विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| हरिवंशपर्व ] | पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः | १६९ |
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एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा सर्वलोकपतिः प्रभुः।
आजगाम मुनिर्यत्र व्यसृजत् पुत्रमुत्तमम् ॥ ५३ ॥
इसी बीचमें सब लोकोंके स्वामी भगवान् ब्रह्मा उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ ऊर्व मुनिने अपने श्रेष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया था ॥ ५३ ॥
स ददर्शोरूमूर्वस्य दीप्यमानं सुताग्निना।
और्वकोपाग्निसंतप्तांल्लोकांश्च ऋषिभिः सह ॥ ५४ ॥
उन्होंने देखा कि ऊर्वकी जाँघ पुत्ररूप अग्निसे देदीप्यमान हो रही है और और्वकी क्रोधाग्निसे ऋषियोंसहित तीनों लोक संतप्त हो उठे हैं ॥ ५४ ॥
समुवाच ततो ब्रह्मा मुनिमूर्वं सभाजयन्।
धार्यतां पुत्रजं तेजो लोकानां हितकाम्यया।
अस्यापत्यस्य ते विप्र करिष्ये साह्यमुत्तमम् ॥ ५५ ॥
तब ब्रह्मा ऊर्व मुनिका सत्कार करते हुए उनसे कहने लगे—‘विप्रवर ! तुम लोकोंका हित करनेकी इच्छासे अपने पुत्रके तेजको रोके रहो। मैं तुम्हारे इस पुत्रकी उत्तम सहायता करूँगा ॥ ५५ ॥
वासं चास्य प्रदास्यामि प्राशनं चामृतोपमम्।
तथ्यमेतन्मम वचः शृणु त्वं वदतां वर ॥ ५६ ॥
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! तुम मेरे इस तथ्य वचनको भी सुनो। मैं इसे अमृतके समान भोजन और रहनेके लिये स्थान भी दूँगा’ ॥ ५६ ॥
ऊर्व उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्ममाद्य भवाञ्छिशोः।
मतिमेतां ददातीह परमानुग्रहाय वै ॥ ५७ ॥
ऊर्वने कहा—‘आज मैं धन्य हूँ। मेरे ऊपर आपका बड़ा अनुग्रह है, जो आप यहाँ पधारकर मेरे पुत्रपर परम अनुग्रह करनेके लिये ऐसी सलाह दे रहे हैं ॥ ५७ ॥
प्रभावकाले सम्प्राप्ते काङ्क्षितव्ये समागमे।
भगवंस्तर्पितः पुत्रः कैर्हव्यैः प्राप्स्यते सुखम् ॥ ५८ ॥
कुत्र चास्य निवासो वै भोजनं च किमात्मकम्।
विधास्यति भवानस्य वीर्यतुल्यं महौजसः ॥ ५९ ॥
भगवन् ! जब इसका यौवनकाल उपस्थित होगा और इसके लिये भोजनकी व्यवस्था वाञ्छनीय होगी, तब यह किस हविसे तृप्त होकर सुख पायेगा ? इसका निवासस्थान कहाँ होगा ? इस महान् शक्तिशाली पुत्रकी शक्तिके अनुरूप आप किस भोजनकी व्यवस्था करेंगे ? ॥ ५८-५९ ॥
ब्रह्मोवाच
वडवामुखेऽस्य वसतिः समुद्रास्ये भविष्यति।
मम योनिर्जलं विप्र तच्च तोयमयं वपुः ॥ ६० ॥
ब्रह्माजीने कहा—विप्रवर ! जिसकी आकृति घोड़ीके मुखके समान है, समुद्रके उस मुखमें इसका निवास होगा। जल मेरी योनि (उत्पत्तिका स्थान) है और उस (समुद्र एवं उसके मुख) का स्वरूप भी जलमय ही है ॥ ६० ॥
तद्धविस्त्वं पुत्रस्य विसृजाम्यालयं तु तत्।
तत्रायमास्तां नियतः पिबन् वारिमयं हविः ॥ ६१ ॥
उसी जलको मैं तुम्हारे पुत्रके लिये हविष्यरूपमें अर्पित करता हूँ और उसके लिये रहनेका स्थान भी वही होगा। यह जलमय हविष्यका पान करता हुआ सदा वहीं रहे ॥ ६१ ॥
ततो युगान्ते भूतानामेष चाहं च सुव्रत।
सहितौ विचरिष्यावो लोकानिति पुनः पुनः ॥ ६२ ॥
सुव्रत ! तदनन्तर प्राणियोंका प्रलयकाल आनेपर यह और मैं दोनों साथ-साथ सम्पूर्ण लोकोंमें बारंबार विचरेंगे ॥ ६२ ॥
एषोऽग्निरन्तकाले तु सलिलाशी मया कृतः।
दहनः सर्वभूतानां सदेवासुररक्षसाम् ॥ ६३ ॥
इस अग्निको मैंने जलाहारी बना दिया। यह प्रलयके समय देवता, राक्षस और असुर आदि समस्त प्राणियोंको भस्म करनेवाला होगा ॥ ६३ ॥
एवमस्त्विति सोऽप्यग्निः संवृतज्वालमण्डलः।
प्रविवेशार्णवमुखं निक्षिप्य पितरि प्रभाम् ॥ ६४ ॥
तब ‘एवमस्तु’ कहकर उस और्व नामक अग्निने अपनी ज्वालाओंको समेट लिया और पिताके शरीरमें यशरूपी तेजको स्थापित करके उसी क्षण समुद्रके मुखमें प्रवेश किया ॥ ६४ ॥
प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ते च सर्वे महर्षयः।
और्वस्याग्नेः प्रभावज्ञाः स्वां स्वां गतिमुपाश्रिताः ॥ ६५ ॥
तब ब्रह्माजी लौट गये तथा और्व अग्निके प्रभावको जाननेवाले वे सब महर्षि भी अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ६५ ॥
हिरण्यकशिपुर्दृष्ट्वा तदद्भुतमपूजयत्।
ऊर्वं प्रणतसर्वाङ्गो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ६६ ॥
इस अद्भुत घटनाको देखकर हिरण्यकशिपुने ऊर्वको साष्टाङ्ग प्रणाम करके उनका पूजन किया और यह बात कही— ॥ ६६ ॥
भगवन्नद्भुतमिदं निर्वृत्तं लोकसाक्षिकम्।
तपसा ते मुनिश्रेष्ठ परितुष्टः पितामहः ॥ ६७ ॥
‘भगवन् ! आपने समस्त लोकोंके सामने यह अद्भुत बात कर दिखायी। मुनिश्रेष्ठ ! आपकी तपस्यासे पितामह ब्रह्मा भी बहुत संतुष्ट हैं ॥ ६७ ॥