भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
१६४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

में प्रकाशित होनेवाले अग्निदेवके समान जिनका सहज तेज है, जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं, नारायणरूपसे समुद्रमे शयन करते हैं, इसलिये समुद्र जिनकी शयनस्थली है, जिन्होने मधु नामक दैत्यका नाश किया है, जो हविष्यके भोक्ता और यज्ञोंमें पूजित एवं सम्मानित होनेवालेहैं, पृथ्वी, जल, आकाश तथा अन्यान्य भूत जिन विराट् रूपधारी प्रभुके अङ्ग हैं, जो सर्वत्र समभावसे रहते और समता रखते हैं, जो कान्तिका विस्तार करनेवाले और शत्रुनाशक हैं, जगत्की योनि ( उत्पत्तिस्थान ), जगत्के बीज ( आदि कारण ) तथा जगत्के गुरु हैं, जिनकी बुद्धिमें सदा उदारता भरी रहती है, वे चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु अग्नि तथा उगते हुए सूर्यके समान उत्तम तेजसे सम्पन्न शत्रुनाशक चक्र उठाये हुए देवसेनाके मध्यभागमे विराजमान थे। उन्हे देखकर ऐसा लगता था, मानो वे परिवेषसहित उगते हुए सूर्यमण्डलको ही पकड़कर ले आये हों॥ ३५-३८ ॥

सव्येनालम्ब्य महतीं सर्वासुरविनाशिनीम् ।
करेण कालीं वपुषा शत्रुकालप्रदां गदाम् ॥ ३९ ॥
शेषैर्भुजैः प्रदीप्तानि भुजगारिध्वजः प्रभुः ।
दधारायुधजालानि शार्ङ्गादीनि महायशाः ॥ ४० ॥

सर्पोंके शत्रु गरुड़ जिनके ध्वज हैं, उन महायशस्वी भगवान् श्रीहरिने अपने बायें हाथमे समस्त असुरोंका विनाश करनेवाली तथा शत्रुओंको कालके गालमे भेजनेवाली काले रंगकी विशाल गदा ले रखी थी और शेष भुजाओंमें वे अत्यन्त दीप्तिमान् शार्ङ्ग आदि आयुध धारण किये हुए थे ॥ ३९-४० ॥

स कश्यपस्यात्मभवं द्विजं भुजंगभोजनम् ।
पवनाधिकसम्पातं गगनक्षोभणं खगम् ॥
भुजगेन्द्रेण वदने निविष्टेन विराजितम् ॥ ४१ ॥
अमृतारम्भनिर्मुक्तं मन्द्राद्रिमिवोच्छ्रितम् ।
देवासुरविमर्देषु शतशो दृष्टविक्रमम् ॥ ४२ ॥
महेन्द्रेणामृतस्यार्थे वज्रेण कृतलक्षणम् ।
शिखिनं चूडिनं चैव तप्तकुण्डलभूषणम् ।
विचित्रपक्षवसनं धातुमन्तमिवाचलम् ॥ ४३ ॥
स्फीतक्रोडावलम्बेन शीतांशुसमतेजसा ।
भोगिभोगावसक्तेन मणिरत्नेन भास्वता ॥ ४४ ॥
पक्षाभ्यां चारुचित्राभ्यामावृत्य दिवि लीलया ।
युगान्ते सेन्द्रचापाभ्यां तोयदाभ्यामिवान्बरम् ॥ ४५ ॥
नीललोहितपीताभिः पताकाभिरलंकृतम् ।
केतुवेषप्रतिच्छन्नं महाकायनिकेतनम् ॥ ४६ ॥
अरुणावरजं श्रीमानारुह्य समरे हरिः ।
सुवर्णे स्वेन वपुषा सुपर्णं खेचरोत्तमम् ॥ ४७ ॥

सबके पाप और दुःखका अपहरण करनेवाले श्रीमान् भगवान् नारायण सर्पोंका भक्षण करनेवाले, कश्यपकुमार एवं अरुणके छोटे भाई पक्षिश्रेष्ठ गरुड़पर सवार होकर वहाँ आये थे। गरुड़जीके पंख बड़े सुन्दर थे तथा वे अपने सुन्दर शरीरसे सुवर्णके समान मनोरम कान्ति फैला रहे थे। आकाशमें विचरनेवाले पक्षिप्रवर गरुड़ वायुकी अपेक्षा भी अधिक वेगसे उड़ते थे, उनके वेगपूर्वक चलते समय आकाशमे खलबली मच जाती थी। वे अपने मुखमे एक नागराजको दबाये हुए थे, इससे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। अमृत निकालनेके लिये प्रारम्भमे ही क्षीरसागरमे छोड़े गये मन्दराचलके समान वे ऊँचे दिखायी देते थे। देवासुर-संग्रामके अवसरोंपर सैकड़ों बार उनका पराक्रम देखा जा चुका था। जब वे स्वर्गमे अमृत लेने गये थे, उस समय इन्द्रने उस अमृतकी रक्षाके लिये उनपर वज्रसे प्रहार किया था। जिसकी चोटका चिह्न उस समय भी दीख रहा था, उनके सिरपर मोरकी-सी कलँगी और चोटी थी तथा वे तपे हुए सुवर्णके कुण्डलोसे विभूषित थे। रंग-बिरंगे पंख ही उन्होंने वस्त्ररूपमे धारण कर रखे थे, जिनके कारण वे विविध धातुओंसे मण्डित पर्वतके समान प्रतीत होते थे। उनका वक्षःस्थल चौड़ा था, उसपर ( मुखमें आधे निगले हुए ) सर्पके मस्तकमें चिपकी हुई श्रेष्ठमणि लटकती थी, जो अपने तेजसे शीतल किरणवाले चन्द्रमाकी भाँति उद्भासित हो रही थी। वे अपने मनोहर एवं विचित्र पंखोंसे लीलापूर्वक आकाशको घेरकर इस तरह खड़े थे, मानो प्रलयकालमें इन्द्रधनुषसे युक्त हुए दो मेघखण्डोंसे आकाश घिर गया हो। श्रीहरिकी ध्वजामे चिह्नके रूपमें छिपे हुए पक्षिराज गरुड नीली, पीली और लाल रंगकी पताकाओंसे अलंकृत थे। उनका आधारभूत ध्वजदण्ड बहुत विशाल था ॥ ४१-४७ ॥

तमन्वयुर्देवगणा मुनयश्च तपोधनाः ।
गीर्भिः परममन्त्राभिस्तुष्टुवुश्च गदाधरम् ॥ ४८ ॥

उस समय समस्त देवता और तपोधन मुनि भगवान् गदाधरके पीछे-पीछे चलने और श्रेष्ठ मन्त्रमयी स्तुतियोंद्वारा उनका स्तवन करने लगे ॥ ४८ ॥

तद्वैश्रवणसंश्लिष्टं वैवस्वतपुरस्सरम् ।
वारिराजपरिक्षिप्तं देवराजविराजितम् ॥ ४९ ॥
चन्द्रप्रभाभिर्विमलं युद्धाय समुपस्थितम् ।
पवनावद्धनिर्घोषं सम्प्रदीप्तहुताशनम् ॥ ५० ॥

देवताओंकी वह सेना कुबेरके द्वारा सुसङ्घठित की गयी थी। यमराज उसके आगे-आगे चलनेवाले सेनानायक थे। जलके स्वामी वरुणने समुद्ररूपसे उसको सब ओरसे घेर रखा था तथा देवराज इन्द्र स्वयं उपस्थित होकर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। चन्द्रमाकी प्रभाओंसे वह सारा सैन्यसमूह उज्ज्वल एवं निर्मल दिखायी देता था। वायुके

हरिवंशपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः १६५

वेगपूर्वक चलनेसे उसमें बड़ा गम्भीर शब्द होता था और उस सेनामे खड़े हुए अग्निदेव बड़े वेगसे प्रज्वलित हो रहे थे। ऐसी देवसेना वहाँ दैत्योंके साथ युद्ध करनेके लिये उपस्थित हुई॥ ४९-५० ॥

विष्णोर्जिष्णोः सहिष्णोश्च भ्राजिष्णोस्तेजसा वृतम्।
बलं बलवदुद्भूतं युद्धाय समवर्तत॥ ५१॥

जो नित्य विजयशील, सब कुछ सहन करनेमें समर्थ और नित्य प्रकाशमान हैं, उन भगवान् विष्णुके तेजसे व्याप्त हुई देवताओकी वह बलवती सेना उत्साहसम्पन्न हो युद्धके लिये तैयार हो गयी॥ ५१॥

स्वस्त्यस्तु देवेभ्य इति स्तुत्वा तत्राङ्गिरा ऽब्रवीत्।
स्वस्त्यस्तु दैत्येभ्य इति उशना वाक्यमाददे॥ ५२॥

उस समय अङ्गिराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिने स्तुति करके कहा—'देवताओंका कल्याण हो।' फिर दैत्योंके गुरु शुक्राचार्य भी बोल उठे—'दैत्योंका मङ्गल हो'॥ ५२॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्चर्यतारकामये चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्चर्यतारकामय संग्रामविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४४ ॥


पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

देवासुर-संग्राम एवं और्व अग्निकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

ताभ्यां बलाभ्यां संजज्ञे तुमुलो विग्रहस्तदा।
सुराणामसुराणां च परस्परजयैषिणाम्॥ १॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! एक दूसरेपर विजय पानेकी इच्छावाले देवताओं और असुरोंकी उन सेनाओंमें उस समय घोर युद्ध आरम्भ हो गया॥ १॥

दानवा दैवतैः सार्द्धं नानाप्रहरणोद्यताः।
समीयुर्युध्यमाना वै पर्वताः पर्वतैरिव॥ २॥

दानव-सैनिक नाना प्रकारके हथियार उठाये देवताओंके साथ युद्ध करते हुए उनसे भिड गये, मानो एक श्रेणीके पर्वत दूसरी श्रेणीके पर्वतोंसे टकरा रहे हैं॥ २॥

तत् सुरासुरसंयुक्तं युद्धमत्यद्भुतं वभौ।
धर्माधर्मसमायुक्तं दर्पेण विनयेन च॥ ३॥

देवताओं और असुरोंका वह तुमुल युद्ध अत्यन्त अद्भुत प्रतीत होता था; मानो धर्म और अधर्म परस्पर जूझ रहे हों, दर्प और विनय एक दूसरेसे लड़ रहे हों॥ ३॥

ततो रथैः प्रजविभिर्वाहनैश्च प्रचोदितैः।
उत्पतद्भिश्च गगनं सासिहस्तैः समन्ततः॥ ४॥
विक्षिप्यमाणैर्मुसलैः सम्प्रेष्यद्भिश्च सायकैः।
चापर्विस्फार्यमाणैश्च पात्यमानैश्च मुद्गरैः॥ ५॥
तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्।
जगतस्त्रासजननं युगसंवर्तकोपमम्॥ ६॥

तदनन्तर रथोंके वेगपूर्वक दौड़ने, घोड़ोंके ऐंड़ लगाकर भगाये जाने, चारों ओर तलवार हाथमें लिये योद्धाओंके आकाशमे उछलने, मूसलोंके फेंके जाने, बाणोंके चलाने, धनुषोंके खींचे जाने और मुद्गरोंके गिराये जानेसे देवताओं और दानवोंसे भरा हुआ वह घोर युद्ध प्रलयकालकी अग्निके समान सम्पूर्ण जगत्‌को त्रास देने लगा॥ ४-६॥

स्वहस्तमुक्तैः परिघैः क्षिप्यमाणैश्च पर्वतैः।
दानवाः समरे जघ्नुर्देवानिन्द्रपुरोगमान्॥ ७॥

उस समराङ्गणमें समस्त दानव अपने हाथोंसे छोड़े गये परिघों और फेंके जाते हुए पर्वतशिखरोंकी चोटसे इन्द्र आदि देवताओंको घायल करने लगे॥ ७॥

ते वध्यमाना बलिभिर्दानवैर्जितकाशिभिः।
विषण्णमनसो देवा जग्मुरार्तिं परां मृधे॥ ८॥

युद्धस्थलमे अपनी विजयसे उल्लसित एवं सुशोभित होनेवाले महाबली दानवोंकी मार खाकर समस्त देवता मन-ही-मन खिन्न हो उठे, उन्हें बड़ी पीड़ा हुई॥ ८॥

तेऽस्त्रजालैः प्रमथिताः परिघैर्भिन्नमस्तकाः।
भिन्नोरस्का दितिसुतैर्वमू रक्तं व्रणैर्बहु॥ ९॥

दैत्योंने अपने अस्त्रसमूहोंसे देवताओको मथ डाला, परिघोंकी मारसे उनके मस्तक फोड़ डाले और वक्षःस्थल विदीर्ण कर दिये। उस समय देवता अपने घावोंसे बहुत रक्त बहा रहे थे॥ ९॥

स्पन्दिताः पाशजालैश्च निर्यत्नाश्च शरैः कृताः।
प्रविष्टा दानवीं मायां न शेकुस्ते विचेष्टितुम्॥ १०॥

दैत्योंने फन्दोंके जाल बिछाकर देवताओंको निरुपाय कर दिया और बाणोंके प्रहारसे उन्हें इतना घायल कर दिया कि वे अपने अङ्गोंसे रक्तकी धारा बहाने लगे। दानवोंकी

१६६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मायाके वशीभूत होकर वे हिलने-डुलनेकी भी शक्ति खो बैठे ॥ १०॥

संस्तम्भितमिवाभाति निष्प्राणसदृशाकृति ।
बलं सुराणामसुरैर्निष्प्रयत्नायुधं कृतम् ॥ ११ ॥
असुरोंने देवताओंकी सेनाके सारे प्रयत्न और आयुध निष्फल कर दिये। उस समय वह सेना मन्त्रशक्तिसे स्तम्भित की हुई-सी प्रतीत होती थी, प्राणशून्य मुर्दे-जैसे दिखायी देती थी ॥ ११ ॥

मायापाशान् विकल्पैश्च भिन्दन् वज्रेण ताञ्शरान् ।
शक्रो दैत्यबलं घोरं विवेश बहुलोचनः ॥ १२ ॥
तब बहुसंख्यक नेत्रोंसे सुशोभित होनेवाले देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे दैत्योंके माया-पाशोंको हटाते और उनके चलाये हुए बाणोंको काटते हुए उनकी घोर सेनामें प्रवेश किया ॥ १२ ॥

स दैत्यान् प्रमुखे हत्वा तद् दानवबलं महत् ।
तामसेनास्त्रजालेन तमोभूतमथाकरोत् ॥ १३ ॥
उन्होंने सामने खड़े हुए दैत्योंको मारकर दानवोंकी उस विशाल वाहिनीपर तामसास्त्रका जाल-सा बिछा दिया और उसे अन्धकारसे अभिभूत कर डाला ॥ १३ ॥

तेऽन्योन्यं नावबुध्यन्त देवान् वा दानवानपि ।
घोरेण तमसाऽऽविष्टाः पुरूहूतस्य तेजसा ॥ १४ ॥
इन्द्रके प्रभावसे घोर अन्धकारमें डूबे हुए दैत्य न तो आपसमें ही किसीको जान पाते थे और न देवताओं अथवा दानवोंको ही पहचान पाते थे ॥ १४ ॥

मायापाशैर्विमुक्ताश्च यत्नवन्तः सुरोत्तमाः ।
वपूंषि दैत्यसंघानां तमोभूतान्यपातयन् ॥ १५ ॥
दैत्योंके मायापाशसे मुक्त हुए श्रेष्ठ देवताओंने प्रयत्नशील होकर उन दैत्यसमूहोंके अन्धकारसे आच्छन्न हुए शरीरोंको धरतीपर गिराना आरम्भ किया ॥ १५ ॥

अपध्वस्ता विसंज्ञाश्च तमसा नीलवर्चसः ।
पेतुस्ते दानवगणाश्छिन्नपक्षा इवाचलाः ॥ १६ ॥
अन्धकारसे नीली कान्ति धारण करनेवाले वे दानव देवताओंकी मार खाकर मूर्छित हो पंख कटे हुए पर्वतोंके समान धराशायी होने लगे ॥ १६ ॥

दैत्यानां तद्घनीभूतमन्धकारमहार्णवम् ।
प्रविष्टं बलमुत्रस्तं तमोभूतमिवाभवौ ॥ १७ ॥
अन्धकारके महासागरमें डूबी हुई दैत्योंकी वह घनीभूत सेना अत्यन्त भयभीत हो गयी और स्वर्ग तमोमयी-सी प्रतीत होने लगी ॥ १७ ॥

तदासृजन्महामायां मयस्तां तामसीं दहन् ।
युगान्ताग्निमिवोत्युग्रां सृष्टामौर्वेण वह्निना ॥ १८ ॥
तब मय नामक दानवने इन्द्रके द्वारा फैलायी हुई उस तामसी मायाको नष्ट करते हुए एक महामायाकी सृष्टि की, जो और्व नामक अग्नि (बड़वानल) के द्वारा रची गयी थी और प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त भयंकर थी ॥ १८ ॥

सा ददाह तमः सर्वं माया मयविकल्पिता ।
दैत्यांश्च दीप्तवपुषः सद्य उत्तस्थुराहवे ॥ १९ ॥
मयके द्वारा फैलायी हुई उस मायाने सारे अन्धकारको जलाकर भस्म कर दिया; फिर तो दैत्योंके शरीर दमक उठे और वे तत्काल युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ १९ ॥

मायामौर्वी समासाद्य दह्यमाना दिवौकसः ।
भेजिरे चन्द्रद्विपथं शीतांगुसलिले शयात् ॥ २० ॥
अब तो देवताओंग और्वी मायाके सम्पर्कमें आकर दग्ध होने लगे और ठंडे जलमें शयन करनेके लिये चन्द्रमाके समीप गये ॥ २० ॥

ते दह्यमाना हौर्वेण तेजसा भ्रष्टतेजसः ।
शशंसुर्वज्रिणे देवाः संतप्ताः शरणैषिणः ॥ २१ ॥
वे सब देवता और्वके तेजसे झुलसकर अपना तेज खो बैठे। उन्होंने अत्यन्त संतप्त होकर शरण पानेकी इच्छासे इन्द्रके पास जाकर पुकार की ॥ २१ ॥

संतप्ते मायया सैन्ये दह्यमाने च दानवैः ।
चोदितो देवराजेन वरुणो वाक्यमब्रवीत् ॥ २२ ॥
जब मयासुरकी मायासे सारी सेना संतप्त हो उठी और दानव भी उसे जलाने लगे, तब देवराजके द्वारा उसकी शान्तिके लिये प्रेरित होनेपर वरुणने इस प्रकार कहा ॥ २२ ॥

वरुण उवाच
पुरा ब्रह्मर्षिजः शक्र तपस्तेपेऽतिदारुणम् ।
ऊर्वो मुनिः स तेजस्वी सदृशो ब्रह्मणो गुणैः ॥ २३ ॥
वरुण बोले—देवेन्द्र ! पूर्वकालमें ऊर्व नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी मुनि थे, जो ब्रह्मर्षि भृगुके पुत्र थे । वे गुणोंमें ब्रह्माजीके समान थे । उन्होंने अत्यन्त दारुण तप करना आरम्भ किया ॥ २३ ॥

तं तपन्तमित्वादित्यं तपसा जगदव्ययम् ।
उपतस्थुर्मुनिगणा देवा ब्रह्मर्षिभिः सह ॥ २४ ॥
जैसे सूर्य इस अव्यय (प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले) जगत्‌को सदा तपाते रहते हैं, उसी प्रकार वे भी अपनी तपस्यासे सबको ताप देने लगे । तब ब्रह्मर्षियोंसहित देवता और मुनिगण उनके पास आये ॥ २४ ॥

हिरण्यकशिपुश्चैव दानवो दानवेश्वरः ।
ऋषिं विज्ञापयामास पुरा परमतेजसम् ॥ २५ ॥

हरिवंशपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः १९७


दानव हिरण्यकशिपु भी, जो समस्त दानवोंका स्वामी था, किसी समय उन परम तेजस्वी महर्षिके पास आया और उनसे शान्तिके लिये प्रार्थना करता रहा; यह प्राचीन कालकी बात है ॥ २५ ॥

तमूचुर्ब्रह्मऋषयो वचनं ब्रह्मसम्मितम् । ऋषिवंशेषु भगवंश्छिन्नमूलमिदं कुलम् ॥ २६ ॥

ब्रह्मर्षियोंने उनसे यह वेदतुल्य बात कही—'भगवन् ! ऋषियोंके वंशोंमें आपके इस कुलकी जड़ कट-सी गयी है ॥ २६ ॥

एकस्त्वमनपत्यश्च गोत्रं यन्नानुवर्तसे । कौमारं व्रतमास्थाय क्लेशमेवानुवर्तसे ॥ २७ ॥

'एकमात्र आप ही अपने कुलमें बचे हैं और आपके कोई संतान नहीं है, तो भी आप गोत्रका अनुसरण नहीं करते हैं—उसकी परम्पराको बनाये रखनेके लिये कोई प्रयत्न नहीं करते हैं। केवल नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करके तपस्याजनित क्लेशका ही अनुगमन कर रहे हैं ॥ २७ ॥

बहूनि विप्र गोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम् । एकदेहानि तिष्ठन्ति विभक्तानि विना प्रजाः ॥ २८ ॥

'विप्रवर ! विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंके बहुत-से ऐसे गोत्र या कुल हैं, जो एक शरीर (एक व्यक्ति) पर ही अवलम्बित रहे हैं और संतान न होनेके कारण जड़से अलग होकर नष्ट हो गये हैं ॥ २८ ॥

कुलेषूच्छिन्नमूलेषु तेषु नो नास्ति कारणम् । भवांस्तु तपसा श्रेष्ठः प्रजापतिसमद्युतिः ॥ २९ ॥

'मूलके ही नष्ट हो जानेसे उन कुलोंकी वृद्धिका हमारे देखनेमें कोई कारण नहीं रह गया है, परंतु आप तो (अपनी भावी वंशपरम्पराके मूलरूपमें विद्यमान ही हैं। आपके रहते इस कुलका उच्छेद नहीं होना चाहिये। आप) तपकी दृष्टिसे श्रेष्ठ हैं और तेज एवं कान्तिमें भी प्रजापतियोंके तुल्य हैं ॥

तत् प्रवर्तस्व वंशाय वर्धयात्मानमात्मना । त्वमाधत्स्वोर्जितं तेजो द्वितीयां वै तनुं कुरु ॥ ३० ॥

'अतः आप अपने वंशको चलानेका उद्योग कीजिये और अपने द्वारा अपने आपको बढ़ाइये। अपने ओजस्वी तेज (वीर्य) का (योग्य पत्नीमें) आधान कीजिये और ऐसा करके पुत्ररूपमें अपने दूसरे शरीरको प्रकट कीजिये' ॥

स एवमुक्तो मुनिभिर्मुनिर्मनसि ताडितः । जगर्हे तानृषिगणान् वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३१ ॥

उन महर्षियोंके ऐसा कहनेपर ऊर्व मुनिके हृदयमें गहरा धक्का लगा। वे उन ऋषियोंकी निन्दा करने लगे और इस प्रकार बोले--॥ ३१॥

यथायं शाश्वतो धर्मो मुनीनां विहितः पुरा । सदाऽऽर्षे सेवतां कर्म वन्यमूलफलाशिनाम् ॥ ३२ ॥

'महात्माओ ! जो वनके फल-मूल खाकर रहते हैं और सदा आर्षशास्त्रोंमें बताये हुए सत्कर्मका सेवन करते हैं, उन हम-जैसे ऋषि-मुनियोंके लिये तो प्राचीन कालसे इस तप एवं ब्रह्मचर्यरूप सनातन धर्मका ही विधान किया गया है ॥ ३२॥

ब्रह्मयोनौ प्रसूतस्य ब्राह्मणस्यानुवर्तिनः । ब्रह्मचर्यं सुचरितं ब्रह्माणमपि चालयेत् ॥ ३३ ॥

'ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न होकर ब्राह्मण-धर्मका अनुसरण करनेवाले द्विजके द्वारा इस ब्रह्मचर्य-व्रतका यदि भलीभाँति आचरण किया जाय तो यह ब्रह्माजीको भी विचलित कर सकता है ॥ ३३ ॥

द्विजानां वृत्तयस्तिस्रो ये गृहाश्रमवासिनः । अस्माकं तु वनं वृत्तिर्वनश्रमनिवासिनाम् ॥ ३४ ॥

'जो गृहस्थ-आश्रममें निवास करते हैं, उन ब्राह्मणोंके लिये ही शास्त्रमें यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना और दान ग्रहण करना—ये तीन वृत्तियाँ बतायी गयी हैं। हम-जैसे ऊर्ध्वरेता वनवासियोंके लिये तो वनके फल-मूल ही जीविकाके साधन हैं॥

अम्बुभक्षा वायुभक्षा दन्तोलूखलिकास्तथा । अश्मकुट्टा दशनपाः पञ्चातपतपाश्च ये ॥ ३५ ॥

'कुछ लोग केवल जल या वायु पीकर ही रहते हैं, कुछ दाँतोंसे ही ओखली और मूसलका काम लेते हैं—अर्थात् दाँत रहनेपर भूसीसहित नीवार आदिको चबा लेते हैं,। ये ही 'दशनप' कहलाते हैं। परंतु जिनके दाँत नहीं हैं, वे पत्थरोंसे ही कूट-पीसकर वन्य वस्तुओंको खाते हैं। कुछ पञ्चाग्निके तापका सेवन करते हैं ॥ ३५ ॥

एते तपसि तिष्ठन्तो व्रतैरपि सुदुष्करैः । ब्रह्मचर्यं पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ते परां गतिम् ॥ ३६ ॥

'ये अत्यन्त दुष्कर व्रतोंका आचरण करते हुए भी तपस्यामें लगे रहते और मुख्यतः ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करके उत्कृष्ट गतिको पाना चाहते हैं ॥ ३६ ॥

ब्रह्मचर्याद् ब्राह्मणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते । एवमाहुः परे लोके ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ ३७ ॥

'ब्रह्मचर्यके पालनसे ही ब्राह्मणको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है। इसी तरह ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि ब्रह्मचर्य-का पालन ही परलोकमें ब्रह्मकी प्राप्तिका मुख्य साधन है ॥

ब्रह्मचर्ये स्थितं धैर्यं ब्रह्मचर्ये स्थितं तपः । ये स्थिता ब्रह्मचर्येषु ब्राह्मणास्ते दिवि स्थिताः ॥ ३८ ॥

'ब्रह्मचर्यमें धैर्यकी स्थिति है और ब्रह्मचर्यमें ही तप प्रतिष्ठित है। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यमें दृढ़तापूर्वक स्थित हैं, वे ब्रह्मलोकमें ही विराजमान हैं ॥ ३८ ॥

१६८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


नास्ति योगं विना सिद्धिर्नास्ति सिद्धिं विना यशः।
नास्ति लोके यशोमलं ब्रह्मचर्यात् परं तपः ॥ ३९ ॥

'योगके बिना सिद्धि नहीं मिलती और सिद्धिके बिना यश नहीं प्राप्त होता है। यशका मूल कारण है तप; परंतु इस जगत्में ब्रह्मचर्यसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ॥ ३९ ॥

तन्निगृहेन्द्रियग्रामं भूतग्रामं च पञ्चमम्।
ब्रह्मचर्येण वर्तेत किमतः परमं तपः ॥ ४० ॥

'अतः इन्द्रिय-समुदायको तथा शब्द आदि सूक्ष्म भूत-रूप उसके विषयसमूहको वशमें करके ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक रहे। इससे बढ़कर और कौन-सा तप हो सकता है? ॥४०॥

अयोगे केशहरणमसंकल्पे व्रतक्रिया।
अब्रह्मचर्ये चर्या च त्रयं स्याद् दम्भसंज्ञितम् ॥ ४१ ॥

'अवश्यकर्तव्य ध्यानरूप योगके अभावमें भी सिर मुड़ा लेना, परलोक सुधारनेका संकल्प न रहनेपर भी केवल लोक-रंजनके लिये कृच्छ्र आदि व्रतोंका आचरण करना तथा ब्रह्मकी प्राप्तिको लक्ष्य बनाकर नियमित वेदाध्ययनके बिना ही ब्रह्मचर्यके नियमोंका आश्रय लेना—ये तीनों दम्भ कहलाते हैं ॥ ४१ ॥

क्व दाराः क्व च संयोगः क्व च भावविपर्ययः।
यदेयं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा ॥ ४२ ॥

'जब ब्रह्माजीने मनके द्वारा मानसी प्रजा (सनत्कुमार आदि) की सृष्टि की थी, उस समय स्त्री कहाँ थी? स्त्री-पुरुषका संयोग कहाँ था ? और चित्तकी विकृति (कामातुरता) भी कहाँ थी ? ॥ ४२ ॥

यद्यस्ति तपसो वीर्यं युष्माकममितात्मनाम्।
सृजध्वं मानसान् पुत्रान् प्राजापत्येन कर्मणा ॥ ४३ ॥

'महर्षियो! आपलोग अमेय आत्मबलसे सम्पन्न हैं, यदि आपमें तपस्याकी शक्ति हो तो आप प्रजापतिके समान कर्म करके मानसिक पुत्र उत्पन्न करें ॥ ४३ ॥

मनसा निर्मिता योनिराधातव्या तपस्विना।
न दारयोगं बीजं वा व्रतमुक्तं तपस्विनाम् ॥ ४४ ॥

'तपस्वीको तो अपने मनसे कल्पित योनिमें ही मानसिक संकल्पसे गर्भाधान करना चाहिये। स्त्रीके साथ संयोग अथवा वीर्यका आधान--यह तपस्वी पुरुषोंका नियम नहीं बताया गया है ॥ ४४ ॥

यदिदं लुप्तधर्मार्थं युष्माभिरिह निर्भयैः।
व्याहृतं सद्भिरत्यर्थमसद्द्भिरिव मे मतिः ॥ ४५ ॥

'आपलोग सज्जन हैं तो भी निरे असज्जनोंके समान आपने निःशङ्क होकर यहाँ यह धर्म और अर्थसे शून्य बात कह डाली है, ऐसा मेरा विचार है ॥ ४५ ॥

वपुर्दीप्तान्तरात्मानमेष कृत्वा मनोमयम्।
दारयोगं विना स्रक्ष्ये पुत्रमात्मतनूरुहम् ॥ ४६ ॥

'अच्छा! देखिये, मैं अभी मनोमय वपु (योनि) का निर्माण करके स्त्रीसहवासके बिना ही अपने शरीरसे उत्पन्न होनेवाले ऐसे पुत्रकी सृष्टि कर रहा हूँ, जिसकी अन्तरात्मा अत्यन्त उद्दीप्त होगी ॥ ४६ ॥

एवमात्मानमात्मा मे द्वितीयं जनयिष्यति।
वन्येनानेन विधिना दिधक्षन्तमिव प्रजाः ॥ ४७ ॥

'इस प्रकार मेरा यह शरीर वनवासीके लिये उचित इस विधानके द्वारा ही मेरे दूसरे स्वरूप (पुत्र) को जन्म देगा, जो समस्त प्रजाको जलाकर भस्म कर देनेकी इच्छा रखता होगा' ॥ ४७ ॥

ऊर्वस्तु तपसाऽऽविष्टो निवेश्योरुं हुताशने।
ममन्थैकेन दर्भेण पुत्रस्य प्रभवारणिम् ॥ ४८ ॥

ऐसा कहकर तपके आवेशमें भरे हुए ऊर्व मुनिने अपनी जाँघको अग्निमें डाल दिया और पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अरणि-रूप उस जाँघको एक कुरासे मथने लगे ॥ ४८ ॥

तस्योरुं सहसा भित्त्वा ज्वालामाली निरिन्धनः।
जगतो निधनाकाङ्क्षी पुत्रोऽग्निः समपद्यत ॥ ४९ ॥

उस समय सहसा उनके ऊरु (जाँघ) का भेदन करके एक अग्निस্বরূপ पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बिना ईंधनके ही ज्वालामालाओंसे अलंकृत था। वह समस्त संसारके विनाशकी इच्छा रखता था ॥ ४९ ॥

ऊर्वस्योरुं विनिर्भिद्य चौर्वो नामान्तकोऽनलः।
दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीञ्जज्ञे परमकोपनः ॥ ५० ॥

ऊर्वकी जाँघको चीरकर जो वह लोक-विनाशक परमं क्रोधी अनल प्रकट हुआ था, वह और्वके नामसे विख्यात हुआ। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह तीनों लोकोंको दग्ध कर डालना चाहता हो ॥ ५० ॥

उत्पन्नमात्रश्चोवाच पितरं दीप्तया गिरा।
क्षुधा मे बाधते तात जगद् भक्षे त्यजस्व माम् ॥ ५१ ॥

उसने उत्पन्न होते ही प्रदीप्त वाणीमें अपने पितासे कहा— 'तात! मुझे भूख सता रही है, मेरे आहारके लिये यह सम्पूर्ण जगत् मुझे अर्पित कर दीजिये' ॥ ५१ ॥

त्रिदिवारोहिभिर्ज्वलैर्जृम्भमाणो दिशो दश।
निर्दहन्निव भूतानि ववृधे सोऽन्तकोऽनलः ॥ ५२ ॥

वह कालरूप अग्नि समस्त प्राणियोंको दग्ध-सा करता हुआ बढ़ने लगा। अपनी स्वर्गतक पहुँचनेवाली ज्वालाओंके द्वारा वह दसों दिशाओंमें फैलता जा रहा था ॥ ५२ ॥

हरिवंशपर्व ]पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः१६९

एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा सर्वलोकपतिः प्रभुः।
आजगाम मुनिर्यत्र व्यसृजत् पुत्रमुत्तमम् ॥ ५३ ॥

इसी बीचमें सब लोकोंके स्वामी भगवान् ब्रह्मा उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ ऊर्व मुनिने अपने श्रेष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया था ॥ ५३ ॥

स ददर्शोरूमूर्वस्य दीप्यमानं सुताग्निना।
और्वकोपाग्निसंतप्तांल्लोकांश्च ऋषिभिः सह ॥ ५४ ॥

उन्होंने देखा कि ऊर्वकी जाँघ पुत्ररूप अग्निसे देदीप्यमान हो रही है और और्वकी क्रोधाग्निसे ऋषियोंसहित तीनों लोक संतप्त हो उठे हैं ॥ ५४ ॥

समुवाच ततो ब्रह्मा मुनिमूर्वं सभाजयन्।
धार्यतां पुत्रजं तेजो लोकानां हितकाम्यया।
अस्यापत्यस्य ते विप्र करिष्ये साह्यमुत्तमम् ॥ ५५ ॥

तब ब्रह्मा ऊर्व मुनिका सत्कार करते हुए उनसे कहने लगे—‘विप्रवर ! तुम लोकोंका हित करनेकी इच्छासे अपने पुत्रके तेजको रोके रहो। मैं तुम्हारे इस पुत्रकी उत्तम सहायता करूँगा ॥ ५५ ॥

वासं चास्य प्रदास्यामि प्राशनं चामृतोपमम्।
तथ्यमेतन्मम वचः शृणु त्वं वदतां वर ॥ ५६ ॥

‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! तुम मेरे इस तथ्य वचनको भी सुनो। मैं इसे अमृतके समान भोजन और रहनेके लिये स्थान भी दूँगा’ ॥ ५६ ॥

ऊर्व उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्ममाद्य भवाञ्छिशोः।
मतिमेतां ददातीह परमानुग्रहाय वै ॥ ५७ ॥

ऊर्वने कहा—‘आज मैं धन्य हूँ। मेरे ऊपर आपका बड़ा अनुग्रह है, जो आप यहाँ पधारकर मेरे पुत्रपर परम अनुग्रह करनेके लिये ऐसी सलाह दे रहे हैं ॥ ५७ ॥

प्रभावकाले सम्प्राप्ते काङ्क्षितव्ये समागमे।
भगवंस्तर्पितः पुत्रः कैर्हव्यैः प्राप्स्यते सुखम् ॥ ५८ ॥
कुत्र चास्य निवासो वै भोजनं च किमात्मकम्।
विधास्यति भवानस्य वीर्यतुल्यं महौजसः ॥ ५९ ॥

भगवन् ! जब इसका यौवनकाल उपस्थित होगा और इसके लिये भोजनकी व्यवस्था वाञ्छनीय होगी, तब यह किस हविसे तृप्त होकर सुख पायेगा ? इसका निवासस्थान कहाँ होगा ? इस महान् शक्तिशाली पुत्रकी शक्तिके अनुरूप आप किस भोजनकी व्यवस्था करेंगे ? ॥ ५८-५९ ॥

ब्रह्मोवाच
वडवामुखेऽस्य वसतिः समुद्रास्ये भविष्यति।
मम योनिर्जलं विप्र तच्च तोयमयं वपुः ॥ ६० ॥

ब्रह्माजीने कहा—विप्रवर ! जिसकी आकृति घोड़ीके मुखके समान है, समुद्रके उस मुखमें इसका निवास होगा। जल मेरी योनि (उत्पत्तिका स्थान) है और उस (समुद्र एवं उसके मुख) का स्वरूप भी जलमय ही है ॥ ६० ॥

तद्धविस्त्वं पुत्रस्य विसृजाम्यालयं तु तत्।
तत्रायमास्तां नियतः पिबन् वारिमयं हविः ॥ ६१ ॥

उसी जलको मैं तुम्हारे पुत्रके लिये हविष्यरूपमें अर्पित करता हूँ और उसके लिये रहनेका स्थान भी वही होगा। यह जलमय हविष्यका पान करता हुआ सदा वहीं रहे ॥ ६१ ॥

ततो युगान्ते भूतानामेष चाहं च सुव्रत।
सहितौ विचरिष्यावो लोकानिति पुनः पुनः ॥ ६२ ॥

सुव्रत ! तदनन्तर प्राणियोंका प्रलयकाल आनेपर यह और मैं दोनों साथ-साथ सम्पूर्ण लोकोंमें बारंबार विचरेंगे ॥ ६२ ॥

एषोऽग्निरन्तकाले तु सलिलाशी मया कृतः।
दहनः सर्वभूतानां सदेवासुररक्षसाम् ॥ ६३ ॥

इस अग्निको मैंने जलाहारी बना दिया। यह प्रलयके समय देवता, राक्षस और असुर आदि समस्त प्राणियोंको भस्म करनेवाला होगा ॥ ६३ ॥

एवमस्त्विति सोऽप्यग्निः संवृतज्वालमण्डलः।
प्रविवेशार्णवमुखं निक्षिप्य पितरि प्रभाम् ॥ ६४ ॥

तब ‘एवमस्तु’ कहकर उस और्व नामक अग्निने अपनी ज्वालाओंको समेट लिया और पिताके शरीरमें यशरूपी तेजको स्थापित करके उसी क्षण समुद्रके मुखमें प्रवेश किया ॥ ६४ ॥

प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ते च सर्वे महर्षयः।
और्वस्याग्नेः प्रभावज्ञाः स्वां स्वां गतिमुपाश्रिताः ॥ ६५ ॥

तब ब्रह्माजी लौट गये तथा और्व अग्निके प्रभावको जाननेवाले वे सब महर्षि भी अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ६५ ॥

हिरण्यकशिपुर्दृष्ट्वा तदद्भुतमपूजयत्।
ऊर्वं प्रणतसर्वाङ्गो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ६६ ॥

इस अद्भुत घटनाको देखकर हिरण्यकशिपुने ऊर्वको साष्टाङ्ग प्रणाम करके उनका पूजन किया और यह बात कही— ॥ ६६ ॥

भगवन्नद्भुतमिदं निर्वृत्तं लोकसाक्षिकम्।
तपसा ते मुनिश्रेष्ठ परितुष्टः पितामहः ॥ ६७ ॥

‘भगवन् ! आपने समस्त लोकोंके सामने यह अद्भुत बात कर दिखायी। मुनिश्रेष्ठ ! आपकी तपस्यासे पितामह ब्रह्मा भी बहुत संतुष्ट हैं ॥ ६७ ॥

१७०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अहं तु तव पुत्रस्य तव चैव महाव्रत ।
भृत्य इत्यवगन्तव्यः श्लाघ्योऽस्मि यदि कर्मणा ॥ ६८ ॥
'महाव्रत ! यदि आप मेरे कर्मोंको देखकर मुझे प्रशंसाके योग्य समझते हो तो मुझे अपने पुत्रका और अपना किङ्कर समझें ॥ ६८ ॥

तन्मां पश्य समापन्नं तवैवाराधने रतम् ।
यदि सीदे मुनिश्रेष्ठ तवैव स्यात् पराजयः ॥ ६९ ॥
'अतः मुनिश्रेष्ठ ! मैं शरणमें आकर आपकी ही आराधनामें तत्पर हूँ। आप मुझपर कृपादृष्टि कीजिये। यदि मैं कष्टमें पड़ा तो यह आपकी ही पराजय होगी' ॥ ६९ ॥

ऊर्व उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य तेऽहं गुरुर्मतः ।
नास्ति ते तपसानेन भयमद्येह सुव्रत ॥ ७० ॥
ऊर्व मुनिने कहा--'सुव्रत ! तुम मुझे अपना गुरु या पिता मान रहे हो, अतः मैं धन्य हूँ, यह तुम्हारा मुझपर महान् अनुग्रह है। मेरी इस तपस्याके प्रभावसे अब तुम्हें यहाँ कोई भय नहीं होगा ॥ ७० ॥

इमां च मायां गृह्णीष्व मम पुत्रेण निर्मिताम् ।
निरिन्धनामग्निमयीं दुःस्पर्शां पावकैरपि ॥ ७१ ॥
साथ ही तुम मेरे पुत्रके द्वारा रची हुई इस मायाको ग्रहण करो। इस ईंधनरहित अग्निमयी मायाका स्पर्श करना साक्षात् अग्निके लिये भी कठिन होगा ॥ ७१ ॥

एषा ते स्वस्य वंशस्य वशगारिविनिग्रहे ।
रक्षिष्यत्यात्मपक्षं सा परांश्च प्रहरिष्यति ॥ ७२ ॥
यह (माया) तुम्हारे जीवनकाल तक सदा तुम्हारे वंशजोंके वशमें होकर रहेगी और शत्रुओंका दमन करते समय यह अपने पक्षवालोंकी रक्षा तथा शत्रुओंका संहार करेगी ॥ ७२ ॥

एवमस्त्विति तां गृह्य प्रणम्य मुनिपुंगवम् ।
जगाम त्रिदिवं हृष्टः कृतार्थो दानवेश्वरः ॥ ७३ ॥
तब 'एवमस्तु' कहकर दानवराजने उस मायाको ग्रहण कर लिया और प्रसन्न हो कृतार्थताका अनुभव करता हुआ उन मुनिवरको प्रणाम करके स्वर्गको चला गया ॥ ७३ ॥

वरुण उवाच
सैषा दुर्विषहा माया देवैरपि दुरासदा ।
और्वेण निर्मिता पूर्वं पावकेनोर्वसूनुना ॥ ७४ ॥
वरुण कहते हैं--इस प्रकार प्राचीन कालमें ऊर्वऋषिके पुत्र और्वनामक अग्निने इस मायाको रचा था, जो देवताओंके लिये भी दुःसह एवं दुर्जय है ॥ ७४ ॥

तस्मिंस्तु व्युत्थिते दैत्ये निर्वीर्या न संशयः ।
शापो ह्यस्याः पुरा दत्तः सृष्टा येनैव तेजसा ॥ ७५ ॥
यह दैत्य अब संसारसे उठ गया है। अतः यह माया निर्बल हो गयी है, इसमें कोई संदेह नहीं है; क्योंकि जिन्होंने अपने तेजसे इसको रचा था, उन्होंने ही इसको शाप भी दिया था (कि यह माया हिरण्यकशिपुके जीवनतक ही बलवती रहेगी) ॥ ७५ ॥

यद्येषा प्रतिहन्तव्या कर्तव्यो भगवान् सुखी ।
दीयतां मे सखा शक्र तोययोनिर्निशाकरः ॥ ७६ ॥
इन्द्रदेव ! यदि आपको इस मायाका संहार करना है और अपनेको प्रसन्न करना है तो आप मुझे जलके उत्पत्तिस्थान चन्द्रमाको मेरी सहायताके लिये दीजिये ॥ ७६ ॥

तेनाहं सह संगम्य यादोभिश्च समावृतः ।
मायामेतां हनिष्यामि त्वत्प्रसादान्न संशयः ॥ ७७ ॥
मैं चन्द्रमाके सहयोगसे और (अपने अधीनस्थ) जलचर जीवोंसे घिरा रहकर आपकी कृपासे इस मायाका अवश्य ही नाश कर डालूँगा ॥ ७७ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि और्वाग्निसम्भवो नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें और्व अग्निके उत्पत्तिविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥


षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

इन्द्रद्वारा चन्द्रमाकी स्तुति, चन्द्रदेव और वरुणदेवके द्वारा दैत्यसेनाका संहार, मयदानवद्वारा मायाका प्रयोग, पवन और अग्निदेवका दैत्यसेनाके साथ संग्राम और कालनेमिका रणमें आगमन

वैशम्पायन उवाच
एवमस्त्विति संहृष्टः शक्रस्त्रिदशवर्धनः ।
संदिदेशाग्रतः सोमं युद्धाय शिशिरायुधम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब देवताओंकी उन्नति करनेवाले इन्द्र अति प्रसन्न होकर बोल उठे—'अच्छा, ऐसा ही होगा।' तदनन्तर वे अपने सामने ही स्थित, हिमसे आयुधका काम लेनेवाले चन्द्रमाको समझाने लगे ॥ १ ॥

शक्र उवाच
गच्छ सोम सहायत्वं कुरु पाशधरस्य वै ।
असुराणां विनाशाय जयाय च दिवौकसाम् ॥ २ ॥

हरिवंशपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः १७१

इन्द्रने कहा--सोम ! आप जाइये और पाशधारी वरुणकी सहायता कीजिये। ऐसा करनेसे असुरोंका संहार और देवताओंकी विजय होगी॥ २॥

त्वमप्रतिमवीर्य्यश्च ज्योतिषां चेश्वरेश्वरः।
तन्मयं सर्वलोकानां रसं रसविदो विदुः॥ ३॥
आपका पराक्रम अनुपम है। आप ग्रह-नक्षत्रोंके अधिपतियोंके भी अधिपति हैं। रस (के तत्त्व) को जाननेवाले विद्वानोंका यह अनुभव है कि सब प्राणियोंमें जो रस है, वह आपका ही है॥ ३॥

क्षयवृद्धी तवाव्यक्ते सागरस्येव मण्डले।
परिवर्त्तस्यहोरात्रं कालं जगति योजयन्॥ ४॥
समुद्रके समान आपके मण्डलकी क्षय-वृद्धि सदा अव्यक्त रहती है। आप संसारमे कालको प्रवर्तित करते हुए दिन और रात्रिका परिवर्तन करते रहते हैं॥ ४॥

लोकच्छायामयं लक्ष्म तवाङ्के शशसंज्ञितम्।
न विदुः सोमदेवाऽपि ये च नक्षत्रयोगिनः॥ ५॥
सोम ! आपके अङ्क (मण्डलके मध्य) में पृथ्वीलोककी छाया (प्रतिबिम्ब) ही शश नामक चिह्न है। नक्षत्रोंका विचार करनेवाले विद्वान् और चन्द्रोपासक भी आपको (वास्तविक रूपमें) नहीं जान सकते॥ ५॥

त्वमादित्यपथादूर्ध्वं ज्योतिषां चोपरि स्थितः।
तमश्चोत्सार्य वपुषा भासयस्यखिलं जगत्॥ ६॥
आप आदित्यपथसे भी ऊर्ध्वदेशमें और सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डलोंके भी ऊपर स्थित रहते हैं। आप अपने (तेजोमय) शरीरके द्वारा अन्धकारको दूर कर समस्त संसारको प्रकाशित करते हैं॥ ६॥

श्वेतभानुर्हिमतनुर्ज्योतिषामधिपः शशी।
शब्दकृत् कालयोगात्मा ईज्यो यज्ञरसोऽव्ययः॥ ७॥
आपकी किरणें श्वेतवर्णकी हैं। आपका शरीर हिममय है। आप नक्षत्रोंके स्वामी, शशके चिह्नसे युक्त, संवत्सररूप (काल) के रचयिता, कालयोगस्वरूप, पूजनीय, (वर्षा आदिके रूपमें) यज्ञके रस और अव्यय (प्रवाहरूपसे नित्य) हैं॥ ७॥

ओषधीशः क्रियायोनिरम्भोयोनिरनुष्णभाक्।
शीतांशुर्मृताधारश्चपलः श्वेतवाहनः॥ ८॥
आप (अन्नादि) ओषधियोंके स्वामी, क्रियाओं और जलके उत्पत्तिस्थान तथा स्वभावसे ही शीतलता धारण करनेवाले हैं। आपकी किरणें शीतल हैं। आप अमृतके आधार हैं, चपल हैं। आपका वाहन श्वेतवर्णका है॥ ८॥

त्वं कान्तिः कान्तवपुषां त्वं सोमः सोमवृत्तिनाम्।
सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरघ्नस्त्वमृक्षराट्॥ ९॥
आप ही कान्तिमान् शरीरवाले नर-नारियों और देवताओंकी कान्ति हैं और सोमसे जीविका चलानेवाले देवसमूहके लिये आप ही सोम हैं। आप सभी प्राणियोंके लिये सौम्य हैं, अन्धकारका नाश करनेवाले हैं तथा नक्षत्रोंके राजा हैं॥

तद् गच्छ त्वं सहानेन वरुणेन वरूथिना।
शमयस्वासुरीं मायां यया दह्याम संगरे॥ १०॥
अतः आप सेना लेकर (युद्धके लिये) तैयार खड़े हुए इन वरुणदेवके साथ जाइये और समराङ्गणमें जिससे हम जल रहे हैं, उस आसुरी मायाको शान्त कीजिये॥ १०॥

सोम उवाच
यन्मां वदसि युद्धार्थे देवराज जगत्पते।
एष वर्षामि शिशिरं दैत्यमायापकर्षणम्॥ ११॥
सोमने कहा--देवराज ! जगत्पते ! आप युद्धके लिये मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, उसके अनुसार मैं अभी दैत्योंकी मायाको नष्ट करनेके लिये हिमकी वर्षा करता हूँ॥ ११॥

एतान् मच्छीतनिर्दग्धान् पश्य त्वं हिमवेष्टितान्।
विमायान् विमदांश्चैव दानवांस्त्वं महामृधे॥ १२॥
देखिये, इस महासमरमे ये दानव किस प्रकार मेरे बरसाये हुए ओलोसे दग्ध होते हैं। हिमसे आवेष्टित होनेपर कैसे इनकी माया नष्ट होती है और किस तरह इनका सारा मद उतर जाता है॥ १२॥

वैशम्पायन उवाच
ततो हिमकरोत्सृष्टाः सवाष्पा हिमवृष्टयः।
वेष्टयन्ति स्म तान् घोरान् दैत्यान् मेघगणा इव॥ १३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन् ! तदनन्तर चन्द्रमाकी छोड़ी हुई सुन्दर बाष्पसहित ओलोंकी वर्षाने मेघोंकी भाँति उन भयंकर दैत्योंको जकड़ना आरम्भ कर दिया॥ १३॥

तौ पाशशुक्लांशुधरौ वरुणेन्दू महारणे।
जघ्नतुर्हिमपातैश्च पाशाघातैश्च दानवान्॥ १४॥
उस महायुद्धमें पाशधारी वरुण और श्वेत किरणोंवाले चन्द्रमा पाशसे मारकर और ओले गिराकर दानवोंका संहार करने लगे॥ १४॥

द्वावम्बुनाथौ समरे तौ पाशहिमयोधिनौ।
मृधे चेरतुरम्भोभिः क्षुब्धाविव महार्णवौ॥ १५॥
पाश और हिमका प्रहार करनेवाले वे दोनों जलके स्वामी वरुण और सोम जलकी वर्षा करते हुए क्षोभमे भरे हुए दो समुद्रोंके समान संग्राममें विचरने लगे॥ १५॥

ताभ्यामाप्लावितं सैन्यं तद् दानवमदृश्यत।
जगत् संवर्तकाम्भोदैः प्रवृष्टैरिव संवृतम्॥ १६॥

१७२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उन दोनोंके द्वारा की गयी जलवर्षासे आप्लावित हुई वह दानवोंकी सेना प्रलयकालमें प्रबल वर्षा करनेवाले संवर्तक मेघोंके द्वारा अनन्त जलराशिमें डुबाये गये जगत्‌के समान दीखने लगी ॥ १६ ॥

तावुद्यतांशुपाशौ द्वौ शशाङ्कवरुणौ रणे ।
शमयामासतुर्मायां देवौ दैतेयनिर्मिताम् ॥ १७ ॥

( इस प्रकार ) चन्द्रदेव और वरुणदेव दोनों उस युद्धमें अपनी किरणों और पाशोंका प्रयोग करके दैत्योंकी रची हुई मायाका शमन करने लगे ॥ १७ ॥

शीतांशुजलनिर्दिग्धः पाशैश्च प्रसितारणे ।
न शेकुश्चलितुं दैत्या विशिरस्का इवाद्रयः ॥ १८ ॥

शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाके ( हिम ) जलसे अकड़े हुए और ( वरुणके ) पाशोंसे जकड़े हुए दैत्य रणमे शिखरहीन पर्वतोंकी भाँति हिल-डुल भी न सके ॥ १८ ॥

शीतांशुनिहतास्ते तु पेतुर्दैत्या हिमादिताः ।
हिमप्रावृतसर्वाङ्गा निरूष्माण इवाग्नयः ॥ १९ ॥

शीतरश्मि चन्द्रमाकी मार खाकर हिमसे पीड़ित हुए दैत्य पृथ्वीपर गिरने लगे । उनके सारे अङ्ग बर्फसे ढक गये थे । उस समय वे उष्णतारहित अग्निके समान जान पड़ते थे ॥ १९ ॥

तेषां तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि च ।
विमानानि विचित्राणि निपतन्त्युत्पतन्ति च ॥ २० ॥

फिर तो स्वर्गमें दैत्योंके विचित्र विमान प्रभाहीन होकर गिरने और गिरकर उछलने लगे ॥ २० ॥

तान् पाशहस्तग्रथिताञ्छादितान् हिमरश्मिना ।
मयो ददर्श मायावी दानवान् दिवि दानवः ॥ २१ ॥

मायावी दानव मयने देखा कि स्वर्गमें बहुत-से दानवोंको पाशधारी वरुणने जकड़ लिया है और बहुतोंको शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाने बर्फसे ढक दिया है ॥ २१ ॥

स शिलाजालविततां गण्डशैलाट्टहासिनीम् ।
पादपोत्कटकूटाग्रां कन्दराकीर्णकाननाम् ॥ २२ ॥
सिंहव्याघ्रगजाकीर्णां नदन्तीमिव यूथपैः ।
ईहामृगगणाकीर्णां पवनाघूर्णितद्रुमाम् ॥ २३ ॥
निर्मितां स्वेन पुत्रेण क्रौञ्चेन दिवि कामगाम् ।
प्रथितां पार्वतीं मायां ससृजे दानवोत्तमः ॥ २४ ॥

तब उस दानव-शिरोमणिने स्वर्गमे अपने पुत्र क्रौञ्चके द्वारा निर्मित सुप्रसिद्ध पार्वती मायाको प्रकट किया, जो इच्छानुसार सर्वत्र पहुँच जानेवाली थी । वह शिलाओंका विशाल जाल-सा बिछा देती थी, भारी-भारी चट्टानोंको गिरा-कर उनके धमाकेकी आवाजके रूपमें मानो अट्टहास करती थी । उन शिलाओंके शिरोभाग वृक्षोंके कारण खुरदरे हो रहे थे । उस पार्वती मायाके कानन-प्रान्त गुफाओंसे व्याप्त थे । वहाँ सिंह, व्याघ्र और बड़े-बड़े गजराज भरे हुए थे । यूथ-पतियोंके चिग्घाड़ने या दहाड़नेके शब्दसे मानो वह माया सिंहनाद-सा करती प्रतीत होती थी । उस मायामयी पर्वत-मालामें सब ओर भेड़िये भरे थे । वहाँके वृक्ष प्रचण्ड वायुके झोंके खाकर झूम रहे थे ॥ २२—२४ ॥

साश्मशब्दैः शिलावर्षैः सम्पतद्भिश्च पादपैः ।
निजघ्ने देवसंघांस्तान् दानवांश्चाप्यजीचयत् ॥२५॥

उस पार्वती मायाने चट्टानोंके टकरानेकी आवाजसे, पत्थरोंकी वर्षासे और गिरते हुए वृक्षसमूहोंसे देवसमुदायको मारना आरम्भ किया । इससे दैत्योंके जीमें-जी आया ॥ २५॥

नैशाकरी वारुणी च मायेऽन्तर्दधतस्ततः ।
अश्मभिश्चायसघनैः कीर्णा देवगणा रणे ॥ २६ ॥

उस दैत्यकी मायाके प्रभावसे वरुण और चन्द्रमा—दोनों-की मायाएँ अदृश्य हो गयीं । रणभूमिमें देवताओंपर प्रस्तर और लोहेके घन बरसने लगे ॥ २६ ॥

साश्मसंघातविषमा द्रुमपर्वतसंकटा ।
अभवद् घोरसंचारा पृथिवी पर्वतैरिव ॥ २७ ॥

जैसे पर्वतोंके कारण वहाँकी भूमिपर चलना कठिन हो जाता है, उसी प्रकार वहाँ गिरे हुए शिलाखण्डोंके समूहसे विषम और वृक्ष एवं पर्वतोंके बिछ जानेसे संकीर्ण हुई उस रणभूमिमे चलना-फिरना दूभर हो गया था ॥ २७ ॥

नानाहतोऽश्मभिः कश्चिच्छिलाभिश्चाप्यताडितः ।
नानिरुद्धो द्रुमगणैर्देवोऽदृश्यत संयुगे ॥ २८ ॥

उस युद्धमें ऐसा कोई देवता नहीं दिखायी देता था, जिसके शरीरपर पत्थरोंसे चोट न आयी हो, जिसपर शिलाओं-की मार न पड़ी हो तथा जो सब ओर गिरें हुए वृक्ष-समूहोंसे अवरुद्ध न हो गया हो ॥ २८ ॥

तदपभ्रष्टधनुषं भग्नप्रहरणाविलम् ।
निष्प्रयत्नं सुरानीकं वर्जयित्वा गदाधरम् ॥ २९ ॥

उस समय भगवान् गदाधरको छोड़कर शेष देवताओंकी वह सारी सेना निरुपाय एवं निश्चेष्ट हो गयी थी । सबके हाथसे धनुष नीचे गिर गये थे और आयुधोंके टूट जानेसे सबके मुखपर मलिनता छा गयी थी ॥ २९ ॥

स हियुद्वागतः श्रीमानीशो न स्म व्यकम्पत ।
सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी न चुक्रोध गदाधरः ॥ ३० ॥

अवश्य ही युद्धमे विराजमान श्रीमान् भगवान् विष्णु उस समय भी कम्पित नहीं हुए और सहनशील होनेके कारण

हरिवंशपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः १७३


उन जगत्पति भगवान् गदाधरको क्रोध भी नहीं आया ॥ ३० ॥
कालज्ञः कालमेघाभः समैक्षत् कालमाहवे ।
देवासुरविमर्दे स द्रष्टुकामो जनार्दनः ॥ ३१ ॥
श्याम मेघकी-सी कान्तिवाले और समयको पहचाननेवाले भगवान् जनार्दन युद्धमें समयकी बाट देखने लगे। वे देवता और असुरोंकी मुठभेड़ देखना चाहते थे ॥ ३१ ॥
ततो भगवताऽऽदिष्टौ रणे पावकमारुतौ ।
शमनार्थं प्रवृद्धाया मायाया मयसृष्टया ॥ ३२ ॥
उधर मयदानवकी रची हुई माया रणभूमिमें उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। उसे शान्त करनेके लिये भगवान्‌ने अग्नि और वायुको आज्ञा दी (कि तुम दोनों इस मायाको नष्ट करो) ॥ ३२ ॥
ततः प्रवृद्धावन्योन्यं प्रबुद्धौ ज्वालवाहिनौ ।
चोदितौ विष्णुवाक्येन तां मायां व्यपकर्षताम् ॥ ३३ ॥
तब एक दूसरेके सहयोगसे बढ़े हुए तथा प्रबुद्ध होकर ज्वालाओंका भार वहन करनेवाले वे दोनों देवता भगवान् विष्णुकी आज्ञासे प्रेरित होकर उस मायाको दूर करने लगे ३३
ताभ्यामुद्‌भ्रान्तवेगाभ्यां प्रवृद्धाभ्यां महाहवे ।
दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश ह ॥ ३४ ॥
प्रवृद्ध होकर महायुद्धमें बवंडरकी तरह वेगसे घूमते हुए पावक और पवनदेवने उस पार्वती मायाको भस्म कर डाला। अतः वह नष्ट हो गयी ॥ ३४ ॥
सोऽनिलोऽनलसंयुक्तः सोऽनलश्चानिलाकुलः ।
दैत्यसेनां ददहतुर्युगान्तेष्विव मूर्च्छितौ ॥ ३५ ॥
प्रलयकालकी भाँति वायुका संयोग पाकर प्रबल हुए अग्निदेवने और अग्निका संयोग पाकर बढ़े हुए वायुदेवने दानवसेनाको भस्म करना आरम्भ किया ॥ ३५ ॥
वायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निश्च मारुतात् ।
चेरतुर्दानवानीके क्रीडन्तावनलानिलौ ॥ ३६ ॥
रणभूमिमें पहले तो वेगसे आँधी चली और फिर वायुसे प्रज्वलित होकर अग्नि वेगपूर्वक फैलने लगी। (इस प्रकार) अग्निदेव और पवनदेव दोनों दानवोंकी सेनामें क्रीड़ा करते हुए विचरने लगे ॥ ३६ ॥
भस्मावयवभूतेषु प्रपतत्सूत्पतत्सु च ।
दानवेषु विनष्टेषु कृतकर्मणि पावके ॥ ३७ ॥
(फिर क्या था ?) दानवलोग भस्म हो-होकर गिरने लगे और (वायुके वेगसे) उनकी राख उड़ने लगी। इस प्रकार अग्निका काम पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
वातस्कन्धापविद्धेषु विमानेषु समन्ततः ।
मायाबन्धे विनिर्वृत्ते स्तूयमाने गदाधरे ॥ ३८ ॥
(इधर) वायुके प्रचण्ड वेगसे आहत हो विमान सब ओर टूट-टूटकर गिरने लगे। मायाका बन्धन नष्ट हो गया तथा भगवान् विष्णुकी स्तुति होने लगी ॥ ३८ ॥
निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तबन्धने ।
सम्पहृष्टेषु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः ॥ ३९ ॥
दानवोंके प्रयत्न निष्फल हो गये, त्रिलोकीका बन्धन जाता रहा और देवता सब ओर अत्यन्त हर्षमें भरकर 'साधु-साधु' कहने लगे ॥ ३९ ॥
जये दशशताक्षस्य मयस्य च पराजये ।
दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मसंस्तरे ॥ ४० ॥
सहस्रनेत्रधारी इन्द्रकी विजय हुई और मय दानवकी पराजय। सम्पूर्ण दिशाएँ शुद्ध हो गयीं और सब ओर धर्म-का विस्तार होने लगा ॥ ४० ॥
अपावृत्ते चन्द्रपथे अयनस्थे दिवाकरे ।
प्रकृतिस्थेषु लोकेषु नृषु चारित्रबन्धुषु ॥ ४१ ॥
चन्द्रमाका मार्ग प्रशस्त हो गया। सूर्य अपने मार्ग-में स्थित हुए। तीनों लोक अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हो गये और मनुष्य सदाचारको ही अपना बन्धु (सहायक) मानने लगे ॥ ४१ ॥
अभिन्नबन्धने मृत्यौ हूयमाने हुताशने ।
यज्ञभागिषु देवेषु स्वर्गार्थं दर्शयत्सु च ॥ ४२ ॥
मृत्युकी मर्यादा नियत हो गयी। अग्निहोत्रका कार्य ठीक ढंगसे चलने लगा। देवता यज्ञोंमें भाग पाने तथा स्वर्ग-का मार्ग दिखाने लगे ॥ ४२ ॥
लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानवर्तिषु ।
भावे तपसि शुद्धानामभावे दुष्टकर्मणाम् ॥ ४३ ॥
समस्त लोकपाल अपनी-अपनी दिशामें निर्भय होकर विचरने लगे। शुद्धात्मा पुरुष तपस्यामे प्रवृत्त हो अभ्युदय-के भागी होने लगे तथा दुराचारी मनुष्योंका विनाश होने लगा ॥ ४३ ॥
देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति ।
त्रिपादविग्रहे धर्मे अधर्मे पादविग्रहे ॥ ४४ ॥
देवताओंका दल प्रसन्न रहने लगा। दैत्योंके समुदाय-पर विषाद छा गया। धर्मके तीन पैर जम गये और अधर्म-का एक ही पैर शेष रह गया ॥ ४४ ॥
अपावृतमहाद्वारे वर्तमाने च सत्पथे ।
स्वधर्मस्थेषु वर्णेषु लोकेऽस्मिन्नाश्रमेषु च ॥ ४५ ॥
जिसपर चलनेवाले पुरुषोंके लिये मोक्षका महान् द्वार खुल जाता है, वह सत्पुरुषोंका मार्ग पुनः चालू हो गया। इस जगत्‌में चारों वर्णों और चारों आश्रमोंके लोग अपने-अपने धर्मका पालन करने लगे ॥ ४५ ॥

१७४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ।
गीयमानासु गाथासु देवसंस्तवनादिषु ॥ ४६ ॥
सभी नरेश प्रजापालनमें तत्पर रहकर विशेष शोभा पाने लगे। देवताओंकी स्तुतिसे युक्त गाथाओंका सब ओर गान होने लगा ॥ ४६ ॥

प्रशान्तकलुषे लोके शान्ते तपसि दारुणे ।
अग्निमारुतयोस्तस्मिन् वृत्ते संग्रामकर्मणि ।
तन्मया विमला लोकास्ताभ्यां जयकृतप्रियाः ॥ ४७ ॥
सब लोगोंका कलुष शान्त हो गया। दारुण या कठोर तपस्या शान्त एवं मृदुल तपके रूपमें परिणत हो गयी। अग्नि और वायुदेवका वह युद्धविषयक महान् पराक्रम जब पूर्ण हो गया, तब निर्मल (प्रसन्न) हुए जगत्‌मे उन्हींकी प्रधानता हो गयी; क्योंकि उनकी विजयने लोगोंका प्रिय कार्य किया था ॥ ४७ ॥

पूर्वदेवभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत् ।
कालनेमिरिति ख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत ॥ ४८ ॥
अग्नि और वायुने दैत्योंपर महान् भय उपस्थित कर दिया है—यह सुनकर 'कालनेमि' नामसे विख्यात दानव उनके सामने आया ॥ ४८ ॥

भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः ।
मन्दराचलसंकाशो महारजतसंवृतः ॥ ४९ ॥
उसके मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी मुकुट शोभा दे रहा था। उसने पैर आदिमें खन-खन शब्द करनेवाले नूपुर आदि आभूषण तथा भुजाओंमें बाजूबन्द धारण कर रखे थे। बहुमूल्य चाँदीके कवचसे आवृत होनेके कारण वह मन्दराचल-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ४९ ॥

शतप्रहरणोद्यग्रः शतबाहुः शताननः ।
शतशीर्षो स्थितः श्रीमांञ्छतशृङ्ग इवाचलः ॥ ५० ॥
उसने अपनी सौ भुजाओंमें उतने ही आयुध धारण किये थे, इसलिये वह अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था। उसके मुख भी सौ ही थे। सौ मस्तकोंसे युक्त वह तेजस्वी दानव जब खड़ा होता था, उस समय सौ शिखरोंसे सुशोभित पर्वतके समान जान पड़ता था ॥ ५० ॥

कक्षे महति संवृद्धे हिमान्त इव पावकः ॥ ५१ ॥
इतना ही नहीं, वह ग्रीष्म ऋतुमें सूखे वृक्षोंसे भरे हुए विशाल वनके भीतर प्रज्वलित हुए दावानलके समान देदीप्यमान हो रहा था ॥ ५१ ॥

धूम्रकेशो हरिच्छ्मश्रुर्दंष्ट्रालोष्ठपुटाननः ।
त्रैलोक्यान्तरविस्तारो धारयन् विपुलं वपुः ॥ ५२ ॥
उसके केश धूम्रवर्णके थे; किंतु मूँछें हरे रंगकी दिखायी देती थीं। उसकी दाढ़ें ओठोंसे बाहर निकली हुई थीं, जिससे उसके मुखकी अद्भुत शोभा होती थी। उसने ऐसा विशाल शरीर धारण कर रखा था, जो तीनों लोकोंमें फैला हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ५२ ॥

बाहुभिस्तुलयन् व्योम क्षिपन् पद्भ्यां महीधरान् ।
ईरयन् मुखनिःश्वासैर्वृष्टिमन्तो वलाहकान् ॥ ५३ ॥
वह अपनी भुजाओंसे आकाशको तौल रहा था, पैरोंकी ठोकरोंसे कितने ही पर्वतोंको दूर फेंक देता था और मुखके निःश्वासोंसे वर्षा करनेवाले बादलोंको उड़ा देता था ॥ ५३ ॥

तिर्यगायतरक्ताक्षं मन्दरोत्थग्रवर्चसम् ।
दिधक्षन्तमवायान्तं सर्वान् देवगणान् मृधे ॥ ५४ ॥
उसके नेत्र विशाल और लाल थे। वह तिरछी दृष्टिसे देखा करता था। मन्दर अर्थात् स्वर्गलोकके सर्वश्रेष्ठ देवता देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी जान पड़ता था। उसे देखकर ऐसा लगता था, मानो वह युद्धमें सम्पूर्ण देवताओंको भस्म कर डालनेकी इच्छासे आ रहा हो ॥ ५४ ॥

तर्जयन्तं सुरगणान्छादयन्तं दिशो दश ।
संवर्तकाले क्षुधितं दृप्तं मृत्युमिवोत्थितम् ॥ ५५ ॥
वह देवताओंको डाँट बताता और दसों दिशाओंको आच्छादित करता आ रहा था। ऐसा जान पड़ता था मानो प्रलयकालमें दर्पसे भरा हुआ भूखा काल उठ खड़ा हुआ हो ॥ ५५ ॥

सुतलेनोच्छ्रितवता विपुलाङ्गुलिपर्वणा ।
माल्याभरणपूर्णेन किञ्चिच्चलितवर्मणा ॥ ५६ ॥
उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता ।
दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रुवन् ॥ ५७ ॥
जिसकी हथेली बहुत सुन्दर थी, अँगुलियोंके पर्व पुष्ट थे, जो मालाकार आभूषण (वलय) से सुशोभित था तथा जिसका कवच कुछ खिसक गया था, ऐसे ऊँचे उठाये हुए मोटे-ताजे दाहिने हाथके अग्रभागसे वह देवताओंकी मार खाकर गिरे हुए दानवोंको उठनेका संकेत करके कह रहा था, कि (वीरो!) उठकर खड़े हो जाओ ॥ ५६-५७ ॥

तं कालनेमिं समरे द्विषतां कालसंनिभम् ।
वीक्षन्ति स्म सुराः सर्वे भयविक्षुब्धमानसाः ॥ ५८ ॥
शत्रुओंके लिये कालके समान भयंकर वह कालनेमि नामक दानव जब समरभूमिमें आया, उस समय वहाँ खड़े हुए समस्त देवता भयभीत चित्तसे उसकी ओर देखने लगे ॥ ५८ ॥

तं स्म वीक्षन्ति भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम् ।
त्रिविक्रमं विक्रमन्तं नारायणमिवापरम् ॥ ५९ ॥
ऊँचे-ऊँचे पग उठाकर आक्रमण करते हुए उस काल-

हरिवंशपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः १७५


नेमिको समस्त प्राणियोंने त्रिविक्रमरूपसे तीनों लोकोंको नापनेके लिये पैर बढ़ाते हुए दूसरे नारायणके समान देखा ॥ ५९ ॥

सोच्छ्रयन् प्रथमं पादं मारुताघूर्णिताम्बरः ।
प्राक्रामच्छत्रुरो युद्धे त्रासयन् सर्वदेवताः ॥ ६० ॥

सम्पूर्ण देवताओंको त्रास देते हुए उस असुरने जब युद्धमें अपना पहला कदम उठाकर रखा, उस समय हवाके झोंकेसे उसके वस्त्र फहराने लगे ॥ ६० ॥

स मयेनासुरेन्द्रेण परिष्वक्तः क्रमन् रणे ।
कालनेमिर्बभौ दैत्यः विष्णुनेव पुरंदरः ॥ ६१ ॥

रणभूमिमें विचरते हुए उस दानवराजको असुरराज मयने आगे बढ़कर हृदयसे लगा लिया। उस समय मयके साथ कालनेमि दैत्यकी वैसे ही शोभा हुई, जैसे भगवान् विष्णुसे देवराज इन्द्र सुशोभित होते हैं ॥ ६१ ॥

अथ विव्यथिरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।
दृष्ट्वा कालमिवायान्तं कालनेमिं भयावहम् ॥ ६२ ॥

कालके समान भयंकर कालनेमिको आते देख इन्द्र आदि सब देवता भयसे व्यथित हो उठे ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि कालनेमिप्रक्रमणे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें कालनेमिका आक्रमणविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥


सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

कालनेमिका युद्ध और प्रभाव

वैशम्पायन उवाच

दानवांश्चापि पिप्रीषुः कालनेमिर्महासुरः ।
न्यवर्धत महातेजास्तपान्ते जलदो यथा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जैसे गर्मीके अन्तमें वर्षाकाल आनेपर मेघ बढ़ता है, उसी प्रकार महातेजस्वी महान् असुर कालनेमि दानवोंको पुष्ट करनेकी इच्छासे बढ़ने लगा ॥ १ ॥

त्रैलोक्यान्तर्गतं तं तु दृष्ट्वा ते दानवेश्वराः ।
उत्तस्थुरपरिश्रान्ताः प्राप्येवामृतमुत्तमम् ॥ २ ॥

उसे तीनों लोकोंमे फैला हुआ देखकर वे सभी दानवराज इस प्रकार सहसा उठ खड़े हुए मानो उन्हें उत्तम अमृत मिल गया हो। उस समय उनकी सारी थकावट दूर हो गयी थी ॥ २ ॥

ते वीतभयसंत्रासा मयतारपुरोगमाः ।
तारकामयसंग्रामे सततं जयकाङ्क्षिणः ।
रेजुरोधनगता दानवा युद्धकाङ्क्षिणः ॥ ३ ॥

वे मय और तार आदि सभी दानव कालनेमिके आ जानेसे भय और त्राससे रहित हो गये, अतः उस तारकामय संग्राममें निरन्तर विजयकी अभिलाषा रखते हुए युद्धकी आकाङ्क्षासे रणभूमिमे खड़े हो शोभा पाने लगे ॥ ३ ॥

अस्त्रमभ्यस्यतां तेषां व्यूहं च परिधावताम् ।
प्रेक्षतां चाभवत् प्रीतिर्दानवं कालनेमिनम् ॥ ४ ॥

उस समय अस्त्रोंका अभ्यास करते और व्यूहमें सब ओर दौड़ लगाते हुए उन दैत्योंको कालनेमि दानवके दर्शनसे बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥

ये तु तत्र मयस्यासन् मुख्या युद्धपुरस्सराः ।
तेऽपि सर्वे भयं त्यक्त्वा हृष्टा योद्धुमुपस्थिताः ॥ ५ ॥

वहाँ जो भी मयके मुख्य-मुख्य सेनापति उपस्थित थे, वे सभी भय छोड़कर हर्ष और उत्साहके साथ युद्धके लिये डट गये ॥ ५ ॥

मयस्तारो वराहश्च हयग्रीवश्च वीर्यवान् ।
विप्रचित्तिसुतः श्वेतः खरकम्बावुभावपि ॥ ६ ॥
अरिष्टो बलिपुत्रस्तु किशोरोष्ट्रौ तथैव च ।
खर्भानुश्चामरप्रख्यो वक्रयोधी महासुरः ॥ ७ ॥
एतेऽस्त्रविदुषः सर्वे सर्वे तपसि सुव्रताः ।
दानवाः कृतिनो जग्मुः कालनेमिनमुत्तमम् ॥ ८ ॥

मय, तार, वराह, पराक्रमी हयग्रीव, विप्रचित्तिकुमार श्वेत तथा खर और लम्ब—ये दो दानव एवं बलिपुत्र अरिष्ट, किशोर, उष्ट्र तथा देवताके समान तेजस्वी एवं कुटिलतापूर्वक युद्ध करनेवाला महान् असुर स्वर्भानु—ये सभी अस्त्रवेत्ता और तपस्यामे नियमपूर्वक स्थित रहनेवाले विद्वान् और कुशल दानव उस उत्तम असुर कालनेमिके पास जा पहुँचे ॥ ६-८ ॥

ते गदाभिश्च गुर्वीभिश्चक्रैश्च सपरश्वधैः ।
अश्मभिश्चाद्रिसदृशैर्गण्डशैलैश्च दंशितैः ॥ ९ ॥
पट्टिशैर्भिन्दिपालैश्च परिघैश्चोत्तमायुधैः ।
घातनीभिश्च गुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च ॥ १० ॥
कालकल्पैश्च मुसलैः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ।
युगैर्यन्त्रैश्च निर्मुक्तैर्गलैश्चाग्रताडितैः ॥ ११ ॥
दोर्भिरायतपीनांसैः पाशैः प्रासैश्च मूर्च्छितैः ।
सर्पैर्लेलिहमानैश्च विसर्पद्भिश्च सायकैः ॥ १२ ॥

१७६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

वज्रैः प्रहरणीयैश्च दीप्यमानैश्च तोमरैः ।
विकोशैश्चासिभिस्तीक्ष्णैः शूलैश्च शितनिर्मलैः ॥ १३ ॥
ते वै संदीप्तमनसः प्रगृहीतोत्तमायुधाः ।
कालनेमिं पुरस्कृत्य तस्थुः संग्राममूर्धनि ॥ १४ ॥

वे सब हर्षसे उत्फुल्ल हृदयवाले दानव हाथोंमें उत्तम आयुध धारण किये, कालनेमिको आगे रखकर उसके सेनापतित्वमें युद्ध करनेके लिये संग्रामके मुहानेपर डट गये। कितने ही दानव अपने चौड़े और पुष्ट कंधोंसे युक्त हाथोंसे ही आयुधोंका काम लेते थे तथा बहुतेरे दैत्य भारी गदा, चक्र, फरसा, पर्वतोंके समान शिलाओंकी बड़ी-बड़ी चट्टान, वज्र आदिके आघातसे टूटकर गिरे हुए शिलाखण्ड, पट्टिश, भिन्दिपाल, परिघ, अन्यान्य उत्तम आयुध, संहार करनेमें समर्थ और सैकड़ोंके प्राण लेनेवाली बड़ी भारी तोपें, कालके समान भयंकर मूसल, क्षेपणीय (गुलेल आदि), मुद्गर, युग (जुआ), खुले हुए यन्त्र, जिसके सिरेको हथौड़ेसे पीटकर तेज किया गया हो ऐसी अर्गला (डंडेला), फैले हुए पाश, प्रास (भाला), जीभ लपलपाते हुए सर्प, तीव्रगतिसे लक्ष्यकी ओर बढ़नेवाले बाण, प्रहार करने योग्य वज्र, दीप्तिमान् तोमर, नंगी तीखी तलवार और तेज किये हुए चमकीले शूल आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये डट गये ॥ ९-१४ ॥

सा दीप्तशस्त्रप्रवरा दैत्यानां शुशुभे चमूः ।
द्यौर्निमीलितनक्षत्रा सघनेवाम्बुदागमे ॥ १५ ॥

जहाँ चमकते हुए श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र विद्युत्की भाँति प्रकाशित हो रहे थे, वह दानवसेना वर्षाकालमें छिपे हुए नक्षत्रवाले मेघ और बिजलीसे युक्त आकाशके समान शोभा पा रही थी ॥ १५ ॥

देवतानामपि चमू रुरुचे शक्रपालिता ।
दीप्ता शीतोष्णतेजोभ्यां चन्द्रभास्करवर्चसा ॥ १६ ॥

इधर चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभासे उद्भासित तथा उनके शीतल और उष्ण तेजके द्वारा देदीप्यमान हुई वह इन्द्रपालित देवसेना भी अनुपम शोभासे सम्पन्न हो रही थी ॥ १६ ॥

वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी ।
तोयदाविद्धवसना ग्रहनक्षत्रहासिनी ॥ १७ ॥
यमेन्द्रधनदैर्गुप्ता वरुणेन च धीमता ।
सप्रदीप्ताग्निपवना नारायणपरायणा ॥ १८ ॥
सा समुद्रौघसदृशी दिव्या देवमहाचमूः ।
रराजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धर्वशालिनी ॥ १९ ॥

वायुके समान वेगवती तथा सौम्य भावसे सम्पन्न देवताओंकी वह दिव्य एवं विशाल सेना तारागणोंको पताकारूपमें धारण करती थी, मेघमय वस्त्रोंसे आच्छन्न थी तथा ग्रह और नक्षत्र मानो उसके शुभ्र हास थे। यम, इन्द्र, कुबेर और बुद्धिमान् वरुणके द्वारा उसकी रक्षा की जा रही थी। उसमें प्रकाशमान अग्नि और वायुदेव भी विद्यमान थे। वह भगवान् नारायणके आश्रित थी। देखनेमें उमड़े हुए समुद्रकी अगाध जलराशिके समान जान पड़ती थी। विविध प्रकारके अस्त्रोंसे सम्पन्न होनेके कारण भयंकर प्रतीत होती थी तथा यक्ष और गन्धर्व उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १७-१९ ॥

तयोश्चम्वोस्तदा तत्र बभूव स समागमः ।
द्यावापृथिव्योः संयोगो यथा स्याद् युगपर्यये ॥ २० ॥

जैसे प्रलयकालमें द्युलोक और पृथ्वी—दोनों एक दूसरेसे टकराते हैं, उसी प्रकार उन दोनों सेनाओमें उस समय वहाँ गहरी भिड़ंत हुई ॥ २० ॥

तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम् ।
क्षमापराक्रममयं दर्पस्य विनयस्य च ॥ २१ ॥

देवताओं और दानवोंसे भरा हुआ वह युद्ध बड़ा भयंकर हो चला। एक ओर उदारतापूर्ण क्षमा थी तो दूसरी ओर क्रूरतापूर्ण पराक्रम ! यह दर्प और विनयका युद्ध था ॥ २१ ॥

निष्क्रम्युर्बलाभ्यां तु ताभ्यां भीमाः सुरासुराः ।
पूर्वापराभ्यां संरब्धाः सागराभ्यामिवाम्बुदाः ॥ २२ ॥

उन दोनों सेनाओंसे रोषमें भरे हुए भयंकर देवता और असुर निकले (तथा युद्धके लिये आगे बढ़े); ठीक उसी तरह जैसे पूर्व और पश्चिमके समुद्रोंसे क्षुब्ध मेघ प्रकट हुए हों ॥ २२ ॥

ताभ्यां चलाभ्यां संहृष्टाश्चेरुरस्ते देवदानवाः ।
वनाभ्यां पर्वतीयाभ्यां पुष्पिताभ्यां यथा गजाः ॥ २३ ॥

उन दोनों सेनाओंसे हर्ष और उत्साहमें भरे हुए देवता और दानव युद्धके लिये निकले, मानो फूलोंसे सुशोभित दो पर्वतीय वनोंसे बहुसंख्यक हाथी निकल आये हों ॥ २३ ॥

समाजघ्नुस्ततो भेरीः शङ्खान् दध्मुश्च नैकशः ।
स शब्दो द्यां भुवं चैव दिशश्च समपूरयत् ॥ २४ ॥

उस समय दोनो दलोंके सैनिक बारंबार नगाड़े पीटने और शङ्ख बजाने लगे। वाद्योंका वह तुमुल नाद पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें भर गया ॥ २४ ॥

ज्याघाततलनिर्घोषो धनुषां कूजितानि च ।
दुन्दुभीनां निनदतां दैत्यानां निर्दधुः स्वनान् ॥ २५ ॥

प्रत्यञ्चा खींचनेसे जो शब्द होता था, धनुषोंकी जो टंकार-ध्वनि होती थी तथा बजती हुई दुन्दुभियोंका जो गम्भीर नाद होता था, उन सबने मिलकर दैत्योंके गर्जन-तर्जनकी आवाजको छिपा दिया ॥ २५ ॥

[हरिवंशपर्व] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः १७७


तेऽन्योन्यमभिसम्पत्य पातयन्तः परस्परम्।
बभञ्जुर्बाहुभिर्बाहून् द्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः॥ २६॥
वे देवता और दानव एक दूसरेपर टूट पड़े और अपने-अपने प्रतिद्वन्द्वीको धराशायी करने लगे। द्वन्द्वयुद्धकी इच्छा रखनेवाले अन्यान्य योद्धाओंने अपनी भुजाओंद्वारा शत्रुओंकी भुजाएँ तोड़ डालीं ॥ २६ ॥

देवतास्त्वशनीर्घोराः परिघांश्चोत्तमायसान्।
ससर्जुरजौ निस्त्रिंशान् गदा गुर्वीश्च दानवाः ॥ २७ ॥
देवतालोग युद्धमें भयंकर वज्र तथा अच्छे लोहेके बने हुए परिघका प्रयोग करने लगे और दानव उनके ऊपर तलवारें और भारी गदाएँ चलाने लगे ॥ २७ ॥

गदानिपातैर्भग्नाङ्गा बाणैश्च शकलीकृताः।
परिपेतर्भृशं केचिन्न्युब्जाः केचित् ससर्जिरे ॥ २८ ॥
गदाओंके आघातसे कितने ही योद्धाओंके अङ्ग चूर-चूर हो गये, कितनोंके शरीर बाणोंकी चोट खाकर टुकड़े-टुकड़े हो गये, कितने ही गहरी चोटसे पछाड़ खाकर पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही पीठ ऊपर किये औंधे मुँह लुढ़क गये ॥ २८ ॥

ततो रथैः सतुरगैर्विमानैश्चाशुगामिभिः।
समीयुस्ते तु संरब्धा रोषादन्योन्यमाहवे ॥ २९ ॥
तदनन्तर उस समराङ्गणमें रोषावेशसे भरे हुए उभय-पक्षके सैनिक घोड़े जुते हुए रथों और शीघ्रगामी विमानों-द्वारा आगे बढ़कर एक दूसरेसे भिड़ गये ॥ २९ ॥

संवर्तमानाः समरे विवर्तन्तस्तथापरे।
रथा रथैर्निरुध्यन्ते पदाताश्च पदातिभिः ॥ ३० ॥
रणभूमिमें कितने ही रथी और पैदल योद्धा शत्रुके सामने आते और कितने ही पीठ दिखाकर भागने लगते थे। उस समय उन रथियोंको रथी और पैदलोंको पैदल योद्धा सामने आकर रोक लेते थे ॥ ३० ॥

तेषां रथानां तुमुलः स शब्दः शब्दवाहिनाम्।
बभूवाथ प्रसक्तानां नभसीव पयोमुचाम् ॥ ३१ ॥
घरघराहटकी आवाजके साथ आगे बढ़नेवाले उन रथियोंके रथोंका तुमुल नाद आकाशमे परस्पर टकरानेवाले बादलोंकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ता था ॥ ३१ ॥

बभञ्जिरे रथान् केचित् केचित् सम्मृदिता रथैः।
सम्बाधमेके सम्प्राप्य न शेकुश्चलितुं रथाः ॥ ३२ ॥
कितने ही रथोंने विपक्षियोंके रथोंको तोड़ डाल और कितने ही शत्रुपक्षके रथोंसे रौंदे जाकर धूलमें मिल गये। दूसरे बहुत-से रथ अन्यान्य रथोंद्वारा मार्ग अवरुद्ध हो जानेके कारण आगे बढ़नेमें असमर्थ हो गये ॥ ३२ ॥

अन्योन्यस्याभिसमरे दोर्भ्यामुत्क्षिप्य दर्पिताः।
संहादमानाभरणा जघ्नुस्तत्रासिचर्मिणः ॥ ३३ ॥
कितने ही दर्पमें भरे हुए योद्धा समराङ्गणमें एक दूसरेके शरीरको अपनी दोनों भुजाओंमें दूर हटाकर आगे बढ़ जाते थे। वहाँ ढाल ओर तलवार लिये हुए सैनिक जब शत्रुपर प्रहार करते थे, उस समय उनके आभूषण झंकृत हो उठते थे ॥ ३३ ॥

अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना रक्तं वेमुर्हता युधि।
क्षरज्जालानां सदृशा जलदानां समागमे ॥ ३४ ॥
दूसरे बहुत-से सिपाही, जो युद्धस्थलमें मारे जाकर अस्त्रों-से विदीर्ण हो गये थे, उसी प्रकार रक्त वमन करते थे, जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी घटाएँ घिर आनेपर वर्षा करनेवाले बादल जलकी धारा गिराते हैं ॥ ३४ ॥

तदस्त्रशस्त्रग्रथितं क्षिप्तोत्क्षिप्तगदाविलम्।
देवदानवसंक्षुब्धं संकुलं युद्धमाबभौ ॥ ३५ ॥
वह संग्राम अस्त्र-शस्त्रोंसे गुँथ गया था, दोनों ओरसे फेंकी और उछाली जानेवाली गदाओंसे मलिन हो रहा था तथा देवता और दानवोंके क्षोभसे व्याप्त होकर अत्यन्त भयानक प्रतीत होता था ॥ ३५ ॥

तद् दानवमहामेघं देवायुधतडित्प्रभम्।
अन्योन्यबाणवर्षं तद् युद्धं दुर्दिनमाबभौ ॥ ३६ ॥
वह युद्ध एक दुर्दिनके समान जान पड़ता था। उसमें दानव ही महान् मेघोंकी घटाके समान घिर आये थे, देवताओं-के चमकीले अस्त्र-शस्त्र विद्युत्की-सी प्रभा बिखेर रहे थे तथा दोनों दलोंकी ओरसे एक दूसरेपर जो बाणोंकी बौछार हो रही थी, वही मानो वर्षा थी ॥ ३६ ॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः कालनेमिर्महासुरः।
व्यवेद्धत समुद्रौघैः पूर्यमाण इवाम्बुदः ॥ ३७ ॥
इसी बीचमें कुपित हुआ महान् असुर कालनेमि समुद्रकी जलराशिसे परिपूर्ण होकर बढ़नेवाले मेघके समान अपना विशाल रूप प्रकट करने लगा ॥ ३७ ॥

तस्य विद्युच्चलापीडाः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः।
गात्रे नगशिरःप्रख्या विनिपेतुर्वलाहकाः ॥ ३८ ॥
मस्तकपर बिजलीके चञ्चल आभूषण धारण किये, प्रज्वलित वज्रकी वर्षा करनेवाले, पर्वतशिखरोंके समान विशालकाय बादल उसके शरीरसे टकराकर चूर-चूर हो जाते थे ॥ ३८ ॥

क्रोधात्रिःश्वसतस्तस्य भ्रूभेदस्वेदवर्षिणः।
साग्निनिष्पेषपवना मुखाद्विनिश्चेरुरर्चिषः ॥ ३९ ॥
जब वह क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचता था, उस समय उसकी भौंहोंमें बल पड़नेसे पसीनेकी बूँदें टपकने लगती थीं

१७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

और मुखसे वज्र तथा प्रचण्ड वायुसे युक्त आगकी लपटें निकलती रहती थीं॥ ३९॥

तिर्यगूर्ध्वं च गगने ववृधुस्तस्य बाहवः।
पञ्चास्याः कृष्णवपुषो लेलिहाना इवोरगाः॥ ४०॥

उसकी भुजाएँ आकाशमें तिरछी और ऊपरकी दिशामें बढ़ने लगीं। वे ऐसी जान पड़ती थीं, मानो पाँच मुखवाले काले सर्प अपनी जीभ लपलपा रहे हों॥ ४०॥

सोऽस्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिघैरपि।
दिव्यैराकाशमावव्रे पर्वतैरुच्छ्रितैरिव॥ ४१॥

जैसे ऊँचे पर्वत आकाशको घेर लेते हैं, उसी प्रकार उसके चलाये हुए नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र-शस्त्र, धनुष और परिघोंने व्योम-मार्गको ढक दिया॥ ४१॥

सोऽनिलोद्धूतवसनस्तस्थौ संग्राममूर्धनि।
संध्यातपग्रस्तशिखः सार्चिर्मेरुरिवापरः॥ ४२॥

वह युद्धके मुहानेपर खड़ा था और वायुके वेगसे उसके वस्त्र ऊपरकी ओर फहरा रहे थे। उस समय वह संध्याकालकी धूपसे व्याप्त शिखरवाले प्रकाशयुक्त दूसरे मेरुके समान शोभा पाता था॥ ४२॥

ऊरुवेगप्रतिक्षिप्तैः शैलशृङ्गाग्रपादपैः।
अपातयद् देवगणान् वज्रेणेव महागिरीन्॥ ४३॥

अपनी जाँघोंके वेगसे फेंके गये शैल-शिखरों और बड़े-बड़े वृक्षोंद्वारा वह देवताओंको उसी तरह धराशायी करने लगा, जैसे इन्द्रने वज्रसे महान् पर्वतोंको पृथ्वीपर गिरा दिया था॥ ४३॥

बाहुभिः शस्त्रनिस्त्रिंशैश्छिन्नभिन्नशिरोरसः।
न शेकुश्चलितुं देवाः कालनेमिहता युधि॥ ४४॥

उस युद्धमें कालनेमिकी मार खाकर घायल हुए देवता चलने-फिरनेकी भी शक्ति खो बैठे। उसकी भुजाओंके आघात-से तथा शस्त्रों एवं खड्गोंकी चोटसे उनके मस्तक और वक्षः-स्थल छिन्न-भिन्न हो गये थे॥ ४४॥

मुष्टिभिर्निहताः केचित् केचिच्च विदलीकृताः।
यक्षगन्धर्वपतयः पेतुः सह महोरगैः॥ ४५॥

कितने ही यक्ष, गन्धर्वराज और बड़े-बड़े नाग उसके मुक्कोंकी मारसे मर गये और कितने ही विदीर्ण होकर पृथ्वी-पर गिर पड़े॥ ४५॥

तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना।
न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि प्रतिकर्तुं विचेतसः॥ ४६॥

उस युद्धमें कालनेमिने देवताओंको इतना भयभीत कर दिया कि वे अपनी सुध-बुध खो बैठे और बहुत यत्न करके भी उसका कोई प्रतीकार न कर सके॥ ४६॥

तेन शक्रः सहस्राक्षः स्तम्भितः शरबन्धनैः।
ऐरावतगतः संख्ये चलितुं न शशाक ह॥ ४७॥

उसने रणभूमिमें ऐरावतपर बैठे हुए सहस्रनेत्रधारी इन्द्रको बाणोंके बन्धनसे बाँधकर स्तब्ध कर दिया। वे वहाँसे चलनेमें भी असमर्थ हो गये॥ ४७॥

निर्जलाम्भोदसदृशो निर्जलार्णवसप्रभः।
निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो वरुणो मृधे॥ ४८॥

समराङ्गणमें कालनेमिने वरुणका पाश छीनकर उन्हें उससे वञ्चित कर दिया; अतः उनका युद्धविषयक सारा व्यापार ठप हो गया। वे निर्जल बादल और बिना पानीके समुद्रकी भाँति श्रीहीन हो गये॥ ४८॥

रणे वैश्रवणस्तेन परिघैः कालरूपिभिः।
व्यलपल्लोकपालेशस्त्याजितो धनदक्रियाम्॥ ४९॥

उस रणक्षेत्रमें उसके कालरूपी परिघोंकी मार खाकर लोकपालेश्वर कुबेर विलाप करने लगे। उसने उनसे धनाध्यक्ष कुबेरके कार्यका बलपूर्वक त्याग करा दिया॥ ४९॥

यमः सर्वहरस्तेन दण्डप्रहरणो रणे।
याम्यामवस्थां समरे नीतः स्वां दिशमाविशत्॥ ५०॥

सबके प्राण लेनेवाले दण्डधारी यमको भी उसने रणभूमि-में याम्यदशा (अचेतनावस्था) को पहुँचा दिया, अतः वे भयभीत होकर अपनी दक्षिण दिशामें घुस गये॥ ५०॥

स लोकपालानुत्साद्य कृत्वा तेषां च कर्म तत्।
दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धा विदधे तदा॥ ५१॥

इस प्रकार समस्त लोकपालोंको दूर भगाकर उसने उन सबके कार्यका सम्पादन अपने हाथमे ले लिया और सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थापित करनेके लिये अपने शरीरको चार प्रकार-का बना लिया॥ ५१॥

स नक्षत्रपथं गत्वा दिव्यं स्वर्भानुदर्शितम्।
जहार लक्ष्मीं सोमस्य तं चास्य विषयं महत्॥ ५२॥

उसने राहुके दिखाये हुए दिव्य नक्षत्रपथमे जाकर राजा सोमकी राजलक्ष्मी तथा उनके विशाल राज्यका भी अपहरण कर लिया॥ ५२॥

चालयामास दीप्तांशुं स्वर्गद्वारात् स भास्करम्।
सायनं चास्य विषयं जहार दिनकर्म च॥ ५३॥

उसने उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यको स्वर्गद्वारसे हटा दिया तथा अयनसहित उनके सारे राज्य और दिन-सम्बन्धी कर्मको भी उनसे छीनकर अपने अधिकारमे कर लिया॥ ५३॥

सोऽग्निं देवमुखे दृष्ट्वा चकारात्ममुखे स्वयम्।
वायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम्॥ ५४॥

कालनेमिने अग्निको देवताओंके मुखमे स्थित देख

हरिवंशपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः १७९


स्वयं बलपूर्वक उन्हें अपने मुखमें स्थापित किया और वायुको भी वेगसे पराजित करके अपनी आज्ञाके अधीन कर लिया ॥ ५४ ॥

ससमुद्राः समानीय सर्वाश्च सरितो बलात् । चकारात्मवशे वीर्याद् देहभूताश्च सिन्धवः ॥ ५५ ॥

समुद्रोंसहित सम्पूर्ण सरिताओंको बलपूर्वक ले आकर कालनेमिने अपने पराक्रमसे उन सबको वशमें कर लिया । समस्त सागर उसके शरीररूप हो गये थे ॥ ५५ ॥

अपः खवशगाः कृत्वा दिविजा याश्च भूमिजाः । स्थापयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः ॥ ५६ ॥

उसने आकाश और पृथ्वीके जलको अपने वशमें करके उसके ऊपर पर्वतोंद्वारा सुरक्षित पृथ्वीको स्थापित किया ॥ ५६ ॥

स स्वयम्भूरिवाभाति महाभूतपतिर्महान् । सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वलोकभयावहः ॥ ५७ ॥

समस्त लोकोंको भय देनेवाला वह महान् दैत्य पञ्च-महाभूतोंका अधिपति एवं सर्वलोकमय होकर स्वयम्भू ब्रह्माके समान शोभा पाने लगा ॥ ५७ ॥

स लोकपालैकवपुश्चन्द्रसूर्यग्रहात्मवान् । पावकानिलसंघातो रराज युधि दानवः ॥ ५८ ॥

उस युद्धस्थलमें दानव कालनेमि एकमात्र स्वयं ही समस्त लोकपालोंके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ था । चन्द्रमा, सूर्य और अन्य ग्रह सबके रूपमें उसका शरीर ही काम कर रहा था । अग्नि और वायु भी उसके शरीर बन गये थे, इस प्रकार उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ५८ ॥

पारमेष्ठ्ये स्थितः स्थाने लोकानां प्रभवाप्यये । तुष्टुवुस्तं दैत्यगणा देवा इव पितामहम् ॥ ५९ ॥

समस्त लोकोंकी उत्पत्ति और प्रलयके कारणभूत ब्रह्म-लोकमें स्थित होकर वह ब्रह्मा बन बैठा था । उस समय दैत्यगण उसकी उसी तरह स्तुति करते थे, जैसे देवता ब्रह्माकी करते हैं ॥ ५९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्चर्यतारकामये सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्चर्यतारकामय संग्रामविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥


अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

कालनेमि और भगवान् विष्णुका संवाद, श्रीविष्णुद्वारा कालनेमिका वध तथा देवताओंको आश्वासन देकर ब्रह्मलोकको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच पञ्च तं नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्मणा । वेदो धर्मः क्षमा सत्यं श्रीश्च नारायणप्रिया ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! कालनेमिके द्वारा शास्त्रविपरीत कर्म किये जानेके कारण वेद, धर्म, क्षमा, सत्य और भगवान् नारायणके आश्रयमें रहनेवाली लक्ष्मी—ये पाँचों उसके पास नहीं आये ॥ १ ॥

स तेषामनुपस्थानात् संक्रोधो दानवेश्वरः । वैष्णवं पदमन्विच्छन् ययौ नारायणान्तिकम् ॥ २ ॥

उनके उपस्थित न होनेसे दानवराज कालनेमिको बड़ा क्रोध हुआ । वह भगवान् विष्णुके पद एवं वैकुण्ठधामको अपने अधीन कर लेनेकी इच्छासे उन श्रीनारायणदेवके निकट गया ॥ २ ॥

स ददर्श सुपर्णस्थं शङ्खचक्रगदाधरम् । दानवानां विनाशाय भ्रामयन्तं गदां शुभाम् ॥ ३ ॥

उसने देखा—शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायण गरुड़्की पीठपर विराजमान हैं और दानवोंका विनाश करनेके लिये अपनी कल्याणमयी कौमोदकी गदाको घुमा रहे हैं ॥ ३ ॥

सजलाम्भोधरसद्शं विद्युत्सदृशवाससम् । स्वारूढं स्वर्णपत्राढ्यं शिखिनं काश्यपं खगम् ॥ ४ ॥

उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति सजल जलधरके समान श्याम है । उनपर विद्युत्‌की-सी दीप्तिसे दमकता हुआ रेशमी पीताम्बर शोभा पा रहा है । वे भगवान् विष्णु जिन कश्यप-कुमार आकाशचारी गरुड़पर आरूढ़ हैं, उनके दोनों पंख सुवर्णके समान सुशोभित हैं और मस्तकपर शिखा शोभा दे रही है ॥ ४ ॥

दृष्ट्वा दैत्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थितम् । दानवो विष्णुमक्षोभ्यं बभाषे क्षुब्धमानसः ॥ ५ ॥

जिन्हें कोई भी क्षोभमें नहीं डाल सकता, उन भगवान् विष्णुको दैत्योंके विनाशके लिये रणक्षेत्रमें स्वस्थभावसे खड़ा देख दानव कालनेमिका हृदय क्षोभसे भर गया और वह इस प्रकार कहने लगा—॥ ५ ॥

१८०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

अयं स रिपुरस्माकं पूर्वेषां दानवर्षिणाम्।
अर्णवावासिनश्चैव मधोर्वै कैटभस्य च ॥ ६ ॥
'यही हमारे पूर्ववर्ती दानवर्षियोंका तथा एकार्णववासी मधु एवं कैटभका सुप्रसिद्ध शत्रु है ॥ ६ ॥

अयं स विग्रहोऽस्माकमशाम्यः किल कथ्यते।
येन नः संयुगेष्वाद्या बहवो दानवा हताः ॥ ७ ॥
'कहते हैं, यही हमलोगोंका वह मूर्तिमान् विग्रह (युद्ध) है, जिसे शान्त करना सर्वथा असम्भव है। इसने अनेक संग्रामोंमें हमारे बहुत-से पूर्वज दानवोंका वध किया है॥ ७॥

अयं स निर्घृणो युद्धेऽस्त्री वालनिरपत्रपः।
येन दानवनारीणां सीमन्तोद्धरणं कृतम् ॥ ८ ॥
'यह वही निर्दयी है, जो युद्धमे अस्त्र धारण करके बालकोंके समान निर्लज्ज होता है। इसीने दानवनारियोंके सीमन्तका सौभाग्यचिह्न सदाके लिये उतार दिया है ॥ ८ ॥

अयं स विष्णुर्देवानां वैकुण्ठश्च दिवौकसाम् ।
अनन्तो भोगिनामप्सु स्वयम्भूश्च स्वयम्भुवः ॥ ९ ॥
'यही वह देवताओंका पक्षपाती विष्णु और स्वर्गवासियोंका वैकुण्ठ है। यही जलमे रहनेवाले सर्पोंका अनन्त और स्वयम्भू ब्रह्माका भी ब्रह्मा है ॥ ९ ॥

अयं स नाथो देवानामास्माकं विप्रिये स्थितः ।
अस्य क्रोधेन महता हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ १० ॥
'यही वह देवताओंका रक्षक है, जो सदा हमारा अप्रिय करनेमें ही लगा रहता है। इसीके महान् क्रोधसे दैत्यराज हिरण्यकशिपु मारे गये थे ॥ १० ॥

अस्यच्छायां समासाद्य देवा मखमुखे स्थिताः ।
आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवन्ति त्रिधा हुतम् ॥ ११ ॥
'इसीकी छायामे रहकर देवता यज्ञके मुखभागमे स्थित हो महर्षियोंद्वारा तीन प्रकारसे हवन करके अर्पित किये गये हविष्यका उपभोग करते हैं ॥ ११ ॥

अयं स निधने हेतुः सर्वेषां देवविद्विषाम् ।
यस्य तेजःप्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे ॥ १२ ॥
'यही समस्त देवद्रोही दैत्योंकी मृत्युमे प्रधान कारण है। समराङ्गणमे हमारे कितने ही कुल इसके तेजमें प्रविष्ट होकर भस्म हो गये ॥ १२ ॥

अयं स किल युद्धेषु सुरार्थे त्यक्तजीवितः ।
सवितुस्तेजसा तुल्यं चक्रं क्षिपति शत्रुपु ॥ १३ ॥
'कहते हैं, यह वही सुविख्यात विष्णु है, जो युद्धमें देवताओंके लिये अपना जीवन निछावर किये रहता है। यह शत्रुओंपर सूर्यके समान तेजस्वी चक्र चलाया करता है ॥ १३ ॥

अयं स कालो दैत्यानां कालभूते मयि स्थिते।
अतिक्रान्तस्य कालस्य फलं प्राप्स्यति दुर्मतिः ॥ १४ ॥
'यही वह दैत्योंका काल है, परंतु आज इसका भी काल होकर मैं खड़ा हूँ। मेरे रहते हुए ही यह दुर्बुद्धि अपने पूर्व कालकी करतूतोंका फल पायेगा ॥ १४ ॥

दिष्ट्येदानीं समक्षं मे विष्णुरेय समागतः ।
अद्य मद्द्वाणनिष्पिष्टो मामेव प्रणमिष्यति ॥ १५ ॥
'सौभाग्यकी बात है कि इस समय यह विष्णु मेरे सामने आ गया। आज यह मेरे बाणोंसे पिस जायगा और धरतीपर गिरकर मुझे ही प्रणाम करेगा ॥ १५ ॥

यास्याम्यपचितिं दिष्ट्या पूर्वेषामद्य संयुगे ।
इमं नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम् ॥ १६ ॥
क्षिप्रमेव वधिष्यामि रणे नारायणाश्रितान् ।
'आज समराङ्गणमे दानवोंको भय देनेवाले इस नारायणका वध करके मैं शीघ्र ही इसके आश्रित रहनेवाले देवताओंका भी संहार कर डालूँगा। ऐसा करके अपने पूर्वजोंके ऋणसे उऋण हो सकूँगा, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात होगी ॥ १६½ ॥

जात्यन्तरगतोऽप्येष मृधे बाधति दानवान् ॥ १७ ॥
एषोऽनन्तः पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति स्मृतः ।
जघनैकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ ।
विनिवेश्य स्वके ऊरौ निहतौ दानवेश्वरौ ॥ १८ ॥
'(मत्स्य, वराह आदि) दूसरी-दूसरी योनियोंमें जन्म धारण करके भी यह युद्धमें दानवोंको ही सताया करता है। यद्यपि यह अनन्त (आकाशकी भाँति असीम एवं व्यापक) है तो भी पूर्वकालमे मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उस समय इसकी पद्मनाम नामसे प्रसिद्धि हुई ; इसने भयंकर एकार्णवमे विचरनेवाले दोनों भाई दानवराज मधु और कैटभको अपनी जाँघपर सुलाकर मार डाला था ॥ १७-१८ ॥

द्विधाभूतं वपुः कृत्वा सिंहार्धं नरसंस्थितम् ।
पितरं मे जघानेको हिरण्यकशिपुं पुरा ॥ १९ ॥
'इसीने पूर्वकालमे आधे नर और आधे सिंहके रूपमे दो प्रकारका शरीर धारण करके अकेले ही मेरे पिता हिरण्यकशिपुका वध किया था ॥ १९ ॥

शुभं गर्भमधत्तेममद्रितिर्देवतारणिः ।
यज्ञकाले बलेर्यो वै कृत्वा वामनरूपताम् ।
त्रींल्लोकानाजहारैकः क्रममाणस्त्रिभिः क्रमैः ॥ २० ॥
'जो देवतारूपी अग्निको प्रकट करनेके लिये अरणिके-


१. अङ्ग होम, प्रधान होम और प्रायश्चित्त होम—ये होमके तीन प्रकार हैं । कुछ लोग नित्य, नैमित्तिक और काम्य भेदसे उसे तीन प्रकारका बताते हैं। कुछ दूसरे विद्वान् आह्वनीय, गार्हपत्य तथा दक्षिणाग्नि रूप उपाधिके भेदसे उसकी त्रिविधताका प्रतिपादन करते हैं।

हरिवंशपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः [ १८४


समान हैं, उन अदिति देवीने शुभ गर्भके रूपमें इसे धारण किया था। वही गर्भ बलिके यज्ञके समय अपनेको वामनरूपमें प्रगट करके आया। उस समय इसने अकेले ही तीन पगोंसे तीनों लोकोंको नापकर उन्हें बलिके अधिकारसे छीन लिया ॥ २० ॥

भूयस्त्विदानीं समरे सम्प्राप्ते तारकामये।
मया सह समागम्य सह देवैर्विनङ्क्ष्यति ॥ २१ ॥

'अब पुनः इस समय इस तारकामय संग्रामका अवसर प्राप्त होनेपर इसने पदार्पण किया है; किंतु अब मेरे साथ भिड़कर यह देवताओंसहित नष्ट हो जायगा' ॥ २१ ॥

स एवमुक्त्वा बहुधा क्षिपन्नारायणं रणे।
वाग्भिरप्रतिरूपाभिर्युद्धमेवाभ्यरोचयत् ॥ २२ ॥

ऐसा कहकर रणभूमिमे भगवान् नारायणपर अयोग्य वचनोंद्वारा नाना प्रकारके आक्षेप करते हुए कालनेमिने उनके साथ युद्ध करना ही पसंद किया ॥ २२ ॥

क्षिप्यमाणोऽसुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः।
क्षमाबलेन महता सस्मितं वाक्यमब्रवीत् ॥ २३ ॥

असुरराज कालनेमिके इस प्रकार आक्षेप करनेपर भी भगवान् गदाधरने उसपर क्रोध नहीं किया; क्योंकि वे महान् क्षमाबलसे सम्पन्न थे। उन्होंने मुसकराते हुए कहा—॥ २३ ॥

अल्पदर्पबलो दैत्य स्थितः क्रोधादसद्वदन् ।
हतस्त्वमात्मनो दोषैः क्षमां योऽतीत्य भाषसे ॥ २४ ॥

'दैत्य ! तुझमें दर्प और बल तो बहुत थोड़ा है, किंतु तू क्रोधके कारण ओछी बातें बकता हुआ यहाँ खड़ा है। अरे ! तू क्षमा अथवा सहनशीलताका उल्लङ्घन करके बढ़-बढ़कर बातें बना रहा है, इसलिये अपने ही दोषोंसे मारा जा चुका है ॥ २४ ॥

अधमस्त्वं मम मतो धिगेतत् तव वाग्बलम् ।
न तत्र पुरुषाः सन्ति यत्र गर्जन्ति योषितः ॥ २५ ॥

'मेरे विचारसे तो तू अधम है ! तेरे इस वाग्बलको धिक्कार है। अरे ! जहाँ पुरुष न हों, केवल स्त्रियाँ ही हों, वहाँ लोग इस तरहकी गर्जना करते हैं, जहाँ वीर पुरुष हों वहाँ नहीं (क्योंकि वहाँ गर्जना करनेसे वे उन वीर पुरुषोंद्वारा मार डाले जाते हैं) ॥ २५ ॥

अहं त्वां दैत्य पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम् ।
प्रजापतिकृतं सेतुं को भित्त्वा स्वस्तिमान् भवेत् ॥ २६ ॥

'दैत्य ! मैं तो देखता हूँ—तू अपने पूर्वजोंके ही मार्गपर जानेवाला है। भला ! प्रजापतिद्वारा नियत की हुई मर्यादाको भङ्ग करके कौन सकुशल रह सकता है ॥ २६ ॥

अद्य त्वां नाशयिष्यामि देवव्यापारकारकम् ।
स्वेषु स्वेषु च स्थानेषु स्थापयिष्यामि देवताः ॥ २७ ॥

'तू दानव होकर देवताओंका कार्य व्यर्थ कर रहा है—तूने उनका अधिकार उनसे छीन लिया है, इसलिये आज मैं तेरा विनाश कर डालूँगा और देवताओंको पुनः अपने-अपने स्थानों (पदों) पर स्थापित कर दूँगा' ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवति तद् वाक्यं मृधे श्रीवत्सधारिणि ।
जहास दानवः क्रोधाद्धस्तांश्चक्रे च सायुधान् ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न धारण करनेवाले भगवान् नारायण जब उस रणभूमिमें ऐसी बातें कह रहे थे, उस समय वह दानव वहाँ क्रोधपूर्वक हँसने लगा। उसने तुरंत ही अपने हाथोंमें हथियार ले लिये ॥ २८ ॥

स बाहुशतमुद्यम्य सर्वास्त्रग्रहणं रणे ।
क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो विष्णुं वक्षस्यताडयत् ॥ २९ ॥

उसने समरभूमिमें सब प्रकारके अस्त्रोंको ग्रहण करनेवाली अपनी सौ भुजाओंको ऊपर उठाकर भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें प्रहार किया। उस समय उनकी आँखें क्रोधके कारण दुगुनी लाल हो रही थीं ॥ २९ ॥

दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमाः ।
उद्यतायुधनिस्त्रिंशा दृष्ट्वा विष्णुमथाद्रवन् ॥ ३० ॥

मय और तार आदि दानव भी रणभूमिमें भगवान् विष्णुको उपस्थित देख हाथोंमें भाँति-भाँतिके आयुध और तलवार लिये उनकी ओर दौड़े ॥ ३० ॥

स ताड्यमानोऽतिबलैर्दैत्यैः सर्वायुधोद्यतैः ।
न चचाल हरिर्युद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः ॥ ३१ ॥

सब प्रकारके आयुध लेकर उद्यत हुए अत्यन्त बलशाली दैत्योंके प्रहार करनेपर भी भगवान् श्रीहरि युद्धभूमिमें कभी कम्पित न होनेवाले पर्वतके समान विचलित नहीं हुए (अविचल भावसे खड़े रहे) ॥ ३१ ॥

संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः ।
सर्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्य बाहुभिः ॥ ३२ ॥
मुमोच ज्वलितां घोरां संरब्धो गरुडोपरि ।
कर्मणा तेन दैत्यस्य विष्णुर्विस्मयमागतः ॥ ३३ ॥

इतनेहीमें महान् असुर कालनेमि गरुड़के साथ उलझ गया। उसने अपनी भुजाओंद्वारा सारी शक्ति लगाकर एक विशाल गदा उठायी, जो तेजसे प्रज्वलित हो रही थी। उस भयंकर गदाको उसने रोषमें भरकर गरुड़पर छोड़ दिया। उस दैत्यके इस कर्मसे भगवान् विष्णुको भी बड़ा विस्मय हुआ ॥ ३२-३३ ॥

१८२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


यदा तस्य सुपर्णस्य पतिता मूर्ध्नि सा गदा । तदाऽऽगमत् पद्भ्यां भूमिं पक्षी व्यथितविग्रहः ॥ ३४ ॥

जिस समय गरुड़के मस्तकपर वह गदा गिरी, उस समय वह पंजोंके बलसे पृथ्वीपर आकर टिक गये। उनका सारा शरीर व्यथित हो गया था ॥ ३४ ॥

सुपर्णं व्यथितं दृष्ट्वा क्षतं च वपुरात्मनः । क्रोधात् संरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे ॥ ३५ ॥

गरुड़को गदाके आघातसे पीड़ित और अपने शरीरको भी क्षत-विक्षत देखकर भगवान् विष्णुके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उन्होंने चक्र हाथमें ले लिया ॥ ३५ ॥

व्यवधर्त च वेगेन सुपर्णेन समं प्रभुः । भुजाश्चास्य व्यवर्धन्त व्याप्नुवन्तो दिशो दश ॥ ३६ ॥

तदनन्तर भगवान् नारायणका वेग गरुड़के समान ही बढ़ने लगा। उनकी चारों भुजाएँ दसों दिशाओंको व्याप्त करती हुई बढ़ने लगीं ॥ ३६ ॥

स दिशः प्रदिशश्चैव खं च गां चैव पूरयन् । ववृधे स पुनर्लोकान् क्रान्तुकाम इवौजसा ॥ ३७ ॥

वे दिशाओं, अवान्तर दिशाओं, आकाश और पृथ्वीको परिपूर्ण करते हुए इस प्रकार बढ़ने लगे, मानो पुनः बलपूर्वक तीनों लोकोंको आक्रान्त करना चाहते हों ॥ ३७ ॥

तं जायय सुरेन्द्राणां वर्धमानं नभस्तले । ऋषयः सह गन्धर्वैस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३८ ॥

देवेश्वरोंकी विजयके लिये आकाशमें बढ़ते हुए उन भगवान् मधुसूदनकी गन्धर्वोंसहित ऋषि स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥

स द्यां किरीटेन लिखन् साभ्रमम्बरमम्बरैः । पद्भ्यामाक्रम्य वसुधां दिशः प्रच्छाद्य बाहुभिः ॥ ३९ ॥

वे अपने मस्तकके किरीटसे स्वर्गलोककी भूमिपर रेखा-सी खींचते, फहराते हुए वस्त्रोंद्वारा बादलोंसहित आकाशको ढकते और चारों बांहोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करते हुए अपने दोनों पैरोंसे पृथ्वीको दबाकर खड़े हो गये ॥ ३९ ॥

सूर्यस्य रश्मितुल्याभं सहस्रारमरिक्षयम् । दीप्ताग्निसदृशं घोरं दर्शनीयं सुदर्शनम् ॥ ४० ॥ सुवर्णनेमिपर्यन्तं वज्रनाभं भयावहम् । मेदोमज्जास्थिरुधिरैर्दिग्धं दानवसम्भवैः ॥ ४१ ॥ अद्वितीयं प्रहारेषु क्षुरपर्यन्तमण्डलम् । स्रग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम् ॥ ४२ ॥ स्वयं स्वयम्भुवा सृष्टं भयदं सर्वविद्विषाम् । महर्षिरोषैराविष्टं नित्यमाहवदर्पितम् ॥ ४३ ॥ क्षेपणाद् यस्य मुह्यन्ति लोकाःसस्थाणुजङ्गमाः । क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महाहवे ॥ ४४ ॥ तमप्रतिमकर्माणं समानं सूर्यवर्चसा । चक्रमुद्यम्य समरे क्रोधदीप्तो गदाधरः ॥ ४५ ॥

जिसकी प्रभा सूर्यकी किरणोंके समान उद्भासित होती है, जिसमें एक सहस्र अरे लगे हुए हैं, जो शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ है, जिसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बताया गया है, जो भयंकर होनेपर भी दर्शनीय है, इसीलिये जिसे सुदर्शन कहते हैं, जिसके किनारेपर सुवर्णमयी नेमि (हाल) लगी हुई है, जिसकी नाभि वज्रके समान सुदृढ़ है, जो शत्रुओंको भय देनेवाला है, दानवोंके मेद, मज्जा, अस्थि तथा रुधिरसे जिसकी पुष्टि हुई है, जो प्रहारके साधनोंमें अद्वितीय (अनुपम) है, उसके प्रान्तभागमें मण्डलाकार छुरे लगे हुए हैं, जो फूल-मालाकी लड़ियोंके समान विस्तृत है, इच्छानुसार चलने और मनमाना रूप धारण करनेमें समर्थ है, समस्त शत्रुओंको भय देनेवाले जिस दिव्य अस्त्रकी साक्षात् ब्रह्माजीने सृष्टि की है, अत्याचारी असुरोंके प्रति महर्षियोंके मनमें जो रोष होते हैं, उनसे जो सदा आविष्ट रहता है, युद्धके अवसरोंपर जो दर्पसे भरा होता है, जिसके प्रहारसे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोक मोहमें पड़ जाते हैं और महासमरमें जिसके प्रभावसे मांसभक्षी प्राणियोंको तृप्ति प्राप्त होती है, उस अनुपम कर्म करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रको हाथमें उठाकर भगवान् गदाधर समराङ्गणमें क्रोधसे उद्दीप्त हो उठे ॥ ४०--४५ ॥

सम्मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा । चिच्छेद बाहूं चक्रेण श्रीधरः कालनेमिनः ॥ ४६ ॥

लक्ष्मीको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले श्रीहरिने समरभूमि-में अपने तेजसे दानवोंके तेजका अपहरण करके उस चक्रसे कालनेमिकी भुजाओंको काट डाला ॥ ४६ ॥

तच्च वक्त्रशतं घोरं साग्निकूर्णाट्टहासिनम् । तस्य दैत्यस्य चक्रेण प्रममाथ बलाद्धरिः ॥ ४७ ॥

साथ ही जिनके अट्टहास करनेपर अग्निचूर्ण प्रकट होते थे, उस दैत्यके उन सौ भयंकर मुखोंको भी भगवान् विष्णुने उस चक्रके द्वारा बलपूर्वक मथ डाला ॥ ४७ ॥

स छिन्नबाहुर्विशिरा न प्राकम्पत दानवः । कबन्धोऽवस्थितः संख्ये विशाख इव पादपः ॥ ४८ ॥

भुजाओं और मस्तकोंके कट जानेपर भी वह दानव कम्पित नहीं हुआ। उसका धड़ युद्धस्थलमें शाखारहित वृक्ष-के समान खड़ा रहा ॥ ४८ ॥

तं वितत्य महापक्षी वायोः कृत्वा समं जवम् । उरसा पातयामास गरुडः कालनेमिनम् ॥ ४९ ॥

तब महापक्षी गरुड़ने अपने पंख फैलाकर वायुके समान

हरिवंशपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः १८३


वेग प्रकट करके कालनेमिको अपनी छातीके धक्केसे गिरा दिया ॥ ४९ ॥
सतस्य देहो विमुखो विशाखः खात् परिभ्रमन् ।
निपपात दिवं त्यक्त्वा क्षोभयन् धरणीतलम् ॥ ५० ॥
उसका वह मस्तक और भुजाओंसे रहित शरीर स्वर्गलोकको त्यागकर आकाशसे चक्कर काटता और भूतलको क्षुब्ध करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ५० ॥
तस्मिन्निपतिते दैत्ये देवाः सर्षिगणास्तदा ।
साधु साध्विति वैकुण्ठं समेताः प्रत्यपूजयन् ॥ ५१ ॥
उस दैत्यके धराशायी होनेपर ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता साधु-साधु कहते हुए वहाँ आये और भगवान् विष्णुकी पूजा एवं प्रशंसा करने लगे ॥ ५१ ॥
अपरे ये तु दैत्या वै युद्धे दुष्टपराक्रमाः ।
ते सर्वे बाहुभिर्व्याप्ता न शेकुश्चलितुं रणे ॥ ५२ ॥
उसके सिवा जो दूसरे दुष्ट पराक्रमी दैत्य थे, वे सब भगवान् विष्णुकी भुजाओंसे अवरुद्ध होकर रणभूमिमें हिल-डुल भी न सके ॥ ५२ ॥
कांश्चित्केशेषु जग्राह कांश्चित्कण्ठेऽभ्यपीडयत् ।
पाटयामास कस्यचिद् वक्त्रं मध्ये कांश्चिदथाग्रहीत् ॥ ५३ ॥
भगवान्ने किन्हींके केश पकड़कर उन्हें टाँग लिया, किन्हींके गले दबा दिये, किन्हींके मुख फाड़ दिये और कुछ दैत्योंकी कमर पकड़कर तोड़ डाली ॥ ५३ ॥
ते गदाचक्रनिर्दग्धा गतसत्त्वा गतासवः ।
गगनाद् भ्रष्टसर्वाङ्गा निपेतुर्धरणीतले ॥ ५४ ॥
वे दैत्य गदा और चक्रके तेजसे दग्ध हो अपने धैर्य और प्राण खो बैठे । उनके सारे अङ्ग आकाशसे भ्रष्ट होकर भूतलपर गिर पड़े ॥ ५४ ॥
तेषु सर्वेषु दैत्येषु हतेषु पुरुषोत्तमः ।
तस्थौ शक्रप्रियं कृत्वा कृतकर्मा गदाधरः ॥ ५५ ॥
उन सब दैत्योंके मारे जानेपर इन्द्रका प्रिय करके कृतकृत्य हुए गदाधारी भगवान् पुरुषोत्तम वहाँ चुपचाप खड़े हो गये ॥ ५५ ॥
तस्मिन् विमर्दे निर्वृत्ते संग्रामे तारकामये ।
तं देशमाजगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५६ ॥
सर्वैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं गन्धर्वैः साप्सरोगणैः ।
देवदेवो हरिं देवं पूजयन् वाक्यमब्रवीत् ॥ ५७ ॥
तारकामय संग्रामकी वह मार-काट समाप्त होनेपर देवाधिदेव लोकपितामह ब्रह्मा समस्त ब्रह्मर्षियों, गन्धर्वों और अप्सराओंके साथ शीघ्र ही उस प्रदेशमें आ पहुँचे और श्रीनारायणदेवकी पूजा करते हुए बोले ॥ ५६-५७ ॥

ब्रह्मोवाच
कृतं देव महत्कर्म सुराणां शल्यमुद्धृतम् ।
वधेनानेन दैत्यानां वयं हि परितोषिताः ॥ ५८ ॥
ब्रह्माजीने कहा—देव ! आपने यह बहुत बड़ा कार्य किया। देवताओंका काँटा निकालदिया। दैत्योंके इस वधसे हमें बड़ा संतोष हुआ है ॥ ५८ ॥
योऽयं हतस्त्वया विष्णो कालनेमी महासुरः ।
त्वमेकोऽस्य मृधे हन्ता नान्यः कश्चन विद्यते ॥ ५९ ॥
विष्णो ! आपके द्वारा जो यह कालनेमि नामक महान् असुर मारा गया है, इसे एकमात्र आप ही युद्धमें मार सकते थे; दूसरा कोई ऐसा नहीं है ॥ ५९ ॥
एष देवान् परिभवँल्लोकांश्च सचराचरान् ।
ऋषीणां कदनं कृत्वा मामपि प्रतिगर्जति ॥ ६० ॥
यह देवताओं तथा चराचर प्राणियोंसहित समस्त लोकोंका तिरस्कार करता था और ऋषियोंका संहार करके मेरे सामने भी गर्जना किया करता था ॥ ६० ॥
तदनेन तवोग्रेण परितुष्टोऽस्मि कर्मणा ।
यदयं कालतुल्याभः कालनेमी निपातितः ॥ ६१ ॥
अतः आपने जो कालके समान प्रतीत होनेवाले इस कालनेमि नामक दैत्यको मार गिराया है, आपके इस उग्र पराक्रमसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ॥ ६१ ॥
तदागच्छस्व भद्रं ते गच्छाम दिवमुत्तमम् ।
ब्रह्मर्षयस्त्वां तत्रस्थाः प्रतीक्षन्ते सदोगताः ॥ ६२ ॥
इसलिये आइये, आपका कल्याण हो । अब हमलोग उत्तम दिव्य लोकको चलें । वहाँ दिव्य सभामें बैठे हुए वहाँके निवासी ब्रह्मर्षि आपकी प्रतीक्षा करते हैं ॥ ६२ ॥
अहं महर्षयश्चैव तत्र त्वां वदतां वर ।
विविधैरर्चयिष्यामो गीर्भिर्दिव्याभिरच्युत ॥ ६३ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ अच्युत ! वहाँ मैं तथा महर्षिगण दिव्य वाणीद्वारा आपकी विधिवत् अर्चना करेंगे ॥ ६३ ॥
किं चाहं तव दास्यामि वरं वरभृतां वर ।
सुरेष्वपि सदैत्येषु वराणां वरदो भवान् ॥ ६४ ॥
वर धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ नारायण ! मैं आपको क्या वर दूँगा । दैत्यों और देवताओंमें जितने भी वर (श्रेष्ठ मनोरथ) हैं, उन सबके दाता तो आप ही हैं ॥ ६४ ॥
निर्यातयैतत् त्रैलोक्यं स्फीतं निहतकण्टकम् ।
अस्मिन्नेव मृधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने ॥ ६५ ॥
विष्णो ! इस युद्धस्थलमें ही आप महात्मा इन्द्रको त्रिलोकीका यह समृद्धिशाली और अकण्टक राज्य लौटा दीजिये ॥ ६५ ॥