भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

हरिवंशपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः [ १८४


समान हैं, उन अदिति देवीने शुभ गर्भके रूपमें इसे धारण किया था। वही गर्भ बलिके यज्ञके समय अपनेको वामनरूपमें प्रगट करके आया। उस समय इसने अकेले ही तीन पगोंसे तीनों लोकोंको नापकर उन्हें बलिके अधिकारसे छीन लिया ॥ २० ॥

भूयस्त्विदानीं समरे सम्प्राप्ते तारकामये।
मया सह समागम्य सह देवैर्विनङ्क्ष्यति ॥ २१ ॥

'अब पुनः इस समय इस तारकामय संग्रामका अवसर प्राप्त होनेपर इसने पदार्पण किया है; किंतु अब मेरे साथ भिड़कर यह देवताओंसहित नष्ट हो जायगा' ॥ २१ ॥

स एवमुक्त्वा बहुधा क्षिपन्नारायणं रणे।
वाग्भिरप्रतिरूपाभिर्युद्धमेवाभ्यरोचयत् ॥ २२ ॥

ऐसा कहकर रणभूमिमे भगवान् नारायणपर अयोग्य वचनोंद्वारा नाना प्रकारके आक्षेप करते हुए कालनेमिने उनके साथ युद्ध करना ही पसंद किया ॥ २२ ॥

क्षिप्यमाणोऽसुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः।
क्षमाबलेन महता सस्मितं वाक्यमब्रवीत् ॥ २३ ॥

असुरराज कालनेमिके इस प्रकार आक्षेप करनेपर भी भगवान् गदाधरने उसपर क्रोध नहीं किया; क्योंकि वे महान् क्षमाबलसे सम्पन्न थे। उन्होंने मुसकराते हुए कहा—॥ २३ ॥

अल्पदर्पबलो दैत्य स्थितः क्रोधादसद्वदन् ।
हतस्त्वमात्मनो दोषैः क्षमां योऽतीत्य भाषसे ॥ २४ ॥

'दैत्य ! तुझमें दर्प और बल तो बहुत थोड़ा है, किंतु तू क्रोधके कारण ओछी बातें बकता हुआ यहाँ खड़ा है। अरे ! तू क्षमा अथवा सहनशीलताका उल्लङ्घन करके बढ़-बढ़कर बातें बना रहा है, इसलिये अपने ही दोषोंसे मारा जा चुका है ॥ २४ ॥

अधमस्त्वं मम मतो धिगेतत् तव वाग्बलम् ।
न तत्र पुरुषाः सन्ति यत्र गर्जन्ति योषितः ॥ २५ ॥

'मेरे विचारसे तो तू अधम है ! तेरे इस वाग्बलको धिक्कार है। अरे ! जहाँ पुरुष न हों, केवल स्त्रियाँ ही हों, वहाँ लोग इस तरहकी गर्जना करते हैं, जहाँ वीर पुरुष हों वहाँ नहीं (क्योंकि वहाँ गर्जना करनेसे वे उन वीर पुरुषोंद्वारा मार डाले जाते हैं) ॥ २५ ॥

अहं त्वां दैत्य पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम् ।
प्रजापतिकृतं सेतुं को भित्त्वा स्वस्तिमान् भवेत् ॥ २६ ॥

'दैत्य ! मैं तो देखता हूँ—तू अपने पूर्वजोंके ही मार्गपर जानेवाला है। भला ! प्रजापतिद्वारा नियत की हुई मर्यादाको भङ्ग करके कौन सकुशल रह सकता है ॥ २६ ॥

अद्य त्वां नाशयिष्यामि देवव्यापारकारकम् ।
स्वेषु स्वेषु च स्थानेषु स्थापयिष्यामि देवताः ॥ २७ ॥

'तू दानव होकर देवताओंका कार्य व्यर्थ कर रहा है—तूने उनका अधिकार उनसे छीन लिया है, इसलिये आज मैं तेरा विनाश कर डालूँगा और देवताओंको पुनः अपने-अपने स्थानों (पदों) पर स्थापित कर दूँगा' ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवति तद् वाक्यं मृधे श्रीवत्सधारिणि ।
जहास दानवः क्रोधाद्धस्तांश्चक्रे च सायुधान् ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न धारण करनेवाले भगवान् नारायण जब उस रणभूमिमें ऐसी बातें कह रहे थे, उस समय वह दानव वहाँ क्रोधपूर्वक हँसने लगा। उसने तुरंत ही अपने हाथोंमें हथियार ले लिये ॥ २८ ॥

स बाहुशतमुद्यम्य सर्वास्त्रग्रहणं रणे ।
क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो विष्णुं वक्षस्यताडयत् ॥ २९ ॥

उसने समरभूमिमें सब प्रकारके अस्त्रोंको ग्रहण करनेवाली अपनी सौ भुजाओंको ऊपर उठाकर भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें प्रहार किया। उस समय उनकी आँखें क्रोधके कारण दुगुनी लाल हो रही थीं ॥ २९ ॥

दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमाः ।
उद्यतायुधनिस्त्रिंशा दृष्ट्वा विष्णुमथाद्रवन् ॥ ३० ॥

मय और तार आदि दानव भी रणभूमिमें भगवान् विष्णुको उपस्थित देख हाथोंमें भाँति-भाँतिके आयुध और तलवार लिये उनकी ओर दौड़े ॥ ३० ॥

स ताड्यमानोऽतिबलैर्दैत्यैः सर्वायुधोद्यतैः ।
न चचाल हरिर्युद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः ॥ ३१ ॥

सब प्रकारके आयुध लेकर उद्यत हुए अत्यन्त बलशाली दैत्योंके प्रहार करनेपर भी भगवान् श्रीहरि युद्धभूमिमें कभी कम्पित न होनेवाले पर्वतके समान विचलित नहीं हुए (अविचल भावसे खड़े रहे) ॥ ३१ ॥

संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः ।
सर्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्य बाहुभिः ॥ ३२ ॥
मुमोच ज्वलितां घोरां संरब्धो गरुडोपरि ।
कर्मणा तेन दैत्यस्य विष्णुर्विस्मयमागतः ॥ ३३ ॥

इतनेहीमें महान् असुर कालनेमि गरुड़के साथ उलझ गया। उसने अपनी भुजाओंद्वारा सारी शक्ति लगाकर एक विशाल गदा उठायी, जो तेजसे प्रज्वलित हो रही थी। उस भयंकर गदाको उसने रोषमें भरकर गरुड़पर छोड़ दिया। उस दैत्यके इस कर्मसे भगवान् विष्णुको भी बड़ा विस्मय हुआ ॥ ३२-३३ ॥