भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

१६८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


नास्ति योगं विना सिद्धिर्नास्ति सिद्धिं विना यशः।
नास्ति लोके यशोमलं ब्रह्मचर्यात् परं तपः ॥ ३९ ॥

'योगके बिना सिद्धि नहीं मिलती और सिद्धिके बिना यश नहीं प्राप्त होता है। यशका मूल कारण है तप; परंतु इस जगत्में ब्रह्मचर्यसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ॥ ३९ ॥

तन्निगृहेन्द्रियग्रामं भूतग्रामं च पञ्चमम्।
ब्रह्मचर्येण वर्तेत किमतः परमं तपः ॥ ४० ॥

'अतः इन्द्रिय-समुदायको तथा शब्द आदि सूक्ष्म भूत-रूप उसके विषयसमूहको वशमें करके ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक रहे। इससे बढ़कर और कौन-सा तप हो सकता है? ॥४०॥

अयोगे केशहरणमसंकल्पे व्रतक्रिया।
अब्रह्मचर्ये चर्या च त्रयं स्याद् दम्भसंज्ञितम् ॥ ४१ ॥

'अवश्यकर्तव्य ध्यानरूप योगके अभावमें भी सिर मुड़ा लेना, परलोक सुधारनेका संकल्प न रहनेपर भी केवल लोक-रंजनके लिये कृच्छ्र आदि व्रतोंका आचरण करना तथा ब्रह्मकी प्राप्तिको लक्ष्य बनाकर नियमित वेदाध्ययनके बिना ही ब्रह्मचर्यके नियमोंका आश्रय लेना—ये तीनों दम्भ कहलाते हैं ॥ ४१ ॥

क्व दाराः क्व च संयोगः क्व च भावविपर्ययः।
यदेयं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा ॥ ४२ ॥

'जब ब्रह्माजीने मनके द्वारा मानसी प्रजा (सनत्कुमार आदि) की सृष्टि की थी, उस समय स्त्री कहाँ थी? स्त्री-पुरुषका संयोग कहाँ था ? और चित्तकी विकृति (कामातुरता) भी कहाँ थी ? ॥ ४२ ॥

यद्यस्ति तपसो वीर्यं युष्माकममितात्मनाम्।
सृजध्वं मानसान् पुत्रान् प्राजापत्येन कर्मणा ॥ ४३ ॥

'महर्षियो! आपलोग अमेय आत्मबलसे सम्पन्न हैं, यदि आपमें तपस्याकी शक्ति हो तो आप प्रजापतिके समान कर्म करके मानसिक पुत्र उत्पन्न करें ॥ ४३ ॥

मनसा निर्मिता योनिराधातव्या तपस्विना।
न दारयोगं बीजं वा व्रतमुक्तं तपस्विनाम् ॥ ४४ ॥

'तपस्वीको तो अपने मनसे कल्पित योनिमें ही मानसिक संकल्पसे गर्भाधान करना चाहिये। स्त्रीके साथ संयोग अथवा वीर्यका आधान--यह तपस्वी पुरुषोंका नियम नहीं बताया गया है ॥ ४४ ॥

यदिदं लुप्तधर्मार्थं युष्माभिरिह निर्भयैः।
व्याहृतं सद्भिरत्यर्थमसद्द्भिरिव मे मतिः ॥ ४५ ॥

'आपलोग सज्जन हैं तो भी निरे असज्जनोंके समान आपने निःशङ्क होकर यहाँ यह धर्म और अर्थसे शून्य बात कह डाली है, ऐसा मेरा विचार है ॥ ४५ ॥

वपुर्दीप्तान्तरात्मानमेष कृत्वा मनोमयम्।
दारयोगं विना स्रक्ष्ये पुत्रमात्मतनूरुहम् ॥ ४६ ॥

'अच्छा! देखिये, मैं अभी मनोमय वपु (योनि) का निर्माण करके स्त्रीसहवासके बिना ही अपने शरीरसे उत्पन्न होनेवाले ऐसे पुत्रकी सृष्टि कर रहा हूँ, जिसकी अन्तरात्मा अत्यन्त उद्दीप्त होगी ॥ ४६ ॥

एवमात्मानमात्मा मे द्वितीयं जनयिष्यति।
वन्येनानेन विधिना दिधक्षन्तमिव प्रजाः ॥ ४७ ॥

'इस प्रकार मेरा यह शरीर वनवासीके लिये उचित इस विधानके द्वारा ही मेरे दूसरे स्वरूप (पुत्र) को जन्म देगा, जो समस्त प्रजाको जलाकर भस्म कर देनेकी इच्छा रखता होगा' ॥ ४७ ॥

ऊर्वस्तु तपसाऽऽविष्टो निवेश्योरुं हुताशने।
ममन्थैकेन दर्भेण पुत्रस्य प्रभवारणिम् ॥ ४८ ॥

ऐसा कहकर तपके आवेशमें भरे हुए ऊर्व मुनिने अपनी जाँघको अग्निमें डाल दिया और पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अरणि-रूप उस जाँघको एक कुरासे मथने लगे ॥ ४८ ॥

तस्योरुं सहसा भित्त्वा ज्वालामाली निरिन्धनः।
जगतो निधनाकाङ्क्षी पुत्रोऽग्निः समपद्यत ॥ ४९ ॥

उस समय सहसा उनके ऊरु (जाँघ) का भेदन करके एक अग्निस্বরূপ पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बिना ईंधनके ही ज्वालामालाओंसे अलंकृत था। वह समस्त संसारके विनाशकी इच्छा रखता था ॥ ४९ ॥

ऊर्वस्योरुं विनिर्भिद्य चौर्वो नामान्तकोऽनलः।
दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीञ्जज्ञे परमकोपनः ॥ ५० ॥

ऊर्वकी जाँघको चीरकर जो वह लोक-विनाशक परमं क्रोधी अनल प्रकट हुआ था, वह और्वके नामसे विख्यात हुआ। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह तीनों लोकोंको दग्ध कर डालना चाहता हो ॥ ५० ॥

उत्पन्नमात्रश्चोवाच पितरं दीप्तया गिरा।
क्षुधा मे बाधते तात जगद् भक्षे त्यजस्व माम् ॥ ५१ ॥

उसने उत्पन्न होते ही प्रदीप्त वाणीमें अपने पितासे कहा— 'तात! मुझे भूख सता रही है, मेरे आहारके लिये यह सम्पूर्ण जगत् मुझे अर्पित कर दीजिये' ॥ ५१ ॥

त्रिदिवारोहिभिर्ज्वलैर्जृम्भमाणो दिशो दश।
निर्दहन्निव भूतानि ववृधे सोऽन्तकोऽनलः ॥ ५२ ॥

वह कालरूप अग्नि समस्त प्राणियोंको दग्ध-सा करता हुआ बढ़ने लगा। अपनी स्वर्गतक पहुँचनेवाली ज्वालाओंके द्वारा वह दसों दिशाओंमें फैलता जा रहा था ॥ ५२ ॥