भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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हरिवंशपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः १७३


उन जगत्पति भगवान् गदाधरको क्रोध भी नहीं आया ॥ ३० ॥
कालज्ञः कालमेघाभः समैक्षत् कालमाहवे ।
देवासुरविमर्दे स द्रष्टुकामो जनार्दनः ॥ ३१ ॥
श्याम मेघकी-सी कान्तिवाले और समयको पहचाननेवाले भगवान् जनार्दन युद्धमें समयकी बाट देखने लगे। वे देवता और असुरोंकी मुठभेड़ देखना चाहते थे ॥ ३१ ॥
ततो भगवताऽऽदिष्टौ रणे पावकमारुतौ ।
शमनार्थं प्रवृद्धाया मायाया मयसृष्टया ॥ ३२ ॥
उधर मयदानवकी रची हुई माया रणभूमिमें उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। उसे शान्त करनेके लिये भगवान्‌ने अग्नि और वायुको आज्ञा दी (कि तुम दोनों इस मायाको नष्ट करो) ॥ ३२ ॥
ततः प्रवृद्धावन्योन्यं प्रबुद्धौ ज्वालवाहिनौ ।
चोदितौ विष्णुवाक्येन तां मायां व्यपकर्षताम् ॥ ३३ ॥
तब एक दूसरेके सहयोगसे बढ़े हुए तथा प्रबुद्ध होकर ज्वालाओंका भार वहन करनेवाले वे दोनों देवता भगवान् विष्णुकी आज्ञासे प्रेरित होकर उस मायाको दूर करने लगे ३३
ताभ्यामुद्‌भ्रान्तवेगाभ्यां प्रवृद्धाभ्यां महाहवे ।
दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश ह ॥ ३४ ॥
प्रवृद्ध होकर महायुद्धमें बवंडरकी तरह वेगसे घूमते हुए पावक और पवनदेवने उस पार्वती मायाको भस्म कर डाला। अतः वह नष्ट हो गयी ॥ ३४ ॥
सोऽनिलोऽनलसंयुक्तः सोऽनलश्चानिलाकुलः ।
दैत्यसेनां ददहतुर्युगान्तेष्विव मूर्च्छितौ ॥ ३५ ॥
प्रलयकालकी भाँति वायुका संयोग पाकर प्रबल हुए अग्निदेवने और अग्निका संयोग पाकर बढ़े हुए वायुदेवने दानवसेनाको भस्म करना आरम्भ किया ॥ ३५ ॥
वायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निश्च मारुतात् ।
चेरतुर्दानवानीके क्रीडन्तावनलानिलौ ॥ ३६ ॥
रणभूमिमें पहले तो वेगसे आँधी चली और फिर वायुसे प्रज्वलित होकर अग्नि वेगपूर्वक फैलने लगी। (इस प्रकार) अग्निदेव और पवनदेव दोनों दानवोंकी सेनामें क्रीड़ा करते हुए विचरने लगे ॥ ३६ ॥
भस्मावयवभूतेषु प्रपतत्सूत्पतत्सु च ।
दानवेषु विनष्टेषु कृतकर्मणि पावके ॥ ३७ ॥
(फिर क्या था ?) दानवलोग भस्म हो-होकर गिरने लगे और (वायुके वेगसे) उनकी राख उड़ने लगी। इस प्रकार अग्निका काम पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
वातस्कन्धापविद्धेषु विमानेषु समन्ततः ।
मायाबन्धे विनिर्वृत्ते स्तूयमाने गदाधरे ॥ ३८ ॥
(इधर) वायुके प्रचण्ड वेगसे आहत हो विमान सब ओर टूट-टूटकर गिरने लगे। मायाका बन्धन नष्ट हो गया तथा भगवान् विष्णुकी स्तुति होने लगी ॥ ३८ ॥
निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तबन्धने ।
सम्पहृष्टेषु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः ॥ ३९ ॥
दानवोंके प्रयत्न निष्फल हो गये, त्रिलोकीका बन्धन जाता रहा और देवता सब ओर अत्यन्त हर्षमें भरकर 'साधु-साधु' कहने लगे ॥ ३९ ॥
जये दशशताक्षस्य मयस्य च पराजये ।
दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मसंस्तरे ॥ ४० ॥
सहस्रनेत्रधारी इन्द्रकी विजय हुई और मय दानवकी पराजय। सम्पूर्ण दिशाएँ शुद्ध हो गयीं और सब ओर धर्म-का विस्तार होने लगा ॥ ४० ॥
अपावृत्ते चन्द्रपथे अयनस्थे दिवाकरे ।
प्रकृतिस्थेषु लोकेषु नृषु चारित्रबन्धुषु ॥ ४१ ॥
चन्द्रमाका मार्ग प्रशस्त हो गया। सूर्य अपने मार्ग-में स्थित हुए। तीनों लोक अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हो गये और मनुष्य सदाचारको ही अपना बन्धु (सहायक) मानने लगे ॥ ४१ ॥
अभिन्नबन्धने मृत्यौ हूयमाने हुताशने ।
यज्ञभागिषु देवेषु स्वर्गार्थं दर्शयत्सु च ॥ ४२ ॥
मृत्युकी मर्यादा नियत हो गयी। अग्निहोत्रका कार्य ठीक ढंगसे चलने लगा। देवता यज्ञोंमें भाग पाने तथा स्वर्ग-का मार्ग दिखाने लगे ॥ ४२ ॥
लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानवर्तिषु ।
भावे तपसि शुद्धानामभावे दुष्टकर्मणाम् ॥ ४३ ॥
समस्त लोकपाल अपनी-अपनी दिशामें निर्भय होकर विचरने लगे। शुद्धात्मा पुरुष तपस्यामे प्रवृत्त हो अभ्युदय-के भागी होने लगे तथा दुराचारी मनुष्योंका विनाश होने लगा ॥ ४३ ॥
देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति ।
त्रिपादविग्रहे धर्मे अधर्मे पादविग्रहे ॥ ४४ ॥
देवताओंका दल प्रसन्न रहने लगा। दैत्योंके समुदाय-पर विषाद छा गया। धर्मके तीन पैर जम गये और अधर्म-का एक ही पैर शेष रह गया ॥ ४४ ॥
अपावृतमहाद्वारे वर्तमाने च सत्पथे ।
स्वधर्मस्थेषु वर्णेषु लोकेऽस्मिन्नाश्रमेषु च ॥ ४५ ॥
जिसपर चलनेवाले पुरुषोंके लिये मोक्षका महान् द्वार खुल जाता है, वह सत्पुरुषोंका मार्ग पुनः चालू हो गया। इस जगत्‌में चारों वर्णों और चारों आश्रमोंके लोग अपने-अपने धर्मका पालन करने लगे ॥ ४५ ॥