विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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मायाके वशीभूत होकर वे हिलने-डुलनेकी भी शक्ति खो बैठे ॥ १०॥
संस्तम्भितमिवाभाति निष्प्राणसदृशाकृति ।
बलं सुराणामसुरैर्निष्प्रयत्नायुधं कृतम् ॥ ११ ॥
असुरोंने देवताओंकी सेनाके सारे प्रयत्न और आयुध निष्फल कर दिये। उस समय वह सेना मन्त्रशक्तिसे स्तम्भित की हुई-सी प्रतीत होती थी, प्राणशून्य मुर्दे-जैसे दिखायी देती थी ॥ ११ ॥
मायापाशान् विकल्पैश्च भिन्दन् वज्रेण ताञ्शरान् ।
शक्रो दैत्यबलं घोरं विवेश बहुलोचनः ॥ १२ ॥
तब बहुसंख्यक नेत्रोंसे सुशोभित होनेवाले देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे दैत्योंके माया-पाशोंको हटाते और उनके चलाये हुए बाणोंको काटते हुए उनकी घोर सेनामें प्रवेश किया ॥ १२ ॥
स दैत्यान् प्रमुखे हत्वा तद् दानवबलं महत् ।
तामसेनास्त्रजालेन तमोभूतमथाकरोत् ॥ १३ ॥
उन्होंने सामने खड़े हुए दैत्योंको मारकर दानवोंकी उस विशाल वाहिनीपर तामसास्त्रका जाल-सा बिछा दिया और उसे अन्धकारसे अभिभूत कर डाला ॥ १३ ॥
तेऽन्योन्यं नावबुध्यन्त देवान् वा दानवानपि ।
घोरेण तमसाऽऽविष्टाः पुरूहूतस्य तेजसा ॥ १४ ॥
इन्द्रके प्रभावसे घोर अन्धकारमें डूबे हुए दैत्य न तो आपसमें ही किसीको जान पाते थे और न देवताओं अथवा दानवोंको ही पहचान पाते थे ॥ १४ ॥
मायापाशैर्विमुक्ताश्च यत्नवन्तः सुरोत्तमाः ।
वपूंषि दैत्यसंघानां तमोभूतान्यपातयन् ॥ १५ ॥
दैत्योंके मायापाशसे मुक्त हुए श्रेष्ठ देवताओंने प्रयत्नशील होकर उन दैत्यसमूहोंके अन्धकारसे आच्छन्न हुए शरीरोंको धरतीपर गिराना आरम्भ किया ॥ १५ ॥
अपध्वस्ता विसंज्ञाश्च तमसा नीलवर्चसः ।
पेतुस्ते दानवगणाश्छिन्नपक्षा इवाचलाः ॥ १६ ॥
अन्धकारसे नीली कान्ति धारण करनेवाले वे दानव देवताओंकी मार खाकर मूर्छित हो पंख कटे हुए पर्वतोंके समान धराशायी होने लगे ॥ १६ ॥
दैत्यानां तद्घनीभूतमन्धकारमहार्णवम् ।
प्रविष्टं बलमुत्रस्तं तमोभूतमिवाभवौ ॥ १७ ॥
अन्धकारके महासागरमें डूबी हुई दैत्योंकी वह घनीभूत सेना अत्यन्त भयभीत हो गयी और स्वर्ग तमोमयी-सी प्रतीत होने लगी ॥ १७ ॥
तदासृजन्महामायां मयस्तां तामसीं दहन् ।
युगान्ताग्निमिवोत्युग्रां सृष्टामौर्वेण वह्निना ॥ १८ ॥
तब मय नामक दानवने इन्द्रके द्वारा फैलायी हुई उस तामसी मायाको नष्ट करते हुए एक महामायाकी सृष्टि की, जो और्व नामक अग्नि (बड़वानल) के द्वारा रची गयी थी और प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त भयंकर थी ॥ १८ ॥
सा ददाह तमः सर्वं माया मयविकल्पिता ।
दैत्यांश्च दीप्तवपुषः सद्य उत्तस्थुराहवे ॥ १९ ॥
मयके द्वारा फैलायी हुई उस मायाने सारे अन्धकारको जलाकर भस्म कर दिया; फिर तो दैत्योंके शरीर दमक उठे और वे तत्काल युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ १९ ॥
मायामौर्वी समासाद्य दह्यमाना दिवौकसः ।
भेजिरे चन्द्रद्विपथं शीतांगुसलिले शयात् ॥ २० ॥
अब तो देवताओंग और्वी मायाके सम्पर्कमें आकर दग्ध होने लगे और ठंडे जलमें शयन करनेके लिये चन्द्रमाके समीप गये ॥ २० ॥
ते दह्यमाना हौर्वेण तेजसा भ्रष्टतेजसः ।
शशंसुर्वज्रिणे देवाः संतप्ताः शरणैषिणः ॥ २१ ॥
वे सब देवता और्वके तेजसे झुलसकर अपना तेज खो बैठे। उन्होंने अत्यन्त संतप्त होकर शरण पानेकी इच्छासे इन्द्रके पास जाकर पुकार की ॥ २१ ॥
संतप्ते मायया सैन्ये दह्यमाने च दानवैः ।
चोदितो देवराजेन वरुणो वाक्यमब्रवीत् ॥ २२ ॥
जब मयासुरकी मायासे सारी सेना संतप्त हो उठी और दानव भी उसे जलाने लगे, तब देवराजके द्वारा उसकी शान्तिके लिये प्रेरित होनेपर वरुणने इस प्रकार कहा ॥ २२ ॥
वरुण उवाच
पुरा ब्रह्मर्षिजः शक्र तपस्तेपेऽतिदारुणम् ।
ऊर्वो मुनिः स तेजस्वी सदृशो ब्रह्मणो गुणैः ॥ २३ ॥
वरुण बोले—देवेन्द्र ! पूर्वकालमें ऊर्व नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी मुनि थे, जो ब्रह्मर्षि भृगुके पुत्र थे । वे गुणोंमें ब्रह्माजीके समान थे । उन्होंने अत्यन्त दारुण तप करना आरम्भ किया ॥ २३ ॥
तं तपन्तमित्वादित्यं तपसा जगदव्ययम् ।
उपतस्थुर्मुनिगणा देवा ब्रह्मर्षिभिः सह ॥ २४ ॥
जैसे सूर्य इस अव्यय (प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले) जगत्को सदा तपाते रहते हैं, उसी प्रकार वे भी अपनी तपस्यासे सबको ताप देने लगे । तब ब्रह्मर्षियोंसहित देवता और मुनिगण उनके पास आये ॥ २४ ॥
हिरण्यकशिपुश्चैव दानवो दानवेश्वरः ।
ऋषिं विज्ञापयामास पुरा परमतेजसम् ॥ २५ ॥