विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 195, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उन दोनोंके द्वारा की गयी जलवर्षासे आप्लावित हुई वह दानवोंकी सेना प्रलयकालमें प्रबल वर्षा करनेवाले संवर्तक मेघोंके द्वारा अनन्त जलराशिमें डुबाये गये जगत्के समान दीखने लगी ॥ १६ ॥
तावुद्यतांशुपाशौ द्वौ शशाङ्कवरुणौ रणे ।
शमयामासतुर्मायां देवौ दैतेयनिर्मिताम् ॥ १७ ॥
( इस प्रकार ) चन्द्रदेव और वरुणदेव दोनों उस युद्धमें अपनी किरणों और पाशोंका प्रयोग करके दैत्योंकी रची हुई मायाका शमन करने लगे ॥ १७ ॥
शीतांशुजलनिर्दिग्धः पाशैश्च प्रसितारणे ।
न शेकुश्चलितुं दैत्या विशिरस्का इवाद्रयः ॥ १८ ॥
शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाके ( हिम ) जलसे अकड़े हुए और ( वरुणके ) पाशोंसे जकड़े हुए दैत्य रणमे शिखरहीन पर्वतोंकी भाँति हिल-डुल भी न सके ॥ १८ ॥
शीतांशुनिहतास्ते तु पेतुर्दैत्या हिमादिताः ।
हिमप्रावृतसर्वाङ्गा निरूष्माण इवाग्नयः ॥ १९ ॥
शीतरश्मि चन्द्रमाकी मार खाकर हिमसे पीड़ित हुए दैत्य पृथ्वीपर गिरने लगे । उनके सारे अङ्ग बर्फसे ढक गये थे । उस समय वे उष्णतारहित अग्निके समान जान पड़ते थे ॥ १९ ॥
तेषां तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि च ।
विमानानि विचित्राणि निपतन्त्युत्पतन्ति च ॥ २० ॥
फिर तो स्वर्गमें दैत्योंके विचित्र विमान प्रभाहीन होकर गिरने और गिरकर उछलने लगे ॥ २० ॥
तान् पाशहस्तग्रथिताञ्छादितान् हिमरश्मिना ।
मयो ददर्श मायावी दानवान् दिवि दानवः ॥ २१ ॥
मायावी दानव मयने देखा कि स्वर्गमें बहुत-से दानवोंको पाशधारी वरुणने जकड़ लिया है और बहुतोंको शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाने बर्फसे ढक दिया है ॥ २१ ॥
स शिलाजालविततां गण्डशैलाट्टहासिनीम् ।
पादपोत्कटकूटाग्रां कन्दराकीर्णकाननाम् ॥ २२ ॥
सिंहव्याघ्रगजाकीर्णां नदन्तीमिव यूथपैः ।
ईहामृगगणाकीर्णां पवनाघूर्णितद्रुमाम् ॥ २३ ॥
निर्मितां स्वेन पुत्रेण क्रौञ्चेन दिवि कामगाम् ।
प्रथितां पार्वतीं मायां ससृजे दानवोत्तमः ॥ २४ ॥
तब उस दानव-शिरोमणिने स्वर्गमे अपने पुत्र क्रौञ्चके द्वारा निर्मित सुप्रसिद्ध पार्वती मायाको प्रकट किया, जो इच्छानुसार सर्वत्र पहुँच जानेवाली थी । वह शिलाओंका विशाल जाल-सा बिछा देती थी, भारी-भारी चट्टानोंको गिरा-कर उनके धमाकेकी आवाजके रूपमें मानो अट्टहास करती थी । उन शिलाओंके शिरोभाग वृक्षोंके कारण खुरदरे हो रहे थे । उस पार्वती मायाके कानन-प्रान्त गुफाओंसे व्याप्त थे । वहाँ सिंह, व्याघ्र और बड़े-बड़े गजराज भरे हुए थे । यूथ-पतियोंके चिग्घाड़ने या दहाड़नेके शब्दसे मानो वह माया सिंहनाद-सा करती प्रतीत होती थी । उस मायामयी पर्वत-मालामें सब ओर भेड़िये भरे थे । वहाँके वृक्ष प्रचण्ड वायुके झोंके खाकर झूम रहे थे ॥ २२—२४ ॥
साश्मशब्दैः शिलावर्षैः सम्पतद्भिश्च पादपैः ।
निजघ्ने देवसंघांस्तान् दानवांश्चाप्यजीचयत् ॥२५॥
उस पार्वती मायाने चट्टानोंके टकरानेकी आवाजसे, पत्थरोंकी वर्षासे और गिरते हुए वृक्षसमूहोंसे देवसमुदायको मारना आरम्भ किया । इससे दैत्योंके जीमें-जी आया ॥ २५॥
नैशाकरी वारुणी च मायेऽन्तर्दधतस्ततः ।
अश्मभिश्चायसघनैः कीर्णा देवगणा रणे ॥ २६ ॥
उस दैत्यकी मायाके प्रभावसे वरुण और चन्द्रमा—दोनों-की मायाएँ अदृश्य हो गयीं । रणभूमिमें देवताओंपर प्रस्तर और लोहेके घन बरसने लगे ॥ २६ ॥
साश्मसंघातविषमा द्रुमपर्वतसंकटा ।
अभवद् घोरसंचारा पृथिवी पर्वतैरिव ॥ २७ ॥
जैसे पर्वतोंके कारण वहाँकी भूमिपर चलना कठिन हो जाता है, उसी प्रकार वहाँ गिरे हुए शिलाखण्डोंके समूहसे विषम और वृक्ष एवं पर्वतोंके बिछ जानेसे संकीर्ण हुई उस रणभूमिमे चलना-फिरना दूभर हो गया था ॥ २७ ॥
नानाहतोऽश्मभिः कश्चिच्छिलाभिश्चाप्यताडितः ।
नानिरुद्धो द्रुमगणैर्देवोऽदृश्यत संयुगे ॥ २८ ॥
उस युद्धमें ऐसा कोई देवता नहीं दिखायी देता था, जिसके शरीरपर पत्थरोंसे चोट न आयी हो, जिसपर शिलाओं-की मार न पड़ी हो तथा जो सब ओर गिरें हुए वृक्ष-समूहोंसे अवरुद्ध न हो गया हो ॥ २८ ॥
तदपभ्रष्टधनुषं भग्नप्रहरणाविलम् ।
निष्प्रयत्नं सुरानीकं वर्जयित्वा गदाधरम् ॥ २९ ॥
उस समय भगवान् गदाधरको छोड़कर शेष देवताओंकी वह सारी सेना निरुपाय एवं निश्चेष्ट हो गयी थी । सबके हाथसे धनुष नीचे गिर गये थे और आयुधोंके टूट जानेसे सबके मुखपर मलिनता छा गयी थी ॥ २९ ॥
स हियुद्वागतः श्रीमानीशो न स्म व्यकम्पत ।
सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी न चुक्रोध गदाधरः ॥ ३० ॥
अवश्य ही युद्धमे विराजमान श्रीमान् भगवान् विष्णु उस समय भी कम्पित नहीं हुए और सहनशील होनेके कारण