भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 201
१७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

और मुखसे वज्र तथा प्रचण्ड वायुसे युक्त आगकी लपटें निकलती रहती थीं॥ ३९॥

तिर्यगूर्ध्वं च गगने ववृधुस्तस्य बाहवः।
पञ्चास्याः कृष्णवपुषो लेलिहाना इवोरगाः॥ ४०॥

उसकी भुजाएँ आकाशमें तिरछी और ऊपरकी दिशामें बढ़ने लगीं। वे ऐसी जान पड़ती थीं, मानो पाँच मुखवाले काले सर्प अपनी जीभ लपलपा रहे हों॥ ४०॥

सोऽस्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिघैरपि।
दिव्यैराकाशमावव्रे पर्वतैरुच्छ्रितैरिव॥ ४१॥

जैसे ऊँचे पर्वत आकाशको घेर लेते हैं, उसी प्रकार उसके चलाये हुए नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र-शस्त्र, धनुष और परिघोंने व्योम-मार्गको ढक दिया॥ ४१॥

सोऽनिलोद्धूतवसनस्तस्थौ संग्राममूर्धनि।
संध्यातपग्रस्तशिखः सार्चिर्मेरुरिवापरः॥ ४२॥

वह युद्धके मुहानेपर खड़ा था और वायुके वेगसे उसके वस्त्र ऊपरकी ओर फहरा रहे थे। उस समय वह संध्याकालकी धूपसे व्याप्त शिखरवाले प्रकाशयुक्त दूसरे मेरुके समान शोभा पाता था॥ ४२॥

ऊरुवेगप्रतिक्षिप्तैः शैलशृङ्गाग्रपादपैः।
अपातयद् देवगणान् वज्रेणेव महागिरीन्॥ ४३॥

अपनी जाँघोंके वेगसे फेंके गये शैल-शिखरों और बड़े-बड़े वृक्षोंद्वारा वह देवताओंको उसी तरह धराशायी करने लगा, जैसे इन्द्रने वज्रसे महान् पर्वतोंको पृथ्वीपर गिरा दिया था॥ ४३॥

बाहुभिः शस्त्रनिस्त्रिंशैश्छिन्नभिन्नशिरोरसः।
न शेकुश्चलितुं देवाः कालनेमिहता युधि॥ ४४॥

उस युद्धमें कालनेमिकी मार खाकर घायल हुए देवता चलने-फिरनेकी भी शक्ति खो बैठे। उसकी भुजाओंके आघात-से तथा शस्त्रों एवं खड्गोंकी चोटसे उनके मस्तक और वक्षः-स्थल छिन्न-भिन्न हो गये थे॥ ४४॥

मुष्टिभिर्निहताः केचित् केचिच्च विदलीकृताः।
यक्षगन्धर्वपतयः पेतुः सह महोरगैः॥ ४५॥

कितने ही यक्ष, गन्धर्वराज और बड़े-बड़े नाग उसके मुक्कोंकी मारसे मर गये और कितने ही विदीर्ण होकर पृथ्वी-पर गिर पड़े॥ ४५॥

तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना।
न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि प्रतिकर्तुं विचेतसः॥ ४६॥

उस युद्धमें कालनेमिने देवताओंको इतना भयभीत कर दिया कि वे अपनी सुध-बुध खो बैठे और बहुत यत्न करके भी उसका कोई प्रतीकार न कर सके॥ ४६॥

तेन शक्रः सहस्राक्षः स्तम्भितः शरबन्धनैः।
ऐरावतगतः संख्ये चलितुं न शशाक ह॥ ४७॥

उसने रणभूमिमें ऐरावतपर बैठे हुए सहस्रनेत्रधारी इन्द्रको बाणोंके बन्धनसे बाँधकर स्तब्ध कर दिया। वे वहाँसे चलनेमें भी असमर्थ हो गये॥ ४७॥

निर्जलाम्भोदसदृशो निर्जलार्णवसप्रभः।
निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो वरुणो मृधे॥ ४८॥

समराङ्गणमें कालनेमिने वरुणका पाश छीनकर उन्हें उससे वञ्चित कर दिया; अतः उनका युद्धविषयक सारा व्यापार ठप हो गया। वे निर्जल बादल और बिना पानीके समुद्रकी भाँति श्रीहीन हो गये॥ ४८॥

रणे वैश्रवणस्तेन परिघैः कालरूपिभिः।
व्यलपल्लोकपालेशस्त्याजितो धनदक्रियाम्॥ ४९॥

उस रणक्षेत्रमें उसके कालरूपी परिघोंकी मार खाकर लोकपालेश्वर कुबेर विलाप करने लगे। उसने उनसे धनाध्यक्ष कुबेरके कार्यका बलपूर्वक त्याग करा दिया॥ ४९॥

यमः सर्वहरस्तेन दण्डप्रहरणो रणे।
याम्यामवस्थां समरे नीतः स्वां दिशमाविशत्॥ ५०॥

सबके प्राण लेनेवाले दण्डधारी यमको भी उसने रणभूमि-में याम्यदशा (अचेतनावस्था) को पहुँचा दिया, अतः वे भयभीत होकर अपनी दक्षिण दिशामें घुस गये॥ ५०॥

स लोकपालानुत्साद्य कृत्वा तेषां च कर्म तत्।
दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धा विदधे तदा॥ ५१॥

इस प्रकार समस्त लोकपालोंको दूर भगाकर उसने उन सबके कार्यका सम्पादन अपने हाथमे ले लिया और सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थापित करनेके लिये अपने शरीरको चार प्रकार-का बना लिया॥ ५१॥

स नक्षत्रपथं गत्वा दिव्यं स्वर्भानुदर्शितम्।
जहार लक्ष्मीं सोमस्य तं चास्य विषयं महत्॥ ५२॥

उसने राहुके दिखाये हुए दिव्य नक्षत्रपथमे जाकर राजा सोमकी राजलक्ष्मी तथा उनके विशाल राज्यका भी अपहरण कर लिया॥ ५२॥

चालयामास दीप्तांशुं स्वर्गद्वारात् स भास्करम्।
सायनं चास्य विषयं जहार दिनकर्म च॥ ५३॥

उसने उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यको स्वर्गद्वारसे हटा दिया तथा अयनसहित उनके सारे राज्य और दिन-सम्बन्धी कर्मको भी उनसे छीनकर अपने अधिकारमे कर लिया॥ ५३॥

सोऽग्निं देवमुखे दृष्ट्वा चकारात्ममुखे स्वयम्।
वायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम्॥ ५४॥

कालनेमिने अग्निको देवताओंके मुखमे स्थित देख

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