विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः १७९
स्वयं बलपूर्वक उन्हें अपने मुखमें स्थापित किया और वायुको भी वेगसे पराजित करके अपनी आज्ञाके अधीन कर लिया ॥ ५४ ॥
ससमुद्राः समानीय सर्वाश्च सरितो बलात् । चकारात्मवशे वीर्याद् देहभूताश्च सिन्धवः ॥ ५५ ॥
समुद्रोंसहित सम्पूर्ण सरिताओंको बलपूर्वक ले आकर कालनेमिने अपने पराक्रमसे उन सबको वशमें कर लिया । समस्त सागर उसके शरीररूप हो गये थे ॥ ५५ ॥
अपः खवशगाः कृत्वा दिविजा याश्च भूमिजाः । स्थापयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः ॥ ५६ ॥
उसने आकाश और पृथ्वीके जलको अपने वशमें करके उसके ऊपर पर्वतोंद्वारा सुरक्षित पृथ्वीको स्थापित किया ॥ ५६ ॥
स स्वयम्भूरिवाभाति महाभूतपतिर्महान् । सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वलोकभयावहः ॥ ५७ ॥
समस्त लोकोंको भय देनेवाला वह महान् दैत्य पञ्च-महाभूतोंका अधिपति एवं सर्वलोकमय होकर स्वयम्भू ब्रह्माके समान शोभा पाने लगा ॥ ५७ ॥
स लोकपालैकवपुश्चन्द्रसूर्यग्रहात्मवान् । पावकानिलसंघातो रराज युधि दानवः ॥ ५८ ॥
उस युद्धस्थलमें दानव कालनेमि एकमात्र स्वयं ही समस्त लोकपालोंके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ था । चन्द्रमा, सूर्य और अन्य ग्रह सबके रूपमें उसका शरीर ही काम कर रहा था । अग्नि और वायु भी उसके शरीर बन गये थे, इस प्रकार उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ५८ ॥
पारमेष्ठ्ये स्थितः स्थाने लोकानां प्रभवाप्यये । तुष्टुवुस्तं दैत्यगणा देवा इव पितामहम् ॥ ५९ ॥
समस्त लोकोंकी उत्पत्ति और प्रलयके कारणभूत ब्रह्म-लोकमें स्थित होकर वह ब्रह्मा बन बैठा था । उस समय दैत्यगण उसकी उसी तरह स्तुति करते थे, जैसे देवता ब्रह्माकी करते हैं ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्चर्यतारकामये सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्चर्यतारकामय संग्रामविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
कालनेमि और भगवान् विष्णुका संवाद, श्रीविष्णुद्वारा कालनेमिका वध तथा देवताओंको आश्वासन देकर ब्रह्मलोकको प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच पञ्च तं नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्मणा । वेदो धर्मः क्षमा सत्यं श्रीश्च नारायणप्रिया ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! कालनेमिके द्वारा शास्त्रविपरीत कर्म किये जानेके कारण वेद, धर्म, क्षमा, सत्य और भगवान् नारायणके आश्रयमें रहनेवाली लक्ष्मी—ये पाँचों उसके पास नहीं आये ॥ १ ॥
स तेषामनुपस्थानात् संक्रोधो दानवेश्वरः । वैष्णवं पदमन्विच्छन् ययौ नारायणान्तिकम् ॥ २ ॥
उनके उपस्थित न होनेसे दानवराज कालनेमिको बड़ा क्रोध हुआ । वह भगवान् विष्णुके पद एवं वैकुण्ठधामको अपने अधीन कर लेनेकी इच्छासे उन श्रीनारायणदेवके निकट गया ॥ २ ॥
स ददर्श सुपर्णस्थं शङ्खचक्रगदाधरम् । दानवानां विनाशाय भ्रामयन्तं गदां शुभाम् ॥ ३ ॥
उसने देखा—शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायण गरुड़्की पीठपर विराजमान हैं और दानवोंका विनाश करनेके लिये अपनी कल्याणमयी कौमोदकी गदाको घुमा रहे हैं ॥ ३ ॥
सजलाम्भोधरसद्शं विद्युत्सदृशवाससम् । स्वारूढं स्वर्णपत्राढ्यं शिखिनं काश्यपं खगम् ॥ ४ ॥
उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति सजल जलधरके समान श्याम है । उनपर विद्युत्की-सी दीप्तिसे दमकता हुआ रेशमी पीताम्बर शोभा पा रहा है । वे भगवान् विष्णु जिन कश्यप-कुमार आकाशचारी गरुड़पर आरूढ़ हैं, उनके दोनों पंख सुवर्णके समान सुशोभित हैं और मस्तकपर शिखा शोभा दे रही है ॥ ४ ॥
दृष्ट्वा दैत्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थितम् । दानवो विष्णुमक्षोभ्यं बभाषे क्षुब्धमानसः ॥ ५ ॥
जिन्हें कोई भी क्षोभमें नहीं डाल सकता, उन भगवान् विष्णुको दैत्योंके विनाशके लिये रणक्षेत्रमें स्वस्थभावसे खड़ा देख दानव कालनेमिका हृदय क्षोभसे भर गया और वह इस प्रकार कहने लगा—॥ ५ ॥