विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
अयं स रिपुरस्माकं पूर्वेषां दानवर्षिणाम्।
अर्णवावासिनश्चैव मधोर्वै कैटभस्य च ॥ ६ ॥
'यही हमारे पूर्ववर्ती दानवर्षियोंका तथा एकार्णववासी मधु एवं कैटभका सुप्रसिद्ध शत्रु है ॥ ६ ॥
अयं स विग्रहोऽस्माकमशाम्यः किल कथ्यते।
येन नः संयुगेष्वाद्या बहवो दानवा हताः ॥ ७ ॥
'कहते हैं, यही हमलोगोंका वह मूर्तिमान् विग्रह (युद्ध) है, जिसे शान्त करना सर्वथा असम्भव है। इसने अनेक संग्रामोंमें हमारे बहुत-से पूर्वज दानवोंका वध किया है॥ ७॥
अयं स निर्घृणो युद्धेऽस्त्री वालनिरपत्रपः।
येन दानवनारीणां सीमन्तोद्धरणं कृतम् ॥ ८ ॥
'यह वही निर्दयी है, जो युद्धमे अस्त्र धारण करके बालकोंके समान निर्लज्ज होता है। इसीने दानवनारियोंके सीमन्तका सौभाग्यचिह्न सदाके लिये उतार दिया है ॥ ८ ॥
अयं स विष्णुर्देवानां वैकुण्ठश्च दिवौकसाम् ।
अनन्तो भोगिनामप्सु स्वयम्भूश्च स्वयम्भुवः ॥ ९ ॥
'यही वह देवताओंका पक्षपाती विष्णु और स्वर्गवासियोंका वैकुण्ठ है। यही जलमे रहनेवाले सर्पोंका अनन्त और स्वयम्भू ब्रह्माका भी ब्रह्मा है ॥ ९ ॥
अयं स नाथो देवानामास्माकं विप्रिये स्थितः ।
अस्य क्रोधेन महता हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ १० ॥
'यही वह देवताओंका रक्षक है, जो सदा हमारा अप्रिय करनेमें ही लगा रहता है। इसीके महान् क्रोधसे दैत्यराज हिरण्यकशिपु मारे गये थे ॥ १० ॥
अस्यच्छायां समासाद्य देवा मखमुखे स्थिताः ।
आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवन्ति त्रिधा हुतम् ॥ ११ ॥
'इसीकी छायामे रहकर देवता यज्ञके मुखभागमे स्थित हो महर्षियोंद्वारा तीन प्रकारसे हवन करके अर्पित किये गये हविष्यका उपभोग करते हैं ॥ ११ ॥
अयं स निधने हेतुः सर्वेषां देवविद्विषाम् ।
यस्य तेजःप्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे ॥ १२ ॥
'यही समस्त देवद्रोही दैत्योंकी मृत्युमे प्रधान कारण है। समराङ्गणमे हमारे कितने ही कुल इसके तेजमें प्रविष्ट होकर भस्म हो गये ॥ १२ ॥
अयं स किल युद्धेषु सुरार्थे त्यक्तजीवितः ।
सवितुस्तेजसा तुल्यं चक्रं क्षिपति शत्रुपु ॥ १३ ॥
'कहते हैं, यह वही सुविख्यात विष्णु है, जो युद्धमें देवताओंके लिये अपना जीवन निछावर किये रहता है। यह शत्रुओंपर सूर्यके समान तेजस्वी चक्र चलाया करता है ॥ १३ ॥
अयं स कालो दैत्यानां कालभूते मयि स्थिते।
अतिक्रान्तस्य कालस्य फलं प्राप्स्यति दुर्मतिः ॥ १४ ॥
'यही वह दैत्योंका काल है, परंतु आज इसका भी काल होकर मैं खड़ा हूँ। मेरे रहते हुए ही यह दुर्बुद्धि अपने पूर्व कालकी करतूतोंका फल पायेगा ॥ १४ ॥
दिष्ट्येदानीं समक्षं मे विष्णुरेय समागतः ।
अद्य मद्द्वाणनिष्पिष्टो मामेव प्रणमिष्यति ॥ १५ ॥
'सौभाग्यकी बात है कि इस समय यह विष्णु मेरे सामने आ गया। आज यह मेरे बाणोंसे पिस जायगा और धरतीपर गिरकर मुझे ही प्रणाम करेगा ॥ १५ ॥
यास्याम्यपचितिं दिष्ट्या पूर्वेषामद्य संयुगे ।
इमं नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम् ॥ १६ ॥
क्षिप्रमेव वधिष्यामि रणे नारायणाश्रितान् ।
'आज समराङ्गणमे दानवोंको भय देनेवाले इस नारायणका वध करके मैं शीघ्र ही इसके आश्रित रहनेवाले देवताओंका भी संहार कर डालूँगा। ऐसा करके अपने पूर्वजोंके ऋणसे उऋण हो सकूँगा, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात होगी ॥ १६½ ॥
जात्यन्तरगतोऽप्येष मृधे बाधति दानवान् ॥ १७ ॥
एषोऽनन्तः पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति स्मृतः ।
जघनैकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ ।
विनिवेश्य स्वके ऊरौ निहतौ दानवेश्वरौ ॥ १८ ॥
'(मत्स्य, वराह आदि) दूसरी-दूसरी योनियोंमें जन्म धारण करके भी यह युद्धमें दानवोंको ही सताया करता है। यद्यपि यह अनन्त (आकाशकी भाँति असीम एवं व्यापक) है तो भी पूर्वकालमे मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उस समय इसकी पद्मनाम नामसे प्रसिद्धि हुई ; इसने भयंकर एकार्णवमे विचरनेवाले दोनों भाई दानवराज मधु और कैटभको अपनी जाँघपर सुलाकर मार डाला था ॥ १७-१८ ॥
द्विधाभूतं वपुः कृत्वा सिंहार्धं नरसंस्थितम् ।
पितरं मे जघानेको हिरण्यकशिपुं पुरा ॥ १९ ॥
'इसीने पूर्वकालमे आधे नर और आधे सिंहके रूपमे दो प्रकारका शरीर धारण करके अकेले ही मेरे पिता हिरण्यकशिपुका वध किया था ॥ १९ ॥
शुभं गर्भमधत्तेममद्रितिर्देवतारणिः ।
यज्ञकाले बलेर्यो वै कृत्वा वामनरूपताम् ।
त्रींल्लोकानाजहारैकः क्रममाणस्त्रिभिः क्रमैः ॥ २० ॥
'जो देवतारूपी अग्निको प्रकट करनेके लिये अरणिके-
१. अङ्ग होम, प्रधान होम और प्रायश्चित्त होम—ये होमके तीन प्रकार हैं । कुछ लोग नित्य, नैमित्तिक और काम्य भेदसे उसे तीन प्रकारका बताते हैं। कुछ दूसरे विद्वान् आह्वनीय, गार्हपत्य तथा दक्षिणाग्नि रूप उपाधिके भेदसे उसकी त्रिविधताका प्रतिपादन करते हैं।