भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 197
१७४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ।
गीयमानासु गाथासु देवसंस्तवनादिषु ॥ ४६ ॥
सभी नरेश प्रजापालनमें तत्पर रहकर विशेष शोभा पाने लगे। देवताओंकी स्तुतिसे युक्त गाथाओंका सब ओर गान होने लगा ॥ ४६ ॥

प्रशान्तकलुषे लोके शान्ते तपसि दारुणे ।
अग्निमारुतयोस्तस्मिन् वृत्ते संग्रामकर्मणि ।
तन्मया विमला लोकास्ताभ्यां जयकृतप्रियाः ॥ ४७ ॥
सब लोगोंका कलुष शान्त हो गया। दारुण या कठोर तपस्या शान्त एवं मृदुल तपके रूपमें परिणत हो गयी। अग्नि और वायुदेवका वह युद्धविषयक महान् पराक्रम जब पूर्ण हो गया, तब निर्मल (प्रसन्न) हुए जगत्‌मे उन्हींकी प्रधानता हो गयी; क्योंकि उनकी विजयने लोगोंका प्रिय कार्य किया था ॥ ४७ ॥

पूर्वदेवभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत् ।
कालनेमिरिति ख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत ॥ ४८ ॥
अग्नि और वायुने दैत्योंपर महान् भय उपस्थित कर दिया है—यह सुनकर 'कालनेमि' नामसे विख्यात दानव उनके सामने आया ॥ ४८ ॥

भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः ।
मन्दराचलसंकाशो महारजतसंवृतः ॥ ४९ ॥
उसके मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी मुकुट शोभा दे रहा था। उसने पैर आदिमें खन-खन शब्द करनेवाले नूपुर आदि आभूषण तथा भुजाओंमें बाजूबन्द धारण कर रखे थे। बहुमूल्य चाँदीके कवचसे आवृत होनेके कारण वह मन्दराचल-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ४९ ॥

शतप्रहरणोद्यग्रः शतबाहुः शताननः ।
शतशीर्षो स्थितः श्रीमांञ्छतशृङ्ग इवाचलः ॥ ५० ॥
उसने अपनी सौ भुजाओंमें उतने ही आयुध धारण किये थे, इसलिये वह अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था। उसके मुख भी सौ ही थे। सौ मस्तकोंसे युक्त वह तेजस्वी दानव जब खड़ा होता था, उस समय सौ शिखरोंसे सुशोभित पर्वतके समान जान पड़ता था ॥ ५० ॥

कक्षे महति संवृद्धे हिमान्त इव पावकः ॥ ५१ ॥
इतना ही नहीं, वह ग्रीष्म ऋतुमें सूखे वृक्षोंसे भरे हुए विशाल वनके भीतर प्रज्वलित हुए दावानलके समान देदीप्यमान हो रहा था ॥ ५१ ॥

धूम्रकेशो हरिच्छ्मश्रुर्दंष्ट्रालोष्ठपुटाननः ।
त्रैलोक्यान्तरविस्तारो धारयन् विपुलं वपुः ॥ ५२ ॥
उसके केश धूम्रवर्णके थे; किंतु मूँछें हरे रंगकी दिखायी देती थीं। उसकी दाढ़ें ओठोंसे बाहर निकली हुई थीं, जिससे उसके मुखकी अद्भुत शोभा होती थी। उसने ऐसा विशाल शरीर धारण कर रखा था, जो तीनों लोकोंमें फैला हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ५२ ॥

बाहुभिस्तुलयन् व्योम क्षिपन् पद्भ्यां महीधरान् ।
ईरयन् मुखनिःश्वासैर्वृष्टिमन्तो वलाहकान् ॥ ५३ ॥
वह अपनी भुजाओंसे आकाशको तौल रहा था, पैरोंकी ठोकरोंसे कितने ही पर्वतोंको दूर फेंक देता था और मुखके निःश्वासोंसे वर्षा करनेवाले बादलोंको उड़ा देता था ॥ ५३ ॥

तिर्यगायतरक्ताक्षं मन्दरोत्थग्रवर्चसम् ।
दिधक्षन्तमवायान्तं सर्वान् देवगणान् मृधे ॥ ५४ ॥
उसके नेत्र विशाल और लाल थे। वह तिरछी दृष्टिसे देखा करता था। मन्दर अर्थात् स्वर्गलोकके सर्वश्रेष्ठ देवता देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी जान पड़ता था। उसे देखकर ऐसा लगता था, मानो वह युद्धमें सम्पूर्ण देवताओंको भस्म कर डालनेकी इच्छासे आ रहा हो ॥ ५४ ॥

तर्जयन्तं सुरगणान्छादयन्तं दिशो दश ।
संवर्तकाले क्षुधितं दृप्तं मृत्युमिवोत्थितम् ॥ ५५ ॥
वह देवताओंको डाँट बताता और दसों दिशाओंको आच्छादित करता आ रहा था। ऐसा जान पड़ता था मानो प्रलयकालमें दर्पसे भरा हुआ भूखा काल उठ खड़ा हुआ हो ॥ ५५ ॥

सुतलेनोच्छ्रितवता विपुलाङ्गुलिपर्वणा ।
माल्याभरणपूर्णेन किञ्चिच्चलितवर्मणा ॥ ५६ ॥
उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता ।
दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रुवन् ॥ ५७ ॥
जिसकी हथेली बहुत सुन्दर थी, अँगुलियोंके पर्व पुष्ट थे, जो मालाकार आभूषण (वलय) से सुशोभित था तथा जिसका कवच कुछ खिसक गया था, ऐसे ऊँचे उठाये हुए मोटे-ताजे दाहिने हाथके अग्रभागसे वह देवताओंकी मार खाकर गिरे हुए दानवोंको उठनेका संकेत करके कह रहा था, कि (वीरो!) उठकर खड़े हो जाओ ॥ ५६-५७ ॥

तं कालनेमिं समरे द्विषतां कालसंनिभम् ।
वीक्षन्ति स्म सुराः सर्वे भयविक्षुब्धमानसाः ॥ ५८ ॥
शत्रुओंके लिये कालके समान भयंकर वह कालनेमि नामक दानव जब समरभूमिमें आया, उस समय वहाँ खड़े हुए समस्त देवता भयभीत चित्तसे उसकी ओर देखने लगे ॥ ५८ ॥

तं स्म वीक्षन्ति भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम् ।
त्रिविक्रमं विक्रमन्तं नारायणमिवापरम् ॥ ५९ ॥
ऊँचे-ऊँचे पग उठाकर आक्रमण करते हुए उस काल-

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