विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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अहं तु तव पुत्रस्य तव चैव महाव्रत ।
भृत्य इत्यवगन्तव्यः श्लाघ्योऽस्मि यदि कर्मणा ॥ ६८ ॥
'महाव्रत ! यदि आप मेरे कर्मोंको देखकर मुझे प्रशंसाके योग्य समझते हो तो मुझे अपने पुत्रका और अपना किङ्कर समझें ॥ ६८ ॥
तन्मां पश्य समापन्नं तवैवाराधने रतम् ।
यदि सीदे मुनिश्रेष्ठ तवैव स्यात् पराजयः ॥ ६९ ॥
'अतः मुनिश्रेष्ठ ! मैं शरणमें आकर आपकी ही आराधनामें तत्पर हूँ। आप मुझपर कृपादृष्टि कीजिये। यदि मैं कष्टमें पड़ा तो यह आपकी ही पराजय होगी' ॥ ६९ ॥
ऊर्व उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य तेऽहं गुरुर्मतः ।
नास्ति ते तपसानेन भयमद्येह सुव्रत ॥ ७० ॥
ऊर्व मुनिने कहा--'सुव्रत ! तुम मुझे अपना गुरु या पिता मान रहे हो, अतः मैं धन्य हूँ, यह तुम्हारा मुझपर महान् अनुग्रह है। मेरी इस तपस्याके प्रभावसे अब तुम्हें यहाँ कोई भय नहीं होगा ॥ ७० ॥
इमां च मायां गृह्णीष्व मम पुत्रेण निर्मिताम् ।
निरिन्धनामग्निमयीं दुःस्पर्शां पावकैरपि ॥ ७१ ॥
साथ ही तुम मेरे पुत्रके द्वारा रची हुई इस मायाको ग्रहण करो। इस ईंधनरहित अग्निमयी मायाका स्पर्श करना साक्षात् अग्निके लिये भी कठिन होगा ॥ ७१ ॥
एषा ते स्वस्य वंशस्य वशगारिविनिग्रहे ।
रक्षिष्यत्यात्मपक्षं सा परांश्च प्रहरिष्यति ॥ ७२ ॥
यह (माया) तुम्हारे जीवनकाल तक सदा तुम्हारे वंशजोंके वशमें होकर रहेगी और शत्रुओंका दमन करते समय यह अपने पक्षवालोंकी रक्षा तथा शत्रुओंका संहार करेगी ॥ ७२ ॥
एवमस्त्विति तां गृह्य प्रणम्य मुनिपुंगवम् ।
जगाम त्रिदिवं हृष्टः कृतार्थो दानवेश्वरः ॥ ७३ ॥
तब 'एवमस्तु' कहकर दानवराजने उस मायाको ग्रहण कर लिया और प्रसन्न हो कृतार्थताका अनुभव करता हुआ उन मुनिवरको प्रणाम करके स्वर्गको चला गया ॥ ७३ ॥
वरुण उवाच
सैषा दुर्विषहा माया देवैरपि दुरासदा ।
और्वेण निर्मिता पूर्वं पावकेनोर्वसूनुना ॥ ७४ ॥
वरुण कहते हैं--इस प्रकार प्राचीन कालमें ऊर्वऋषिके पुत्र और्वनामक अग्निने इस मायाको रचा था, जो देवताओंके लिये भी दुःसह एवं दुर्जय है ॥ ७४ ॥
तस्मिंस्तु व्युत्थिते दैत्ये निर्वीर्या न संशयः ।
शापो ह्यस्याः पुरा दत्तः सृष्टा येनैव तेजसा ॥ ७५ ॥
यह दैत्य अब संसारसे उठ गया है। अतः यह माया निर्बल हो गयी है, इसमें कोई संदेह नहीं है; क्योंकि जिन्होंने अपने तेजसे इसको रचा था, उन्होंने ही इसको शाप भी दिया था (कि यह माया हिरण्यकशिपुके जीवनतक ही बलवती रहेगी) ॥ ७५ ॥
यद्येषा प्रतिहन्तव्या कर्तव्यो भगवान् सुखी ।
दीयतां मे सखा शक्र तोययोनिर्निशाकरः ॥ ७६ ॥
इन्द्रदेव ! यदि आपको इस मायाका संहार करना है और अपनेको प्रसन्न करना है तो आप मुझे जलके उत्पत्तिस्थान चन्द्रमाको मेरी सहायताके लिये दीजिये ॥ ७६ ॥
तेनाहं सह संगम्य यादोभिश्च समावृतः ।
मायामेतां हनिष्यामि त्वत्प्रसादान्न संशयः ॥ ७७ ॥
मैं चन्द्रमाके सहयोगसे और (अपने अधीनस्थ) जलचर जीवोंसे घिरा रहकर आपकी कृपासे इस मायाका अवश्य ही नाश कर डालूँगा ॥ ७७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि और्वाग्निसम्भवो नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें और्व अग्निके उत्पत्तिविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
इन्द्रद्वारा चन्द्रमाकी स्तुति, चन्द्रदेव और वरुणदेवके द्वारा दैत्यसेनाका संहार, मयदानवद्वारा मायाका प्रयोग, पवन और अग्निदेवका दैत्यसेनाके साथ संग्राम और कालनेमिका रणमें आगमन
वैशम्पायन उवाच
एवमस्त्विति संहृष्टः शक्रस्त्रिदशवर्धनः ।
संदिदेशाग्रतः सोमं युद्धाय शिशिरायुधम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब देवताओंकी उन्नति करनेवाले इन्द्र अति प्रसन्न होकर बोल उठे—'अच्छा, ऐसा ही होगा।' तदनन्तर वे अपने सामने ही स्थित, हिमसे आयुधका काम लेनेवाले चन्द्रमाको समझाने लगे ॥ १ ॥
शक्र उवाच
गच्छ सोम सहायत्वं कुरु पाशधरस्य वै ।
असुराणां विनाशाय जयाय च दिवौकसाम् ॥ २ ॥