विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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में प्रकाशित होनेवाले अग्निदेवके समान जिनका सहज तेज है, जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं, नारायणरूपसे समुद्रमे शयन करते हैं, इसलिये समुद्र जिनकी शयनस्थली है, जिन्होने मधु नामक दैत्यका नाश किया है, जो हविष्यके भोक्ता और यज्ञोंमें पूजित एवं सम्मानित होनेवालेहैं, पृथ्वी, जल, आकाश तथा अन्यान्य भूत जिन विराट् रूपधारी प्रभुके अङ्ग हैं, जो सर्वत्र समभावसे रहते और समता रखते हैं, जो कान्तिका विस्तार करनेवाले और शत्रुनाशक हैं, जगत्की योनि ( उत्पत्तिस्थान ), जगत्के बीज ( आदि कारण ) तथा जगत्के गुरु हैं, जिनकी बुद्धिमें सदा उदारता भरी रहती है, वे चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु अग्नि तथा उगते हुए सूर्यके समान उत्तम तेजसे सम्पन्न शत्रुनाशक चक्र उठाये हुए देवसेनाके मध्यभागमे विराजमान थे। उन्हे देखकर ऐसा लगता था, मानो वे परिवेषसहित उगते हुए सूर्यमण्डलको ही पकड़कर ले आये हों॥ ३५-३८ ॥
सव्येनालम्ब्य महतीं सर्वासुरविनाशिनीम् ।
करेण कालीं वपुषा शत्रुकालप्रदां गदाम् ॥ ३९ ॥
शेषैर्भुजैः प्रदीप्तानि भुजगारिध्वजः प्रभुः ।
दधारायुधजालानि शार्ङ्गादीनि महायशाः ॥ ४० ॥
सर्पोंके शत्रु गरुड़ जिनके ध्वज हैं, उन महायशस्वी भगवान् श्रीहरिने अपने बायें हाथमे समस्त असुरोंका विनाश करनेवाली तथा शत्रुओंको कालके गालमे भेजनेवाली काले रंगकी विशाल गदा ले रखी थी और शेष भुजाओंमें वे अत्यन्त दीप्तिमान् शार्ङ्ग आदि आयुध धारण किये हुए थे ॥ ३९-४० ॥
स कश्यपस्यात्मभवं द्विजं भुजंगभोजनम् ।
पवनाधिकसम्पातं गगनक्षोभणं खगम् ॥
भुजगेन्द्रेण वदने निविष्टेन विराजितम् ॥ ४१ ॥
अमृतारम्भनिर्मुक्तं मन्द्राद्रिमिवोच्छ्रितम् ।
देवासुरविमर्देषु शतशो दृष्टविक्रमम् ॥ ४२ ॥
महेन्द्रेणामृतस्यार्थे वज्रेण कृतलक्षणम् ।
शिखिनं चूडिनं चैव तप्तकुण्डलभूषणम् ।
विचित्रपक्षवसनं धातुमन्तमिवाचलम् ॥ ४३ ॥
स्फीतक्रोडावलम्बेन शीतांशुसमतेजसा ।
भोगिभोगावसक्तेन मणिरत्नेन भास्वता ॥ ४४ ॥
पक्षाभ्यां चारुचित्राभ्यामावृत्य दिवि लीलया ।
युगान्ते सेन्द्रचापाभ्यां तोयदाभ्यामिवान्बरम् ॥ ४५ ॥
नीललोहितपीताभिः पताकाभिरलंकृतम् ।
केतुवेषप्रतिच्छन्नं महाकायनिकेतनम् ॥ ४६ ॥
अरुणावरजं श्रीमानारुह्य समरे हरिः ।
सुवर्णे स्वेन वपुषा सुपर्णं खेचरोत्तमम् ॥ ४७ ॥
सबके पाप और दुःखका अपहरण करनेवाले श्रीमान् भगवान् नारायण सर्पोंका भक्षण करनेवाले, कश्यपकुमार एवं अरुणके छोटे भाई पक्षिश्रेष्ठ गरुड़पर सवार होकर वहाँ आये थे। गरुड़जीके पंख बड़े सुन्दर थे तथा वे अपने सुन्दर शरीरसे सुवर्णके समान मनोरम कान्ति फैला रहे थे। आकाशमें विचरनेवाले पक्षिप्रवर गरुड़ वायुकी अपेक्षा भी अधिक वेगसे उड़ते थे, उनके वेगपूर्वक चलते समय आकाशमे खलबली मच जाती थी। वे अपने मुखमे एक नागराजको दबाये हुए थे, इससे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। अमृत निकालनेके लिये प्रारम्भमे ही क्षीरसागरमे छोड़े गये मन्दराचलके समान वे ऊँचे दिखायी देते थे। देवासुर-संग्रामके अवसरोंपर सैकड़ों बार उनका पराक्रम देखा जा चुका था। जब वे स्वर्गमे अमृत लेने गये थे, उस समय इन्द्रने उस अमृतकी रक्षाके लिये उनपर वज्रसे प्रहार किया था। जिसकी चोटका चिह्न उस समय भी दीख रहा था, उनके सिरपर मोरकी-सी कलँगी और चोटी थी तथा वे तपे हुए सुवर्णके कुण्डलोसे विभूषित थे। रंग-बिरंगे पंख ही उन्होंने वस्त्ररूपमे धारण कर रखे थे, जिनके कारण वे विविध धातुओंसे मण्डित पर्वतके समान प्रतीत होते थे। उनका वक्षःस्थल चौड़ा था, उसपर ( मुखमें आधे निगले हुए ) सर्पके मस्तकमें चिपकी हुई श्रेष्ठमणि लटकती थी, जो अपने तेजसे शीतल किरणवाले चन्द्रमाकी भाँति उद्भासित हो रही थी। वे अपने मनोहर एवं विचित्र पंखोंसे लीलापूर्वक आकाशको घेरकर इस तरह खड़े थे, मानो प्रलयकालमें इन्द्रधनुषसे युक्त हुए दो मेघखण्डोंसे आकाश घिर गया हो। श्रीहरिकी ध्वजामे चिह्नके रूपमें छिपे हुए पक्षिराज गरुड नीली, पीली और लाल रंगकी पताकाओंसे अलंकृत थे। उनका आधारभूत ध्वजदण्ड बहुत विशाल था ॥ ४१-४७ ॥
तमन्वयुर्देवगणा मुनयश्च तपोधनाः ।
गीर्भिः परममन्त्राभिस्तुष्टुवुश्च गदाधरम् ॥ ४८ ॥
उस समय समस्त देवता और तपोधन मुनि भगवान् गदाधरके पीछे-पीछे चलने और श्रेष्ठ मन्त्रमयी स्तुतियोंद्वारा उनका स्तवन करने लगे ॥ ४८ ॥
तद्वैश्रवणसंश्लिष्टं वैवस्वतपुरस्सरम् ।
वारिराजपरिक्षिप्तं देवराजविराजितम् ॥ ४९ ॥
चन्द्रप्रभाभिर्विमलं युद्धाय समुपस्थितम् ।
पवनावद्धनिर्घोषं सम्प्रदीप्तहुताशनम् ॥ ५० ॥
देवताओंकी वह सेना कुबेरके द्वारा सुसङ्घठित की गयी थी। यमराज उसके आगे-आगे चलनेवाले सेनानायक थे। जलके स्वामी वरुणने समुद्ररूपसे उसको सब ओरसे घेर रखा था तथा देवराज इन्द्र स्वयं उपस्थित होकर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। चन्द्रमाकी प्रभाओंसे वह सारा सैन्यसमूह उज्ज्वल एवं निर्मल दिखायी देता था। वायुके