विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः १९७
दानव हिरण्यकशिपु भी, जो समस्त दानवोंका स्वामी था, किसी समय उन परम तेजस्वी महर्षिके पास आया और उनसे शान्तिके लिये प्रार्थना करता रहा; यह प्राचीन कालकी बात है ॥ २५ ॥
तमूचुर्ब्रह्मऋषयो वचनं ब्रह्मसम्मितम् । ऋषिवंशेषु भगवंश्छिन्नमूलमिदं कुलम् ॥ २६ ॥
ब्रह्मर्षियोंने उनसे यह वेदतुल्य बात कही—'भगवन् ! ऋषियोंके वंशोंमें आपके इस कुलकी जड़ कट-सी गयी है ॥ २६ ॥
एकस्त्वमनपत्यश्च गोत्रं यन्नानुवर्तसे । कौमारं व्रतमास्थाय क्लेशमेवानुवर्तसे ॥ २७ ॥
'एकमात्र आप ही अपने कुलमें बचे हैं और आपके कोई संतान नहीं है, तो भी आप गोत्रका अनुसरण नहीं करते हैं—उसकी परम्पराको बनाये रखनेके लिये कोई प्रयत्न नहीं करते हैं। केवल नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करके तपस्याजनित क्लेशका ही अनुगमन कर रहे हैं ॥ २७ ॥
बहूनि विप्र गोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम् । एकदेहानि तिष्ठन्ति विभक्तानि विना प्रजाः ॥ २८ ॥
'विप्रवर ! विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंके बहुत-से ऐसे गोत्र या कुल हैं, जो एक शरीर (एक व्यक्ति) पर ही अवलम्बित रहे हैं और संतान न होनेके कारण जड़से अलग होकर नष्ट हो गये हैं ॥ २८ ॥
कुलेषूच्छिन्नमूलेषु तेषु नो नास्ति कारणम् । भवांस्तु तपसा श्रेष्ठः प्रजापतिसमद्युतिः ॥ २९ ॥
'मूलके ही नष्ट हो जानेसे उन कुलोंकी वृद्धिका हमारे देखनेमें कोई कारण नहीं रह गया है, परंतु आप तो (अपनी भावी वंशपरम्पराके मूलरूपमें विद्यमान ही हैं। आपके रहते इस कुलका उच्छेद नहीं होना चाहिये। आप) तपकी दृष्टिसे श्रेष्ठ हैं और तेज एवं कान्तिमें भी प्रजापतियोंके तुल्य हैं ॥
तत् प्रवर्तस्व वंशाय वर्धयात्मानमात्मना । त्वमाधत्स्वोर्जितं तेजो द्वितीयां वै तनुं कुरु ॥ ३० ॥
'अतः आप अपने वंशको चलानेका उद्योग कीजिये और अपने द्वारा अपने आपको बढ़ाइये। अपने ओजस्वी तेज (वीर्य) का (योग्य पत्नीमें) आधान कीजिये और ऐसा करके पुत्ररूपमें अपने दूसरे शरीरको प्रकट कीजिये' ॥
स एवमुक्तो मुनिभिर्मुनिर्मनसि ताडितः । जगर्हे तानृषिगणान् वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३१ ॥
उन महर्षियोंके ऐसा कहनेपर ऊर्व मुनिके हृदयमें गहरा धक्का लगा। वे उन ऋषियोंकी निन्दा करने लगे और इस प्रकार बोले--॥ ३१॥
यथायं शाश्वतो धर्मो मुनीनां विहितः पुरा । सदाऽऽर्षे सेवतां कर्म वन्यमूलफलाशिनाम् ॥ ३२ ॥
'महात्माओ ! जो वनके फल-मूल खाकर रहते हैं और सदा आर्षशास्त्रोंमें बताये हुए सत्कर्मका सेवन करते हैं, उन हम-जैसे ऋषि-मुनियोंके लिये तो प्राचीन कालसे इस तप एवं ब्रह्मचर्यरूप सनातन धर्मका ही विधान किया गया है ॥ ३२॥
ब्रह्मयोनौ प्रसूतस्य ब्राह्मणस्यानुवर्तिनः । ब्रह्मचर्यं सुचरितं ब्रह्माणमपि चालयेत् ॥ ३३ ॥
'ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न होकर ब्राह्मण-धर्मका अनुसरण करनेवाले द्विजके द्वारा इस ब्रह्मचर्य-व्रतका यदि भलीभाँति आचरण किया जाय तो यह ब्रह्माजीको भी विचलित कर सकता है ॥ ३३ ॥
द्विजानां वृत्तयस्तिस्रो ये गृहाश्रमवासिनः । अस्माकं तु वनं वृत्तिर्वनश्रमनिवासिनाम् ॥ ३४ ॥
'जो गृहस्थ-आश्रममें निवास करते हैं, उन ब्राह्मणोंके लिये ही शास्त्रमें यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना और दान ग्रहण करना—ये तीन वृत्तियाँ बतायी गयी हैं। हम-जैसे ऊर्ध्वरेता वनवासियोंके लिये तो वनके फल-मूल ही जीविकाके साधन हैं॥
अम्बुभक्षा वायुभक्षा दन्तोलूखलिकास्तथा । अश्मकुट्टा दशनपाः पञ्चातपतपाश्च ये ॥ ३५ ॥
'कुछ लोग केवल जल या वायु पीकर ही रहते हैं, कुछ दाँतोंसे ही ओखली और मूसलका काम लेते हैं—अर्थात् दाँत रहनेपर भूसीसहित नीवार आदिको चबा लेते हैं,। ये ही 'दशनप' कहलाते हैं। परंतु जिनके दाँत नहीं हैं, वे पत्थरोंसे ही कूट-पीसकर वन्य वस्तुओंको खाते हैं। कुछ पञ्चाग्निके तापका सेवन करते हैं ॥ ३५ ॥
एते तपसि तिष्ठन्तो व्रतैरपि सुदुष्करैः । ब्रह्मचर्यं पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ते परां गतिम् ॥ ३६ ॥
'ये अत्यन्त दुष्कर व्रतोंका आचरण करते हुए भी तपस्यामें लगे रहते और मुख्यतः ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करके उत्कृष्ट गतिको पाना चाहते हैं ॥ ३६ ॥
ब्रह्मचर्याद् ब्राह्मणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते । एवमाहुः परे लोके ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ ३७ ॥
'ब्रह्मचर्यके पालनसे ही ब्राह्मणको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है। इसी तरह ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि ब्रह्मचर्य-का पालन ही परलोकमें ब्रह्मकी प्राप्तिका मुख्य साधन है ॥
ब्रह्मचर्ये स्थितं धैर्यं ब्रह्मचर्ये स्थितं तपः । ये स्थिता ब्रह्मचर्येषु ब्राह्मणास्ते दिवि स्थिताः ॥ ३८ ॥
'ब्रह्मचर्यमें धैर्यकी स्थिति है और ब्रह्मचर्यमें ही तप प्रतिष्ठित है। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यमें दृढ़तापूर्वक स्थित हैं, वे ब्रह्मलोकमें ही विराजमान हैं ॥ ३८ ॥