर बहुत ही सुन्दर चक्ररूपी चरणोंसे गरुड़के समान वेगपूर्वक चलनेवाला सुवर्ण और हीरोंसे जड़ा हुआ उनका रथ चल रहा था ॥ ४ ॥

देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः।
दीप्तिमद्भिः सदस्यैश्च ब्रह्मर्षिभिरभिष्टुतः ॥ ५ ॥
उनके पीछे देवता, गन्धर्व और यक्षोंकी मण्डलियाँ चल


म० ह० ६—

१६२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

रही थीं तथा यज्ञमें सहायता करनेवाले सहस्रों दीप्तिमान् ब्रह्मर्षि स्तुति करते हुए चल रहे थे ॥ ५ ॥

वज्रविस्फूर्जितोद्भूतैर्विद्युदिन्द्रायुधान्वितैः ।
गुप्तो वलाहकगणैः कामगैरिव पर्वतैः ॥ ६ ॥

वज्र (गाज) की गड़गड़ाहटसे फटते हुए तथा बिजली एवं इन्द्रधनुषसे युक्त मेघसमूह देवराजके साथ चल रहे थे। वे ऐसे लगते थे मानो इच्छानुसार चलनेवाले पर्वत हों। इन्द्रका वह रथ उन मेघोंद्वारा सुरक्षित था ॥ ६ ॥

समारूढः स भगवान् पर्यति मघवा गजम् ।
हविर्धानेषु गायन्ति विप्राः सोममखे स्थिताः ॥ ७ ॥
स्वर्गे शक्रानुयानेषु देवतूर्यनिनादिषु ।
इन्द्रं समुपवृत्त्यन्ति शतशो ह्यप्सरोगणाः ॥ ८ ॥

सोमयागमें भाग लेनेवाले ब्राह्मण हविष्य रखनेके स्थानोंमें हविष्य रखते समय जिनकी स्तुति करते हैं, स्वर्गमें जिनकी सवारियोंके अवसरपर देवताओंकी तुरहियाँ बजती हैं और जिनके साथ अप्सराओंकी सैकड़ों मण्डलियाँ नाचती हुई चलती हैं, वे ही भगवान् इन्द्र हाथीपर सवार होकर चल रहे थे ॥ ७-८॥

केतुना वंशजातेन राजमानो यथा रविः ।
युक्तो हरिसहस्रेण मनोमारुतरंहसा ॥ ९ ॥

बाँसकी ध्वजासे सुशोभित तथा मन और वायुके समान वेगवाले हजार घोड़ोंसे खींचा जानेवाला इन्द्रका रथ सूर्यकी तरह दमक रहा था ॥ ९ ॥

स स्यन्दनवरो भाति युक्तो मातलिना तदा ।
कृत्स्नः परिवृतो मेरुर्भास्करस्येव तेजसा ॥ १० ॥

(इन्द्रके सारथि) मातलिस युक्त वह रथ सूर्यके तेजसे घिरा हुआ सम्पूर्ण मेरुपर्वत-सा दीखता था ॥ १० ॥

यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालयुक्तं च मुद्गरम् ।
तस्थौ सुरगणानीके दैत्यान् नादेन भीषयन् ॥ ११ ॥

यमराज मृत्यु-देवताके द्वारा अधिष्ठित दण्ड तथा मुद्गरको धारण कर अपने सिंहनादसे दैत्योंको भयभीत करते हुए देवताओंकी सेनाके मुहानेपर डट गये ॥ ११ ॥

चतुर्भिः सागरैर्गुप्तो लेलिहानैश्च पन्नगैः ।
शङ्खमुक्ताङ्गदधरो बिभ्रत्तोयमयं वपुः ॥ १२ ॥
कालपाशं समाविध्य हयैः शशिकरोपमैः ।
वाय्वीरितजलोद्वारैः कुर्वँल्लीलाः सहस्रशः ॥ १३ ॥
पाण्डुरोद्धूतवसनः प्रवालरुचिराधरः ।
मणिश्यामोत्तमवपुर्हारभारापिंतोदरः ॥ १४ ॥
वरुणः पाशभृन्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान् ।
युद्धवेलामभिलपन् भिन्नवेल इवार्णवः ॥ १५ ॥

युद्धका अवसर चाहते हुए पाशधारी वरुण किनारेको तोड़कर आगे बढ़नेवाले समुद्रकी भाँति देवताओंकी सेनाके बीचमें आकर डट गये। वे चारों समुद्रों और जीभ लपलपाते हुए सर्पोंसे सुरक्षित थे। उन्होंने शङ्ख और मोतियोंके बाजूबन्द धारण कर रखे थे। उनका शरीर जलमय था। वे कालपाशको घुमाते हुए चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत रंगके घोड़ोंसे और वायुके द्वारा उछाले जानेवाले जलके उद्गारोंसे सहस्रों प्रकारकी क्रीड़ाएँ कर रहे थे। उनका श्वेत वस्त्र फहरा रहा था। उनके सुन्दर ओठ मूँगे एवं नूतन पल्लवोंके समान लाल-लाल थे। मणिमय आभूषणोंसे विभूषित हुए उनके श्याम अङ्गोंकी बड़ी उत्तम शोभा हो रही थी तथा हारोंका भार उनके उदरपर पड़ रहा था ॥ १२-१५ ॥

यक्षराक्षससैन्येन गुह्यकानां गणैरपि ।
मणिश्यामोत्तमवपुः कुबेरो नरवाहनः ॥ १६ ॥
युक्तश्च शङ्खपद्माभ्यां निधीनामधिपः प्रभुः ।
राजराजेश्वरः श्रीमान् गदापाणिर्दृश्यत ॥ १७ ॥

नवों निधियोंके स्वामी, महान् शक्तिशाली, राजराजेश्वर श्रीमान् कुबेर, जिनका उत्तम शरीर नीलमणिके समान श्याम कान्तिसे सुशोभित था और जो मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकीमें सवार होते हैं, मूर्त्तिमान् शङ्ख और पद्म नामकी निधियोंको साथ लेकर हाथमें गदा धारण किये दिखायी दिये। उनके साथ यक्ष और राक्षसोंकी सेना तथा गुह्यकोंके गण विद्यमान थे ॥ १६-१७ ॥

विमानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थितः ।
स राजराजः शुशुभे युद्धार्थी नरवाहनः ।
प्रेक्ष्यमाणः शिवसखः साक्षादिव शिवः स्वयं ॥ १८ ॥

विमानमें बैठकर युद्ध करनेवाले, शिवजीके मित्र, राजाधिराज नरवाहन कुबेर युद्धके लिये पुष्पक विमानमें स्थित हो बड़ी शोभा पा रहे थे। उस समय वे साक्षात् भगवान् शिवके समान दृष्टिगोचर होते थे ॥ १८ ॥

पूर्वं पक्षं सहस्राक्षः पितृराजस्तु दक्षिणम् ।
वरुणः पश्चिमं पक्षमुत्तरं नरवाहनः ॥ १९ ॥
चतुर्षु युक्ताश्चत्वारो लोकपाला बलोत्कटाः ।
स्वासु दिक्ष्वभ्यरक्षन् वै तस्य देवबलस्य ह ॥ २० ॥

उस देवसेनाके पूर्वपक्षकी देखभाल सहस्रलोचन देवराज इन्द्र कर रहे थे। दक्षिण-पक्षकी देखभालका भार पितृराज यमने सम्हाला। पश्चिम-पक्षकी देख-रेख वरुणदेवने की और उत्तर-पक्षका निरीक्षण नरवाहन कुबेरने किया। इस प्रकार चारों दिशाओंमें सावधानीके साथ खड़े हुए चारों उत्कट बलशाली लोकपाल अपनी-अपनी दिशाकी ओरसे उस सेनाकी रक्षा कर रहे थे ॥ १९-२० ॥

सूर्यः सप्ताश्वयुक्तेन रथेनाम्बरगामिना ।
श्रिया जाज्वल्यमानेन दीप्यमानैश्च रश्मिभिः ॥ २१ ॥

हरिवंशपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः १६३


उदयास्तमयं चक्रे मेरुपर्यन्तगामिना।
त्रिदिवद्वारचक्रेण तपता लोकमव्ययम्॥ २२॥

सूर्यदेव सात घोड़ोंसे युक्त आकाशगामी रथके द्वारा युद्धभूमिमें आये थे। उनका वह रथ उत्तम शोभा तथा दीप्तिमान् किरणोंसे जगमगा रहा था। वह मेरु पर्वतके चारों ओर चक्कर लगानेवाला, स्वर्गके द्वारपर चक्रकी भाँति घूमनेवाला और जो प्रवाहरूपसे अक्षय बने रहते हैं, उन समस्त लोकोंको प्रकाशित करनेवाला था। उसीके द्वारा सूर्यदेव संसारमें उदय और अस्तकी झाँकी कराते हैं॥ २१-२२॥

सहस्ररश्मियुक्तेन भ्राजमानः स्वतेजसा।
चचार मध्ये देवानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः॥ २३॥

सहस्रों किरणोंसे सम्पन्न अपने ही तेजसे प्रकाशित होनेवाले, द्वादश रूपधारी भगवान् दिनेश (सूर्य) पूर्वोक्त रथके द्वारा आकर देव-सेनाके बीचमें विचरने लगे॥ २३॥

सोमः श्वेतहयैर्भाति स्यन्दने शीतरश्मिवान्।
हिमतोयप्रपूर्णाभिर्भाभिराह्लादयञ्जगत् ॥ २४॥

शीतल किरणोंवाले चन्द्रमा श्वेत घोड़ोंसे युक्त रथमें बैठे हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। वे हिम और जलसे भरी हुई अपनी प्रभाओंद्वारा सम्पूर्ण जगत्‌को आह्लाद प्रदान करते थे॥ २४॥

तमृक्षयोगानुगतं शिशिरांशुं द्विजेश्वरम्।
जगच्छायाङ्किततनुं नैशस्य तमसः क्षयम्॥ २५॥
ज्योतिषामीश्वरं व्योम्नि रसानां रसनं प्रभुम्।
ओषधीनां परित्राणं निधानममृतस्य च॥ २६॥
जगतः प्रथमं भागं सौम्यं शीतमयं रसम्।
ददृशुर्दानवाः सोमं हिमप्रहरणस्थितम्॥ २७॥

नक्षत्र और योग जिनका अनुसरण करते हैं, जो शीतल किरणोंसे सुशोभित हैं, ब्राह्मणोंके राजा हैं, जिनका शरीर नीले धब्बेके रूपमें पृथ्वीकी छायासे अङ्कित रहता है, जो रात्रिके अन्धकारका नाश करनेवाले हैं, आकाशमें स्थित ज्योतिर्मयी तारिकाओंके अधीश्वर हैं, रसोंके आश्रय एवं प्रभु हैं, ओषधियोंके रक्षक तथा अमृतकी निधि हैं, (अग्नीषोमात्मक) जगत्‌के प्रथम (मुख्य) भाग हैं और सौम्य तथा शीतल रस हैं, उन्हीं चन्द्रमाको दैत्योंने हिमका आयुध ग्रहण करके खड़ा हुआ देखा॥ २५-२७॥

यः प्राणः सर्वभूतानां पञ्चधा भिद्यते नृषु।
सप्तस्कन्धगतो लोकांस्त्रीन् दधार चराचरान्॥ २८॥
यमाहुरग्नेर्यन्तारं सर्वप्रभवमीश्वरम्।
सप्तस्वरगता यस्य योनिर्गीतिरुदीर्यते॥ २९॥
यं वदन्त्युत्तमं भूतं यं वदन्त्यशरीरिणम्।
यमाहुराकाशगमं शीघ्रगं शब्दयोनिजम्॥ ३०॥
स वायुः सर्वभूतायुरुद्धतः स्वेन तेजसा।
ववौ प्रव्यथयन् दैत्यान् प्रतिलोमः सतोयदः॥ ३१॥

जो समस्त भूतोंके प्राण हैं, मनुष्य आदि जीवोंके भीतर प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—इन पाँच रूपोंमें विभक्त होकर निवास करते हैं, आवह, प्रवह आदि सात स्कन्धोंमें स्थित हो त्रिलोकीके चराचर जीवोंको धारण करते हैं, जिन्हें अग्निका सारथि कहा जाता है, जो सबके उत्पत्तिस्थान और ईश्वर हैं, जिनके कारणभूत आकाशकी शब्दतन्मात्रा निषाद ऋषभ आदि स्वरोंमें उतर आनेपर गीति कहलाती है, जिन्हें पाँच महाभूतोंमें उत्तम तथा शरीररहित बताते हैं, जिनको आकाशचारी और शीघ्रगामी भी कहते हैं तथा शब्दयोनि (आकाश) से जिनकी उत्पत्ति बतायी गयी है, वे समस्त प्राणियोंके जीवनरूप वायुदेव अपने तेजसे दैत्योंको व्यथित करते हुए वहाँ मेघोंके साथ प्रतिकूल एवं प्रचण्ड गतिसे प्रवाहित होने लगे॥ २८-३१॥

मरुतो देवगन्धर्वा विद्याधरगणैः सह।
चिक्रीडुरसिभिः शुभ्रैर्निर्मुक्त्तैरिव पन्नगैः॥ ३२॥

उनचास मरुत, देवता और गन्धर्व, विद्याधरगणोंके साथ आकर केंचुलसे निकले हुए सर्पोंके समान, म्यानसे बाहर निकाली हुई चमचमाती तलवारोंसे खेलने लगे॥ ३२॥

सृजन्तः सर्पपतयस्तीव्रं रोषमयं विषम्।
शरभूताः सुरेन्द्राणां चेरुर्व्यात्तमुखा दिवि॥ ३३॥

देवेश्वरोंके बाण बने हुए बहुसंख्यक नागराज अपने मुखको फैलाकर तीव्र रोषमय विष उगलते हुए आकाशमें घूमने लगे॥ ३३॥

पर्वतास्तु शिलाभृङ्गैः शतशाखैश्च पादपैः।
उपतस्थुः सुरगणान् प्रहर्तुं दानवं वलम्॥ ३४॥

पर्वतोंके अधिष्ठाता देवता भी बहुत-सी चट्टानों, शिखरों तथा सौ-सौ डालियोंवाले वृक्षोंद्वारा दानवदलपर प्रहार करनेके लिये देवगणोंकी सेवामें उपस्थित थे॥ ३४॥

यः स देवो हृषीकेशः पद्मनाभस्त्रिविक्रमः।
कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो विश्वस्य जगतः प्रभुः॥ ३५॥
समुद्रयोनिर्मधुहा हव्यभुक्तुतसत्कृतः।
भूरापोव्योमभूतात्मा समः शान्तिकरोऽरिहा॥ ३६॥
जगद्योनिर्जगद्बीजो जगद्गुरुस्दारधीः।
सोऽर्कमग्निसिवोद्यन्तमुद्यम्योत्तमतेजसम् ॥ ३७॥
अरिप्रममरानीके चक्रं चक्रगदाधरः।
सपरीवेपमुद्यन्तं सवितुर्मण्डलं यथा॥ ३८॥

जो हृषीकेशके नामसे प्रसिद्ध हैं, सबके आराध्यदेव हैं, सृष्टिके आरम्भमें जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ था, जो अपने तीन डगोंसे सम्पूर्ण त्रिलोकीको नाप चुके हैं, प्रलयकाल-

१६४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

में प्रकाशित होनेवाले अग्निदेवके समान जिनका सहज तेज है, जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं, नारायणरूपसे समुद्रमे शयन करते हैं, इसलिये समुद्र जिनकी शयनस्थली है, जिन्होने मधु नामक दैत्यका नाश किया है, जो हविष्यके भोक्ता और यज्ञोंमें पूजित एवं सम्मानित होनेवालेहैं, पृथ्वी, जल, आकाश तथा अन्यान्य भूत जिन विराट् रूपधारी प्रभुके अङ्ग हैं, जो सर्वत्र समभावसे रहते और समता रखते हैं, जो कान्तिका विस्तार करनेवाले और शत्रुनाशक हैं, जगत्की योनि ( उत्पत्तिस्थान ), जगत्के बीज ( आदि कारण ) तथा जगत्के गुरु हैं, जिनकी बुद्धिमें सदा उदारता भरी रहती है, वे चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु अग्नि तथा उगते हुए सूर्यके समान उत्तम तेजसे सम्पन्न शत्रुनाशक चक्र उठाये हुए देवसेनाके मध्यभागमे विराजमान थे। उन्हे देखकर ऐसा लगता था, मानो वे परिवेषसहित उगते हुए सूर्यमण्डलको ही पकड़कर ले आये हों॥ ३५-३८ ॥

सव्येनालम्ब्य महतीं सर्वासुरविनाशिनीम् ।
करेण कालीं वपुषा शत्रुकालप्रदां गदाम् ॥ ३९ ॥
शेषैर्भुजैः प्रदीप्तानि भुजगारिध्वजः प्रभुः ।
दधारायुधजालानि शार्ङ्गादीनि महायशाः ॥ ४० ॥

सर्पोंके शत्रु गरुड़ जिनके ध्वज हैं, उन महायशस्वी भगवान् श्रीहरिने अपने बायें हाथमे समस्त असुरोंका विनाश करनेवाली तथा शत्रुओंको कालके गालमे भेजनेवाली काले रंगकी विशाल गदा ले रखी थी और शेष भुजाओंमें वे अत्यन्त दीप्तिमान् शार्ङ्ग आदि आयुध धारण किये हुए थे ॥ ३९-४० ॥

स कश्यपस्यात्मभवं द्विजं भुजंगभोजनम् ।
पवनाधिकसम्पातं गगनक्षोभणं खगम् ॥
भुजगेन्द्रेण वदने निविष्टेन विराजितम् ॥ ४१ ॥
अमृतारम्भनिर्मुक्तं मन्द्राद्रिमिवोच्छ्रितम् ।
देवासुरविमर्देषु शतशो दृष्टविक्रमम् ॥ ४२ ॥
महेन्द्रेणामृतस्यार्थे वज्रेण कृतलक्षणम् ।
शिखिनं चूडिनं चैव तप्तकुण्डलभूषणम् ।
विचित्रपक्षवसनं धातुमन्तमिवाचलम् ॥ ४३ ॥
स्फीतक्रोडावलम्बेन शीतांशुसमतेजसा ।
भोगिभोगावसक्तेन मणिरत्नेन भास्वता ॥ ४४ ॥
पक्षाभ्यां चारुचित्राभ्यामावृत्य दिवि लीलया ।
युगान्ते सेन्द्रचापाभ्यां तोयदाभ्यामिवान्बरम् ॥ ४५ ॥
नीललोहितपीताभिः पताकाभिरलंकृतम् ।
केतुवेषप्रतिच्छन्नं महाकायनिकेतनम् ॥ ४६ ॥
अरुणावरजं श्रीमानारुह्य समरे हरिः ।
सुवर्णे स्वेन वपुषा सुपर्णं खेचरोत्तमम् ॥ ४७ ॥

सबके पाप और दुःखका अपहरण करनेवाले श्रीमान् भगवान् नारायण सर्पोंका भक्षण करनेवाले, कश्यपकुमार एवं अरुणके छोटे भाई पक्षिश्रेष्ठ गरुड़पर सवार होकर वहाँ आये थे। गरुड़जीके पंख बड़े सुन्दर थे तथा वे अपने सुन्दर शरीरसे सुवर्णके समान मनोरम कान्ति फैला रहे थे। आकाशमें विचरनेवाले पक्षिप्रवर गरुड़ वायुकी अपेक्षा भी अधिक वेगसे उड़ते थे, उनके वेगपूर्वक चलते समय आकाशमे खलबली मच जाती थी। वे अपने मुखमे एक नागराजको दबाये हुए थे, इससे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। अमृत निकालनेके लिये प्रारम्भमे ही क्षीरसागरमे छोड़े गये मन्दराचलके समान वे ऊँचे दिखायी देते थे। देवासुर-संग्रामके अवसरोंपर सैकड़ों बार उनका पराक्रम देखा जा चुका था। जब वे स्वर्गमे अमृत लेने गये थे, उस समय इन्द्रने उस अमृतकी रक्षाके लिये उनपर वज्रसे प्रहार किया था। जिसकी चोटका चिह्न उस समय भी दीख रहा था, उनके सिरपर मोरकी-सी कलँगी और चोटी थी तथा वे तपे हुए सुवर्णके कुण्डलोसे विभूषित थे। रंग-बिरंगे पंख ही उन्होंने वस्त्ररूपमे धारण कर रखे थे, जिनके कारण वे विविध धातुओंसे मण्डित पर्वतके समान प्रतीत होते थे। उनका वक्षःस्थल चौड़ा था, उसपर ( मुखमें आधे निगले हुए ) सर्पके मस्तकमें चिपकी हुई श्रेष्ठमणि लटकती थी, जो अपने तेजसे शीतल किरणवाले चन्द्रमाकी भाँति उद्भासित हो रही थी। वे अपने मनोहर एवं विचित्र पंखोंसे लीलापूर्वक आकाशको घेरकर इस तरह खड़े थे, मानो प्रलयकालमें इन्द्रधनुषसे युक्त हुए दो मेघखण्डोंसे आकाश घिर गया हो। श्रीहरिकी ध्वजामे चिह्नके रूपमें छिपे हुए पक्षिराज गरुड नीली, पीली और लाल रंगकी पताकाओंसे अलंकृत थे। उनका आधारभूत ध्वजदण्ड बहुत विशाल था ॥ ४१-४७ ॥

तमन्वयुर्देवगणा मुनयश्च तपोधनाः ।
गीर्भिः परममन्त्राभिस्तुष्टुवुश्च गदाधरम् ॥ ४८ ॥

उस समय समस्त देवता और तपोधन मुनि भगवान् गदाधरके पीछे-पीछे चलने और श्रेष्ठ मन्त्रमयी स्तुतियोंद्वारा उनका स्तवन करने लगे ॥ ४८ ॥

तद्वैश्रवणसंश्लिष्टं वैवस्वतपुरस्सरम् ।
वारिराजपरिक्षिप्तं देवराजविराजितम् ॥ ४९ ॥
चन्द्रप्रभाभिर्विमलं युद्धाय समुपस्थितम् ।
पवनावद्धनिर्घोषं सम्प्रदीप्तहुताशनम् ॥ ५० ॥

देवताओंकी वह सेना कुबेरके द्वारा सुसङ्घठित की गयी थी। यमराज उसके आगे-आगे चलनेवाले सेनानायक थे। जलके स्वामी वरुणने समुद्ररूपसे उसको सब ओरसे घेर रखा था तथा देवराज इन्द्र स्वयं उपस्थित होकर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। चन्द्रमाकी प्रभाओंसे वह सारा सैन्यसमूह उज्ज्वल एवं निर्मल दिखायी देता था। वायुके

हरिवंशपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः १६५

वेगपूर्वक चलनेसे उसमें बड़ा गम्भीर शब्द होता था और उस सेनामे खड़े हुए अग्निदेव बड़े वेगसे प्रज्वलित हो रहे थे। ऐसी देवसेना वहाँ दैत्योंके साथ युद्ध करनेके लिये उपस्थित हुई॥ ४९-५० ॥

विष्णोर्जिष्णोः सहिष्णोश्च भ्राजिष्णोस्तेजसा वृतम्।
बलं बलवदुद्भूतं युद्धाय समवर्तत॥ ५१॥

जो नित्य विजयशील, सब कुछ सहन करनेमें समर्थ और नित्य प्रकाशमान हैं, उन भगवान् विष्णुके तेजसे व्याप्त हुई देवताओकी वह बलवती सेना उत्साहसम्पन्न हो युद्धके लिये तैयार हो गयी॥ ५१॥

स्वस्त्यस्तु देवेभ्य इति स्तुत्वा तत्राङ्गिरा ऽब्रवीत्।
स्वस्त्यस्तु दैत्येभ्य इति उशना वाक्यमाददे॥ ५२॥

उस समय अङ्गिराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिने स्तुति करके कहा—'देवताओंका कल्याण हो।' फिर दैत्योंके गुरु शुक्राचार्य भी बोल उठे—'दैत्योंका मङ्गल हो'॥ ५२॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्चर्यतारकामये चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्चर्यतारकामय संग्रामविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४४ ॥


पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

देवासुर-संग्राम एवं और्व अग्निकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

ताभ्यां बलाभ्यां संजज्ञे तुमुलो विग्रहस्तदा।
सुराणामसुराणां च परस्परजयैषिणाम्॥ १॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! एक दूसरेपर विजय पानेकी इच्छावाले देवताओं और असुरोंकी उन सेनाओंमें उस समय घोर युद्ध आरम्भ हो गया॥ १॥

दानवा दैवतैः सार्द्धं नानाप्रहरणोद्यताः।
समीयुर्युध्यमाना वै पर्वताः पर्वतैरिव॥ २॥

दानव-सैनिक नाना प्रकारके हथियार उठाये देवताओंके साथ युद्ध करते हुए उनसे भिड गये, मानो एक श्रेणीके पर्वत दूसरी श्रेणीके पर्वतोंसे टकरा रहे हैं॥ २॥

तत् सुरासुरसंयुक्तं युद्धमत्यद्भुतं वभौ।
धर्माधर्मसमायुक्तं दर्पेण विनयेन च॥ ३॥

देवताओं और असुरोंका वह तुमुल युद्ध अत्यन्त अद्भुत प्रतीत होता था; मानो धर्म और अधर्म परस्पर जूझ रहे हों, दर्प और विनय एक दूसरेसे लड़ रहे हों॥ ३॥

ततो रथैः प्रजविभिर्वाहनैश्च प्रचोदितैः।
उत्पतद्भिश्च गगनं सासिहस्तैः समन्ततः॥ ४॥
विक्षिप्यमाणैर्मुसलैः सम्प्रेष्यद्भिश्च सायकैः।
चापर्विस्फार्यमाणैश्च पात्यमानैश्च मुद्गरैः॥ ५॥
तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्।
जगतस्त्रासजननं युगसंवर्तकोपमम्॥ ६॥

तदनन्तर रथोंके वेगपूर्वक दौड़ने, घोड़ोंके ऐंड़ लगाकर भगाये जाने, चारों ओर तलवार हाथमें लिये योद्धाओंके आकाशमे उछलने, मूसलोंके फेंके जाने, बाणोंके चलाने, धनुषोंके खींचे जाने और मुद्गरोंके गिराये जानेसे देवताओं और दानवोंसे भरा हुआ वह घोर युद्ध प्रलयकालकी अग्निके समान सम्पूर्ण जगत्‌को त्रास देने लगा॥ ४-६॥

स्वहस्तमुक्तैः परिघैः क्षिप्यमाणैश्च पर्वतैः।
दानवाः समरे जघ्नुर्देवानिन्द्रपुरोगमान्॥ ७॥

उस समराङ्गणमें समस्त दानव अपने हाथोंसे छोड़े गये परिघों और फेंके जाते हुए पर्वतशिखरोंकी चोटसे इन्द्र आदि देवताओंको घायल करने लगे॥ ७॥

ते वध्यमाना बलिभिर्दानवैर्जितकाशिभिः।
विषण्णमनसो देवा जग्मुरार्तिं परां मृधे॥ ८॥

युद्धस्थलमे अपनी विजयसे उल्लसित एवं सुशोभित होनेवाले महाबली दानवोंकी मार खाकर समस्त देवता मन-ही-मन खिन्न हो उठे, उन्हें बड़ी पीड़ा हुई॥ ८॥

तेऽस्त्रजालैः प्रमथिताः परिघैर्भिन्नमस्तकाः।
भिन्नोरस्का दितिसुतैर्वमू रक्तं व्रणैर्बहु॥ ९॥

दैत्योंने अपने अस्त्रसमूहोंसे देवताओको मथ डाला, परिघोंकी मारसे उनके मस्तक फोड़ डाले और वक्षःस्थल विदीर्ण कर दिये। उस समय देवता अपने घावोंसे बहुत रक्त बहा रहे थे॥ ९॥

स्पन्दिताः पाशजालैश्च निर्यत्नाश्च शरैः कृताः।
प्रविष्टा दानवीं मायां न शेकुस्ते विचेष्टितुम्॥ १०॥

दैत्योंने फन्दोंके जाल बिछाकर देवताओंको निरुपाय कर दिया और बाणोंके प्रहारसे उन्हें इतना घायल कर दिया कि वे अपने अङ्गोंसे रक्तकी धारा बहाने लगे। दानवोंकी

१६६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मायाके वशीभूत होकर वे हिलने-डुलनेकी भी शक्ति खो बैठे ॥ १०॥

संस्तम्भितमिवाभाति निष्प्राणसदृशाकृति ।
बलं सुराणामसुरैर्निष्प्रयत्नायुधं कृतम् ॥ ११ ॥
असुरोंने देवताओंकी सेनाके सारे प्रयत्न और आयुध निष्फल कर दिये। उस समय वह सेना मन्त्रशक्तिसे स्तम्भित की हुई-सी प्रतीत होती थी, प्राणशून्य मुर्दे-जैसे दिखायी देती थी ॥ ११ ॥

मायापाशान् विकल्पैश्च भिन्दन् वज्रेण ताञ्शरान् ।
शक्रो दैत्यबलं घोरं विवेश बहुलोचनः ॥ १२ ॥
तब बहुसंख्यक नेत्रोंसे सुशोभित होनेवाले देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे दैत्योंके माया-पाशोंको हटाते और उनके चलाये हुए बाणोंको काटते हुए उनकी घोर सेनामें प्रवेश किया ॥ १२ ॥

स दैत्यान् प्रमुखे हत्वा तद् दानवबलं महत् ।
तामसेनास्त्रजालेन तमोभूतमथाकरोत् ॥ १३ ॥
उन्होंने सामने खड़े हुए दैत्योंको मारकर दानवोंकी उस विशाल वाहिनीपर तामसास्त्रका जाल-सा बिछा दिया और उसे अन्धकारसे अभिभूत कर डाला ॥ १३ ॥

तेऽन्योन्यं नावबुध्यन्त देवान् वा दानवानपि ।
घोरेण तमसाऽऽविष्टाः पुरूहूतस्य तेजसा ॥ १४ ॥
इन्द्रके प्रभावसे घोर अन्धकारमें डूबे हुए दैत्य न तो आपसमें ही किसीको जान पाते थे और न देवताओं अथवा दानवोंको ही पहचान पाते थे ॥ १४ ॥

मायापाशैर्विमुक्ताश्च यत्नवन्तः सुरोत्तमाः ।
वपूंषि दैत्यसंघानां तमोभूतान्यपातयन् ॥ १५ ॥
दैत्योंके मायापाशसे मुक्त हुए श्रेष्ठ देवताओंने प्रयत्नशील होकर उन दैत्यसमूहोंके अन्धकारसे आच्छन्न हुए शरीरोंको धरतीपर गिराना आरम्भ किया ॥ १५ ॥

अपध्वस्ता विसंज्ञाश्च तमसा नीलवर्चसः ।
पेतुस्ते दानवगणाश्छिन्नपक्षा इवाचलाः ॥ १६ ॥
अन्धकारसे नीली कान्ति धारण करनेवाले वे दानव देवताओंकी मार खाकर मूर्छित हो पंख कटे हुए पर्वतोंके समान धराशायी होने लगे ॥ १६ ॥

दैत्यानां तद्घनीभूतमन्धकारमहार्णवम् ।
प्रविष्टं बलमुत्रस्तं तमोभूतमिवाभवौ ॥ १७ ॥
अन्धकारके महासागरमें डूबी हुई दैत्योंकी वह घनीभूत सेना अत्यन्त भयभीत हो गयी और स्वर्ग तमोमयी-सी प्रतीत होने लगी ॥ १७ ॥

तदासृजन्महामायां मयस्तां तामसीं दहन् ।
युगान्ताग्निमिवोत्युग्रां सृष्टामौर्वेण वह्निना ॥ १८ ॥
तब मय नामक दानवने इन्द्रके द्वारा फैलायी हुई उस तामसी मायाको नष्ट करते हुए एक महामायाकी सृष्टि की, जो और्व नामक अग्नि (बड़वानल) के द्वारा रची गयी थी और प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त भयंकर थी ॥ १८ ॥

सा ददाह तमः सर्वं माया मयविकल्पिता ।
दैत्यांश्च दीप्तवपुषः सद्य उत्तस्थुराहवे ॥ १९ ॥
मयके द्वारा फैलायी हुई उस मायाने सारे अन्धकारको जलाकर भस्म कर दिया; फिर तो दैत्योंके शरीर दमक उठे और वे तत्काल युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ १९ ॥

मायामौर्वी समासाद्य दह्यमाना दिवौकसः ।
भेजिरे चन्द्रद्विपथं शीतांगुसलिले शयात् ॥ २० ॥
अब तो देवताओंग और्वी मायाके सम्पर्कमें आकर दग्ध होने लगे और ठंडे जलमें शयन करनेके लिये चन्द्रमाके समीप गये ॥ २० ॥

ते दह्यमाना हौर्वेण तेजसा भ्रष्टतेजसः ।
शशंसुर्वज्रिणे देवाः संतप्ताः शरणैषिणः ॥ २१ ॥
वे सब देवता और्वके तेजसे झुलसकर अपना तेज खो बैठे। उन्होंने अत्यन्त संतप्त होकर शरण पानेकी इच्छासे इन्द्रके पास जाकर पुकार की ॥ २१ ॥

संतप्ते मायया सैन्ये दह्यमाने च दानवैः ।
चोदितो देवराजेन वरुणो वाक्यमब्रवीत् ॥ २२ ॥
जब मयासुरकी मायासे सारी सेना संतप्त हो उठी और दानव भी उसे जलाने लगे, तब देवराजके द्वारा उसकी शान्तिके लिये प्रेरित होनेपर वरुणने इस प्रकार कहा ॥ २२ ॥

वरुण उवाच
पुरा ब्रह्मर्षिजः शक्र तपस्तेपेऽतिदारुणम् ।
ऊर्वो मुनिः स तेजस्वी सदृशो ब्रह्मणो गुणैः ॥ २३ ॥
वरुण बोले—देवेन्द्र ! पूर्वकालमें ऊर्व नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी मुनि थे, जो ब्रह्मर्षि भृगुके पुत्र थे । वे गुणोंमें ब्रह्माजीके समान थे । उन्होंने अत्यन्त दारुण तप करना आरम्भ किया ॥ २३ ॥

तं तपन्तमित्वादित्यं तपसा जगदव्ययम् ।
उपतस्थुर्मुनिगणा देवा ब्रह्मर्षिभिः सह ॥ २४ ॥
जैसे सूर्य इस अव्यय (प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले) जगत्‌को सदा तपाते रहते हैं, उसी प्रकार वे भी अपनी तपस्यासे सबको ताप देने लगे । तब ब्रह्मर्षियोंसहित देवता और मुनिगण उनके पास आये ॥ २४ ॥

हिरण्यकशिपुश्चैव दानवो दानवेश्वरः ।
ऋषिं विज्ञापयामास पुरा परमतेजसम् ॥ २५ ॥

हरिवंशपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः १९७


दानव हिरण्यकशिपु भी, जो समस्त दानवोंका स्वामी था, किसी समय उन परम तेजस्वी महर्षिके पास आया और उनसे शान्तिके लिये प्रार्थना करता रहा; यह प्राचीन कालकी बात है ॥ २५ ॥

तमूचुर्ब्रह्मऋषयो वचनं ब्रह्मसम्मितम् । ऋषिवंशेषु भगवंश्छिन्नमूलमिदं कुलम् ॥ २६ ॥

ब्रह्मर्षियोंने उनसे यह वेदतुल्य बात कही—'भगवन् ! ऋषियोंके वंशोंमें आपके इस कुलकी जड़ कट-सी गयी है ॥ २६ ॥

एकस्त्वमनपत्यश्च गोत्रं यन्नानुवर्तसे । कौमारं व्रतमास्थाय क्लेशमेवानुवर्तसे ॥ २७ ॥

'एकमात्र आप ही अपने कुलमें बचे हैं और आपके कोई संतान नहीं है, तो भी आप गोत्रका अनुसरण नहीं करते हैं—उसकी परम्पराको बनाये रखनेके लिये कोई प्रयत्न नहीं करते हैं। केवल नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करके तपस्याजनित क्लेशका ही अनुगमन कर रहे हैं ॥ २७ ॥

बहूनि विप्र गोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम् । एकदेहानि तिष्ठन्ति विभक्तानि विना प्रजाः ॥ २८ ॥

'विप्रवर ! विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंके बहुत-से ऐसे गोत्र या कुल हैं, जो एक शरीर (एक व्यक्ति) पर ही अवलम्बित रहे हैं और संतान न होनेके कारण जड़से अलग होकर नष्ट हो गये हैं ॥ २८ ॥

कुलेषूच्छिन्नमूलेषु तेषु नो नास्ति कारणम् । भवांस्तु तपसा श्रेष्ठः प्रजापतिसमद्युतिः ॥ २९ ॥

'मूलके ही नष्ट हो जानेसे उन कुलोंकी वृद्धिका हमारे देखनेमें कोई कारण नहीं रह गया है, परंतु आप तो (अपनी भावी वंशपरम्पराके मूलरूपमें विद्यमान ही हैं। आपके रहते इस कुलका उच्छेद नहीं होना चाहिये। आप) तपकी दृष्टिसे श्रेष्ठ हैं और तेज एवं कान्तिमें भी प्रजापतियोंके तुल्य हैं ॥

तत् प्रवर्तस्व वंशाय वर्धयात्मानमात्मना । त्वमाधत्स्वोर्जितं तेजो द्वितीयां वै तनुं कुरु ॥ ३० ॥

'अतः आप अपने वंशको चलानेका उद्योग कीजिये और अपने द्वारा अपने आपको बढ़ाइये। अपने ओजस्वी तेज (वीर्य) का (योग्य पत्नीमें) आधान कीजिये और ऐसा करके पुत्ररूपमें अपने दूसरे शरीरको प्रकट कीजिये' ॥

स एवमुक्तो मुनिभिर्मुनिर्मनसि ताडितः । जगर्हे तानृषिगणान् वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३१ ॥

उन महर्षियोंके ऐसा कहनेपर ऊर्व मुनिके हृदयमें गहरा धक्का लगा। वे उन ऋषियोंकी निन्दा करने लगे और इस प्रकार बोले--॥ ३१॥

यथायं शाश्वतो धर्मो मुनीनां विहितः पुरा । सदाऽऽर्षे सेवतां कर्म वन्यमूलफलाशिनाम् ॥ ३२ ॥

'महात्माओ ! जो वनके फल-मूल खाकर रहते हैं और सदा आर्षशास्त्रोंमें बताये हुए सत्कर्मका सेवन करते हैं, उन हम-जैसे ऋषि-मुनियोंके लिये तो प्राचीन कालसे इस तप एवं ब्रह्मचर्यरूप सनातन धर्मका ही विधान किया गया है ॥ ३२॥

ब्रह्मयोनौ प्रसूतस्य ब्राह्मणस्यानुवर्तिनः । ब्रह्मचर्यं सुचरितं ब्रह्माणमपि चालयेत् ॥ ३३ ॥

'ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न होकर ब्राह्मण-धर्मका अनुसरण करनेवाले द्विजके द्वारा इस ब्रह्मचर्य-व्रतका यदि भलीभाँति आचरण किया जाय तो यह ब्रह्माजीको भी विचलित कर सकता है ॥ ३३ ॥

द्विजानां वृत्तयस्तिस्रो ये गृहाश्रमवासिनः । अस्माकं तु वनं वृत्तिर्वनश्रमनिवासिनाम् ॥ ३४ ॥

'जो गृहस्थ-आश्रममें निवास करते हैं, उन ब्राह्मणोंके लिये ही शास्त्रमें यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना और दान ग्रहण करना—ये तीन वृत्तियाँ बतायी गयी हैं। हम-जैसे ऊर्ध्वरेता वनवासियोंके लिये तो वनके फल-मूल ही जीविकाके साधन हैं॥

अम्बुभक्षा वायुभक्षा दन्तोलूखलिकास्तथा । अश्मकुट्टा दशनपाः पञ्चातपतपाश्च ये ॥ ३५ ॥

'कुछ लोग केवल जल या वायु पीकर ही रहते हैं, कुछ दाँतोंसे ही ओखली और मूसलका काम लेते हैं—अर्थात् दाँत रहनेपर भूसीसहित नीवार आदिको चबा लेते हैं,। ये ही 'दशनप' कहलाते हैं। परंतु जिनके दाँत नहीं हैं, वे पत्थरोंसे ही कूट-पीसकर वन्य वस्तुओंको खाते हैं। कुछ पञ्चाग्निके तापका सेवन करते हैं ॥ ३५ ॥

एते तपसि तिष्ठन्तो व्रतैरपि सुदुष्करैः । ब्रह्मचर्यं पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ते परां गतिम् ॥ ३६ ॥

'ये अत्यन्त दुष्कर व्रतोंका आचरण करते हुए भी तपस्यामें लगे रहते और मुख्यतः ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करके उत्कृष्ट गतिको पाना चाहते हैं ॥ ३६ ॥

ब्रह्मचर्याद् ब्राह्मणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते । एवमाहुः परे लोके ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ ३७ ॥

'ब्रह्मचर्यके पालनसे ही ब्राह्मणको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है। इसी तरह ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि ब्रह्मचर्य-का पालन ही परलोकमें ब्रह्मकी प्राप्तिका मुख्य साधन है ॥

ब्रह्मचर्ये स्थितं धैर्यं ब्रह्मचर्ये स्थितं तपः । ये स्थिता ब्रह्मचर्येषु ब्राह्मणास्ते दिवि स्थिताः ॥ ३८ ॥

'ब्रह्मचर्यमें धैर्यकी स्थिति है और ब्रह्मचर्यमें ही तप प्रतिष्ठित है। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यमें दृढ़तापूर्वक स्थित हैं, वे ब्रह्मलोकमें ही विराजमान हैं ॥ ३८ ॥

१६८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


नास्ति योगं विना सिद्धिर्नास्ति सिद्धिं विना यशः।
नास्ति लोके यशोमलं ब्रह्मचर्यात् परं तपः ॥ ३९ ॥

'योगके बिना सिद्धि नहीं मिलती और सिद्धिके बिना यश नहीं प्राप्त होता है। यशका मूल कारण है तप; परंतु इस जगत्में ब्रह्मचर्यसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ॥ ३९ ॥

तन्निगृहेन्द्रियग्रामं भूतग्रामं च पञ्चमम्।
ब्रह्मचर्येण वर्तेत किमतः परमं तपः ॥ ४० ॥

'अतः इन्द्रिय-समुदायको तथा शब्द आदि सूक्ष्म भूत-रूप उसके विषयसमूहको वशमें करके ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक रहे। इससे बढ़कर और कौन-सा तप हो सकता है? ॥४०॥

अयोगे केशहरणमसंकल्पे व्रतक्रिया।
अब्रह्मचर्ये चर्या च त्रयं स्याद् दम्भसंज्ञितम् ॥ ४१ ॥

'अवश्यकर्तव्य ध्यानरूप योगके अभावमें भी सिर मुड़ा लेना, परलोक सुधारनेका संकल्प न रहनेपर भी केवल लोक-रंजनके लिये कृच्छ्र आदि व्रतोंका आचरण करना तथा ब्रह्मकी प्राप्तिको लक्ष्य बनाकर नियमित वेदाध्ययनके बिना ही ब्रह्मचर्यके नियमोंका आश्रय लेना—ये तीनों दम्भ कहलाते हैं ॥ ४१ ॥

क्व दाराः क्व च संयोगः क्व च भावविपर्ययः।
यदेयं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा ॥ ४२ ॥

'जब ब्रह्माजीने मनके द्वारा मानसी प्रजा (सनत्कुमार आदि) की सृष्टि की थी, उस समय स्त्री कहाँ थी? स्त्री-पुरुषका संयोग कहाँ था ? और चित्तकी विकृति (कामातुरता) भी कहाँ थी ? ॥ ४२ ॥

यद्यस्ति तपसो वीर्यं युष्माकममितात्मनाम्।
सृजध्वं मानसान् पुत्रान् प्राजापत्येन कर्मणा ॥ ४३ ॥

'महर्षियो! आपलोग अमेय आत्मबलसे सम्पन्न हैं, यदि आपमें तपस्याकी शक्ति हो तो आप प्रजापतिके समान कर्म करके मानसिक पुत्र उत्पन्न करें ॥ ४३ ॥

मनसा निर्मिता योनिराधातव्या तपस्विना।
न दारयोगं बीजं वा व्रतमुक्तं तपस्विनाम् ॥ ४४ ॥

'तपस्वीको तो अपने मनसे कल्पित योनिमें ही मानसिक संकल्पसे गर्भाधान करना चाहिये। स्त्रीके साथ संयोग अथवा वीर्यका आधान--यह तपस्वी पुरुषोंका नियम नहीं बताया गया है ॥ ४४ ॥

यदिदं लुप्तधर्मार्थं युष्माभिरिह निर्भयैः।
व्याहृतं सद्भिरत्यर्थमसद्द्भिरिव मे मतिः ॥ ४५ ॥

'आपलोग सज्जन हैं तो भी निरे असज्जनोंके समान आपने निःशङ्क होकर यहाँ यह धर्म और अर्थसे शून्य बात कह डाली है, ऐसा मेरा विचार है ॥ ४५ ॥

वपुर्दीप्तान्तरात्मानमेष कृत्वा मनोमयम्।
दारयोगं विना स्रक्ष्ये पुत्रमात्मतनूरुहम् ॥ ४६ ॥

'अच्छा! देखिये, मैं अभी मनोमय वपु (योनि) का निर्माण करके स्त्रीसहवासके बिना ही अपने शरीरसे उत्पन्न होनेवाले ऐसे पुत्रकी सृष्टि कर रहा हूँ, जिसकी अन्तरात्मा अत्यन्त उद्दीप्त होगी ॥ ४६ ॥

एवमात्मानमात्मा मे द्वितीयं जनयिष्यति।
वन्येनानेन विधिना दिधक्षन्तमिव प्रजाः ॥ ४७ ॥

'इस प्रकार मेरा यह शरीर वनवासीके लिये उचित इस विधानके द्वारा ही मेरे दूसरे स्वरूप (पुत्र) को जन्म देगा, जो समस्त प्रजाको जलाकर भस्म कर देनेकी इच्छा रखता होगा' ॥ ४७ ॥

ऊर्वस्तु तपसाऽऽविष्टो निवेश्योरुं हुताशने।
ममन्थैकेन दर्भेण पुत्रस्य प्रभवारणिम् ॥ ४८ ॥

ऐसा कहकर तपके आवेशमें भरे हुए ऊर्व मुनिने अपनी जाँघको अग्निमें डाल दिया और पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अरणि-रूप उस जाँघको एक कुरासे मथने लगे ॥ ४८ ॥

तस्योरुं सहसा भित्त्वा ज्वालामाली निरिन्धनः।
जगतो निधनाकाङ्क्षी पुत्रोऽग्निः समपद्यत ॥ ४९ ॥

उस समय सहसा उनके ऊरु (जाँघ) का भेदन करके एक अग्निस্বরূপ पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बिना ईंधनके ही ज्वालामालाओंसे अलंकृत था। वह समस्त संसारके विनाशकी इच्छा रखता था ॥ ४९ ॥

ऊर्वस्योरुं विनिर्भिद्य चौर्वो नामान्तकोऽनलः।
दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीञ्जज्ञे परमकोपनः ॥ ५० ॥

ऊर्वकी जाँघको चीरकर जो वह लोक-विनाशक परमं क्रोधी अनल प्रकट हुआ था, वह और्वके नामसे विख्यात हुआ। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह तीनों लोकोंको दग्ध कर डालना चाहता हो ॥ ५० ॥

उत्पन्नमात्रश्चोवाच पितरं दीप्तया गिरा।
क्षुधा मे बाधते तात जगद् भक्षे त्यजस्व माम् ॥ ५१ ॥

उसने उत्पन्न होते ही प्रदीप्त वाणीमें अपने पितासे कहा— 'तात! मुझे भूख सता रही है, मेरे आहारके लिये यह सम्पूर्ण जगत् मुझे अर्पित कर दीजिये' ॥ ५१ ॥

त्रिदिवारोहिभिर्ज्वलैर्जृम्भमाणो दिशो दश।
निर्दहन्निव भूतानि ववृधे सोऽन्तकोऽनलः ॥ ५२ ॥

वह कालरूप अग्नि समस्त प्राणियोंको दग्ध-सा करता हुआ बढ़ने लगा। अपनी स्वर्गतक पहुँचनेवाली ज्वालाओंके द्वारा वह दसों दिशाओंमें फैलता जा रहा था ॥ ५२ ॥