विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[हरिवंशपर्व] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः १७७
तेऽन्योन्यमभिसम्पत्य पातयन्तः परस्परम्।
बभञ्जुर्बाहुभिर्बाहून् द्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः॥ २६॥
वे देवता और दानव एक दूसरेपर टूट पड़े और अपने-अपने प्रतिद्वन्द्वीको धराशायी करने लगे। द्वन्द्वयुद्धकी इच्छा रखनेवाले अन्यान्य योद्धाओंने अपनी भुजाओंद्वारा शत्रुओंकी भुजाएँ तोड़ डालीं ॥ २६ ॥
देवतास्त्वशनीर्घोराः परिघांश्चोत्तमायसान्।
ससर्जुरजौ निस्त्रिंशान् गदा गुर्वीश्च दानवाः ॥ २७ ॥
देवतालोग युद्धमें भयंकर वज्र तथा अच्छे लोहेके बने हुए परिघका प्रयोग करने लगे और दानव उनके ऊपर तलवारें और भारी गदाएँ चलाने लगे ॥ २७ ॥
गदानिपातैर्भग्नाङ्गा बाणैश्च शकलीकृताः।
परिपेतर्भृशं केचिन्न्युब्जाः केचित् ससर्जिरे ॥ २८ ॥
गदाओंके आघातसे कितने ही योद्धाओंके अङ्ग चूर-चूर हो गये, कितनोंके शरीर बाणोंकी चोट खाकर टुकड़े-टुकड़े हो गये, कितने ही गहरी चोटसे पछाड़ खाकर पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही पीठ ऊपर किये औंधे मुँह लुढ़क गये ॥ २८ ॥
ततो रथैः सतुरगैर्विमानैश्चाशुगामिभिः।
समीयुस्ते तु संरब्धा रोषादन्योन्यमाहवे ॥ २९ ॥
तदनन्तर उस समराङ्गणमें रोषावेशसे भरे हुए उभय-पक्षके सैनिक घोड़े जुते हुए रथों और शीघ्रगामी विमानों-द्वारा आगे बढ़कर एक दूसरेसे भिड़ गये ॥ २९ ॥
संवर्तमानाः समरे विवर्तन्तस्तथापरे।
रथा रथैर्निरुध्यन्ते पदाताश्च पदातिभिः ॥ ३० ॥
रणभूमिमें कितने ही रथी और पैदल योद्धा शत्रुके सामने आते और कितने ही पीठ दिखाकर भागने लगते थे। उस समय उन रथियोंको रथी और पैदलोंको पैदल योद्धा सामने आकर रोक लेते थे ॥ ३० ॥
तेषां रथानां तुमुलः स शब्दः शब्दवाहिनाम्।
बभूवाथ प्रसक्तानां नभसीव पयोमुचाम् ॥ ३१ ॥
घरघराहटकी आवाजके साथ आगे बढ़नेवाले उन रथियोंके रथोंका तुमुल नाद आकाशमे परस्पर टकरानेवाले बादलोंकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ता था ॥ ३१ ॥
बभञ्जिरे रथान् केचित् केचित् सम्मृदिता रथैः।
सम्बाधमेके सम्प्राप्य न शेकुश्चलितुं रथाः ॥ ३२ ॥
कितने ही रथोंने विपक्षियोंके रथोंको तोड़ डाल और कितने ही शत्रुपक्षके रथोंसे रौंदे जाकर धूलमें मिल गये। दूसरे बहुत-से रथ अन्यान्य रथोंद्वारा मार्ग अवरुद्ध हो जानेके कारण आगे बढ़नेमें असमर्थ हो गये ॥ ३२ ॥
अन्योन्यस्याभिसमरे दोर्भ्यामुत्क्षिप्य दर्पिताः।
संहादमानाभरणा जघ्नुस्तत्रासिचर्मिणः ॥ ३३ ॥
कितने ही दर्पमें भरे हुए योद्धा समराङ्गणमें एक दूसरेके शरीरको अपनी दोनों भुजाओंमें दूर हटाकर आगे बढ़ जाते थे। वहाँ ढाल ओर तलवार लिये हुए सैनिक जब शत्रुपर प्रहार करते थे, उस समय उनके आभूषण झंकृत हो उठते थे ॥ ३३ ॥
अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना रक्तं वेमुर्हता युधि।
क्षरज्जालानां सदृशा जलदानां समागमे ॥ ३४ ॥
दूसरे बहुत-से सिपाही, जो युद्धस्थलमें मारे जाकर अस्त्रों-से विदीर्ण हो गये थे, उसी प्रकार रक्त वमन करते थे, जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी घटाएँ घिर आनेपर वर्षा करनेवाले बादल जलकी धारा गिराते हैं ॥ ३४ ॥
तदस्त्रशस्त्रग्रथितं क्षिप्तोत्क्षिप्तगदाविलम्।
देवदानवसंक्षुब्धं संकुलं युद्धमाबभौ ॥ ३५ ॥
वह संग्राम अस्त्र-शस्त्रोंसे गुँथ गया था, दोनों ओरसे फेंकी और उछाली जानेवाली गदाओंसे मलिन हो रहा था तथा देवता और दानवोंके क्षोभसे व्याप्त होकर अत्यन्त भयानक प्रतीत होता था ॥ ३५ ॥
तद् दानवमहामेघं देवायुधतडित्प्रभम्।
अन्योन्यबाणवर्षं तद् युद्धं दुर्दिनमाबभौ ॥ ३६ ॥
वह युद्ध एक दुर्दिनके समान जान पड़ता था। उसमें दानव ही महान् मेघोंकी घटाके समान घिर आये थे, देवताओं-के चमकीले अस्त्र-शस्त्र विद्युत्की-सी प्रभा बिखेर रहे थे तथा दोनों दलोंकी ओरसे एक दूसरेपर जो बाणोंकी बौछार हो रही थी, वही मानो वर्षा थी ॥ ३६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः कालनेमिर्महासुरः।
व्यवेद्धत समुद्रौघैः पूर्यमाण इवाम्बुदः ॥ ३७ ॥
इसी बीचमें कुपित हुआ महान् असुर कालनेमि समुद्रकी जलराशिसे परिपूर्ण होकर बढ़नेवाले मेघके समान अपना विशाल रूप प्रकट करने लगा ॥ ३७ ॥
तस्य विद्युच्चलापीडाः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः।
गात्रे नगशिरःप्रख्या विनिपेतुर्वलाहकाः ॥ ३८ ॥
मस्तकपर बिजलीके चञ्चल आभूषण धारण किये, प्रज्वलित वज्रकी वर्षा करनेवाले, पर्वतशिखरोंके समान विशालकाय बादल उसके शरीरसे टकराकर चूर-चूर हो जाते थे ॥ ३८ ॥
क्रोधात्रिःश्वसतस्तस्य भ्रूभेदस्वेदवर्षिणः।
साग्निनिष्पेषपवना मुखाद्विनिश्चेरुरर्चिषः ॥ ३९ ॥
जब वह क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचता था, उस समय उसकी भौंहोंमें बल पड़नेसे पसीनेकी बूँदें टपकने लगती थीं