विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः १६५
वेगपूर्वक चलनेसे उसमें बड़ा गम्भीर शब्द होता था और उस सेनामे खड़े हुए अग्निदेव बड़े वेगसे प्रज्वलित हो रहे थे। ऐसी देवसेना वहाँ दैत्योंके साथ युद्ध करनेके लिये उपस्थित हुई॥ ४९-५० ॥
विष्णोर्जिष्णोः सहिष्णोश्च भ्राजिष्णोस्तेजसा वृतम्।
बलं बलवदुद्भूतं युद्धाय समवर्तत॥ ५१॥
जो नित्य विजयशील, सब कुछ सहन करनेमें समर्थ और नित्य प्रकाशमान हैं, उन भगवान् विष्णुके तेजसे व्याप्त हुई देवताओकी वह बलवती सेना उत्साहसम्पन्न हो युद्धके लिये तैयार हो गयी॥ ५१॥
स्वस्त्यस्तु देवेभ्य इति स्तुत्वा तत्राङ्गिरा ऽब्रवीत्।
स्वस्त्यस्तु दैत्येभ्य इति उशना वाक्यमाददे॥ ५२॥
उस समय अङ्गिराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिने स्तुति करके कहा—'देवताओंका कल्याण हो।' फिर दैत्योंके गुरु शुक्राचार्य भी बोल उठे—'दैत्योंका मङ्गल हो'॥ ५२॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्चर्यतारकामये चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्चर्यतारकामय संग्रामविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४४ ॥
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
देवासुर-संग्राम एवं और्व अग्निकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
ताभ्यां बलाभ्यां संजज्ञे तुमुलो विग्रहस्तदा।
सुराणामसुराणां च परस्परजयैषिणाम्॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! एक दूसरेपर विजय पानेकी इच्छावाले देवताओं और असुरोंकी उन सेनाओंमें उस समय घोर युद्ध आरम्भ हो गया॥ १॥
दानवा दैवतैः सार्द्धं नानाप्रहरणोद्यताः।
समीयुर्युध्यमाना वै पर्वताः पर्वतैरिव॥ २॥
दानव-सैनिक नाना प्रकारके हथियार उठाये देवताओंके साथ युद्ध करते हुए उनसे भिड गये, मानो एक श्रेणीके पर्वत दूसरी श्रेणीके पर्वतोंसे टकरा रहे हैं॥ २॥
तत् सुरासुरसंयुक्तं युद्धमत्यद्भुतं वभौ।
धर्माधर्मसमायुक्तं दर्पेण विनयेन च॥ ३॥
देवताओं और असुरोंका वह तुमुल युद्ध अत्यन्त अद्भुत प्रतीत होता था; मानो धर्म और अधर्म परस्पर जूझ रहे हों, दर्प और विनय एक दूसरेसे लड़ रहे हों॥ ३॥
ततो रथैः प्रजविभिर्वाहनैश्च प्रचोदितैः।
उत्पतद्भिश्च गगनं सासिहस्तैः समन्ततः॥ ४॥
विक्षिप्यमाणैर्मुसलैः सम्प्रेष्यद्भिश्च सायकैः।
चापर्विस्फार्यमाणैश्च पात्यमानैश्च मुद्गरैः॥ ५॥
तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्।
जगतस्त्रासजननं युगसंवर्तकोपमम्॥ ६॥
तदनन्तर रथोंके वेगपूर्वक दौड़ने, घोड़ोंके ऐंड़ लगाकर भगाये जाने, चारों ओर तलवार हाथमें लिये योद्धाओंके आकाशमे उछलने, मूसलोंके फेंके जाने, बाणोंके चलाने, धनुषोंके खींचे जाने और मुद्गरोंके गिराये जानेसे देवताओं और दानवोंसे भरा हुआ वह घोर युद्ध प्रलयकालकी अग्निके समान सम्पूर्ण जगत्को त्रास देने लगा॥ ४-६॥
स्वहस्तमुक्तैः परिघैः क्षिप्यमाणैश्च पर्वतैः।
दानवाः समरे जघ्नुर्देवानिन्द्रपुरोगमान्॥ ७॥
उस समराङ्गणमें समस्त दानव अपने हाथोंसे छोड़े गये परिघों और फेंके जाते हुए पर्वतशिखरोंकी चोटसे इन्द्र आदि देवताओंको घायल करने लगे॥ ७॥
ते वध्यमाना बलिभिर्दानवैर्जितकाशिभिः।
विषण्णमनसो देवा जग्मुरार्तिं परां मृधे॥ ८॥
युद्धस्थलमे अपनी विजयसे उल्लसित एवं सुशोभित होनेवाले महाबली दानवोंकी मार खाकर समस्त देवता मन-ही-मन खिन्न हो उठे, उन्हें बड़ी पीड़ा हुई॥ ८॥
तेऽस्त्रजालैः प्रमथिताः परिघैर्भिन्नमस्तकाः।
भिन्नोरस्का दितिसुतैर्वमू रक्तं व्रणैर्बहु॥ ९॥
दैत्योंने अपने अस्त्रसमूहोंसे देवताओको मथ डाला, परिघोंकी मारसे उनके मस्तक फोड़ डाले और वक्षःस्थल विदीर्ण कर दिये। उस समय देवता अपने घावोंसे बहुत रक्त बहा रहे थे॥ ९॥
स्पन्दिताः पाशजालैश्च निर्यत्नाश्च शरैः कृताः।
प्रविष्टा दानवीं मायां न शेकुस्ते विचेष्टितुम्॥ १०॥
दैत्योंने फन्दोंके जाल बिछाकर देवताओंको निरुपाय कर दिया और बाणोंके प्रहारसे उन्हें इतना घायल कर दिया कि वे अपने अङ्गोंसे रक्तकी धारा बहाने लगे। दानवोंकी