विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| १७४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ।
गीयमानासु गाथासु देवसंस्तवनादिषु ॥ ४६ ॥
सभी नरेश प्रजापालनमें तत्पर रहकर विशेष शोभा पाने लगे। देवताओंकी स्तुतिसे युक्त गाथाओंका सब ओर गान होने लगा ॥ ४६ ॥
प्रशान्तकलुषे लोके शान्ते तपसि दारुणे ।
अग्निमारुतयोस्तस्मिन् वृत्ते संग्रामकर्मणि ।
तन्मया विमला लोकास्ताभ्यां जयकृतप्रियाः ॥ ४७ ॥
सब लोगोंका कलुष शान्त हो गया। दारुण या कठोर तपस्या शान्त एवं मृदुल तपके रूपमें परिणत हो गयी। अग्नि और वायुदेवका वह युद्धविषयक महान् पराक्रम जब पूर्ण हो गया, तब निर्मल (प्रसन्न) हुए जगत्मे उन्हींकी प्रधानता हो गयी; क्योंकि उनकी विजयने लोगोंका प्रिय कार्य किया था ॥ ४७ ॥
पूर्वदेवभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत् ।
कालनेमिरिति ख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत ॥ ४८ ॥
अग्नि और वायुने दैत्योंपर महान् भय उपस्थित कर दिया है—यह सुनकर 'कालनेमि' नामसे विख्यात दानव उनके सामने आया ॥ ४८ ॥
भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः ।
मन्दराचलसंकाशो महारजतसंवृतः ॥ ४९ ॥
उसके मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी मुकुट शोभा दे रहा था। उसने पैर आदिमें खन-खन शब्द करनेवाले नूपुर आदि आभूषण तथा भुजाओंमें बाजूबन्द धारण कर रखे थे। बहुमूल्य चाँदीके कवचसे आवृत होनेके कारण वह मन्दराचल-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ४९ ॥
शतप्रहरणोद्यग्रः शतबाहुः शताननः ।
शतशीर्षो स्थितः श्रीमांञ्छतशृङ्ग इवाचलः ॥ ५० ॥
उसने अपनी सौ भुजाओंमें उतने ही आयुध धारण किये थे, इसलिये वह अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था। उसके मुख भी सौ ही थे। सौ मस्तकोंसे युक्त वह तेजस्वी दानव जब खड़ा होता था, उस समय सौ शिखरोंसे सुशोभित पर्वतके समान जान पड़ता था ॥ ५० ॥
कक्षे महति संवृद्धे हिमान्त इव पावकः ॥ ५१ ॥
इतना ही नहीं, वह ग्रीष्म ऋतुमें सूखे वृक्षोंसे भरे हुए विशाल वनके भीतर प्रज्वलित हुए दावानलके समान देदीप्यमान हो रहा था ॥ ५१ ॥
धूम्रकेशो हरिच्छ्मश्रुर्दंष्ट्रालोष्ठपुटाननः ।
त्रैलोक्यान्तरविस्तारो धारयन् विपुलं वपुः ॥ ५२ ॥
उसके केश धूम्रवर्णके थे; किंतु मूँछें हरे रंगकी दिखायी देती थीं। उसकी दाढ़ें ओठोंसे बाहर निकली हुई थीं, जिससे उसके मुखकी अद्भुत शोभा होती थी। उसने ऐसा विशाल शरीर धारण कर रखा था, जो तीनों लोकोंमें फैला हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ५२ ॥
बाहुभिस्तुलयन् व्योम क्षिपन् पद्भ्यां महीधरान् ।
ईरयन् मुखनिःश्वासैर्वृष्टिमन्तो वलाहकान् ॥ ५३ ॥
वह अपनी भुजाओंसे आकाशको तौल रहा था, पैरोंकी ठोकरोंसे कितने ही पर्वतोंको दूर फेंक देता था और मुखके निःश्वासोंसे वर्षा करनेवाले बादलोंको उड़ा देता था ॥ ५३ ॥
तिर्यगायतरक्ताक्षं मन्दरोत्थग्रवर्चसम् ।
दिधक्षन्तमवायान्तं सर्वान् देवगणान् मृधे ॥ ५४ ॥
उसके नेत्र विशाल और लाल थे। वह तिरछी दृष्टिसे देखा करता था। मन्दर अर्थात् स्वर्गलोकके सर्वश्रेष्ठ देवता देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी जान पड़ता था। उसे देखकर ऐसा लगता था, मानो वह युद्धमें सम्पूर्ण देवताओंको भस्म कर डालनेकी इच्छासे आ रहा हो ॥ ५४ ॥
तर्जयन्तं सुरगणान्छादयन्तं दिशो दश ।
संवर्तकाले क्षुधितं दृप्तं मृत्युमिवोत्थितम् ॥ ५५ ॥
वह देवताओंको डाँट बताता और दसों दिशाओंको आच्छादित करता आ रहा था। ऐसा जान पड़ता था मानो प्रलयकालमें दर्पसे भरा हुआ भूखा काल उठ खड़ा हुआ हो ॥ ५५ ॥
सुतलेनोच्छ्रितवता विपुलाङ्गुलिपर्वणा ।
माल्याभरणपूर्णेन किञ्चिच्चलितवर्मणा ॥ ५६ ॥
उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता ।
दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रुवन् ॥ ५७ ॥
जिसकी हथेली बहुत सुन्दर थी, अँगुलियोंके पर्व पुष्ट थे, जो मालाकार आभूषण (वलय) से सुशोभित था तथा जिसका कवच कुछ खिसक गया था, ऐसे ऊँचे उठाये हुए मोटे-ताजे दाहिने हाथके अग्रभागसे वह देवताओंकी मार खाकर गिरे हुए दानवोंको उठनेका संकेत करके कह रहा था, कि (वीरो!) उठकर खड़े हो जाओ ॥ ५६-५७ ॥
तं कालनेमिं समरे द्विषतां कालसंनिभम् ।
वीक्षन्ति स्म सुराः सर्वे भयविक्षुब्धमानसाः ॥ ५८ ॥
शत्रुओंके लिये कालके समान भयंकर वह कालनेमि नामक दानव जब समरभूमिमें आया, उस समय वहाँ खड़े हुए समस्त देवता भयभीत चित्तसे उसकी ओर देखने लगे ॥ ५८ ॥
तं स्म वीक्षन्ति भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम् ।
त्रिविक्रमं विक्रमन्तं नारायणमिवापरम् ॥ ५९ ॥
ऊँचे-ऊँचे पग उठाकर आक्रमण करते हुए उस काल-
हरिवंशपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः १७५
नेमिको समस्त प्राणियोंने त्रिविक्रमरूपसे तीनों लोकोंको नापनेके लिये पैर बढ़ाते हुए दूसरे नारायणके समान देखा ॥ ५९ ॥
सोच्छ्रयन् प्रथमं पादं मारुताघूर्णिताम्बरः ।
प्राक्रामच्छत्रुरो युद्धे त्रासयन् सर्वदेवताः ॥ ६० ॥
सम्पूर्ण देवताओंको त्रास देते हुए उस असुरने जब युद्धमें अपना पहला कदम उठाकर रखा, उस समय हवाके झोंकेसे उसके वस्त्र फहराने लगे ॥ ६० ॥
स मयेनासुरेन्द्रेण परिष्वक्तः क्रमन् रणे ।
कालनेमिर्बभौ दैत्यः विष्णुनेव पुरंदरः ॥ ६१ ॥
रणभूमिमें विचरते हुए उस दानवराजको असुरराज मयने आगे बढ़कर हृदयसे लगा लिया। उस समय मयके साथ कालनेमि दैत्यकी वैसे ही शोभा हुई, जैसे भगवान् विष्णुसे देवराज इन्द्र सुशोभित होते हैं ॥ ६१ ॥
अथ विव्यथिरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।
दृष्ट्वा कालमिवायान्तं कालनेमिं भयावहम् ॥ ६२ ॥
कालके समान भयंकर कालनेमिको आते देख इन्द्र आदि सब देवता भयसे व्यथित हो उठे ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि कालनेमिप्रक्रमणे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें कालनेमिका आक्रमणविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
कालनेमिका युद्ध और प्रभाव
वैशम्पायन उवाच
दानवांश्चापि पिप्रीषुः कालनेमिर्महासुरः ।
न्यवर्धत महातेजास्तपान्ते जलदो यथा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जैसे गर्मीके अन्तमें वर्षाकाल आनेपर मेघ बढ़ता है, उसी प्रकार महातेजस्वी महान् असुर कालनेमि दानवोंको पुष्ट करनेकी इच्छासे बढ़ने लगा ॥ १ ॥
त्रैलोक्यान्तर्गतं तं तु दृष्ट्वा ते दानवेश्वराः ।
उत्तस्थुरपरिश्रान्ताः प्राप्येवामृतमुत्तमम् ॥ २ ॥
उसे तीनों लोकोंमे फैला हुआ देखकर वे सभी दानवराज इस प्रकार सहसा उठ खड़े हुए मानो उन्हें उत्तम अमृत मिल गया हो। उस समय उनकी सारी थकावट दूर हो गयी थी ॥ २ ॥
ते वीतभयसंत्रासा मयतारपुरोगमाः ।
तारकामयसंग्रामे सततं जयकाङ्क्षिणः ।
रेजुरोधनगता दानवा युद्धकाङ्क्षिणः ॥ ३ ॥
वे मय और तार आदि सभी दानव कालनेमिके आ जानेसे भय और त्राससे रहित हो गये, अतः उस तारकामय संग्राममें निरन्तर विजयकी अभिलाषा रखते हुए युद्धकी आकाङ्क्षासे रणभूमिमे खड़े हो शोभा पाने लगे ॥ ३ ॥
अस्त्रमभ्यस्यतां तेषां व्यूहं च परिधावताम् ।
प्रेक्षतां चाभवत् प्रीतिर्दानवं कालनेमिनम् ॥ ४ ॥
उस समय अस्त्रोंका अभ्यास करते और व्यूहमें सब ओर दौड़ लगाते हुए उन दैत्योंको कालनेमि दानवके दर्शनसे बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥
ये तु तत्र मयस्यासन् मुख्या युद्धपुरस्सराः ।
तेऽपि सर्वे भयं त्यक्त्वा हृष्टा योद्धुमुपस्थिताः ॥ ५ ॥
वहाँ जो भी मयके मुख्य-मुख्य सेनापति उपस्थित थे, वे सभी भय छोड़कर हर्ष और उत्साहके साथ युद्धके लिये डट गये ॥ ५ ॥
मयस्तारो वराहश्च हयग्रीवश्च वीर्यवान् ।
विप्रचित्तिसुतः श्वेतः खरकम्बावुभावपि ॥ ६ ॥
अरिष्टो बलिपुत्रस्तु किशोरोष्ट्रौ तथैव च ।
खर्भानुश्चामरप्रख्यो वक्रयोधी महासुरः ॥ ७ ॥
एतेऽस्त्रविदुषः सर्वे सर्वे तपसि सुव्रताः ।
दानवाः कृतिनो जग्मुः कालनेमिनमुत्तमम् ॥ ८ ॥
मय, तार, वराह, पराक्रमी हयग्रीव, विप्रचित्तिकुमार श्वेत तथा खर और लम्ब—ये दो दानव एवं बलिपुत्र अरिष्ट, किशोर, उष्ट्र तथा देवताके समान तेजस्वी एवं कुटिलतापूर्वक युद्ध करनेवाला महान् असुर स्वर्भानु—ये सभी अस्त्रवेत्ता और तपस्यामे नियमपूर्वक स्थित रहनेवाले विद्वान् और कुशल दानव उस उत्तम असुर कालनेमिके पास जा पहुँचे ॥ ६-८ ॥
ते गदाभिश्च गुर्वीभिश्चक्रैश्च सपरश्वधैः ।
अश्मभिश्चाद्रिसदृशैर्गण्डशैलैश्च दंशितैः ॥ ९ ॥
पट्टिशैर्भिन्दिपालैश्च परिघैश्चोत्तमायुधैः ।
घातनीभिश्च गुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च ॥ १० ॥
कालकल्पैश्च मुसलैः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ।
युगैर्यन्त्रैश्च निर्मुक्तैर्गलैश्चाग्रताडितैः ॥ ११ ॥
दोर्भिरायतपीनांसैः पाशैः प्रासैश्च मूर्च्छितैः ।
सर्पैर्लेलिहमानैश्च विसर्पद्भिश्च सायकैः ॥ १२ ॥
| १७६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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वज्रैः प्रहरणीयैश्च दीप्यमानैश्च तोमरैः ।
विकोशैश्चासिभिस्तीक्ष्णैः शूलैश्च शितनिर्मलैः ॥ १३ ॥
ते वै संदीप्तमनसः प्रगृहीतोत्तमायुधाः ।
कालनेमिं पुरस्कृत्य तस्थुः संग्राममूर्धनि ॥ १४ ॥
वे सब हर्षसे उत्फुल्ल हृदयवाले दानव हाथोंमें उत्तम आयुध धारण किये, कालनेमिको आगे रखकर उसके सेनापतित्वमें युद्ध करनेके लिये संग्रामके मुहानेपर डट गये। कितने ही दानव अपने चौड़े और पुष्ट कंधोंसे युक्त हाथोंसे ही आयुधोंका काम लेते थे तथा बहुतेरे दैत्य भारी गदा, चक्र, फरसा, पर्वतोंके समान शिलाओंकी बड़ी-बड़ी चट्टान, वज्र आदिके आघातसे टूटकर गिरे हुए शिलाखण्ड, पट्टिश, भिन्दिपाल, परिघ, अन्यान्य उत्तम आयुध, संहार करनेमें समर्थ और सैकड़ोंके प्राण लेनेवाली बड़ी भारी तोपें, कालके समान भयंकर मूसल, क्षेपणीय (गुलेल आदि), मुद्गर, युग (जुआ), खुले हुए यन्त्र, जिसके सिरेको हथौड़ेसे पीटकर तेज किया गया हो ऐसी अर्गला (डंडेला), फैले हुए पाश, प्रास (भाला), जीभ लपलपाते हुए सर्प, तीव्रगतिसे लक्ष्यकी ओर बढ़नेवाले बाण, प्रहार करने योग्य वज्र, दीप्तिमान् तोमर, नंगी तीखी तलवार और तेज किये हुए चमकीले शूल आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये डट गये ॥ ९-१४ ॥
सा दीप्तशस्त्रप्रवरा दैत्यानां शुशुभे चमूः ।
द्यौर्निमीलितनक्षत्रा सघनेवाम्बुदागमे ॥ १५ ॥
जहाँ चमकते हुए श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र विद्युत्की भाँति प्रकाशित हो रहे थे, वह दानवसेना वर्षाकालमें छिपे हुए नक्षत्रवाले मेघ और बिजलीसे युक्त आकाशके समान शोभा पा रही थी ॥ १५ ॥
देवतानामपि चमू रुरुचे शक्रपालिता ।
दीप्ता शीतोष्णतेजोभ्यां चन्द्रभास्करवर्चसा ॥ १६ ॥
इधर चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभासे उद्भासित तथा उनके शीतल और उष्ण तेजके द्वारा देदीप्यमान हुई वह इन्द्रपालित देवसेना भी अनुपम शोभासे सम्पन्न हो रही थी ॥ १६ ॥
वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी ।
तोयदाविद्धवसना ग्रहनक्षत्रहासिनी ॥ १७ ॥
यमेन्द्रधनदैर्गुप्ता वरुणेन च धीमता ।
सप्रदीप्ताग्निपवना नारायणपरायणा ॥ १८ ॥
सा समुद्रौघसदृशी दिव्या देवमहाचमूः ।
रराजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धर्वशालिनी ॥ १९ ॥
वायुके समान वेगवती तथा सौम्य भावसे सम्पन्न देवताओंकी वह दिव्य एवं विशाल सेना तारागणोंको पताकारूपमें धारण करती थी, मेघमय वस्त्रोंसे आच्छन्न थी तथा ग्रह और नक्षत्र मानो उसके शुभ्र हास थे। यम, इन्द्र, कुबेर और बुद्धिमान् वरुणके द्वारा उसकी रक्षा की जा रही थी। उसमें प्रकाशमान अग्नि और वायुदेव भी विद्यमान थे। वह भगवान् नारायणके आश्रित थी। देखनेमें उमड़े हुए समुद्रकी अगाध जलराशिके समान जान पड़ती थी। विविध प्रकारके अस्त्रोंसे सम्पन्न होनेके कारण भयंकर प्रतीत होती थी तथा यक्ष और गन्धर्व उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १७-१९ ॥
तयोश्चम्वोस्तदा तत्र बभूव स समागमः ।
द्यावापृथिव्योः संयोगो यथा स्याद् युगपर्यये ॥ २० ॥
जैसे प्रलयकालमें द्युलोक और पृथ्वी—दोनों एक दूसरेसे टकराते हैं, उसी प्रकार उन दोनों सेनाओमें उस समय वहाँ गहरी भिड़ंत हुई ॥ २० ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम् ।
क्षमापराक्रममयं दर्पस्य विनयस्य च ॥ २१ ॥
देवताओं और दानवोंसे भरा हुआ वह युद्ध बड़ा भयंकर हो चला। एक ओर उदारतापूर्ण क्षमा थी तो दूसरी ओर क्रूरतापूर्ण पराक्रम ! यह दर्प और विनयका युद्ध था ॥ २१ ॥
निष्क्रम्युर्बलाभ्यां तु ताभ्यां भीमाः सुरासुराः ।
पूर्वापराभ्यां संरब्धाः सागराभ्यामिवाम्बुदाः ॥ २२ ॥
उन दोनों सेनाओंसे रोषमें भरे हुए भयंकर देवता और असुर निकले (तथा युद्धके लिये आगे बढ़े); ठीक उसी तरह जैसे पूर्व और पश्चिमके समुद्रोंसे क्षुब्ध मेघ प्रकट हुए हों ॥ २२ ॥
ताभ्यां चलाभ्यां संहृष्टाश्चेरुरस्ते देवदानवाः ।
वनाभ्यां पर्वतीयाभ्यां पुष्पिताभ्यां यथा गजाः ॥ २३ ॥
उन दोनों सेनाओंसे हर्ष और उत्साहमें भरे हुए देवता और दानव युद्धके लिये निकले, मानो फूलोंसे सुशोभित दो पर्वतीय वनोंसे बहुसंख्यक हाथी निकल आये हों ॥ २३ ॥
समाजघ्नुस्ततो भेरीः शङ्खान् दध्मुश्च नैकशः ।
स शब्दो द्यां भुवं चैव दिशश्च समपूरयत् ॥ २४ ॥
उस समय दोनो दलोंके सैनिक बारंबार नगाड़े पीटने और शङ्ख बजाने लगे। वाद्योंका वह तुमुल नाद पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें भर गया ॥ २४ ॥
ज्याघाततलनिर्घोषो धनुषां कूजितानि च ।
दुन्दुभीनां निनदतां दैत्यानां निर्दधुः स्वनान् ॥ २५ ॥
प्रत्यञ्चा खींचनेसे जो शब्द होता था, धनुषोंकी जो टंकार-ध्वनि होती थी तथा बजती हुई दुन्दुभियोंका जो गम्भीर नाद होता था, उन सबने मिलकर दैत्योंके गर्जन-तर्जनकी आवाजको छिपा दिया ॥ २५ ॥
[हरिवंशपर्व] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः १७७
तेऽन्योन्यमभिसम्पत्य पातयन्तः परस्परम्।
बभञ्जुर्बाहुभिर्बाहून् द्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः॥ २६॥
वे देवता और दानव एक दूसरेपर टूट पड़े और अपने-अपने प्रतिद्वन्द्वीको धराशायी करने लगे। द्वन्द्वयुद्धकी इच्छा रखनेवाले अन्यान्य योद्धाओंने अपनी भुजाओंद्वारा शत्रुओंकी भुजाएँ तोड़ डालीं ॥ २६ ॥
देवतास्त्वशनीर्घोराः परिघांश्चोत्तमायसान्।
ससर्जुरजौ निस्त्रिंशान् गदा गुर्वीश्च दानवाः ॥ २७ ॥
देवतालोग युद्धमें भयंकर वज्र तथा अच्छे लोहेके बने हुए परिघका प्रयोग करने लगे और दानव उनके ऊपर तलवारें और भारी गदाएँ चलाने लगे ॥ २७ ॥
गदानिपातैर्भग्नाङ्गा बाणैश्च शकलीकृताः।
परिपेतर्भृशं केचिन्न्युब्जाः केचित् ससर्जिरे ॥ २८ ॥
गदाओंके आघातसे कितने ही योद्धाओंके अङ्ग चूर-चूर हो गये, कितनोंके शरीर बाणोंकी चोट खाकर टुकड़े-टुकड़े हो गये, कितने ही गहरी चोटसे पछाड़ खाकर पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही पीठ ऊपर किये औंधे मुँह लुढ़क गये ॥ २८ ॥
ततो रथैः सतुरगैर्विमानैश्चाशुगामिभिः।
समीयुस्ते तु संरब्धा रोषादन्योन्यमाहवे ॥ २९ ॥
तदनन्तर उस समराङ्गणमें रोषावेशसे भरे हुए उभय-पक्षके सैनिक घोड़े जुते हुए रथों और शीघ्रगामी विमानों-द्वारा आगे बढ़कर एक दूसरेसे भिड़ गये ॥ २९ ॥
संवर्तमानाः समरे विवर्तन्तस्तथापरे।
रथा रथैर्निरुध्यन्ते पदाताश्च पदातिभिः ॥ ३० ॥
रणभूमिमें कितने ही रथी और पैदल योद्धा शत्रुके सामने आते और कितने ही पीठ दिखाकर भागने लगते थे। उस समय उन रथियोंको रथी और पैदलोंको पैदल योद्धा सामने आकर रोक लेते थे ॥ ३० ॥
तेषां रथानां तुमुलः स शब्दः शब्दवाहिनाम्।
बभूवाथ प्रसक्तानां नभसीव पयोमुचाम् ॥ ३१ ॥
घरघराहटकी आवाजके साथ आगे बढ़नेवाले उन रथियोंके रथोंका तुमुल नाद आकाशमे परस्पर टकरानेवाले बादलोंकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ता था ॥ ३१ ॥
बभञ्जिरे रथान् केचित् केचित् सम्मृदिता रथैः।
सम्बाधमेके सम्प्राप्य न शेकुश्चलितुं रथाः ॥ ३२ ॥
कितने ही रथोंने विपक्षियोंके रथोंको तोड़ डाल और कितने ही शत्रुपक्षके रथोंसे रौंदे जाकर धूलमें मिल गये। दूसरे बहुत-से रथ अन्यान्य रथोंद्वारा मार्ग अवरुद्ध हो जानेके कारण आगे बढ़नेमें असमर्थ हो गये ॥ ३२ ॥
अन्योन्यस्याभिसमरे दोर्भ्यामुत्क्षिप्य दर्पिताः।
संहादमानाभरणा जघ्नुस्तत्रासिचर्मिणः ॥ ३३ ॥
कितने ही दर्पमें भरे हुए योद्धा समराङ्गणमें एक दूसरेके शरीरको अपनी दोनों भुजाओंमें दूर हटाकर आगे बढ़ जाते थे। वहाँ ढाल ओर तलवार लिये हुए सैनिक जब शत्रुपर प्रहार करते थे, उस समय उनके आभूषण झंकृत हो उठते थे ॥ ३३ ॥
अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना रक्तं वेमुर्हता युधि।
क्षरज्जालानां सदृशा जलदानां समागमे ॥ ३४ ॥
दूसरे बहुत-से सिपाही, जो युद्धस्थलमें मारे जाकर अस्त्रों-से विदीर्ण हो गये थे, उसी प्रकार रक्त वमन करते थे, जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी घटाएँ घिर आनेपर वर्षा करनेवाले बादल जलकी धारा गिराते हैं ॥ ३४ ॥
तदस्त्रशस्त्रग्रथितं क्षिप्तोत्क्षिप्तगदाविलम्।
देवदानवसंक्षुब्धं संकुलं युद्धमाबभौ ॥ ३५ ॥
वह संग्राम अस्त्र-शस्त्रोंसे गुँथ गया था, दोनों ओरसे फेंकी और उछाली जानेवाली गदाओंसे मलिन हो रहा था तथा देवता और दानवोंके क्षोभसे व्याप्त होकर अत्यन्त भयानक प्रतीत होता था ॥ ३५ ॥
तद् दानवमहामेघं देवायुधतडित्प्रभम्।
अन्योन्यबाणवर्षं तद् युद्धं दुर्दिनमाबभौ ॥ ३६ ॥
वह युद्ध एक दुर्दिनके समान जान पड़ता था। उसमें दानव ही महान् मेघोंकी घटाके समान घिर आये थे, देवताओं-के चमकीले अस्त्र-शस्त्र विद्युत्की-सी प्रभा बिखेर रहे थे तथा दोनों दलोंकी ओरसे एक दूसरेपर जो बाणोंकी बौछार हो रही थी, वही मानो वर्षा थी ॥ ३६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः कालनेमिर्महासुरः।
व्यवेद्धत समुद्रौघैः पूर्यमाण इवाम्बुदः ॥ ३७ ॥
इसी बीचमें कुपित हुआ महान् असुर कालनेमि समुद्रकी जलराशिसे परिपूर्ण होकर बढ़नेवाले मेघके समान अपना विशाल रूप प्रकट करने लगा ॥ ३७ ॥
तस्य विद्युच्चलापीडाः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः।
गात्रे नगशिरःप्रख्या विनिपेतुर्वलाहकाः ॥ ३८ ॥
मस्तकपर बिजलीके चञ्चल आभूषण धारण किये, प्रज्वलित वज्रकी वर्षा करनेवाले, पर्वतशिखरोंके समान विशालकाय बादल उसके शरीरसे टकराकर चूर-चूर हो जाते थे ॥ ३८ ॥
क्रोधात्रिःश्वसतस्तस्य भ्रूभेदस्वेदवर्षिणः।
साग्निनिष्पेषपवना मुखाद्विनिश्चेरुरर्चिषः ॥ ३९ ॥
जब वह क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचता था, उस समय उसकी भौंहोंमें बल पड़नेसे पसीनेकी बूँदें टपकने लगती थीं
| १७८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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और मुखसे वज्र तथा प्रचण्ड वायुसे युक्त आगकी लपटें निकलती रहती थीं॥ ३९॥
तिर्यगूर्ध्वं च गगने ववृधुस्तस्य बाहवः।
पञ्चास्याः कृष्णवपुषो लेलिहाना इवोरगाः॥ ४०॥
उसकी भुजाएँ आकाशमें तिरछी और ऊपरकी दिशामें बढ़ने लगीं। वे ऐसी जान पड़ती थीं, मानो पाँच मुखवाले काले सर्प अपनी जीभ लपलपा रहे हों॥ ४०॥
सोऽस्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिघैरपि।
दिव्यैराकाशमावव्रे पर्वतैरुच्छ्रितैरिव॥ ४१॥
जैसे ऊँचे पर्वत आकाशको घेर लेते हैं, उसी प्रकार उसके चलाये हुए नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र-शस्त्र, धनुष और परिघोंने व्योम-मार्गको ढक दिया॥ ४१॥
सोऽनिलोद्धूतवसनस्तस्थौ संग्राममूर्धनि।
संध्यातपग्रस्तशिखः सार्चिर्मेरुरिवापरः॥ ४२॥
वह युद्धके मुहानेपर खड़ा था और वायुके वेगसे उसके वस्त्र ऊपरकी ओर फहरा रहे थे। उस समय वह संध्याकालकी धूपसे व्याप्त शिखरवाले प्रकाशयुक्त दूसरे मेरुके समान शोभा पाता था॥ ४२॥
ऊरुवेगप्रतिक्षिप्तैः शैलशृङ्गाग्रपादपैः।
अपातयद् देवगणान् वज्रेणेव महागिरीन्॥ ४३॥
अपनी जाँघोंके वेगसे फेंके गये शैल-शिखरों और बड़े-बड़े वृक्षोंद्वारा वह देवताओंको उसी तरह धराशायी करने लगा, जैसे इन्द्रने वज्रसे महान् पर्वतोंको पृथ्वीपर गिरा दिया था॥ ४३॥
बाहुभिः शस्त्रनिस्त्रिंशैश्छिन्नभिन्नशिरोरसः।
न शेकुश्चलितुं देवाः कालनेमिहता युधि॥ ४४॥
उस युद्धमें कालनेमिकी मार खाकर घायल हुए देवता चलने-फिरनेकी भी शक्ति खो बैठे। उसकी भुजाओंके आघात-से तथा शस्त्रों एवं खड्गोंकी चोटसे उनके मस्तक और वक्षः-स्थल छिन्न-भिन्न हो गये थे॥ ४४॥
मुष्टिभिर्निहताः केचित् केचिच्च विदलीकृताः।
यक्षगन्धर्वपतयः पेतुः सह महोरगैः॥ ४५॥
कितने ही यक्ष, गन्धर्वराज और बड़े-बड़े नाग उसके मुक्कोंकी मारसे मर गये और कितने ही विदीर्ण होकर पृथ्वी-पर गिर पड़े॥ ४५॥
तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना।
न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि प्रतिकर्तुं विचेतसः॥ ४६॥
उस युद्धमें कालनेमिने देवताओंको इतना भयभीत कर दिया कि वे अपनी सुध-बुध खो बैठे और बहुत यत्न करके भी उसका कोई प्रतीकार न कर सके॥ ४६॥
तेन शक्रः सहस्राक्षः स्तम्भितः शरबन्धनैः।
ऐरावतगतः संख्ये चलितुं न शशाक ह॥ ४७॥
उसने रणभूमिमें ऐरावतपर बैठे हुए सहस्रनेत्रधारी इन्द्रको बाणोंके बन्धनसे बाँधकर स्तब्ध कर दिया। वे वहाँसे चलनेमें भी असमर्थ हो गये॥ ४७॥
निर्जलाम्भोदसदृशो निर्जलार्णवसप्रभः।
निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो वरुणो मृधे॥ ४८॥
समराङ्गणमें कालनेमिने वरुणका पाश छीनकर उन्हें उससे वञ्चित कर दिया; अतः उनका युद्धविषयक सारा व्यापार ठप हो गया। वे निर्जल बादल और बिना पानीके समुद्रकी भाँति श्रीहीन हो गये॥ ४८॥
रणे वैश्रवणस्तेन परिघैः कालरूपिभिः।
व्यलपल्लोकपालेशस्त्याजितो धनदक्रियाम्॥ ४९॥
उस रणक्षेत्रमें उसके कालरूपी परिघोंकी मार खाकर लोकपालेश्वर कुबेर विलाप करने लगे। उसने उनसे धनाध्यक्ष कुबेरके कार्यका बलपूर्वक त्याग करा दिया॥ ४९॥
यमः सर्वहरस्तेन दण्डप्रहरणो रणे।
याम्यामवस्थां समरे नीतः स्वां दिशमाविशत्॥ ५०॥
सबके प्राण लेनेवाले दण्डधारी यमको भी उसने रणभूमि-में याम्यदशा (अचेतनावस्था) को पहुँचा दिया, अतः वे भयभीत होकर अपनी दक्षिण दिशामें घुस गये॥ ५०॥
स लोकपालानुत्साद्य कृत्वा तेषां च कर्म तत्।
दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धा विदधे तदा॥ ५१॥
इस प्रकार समस्त लोकपालोंको दूर भगाकर उसने उन सबके कार्यका सम्पादन अपने हाथमे ले लिया और सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थापित करनेके लिये अपने शरीरको चार प्रकार-का बना लिया॥ ५१॥
स नक्षत्रपथं गत्वा दिव्यं स्वर्भानुदर्शितम्।
जहार लक्ष्मीं सोमस्य तं चास्य विषयं महत्॥ ५२॥
उसने राहुके दिखाये हुए दिव्य नक्षत्रपथमे जाकर राजा सोमकी राजलक्ष्मी तथा उनके विशाल राज्यका भी अपहरण कर लिया॥ ५२॥
चालयामास दीप्तांशुं स्वर्गद्वारात् स भास्करम्।
सायनं चास्य विषयं जहार दिनकर्म च॥ ५३॥
उसने उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यको स्वर्गद्वारसे हटा दिया तथा अयनसहित उनके सारे राज्य और दिन-सम्बन्धी कर्मको भी उनसे छीनकर अपने अधिकारमे कर लिया॥ ५३॥
सोऽग्निं देवमुखे दृष्ट्वा चकारात्ममुखे स्वयम्।
वायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम्॥ ५४॥
कालनेमिने अग्निको देवताओंके मुखमे स्थित देख
हरिवंशपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः १७९
स्वयं बलपूर्वक उन्हें अपने मुखमें स्थापित किया और वायुको भी वेगसे पराजित करके अपनी आज्ञाके अधीन कर लिया ॥ ५४ ॥
ससमुद्राः समानीय सर्वाश्च सरितो बलात् । चकारात्मवशे वीर्याद् देहभूताश्च सिन्धवः ॥ ५५ ॥
समुद्रोंसहित सम्पूर्ण सरिताओंको बलपूर्वक ले आकर कालनेमिने अपने पराक्रमसे उन सबको वशमें कर लिया । समस्त सागर उसके शरीररूप हो गये थे ॥ ५५ ॥
अपः खवशगाः कृत्वा दिविजा याश्च भूमिजाः । स्थापयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः ॥ ५६ ॥
उसने आकाश और पृथ्वीके जलको अपने वशमें करके उसके ऊपर पर्वतोंद्वारा सुरक्षित पृथ्वीको स्थापित किया ॥ ५६ ॥
स स्वयम्भूरिवाभाति महाभूतपतिर्महान् । सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वलोकभयावहः ॥ ५७ ॥
समस्त लोकोंको भय देनेवाला वह महान् दैत्य पञ्च-महाभूतोंका अधिपति एवं सर्वलोकमय होकर स्वयम्भू ब्रह्माके समान शोभा पाने लगा ॥ ५७ ॥
स लोकपालैकवपुश्चन्द्रसूर्यग्रहात्मवान् । पावकानिलसंघातो रराज युधि दानवः ॥ ५८ ॥
उस युद्धस्थलमें दानव कालनेमि एकमात्र स्वयं ही समस्त लोकपालोंके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ था । चन्द्रमा, सूर्य और अन्य ग्रह सबके रूपमें उसका शरीर ही काम कर रहा था । अग्नि और वायु भी उसके शरीर बन गये थे, इस प्रकार उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ५८ ॥
पारमेष्ठ्ये स्थितः स्थाने लोकानां प्रभवाप्यये । तुष्टुवुस्तं दैत्यगणा देवा इव पितामहम् ॥ ५९ ॥
समस्त लोकोंकी उत्पत्ति और प्रलयके कारणभूत ब्रह्म-लोकमें स्थित होकर वह ब्रह्मा बन बैठा था । उस समय दैत्यगण उसकी उसी तरह स्तुति करते थे, जैसे देवता ब्रह्माकी करते हैं ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्चर्यतारकामये सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्चर्यतारकामय संग्रामविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
कालनेमि और भगवान् विष्णुका संवाद, श्रीविष्णुद्वारा कालनेमिका वध तथा देवताओंको आश्वासन देकर ब्रह्मलोकको प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच पञ्च तं नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्मणा । वेदो धर्मः क्षमा सत्यं श्रीश्च नारायणप्रिया ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! कालनेमिके द्वारा शास्त्रविपरीत कर्म किये जानेके कारण वेद, धर्म, क्षमा, सत्य और भगवान् नारायणके आश्रयमें रहनेवाली लक्ष्मी—ये पाँचों उसके पास नहीं आये ॥ १ ॥
स तेषामनुपस्थानात् संक्रोधो दानवेश्वरः । वैष्णवं पदमन्विच्छन् ययौ नारायणान्तिकम् ॥ २ ॥
उनके उपस्थित न होनेसे दानवराज कालनेमिको बड़ा क्रोध हुआ । वह भगवान् विष्णुके पद एवं वैकुण्ठधामको अपने अधीन कर लेनेकी इच्छासे उन श्रीनारायणदेवके निकट गया ॥ २ ॥
स ददर्श सुपर्णस्थं शङ्खचक्रगदाधरम् । दानवानां विनाशाय भ्रामयन्तं गदां शुभाम् ॥ ३ ॥
उसने देखा—शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायण गरुड़्की पीठपर विराजमान हैं और दानवोंका विनाश करनेके लिये अपनी कल्याणमयी कौमोदकी गदाको घुमा रहे हैं ॥ ३ ॥
सजलाम्भोधरसद्शं विद्युत्सदृशवाससम् । स्वारूढं स्वर्णपत्राढ्यं शिखिनं काश्यपं खगम् ॥ ४ ॥
उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति सजल जलधरके समान श्याम है । उनपर विद्युत्की-सी दीप्तिसे दमकता हुआ रेशमी पीताम्बर शोभा पा रहा है । वे भगवान् विष्णु जिन कश्यप-कुमार आकाशचारी गरुड़पर आरूढ़ हैं, उनके दोनों पंख सुवर्णके समान सुशोभित हैं और मस्तकपर शिखा शोभा दे रही है ॥ ४ ॥
दृष्ट्वा दैत्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थितम् । दानवो विष्णुमक्षोभ्यं बभाषे क्षुब्धमानसः ॥ ५ ॥
जिन्हें कोई भी क्षोभमें नहीं डाल सकता, उन भगवान् विष्णुको दैत्योंके विनाशके लिये रणक्षेत्रमें स्वस्थभावसे खड़ा देख दानव कालनेमिका हृदय क्षोभसे भर गया और वह इस प्रकार कहने लगा—॥ ५ ॥
| १८० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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अयं स रिपुरस्माकं पूर्वेषां दानवर्षिणाम्।
अर्णवावासिनश्चैव मधोर्वै कैटभस्य च ॥ ६ ॥
'यही हमारे पूर्ववर्ती दानवर्षियोंका तथा एकार्णववासी मधु एवं कैटभका सुप्रसिद्ध शत्रु है ॥ ६ ॥
अयं स विग्रहोऽस्माकमशाम्यः किल कथ्यते।
येन नः संयुगेष्वाद्या बहवो दानवा हताः ॥ ७ ॥
'कहते हैं, यही हमलोगोंका वह मूर्तिमान् विग्रह (युद्ध) है, जिसे शान्त करना सर्वथा असम्भव है। इसने अनेक संग्रामोंमें हमारे बहुत-से पूर्वज दानवोंका वध किया है॥ ७॥
अयं स निर्घृणो युद्धेऽस्त्री वालनिरपत्रपः।
येन दानवनारीणां सीमन्तोद्धरणं कृतम् ॥ ८ ॥
'यह वही निर्दयी है, जो युद्धमे अस्त्र धारण करके बालकोंके समान निर्लज्ज होता है। इसीने दानवनारियोंके सीमन्तका सौभाग्यचिह्न सदाके लिये उतार दिया है ॥ ८ ॥
अयं स विष्णुर्देवानां वैकुण्ठश्च दिवौकसाम् ।
अनन्तो भोगिनामप्सु स्वयम्भूश्च स्वयम्भुवः ॥ ९ ॥
'यही वह देवताओंका पक्षपाती विष्णु और स्वर्गवासियोंका वैकुण्ठ है। यही जलमे रहनेवाले सर्पोंका अनन्त और स्वयम्भू ब्रह्माका भी ब्रह्मा है ॥ ९ ॥
अयं स नाथो देवानामास्माकं विप्रिये स्थितः ।
अस्य क्रोधेन महता हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ १० ॥
'यही वह देवताओंका रक्षक है, जो सदा हमारा अप्रिय करनेमें ही लगा रहता है। इसीके महान् क्रोधसे दैत्यराज हिरण्यकशिपु मारे गये थे ॥ १० ॥
अस्यच्छायां समासाद्य देवा मखमुखे स्थिताः ।
आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवन्ति त्रिधा हुतम् ॥ ११ ॥
'इसीकी छायामे रहकर देवता यज्ञके मुखभागमे स्थित हो महर्षियोंद्वारा तीन प्रकारसे हवन करके अर्पित किये गये हविष्यका उपभोग करते हैं ॥ ११ ॥
अयं स निधने हेतुः सर्वेषां देवविद्विषाम् ।
यस्य तेजःप्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे ॥ १२ ॥
'यही समस्त देवद्रोही दैत्योंकी मृत्युमे प्रधान कारण है। समराङ्गणमे हमारे कितने ही कुल इसके तेजमें प्रविष्ट होकर भस्म हो गये ॥ १२ ॥
अयं स किल युद्धेषु सुरार्थे त्यक्तजीवितः ।
सवितुस्तेजसा तुल्यं चक्रं क्षिपति शत्रुपु ॥ १३ ॥
'कहते हैं, यह वही सुविख्यात विष्णु है, जो युद्धमें देवताओंके लिये अपना जीवन निछावर किये रहता है। यह शत्रुओंपर सूर्यके समान तेजस्वी चक्र चलाया करता है ॥ १३ ॥
अयं स कालो दैत्यानां कालभूते मयि स्थिते।
अतिक्रान्तस्य कालस्य फलं प्राप्स्यति दुर्मतिः ॥ १४ ॥
'यही वह दैत्योंका काल है, परंतु आज इसका भी काल होकर मैं खड़ा हूँ। मेरे रहते हुए ही यह दुर्बुद्धि अपने पूर्व कालकी करतूतोंका फल पायेगा ॥ १४ ॥
दिष्ट्येदानीं समक्षं मे विष्णुरेय समागतः ।
अद्य मद्द्वाणनिष्पिष्टो मामेव प्रणमिष्यति ॥ १५ ॥
'सौभाग्यकी बात है कि इस समय यह विष्णु मेरे सामने आ गया। आज यह मेरे बाणोंसे पिस जायगा और धरतीपर गिरकर मुझे ही प्रणाम करेगा ॥ १५ ॥
यास्याम्यपचितिं दिष्ट्या पूर्वेषामद्य संयुगे ।
इमं नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम् ॥ १६ ॥
क्षिप्रमेव वधिष्यामि रणे नारायणाश्रितान् ।
'आज समराङ्गणमे दानवोंको भय देनेवाले इस नारायणका वध करके मैं शीघ्र ही इसके आश्रित रहनेवाले देवताओंका भी संहार कर डालूँगा। ऐसा करके अपने पूर्वजोंके ऋणसे उऋण हो सकूँगा, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात होगी ॥ १६½ ॥
जात्यन्तरगतोऽप्येष मृधे बाधति दानवान् ॥ १७ ॥
एषोऽनन्तः पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति स्मृतः ।
जघनैकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ ।
विनिवेश्य स्वके ऊरौ निहतौ दानवेश्वरौ ॥ १८ ॥
'(मत्स्य, वराह आदि) दूसरी-दूसरी योनियोंमें जन्म धारण करके भी यह युद्धमें दानवोंको ही सताया करता है। यद्यपि यह अनन्त (आकाशकी भाँति असीम एवं व्यापक) है तो भी पूर्वकालमे मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उस समय इसकी पद्मनाम नामसे प्रसिद्धि हुई ; इसने भयंकर एकार्णवमे विचरनेवाले दोनों भाई दानवराज मधु और कैटभको अपनी जाँघपर सुलाकर मार डाला था ॥ १७-१८ ॥
द्विधाभूतं वपुः कृत्वा सिंहार्धं नरसंस्थितम् ।
पितरं मे जघानेको हिरण्यकशिपुं पुरा ॥ १९ ॥
'इसीने पूर्वकालमे आधे नर और आधे सिंहके रूपमे दो प्रकारका शरीर धारण करके अकेले ही मेरे पिता हिरण्यकशिपुका वध किया था ॥ १९ ॥
शुभं गर्भमधत्तेममद्रितिर्देवतारणिः ।
यज्ञकाले बलेर्यो वै कृत्वा वामनरूपताम् ।
त्रींल्लोकानाजहारैकः क्रममाणस्त्रिभिः क्रमैः ॥ २० ॥
'जो देवतारूपी अग्निको प्रकट करनेके लिये अरणिके-
१. अङ्ग होम, प्रधान होम और प्रायश्चित्त होम—ये होमके तीन प्रकार हैं । कुछ लोग नित्य, नैमित्तिक और काम्य भेदसे उसे तीन प्रकारका बताते हैं। कुछ दूसरे विद्वान् आह्वनीय, गार्हपत्य तथा दक्षिणाग्नि रूप उपाधिके भेदसे उसकी त्रिविधताका प्रतिपादन करते हैं।
हरिवंशपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः [ १८४
समान हैं, उन अदिति देवीने शुभ गर्भके रूपमें इसे धारण किया था। वही गर्भ बलिके यज्ञके समय अपनेको वामनरूपमें प्रगट करके आया। उस समय इसने अकेले ही तीन पगोंसे तीनों लोकोंको नापकर उन्हें बलिके अधिकारसे छीन लिया ॥ २० ॥
भूयस्त्विदानीं समरे सम्प्राप्ते तारकामये।
मया सह समागम्य सह देवैर्विनङ्क्ष्यति ॥ २१ ॥
'अब पुनः इस समय इस तारकामय संग्रामका अवसर प्राप्त होनेपर इसने पदार्पण किया है; किंतु अब मेरे साथ भिड़कर यह देवताओंसहित नष्ट हो जायगा' ॥ २१ ॥
स एवमुक्त्वा बहुधा क्षिपन्नारायणं रणे।
वाग्भिरप्रतिरूपाभिर्युद्धमेवाभ्यरोचयत् ॥ २२ ॥
ऐसा कहकर रणभूमिमे भगवान् नारायणपर अयोग्य वचनोंद्वारा नाना प्रकारके आक्षेप करते हुए कालनेमिने उनके साथ युद्ध करना ही पसंद किया ॥ २२ ॥
क्षिप्यमाणोऽसुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः।
क्षमाबलेन महता सस्मितं वाक्यमब्रवीत् ॥ २३ ॥
असुरराज कालनेमिके इस प्रकार आक्षेप करनेपर भी भगवान् गदाधरने उसपर क्रोध नहीं किया; क्योंकि वे महान् क्षमाबलसे सम्पन्न थे। उन्होंने मुसकराते हुए कहा—॥ २३ ॥
अल्पदर्पबलो दैत्य स्थितः क्रोधादसद्वदन् ।
हतस्त्वमात्मनो दोषैः क्षमां योऽतीत्य भाषसे ॥ २४ ॥
'दैत्य ! तुझमें दर्प और बल तो बहुत थोड़ा है, किंतु तू क्रोधके कारण ओछी बातें बकता हुआ यहाँ खड़ा है। अरे ! तू क्षमा अथवा सहनशीलताका उल्लङ्घन करके बढ़-बढ़कर बातें बना रहा है, इसलिये अपने ही दोषोंसे मारा जा चुका है ॥ २४ ॥
अधमस्त्वं मम मतो धिगेतत् तव वाग्बलम् ।
न तत्र पुरुषाः सन्ति यत्र गर्जन्ति योषितः ॥ २५ ॥
'मेरे विचारसे तो तू अधम है ! तेरे इस वाग्बलको धिक्कार है। अरे ! जहाँ पुरुष न हों, केवल स्त्रियाँ ही हों, वहाँ लोग इस तरहकी गर्जना करते हैं, जहाँ वीर पुरुष हों वहाँ नहीं (क्योंकि वहाँ गर्जना करनेसे वे उन वीर पुरुषोंद्वारा मार डाले जाते हैं) ॥ २५ ॥
अहं त्वां दैत्य पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम् ।
प्रजापतिकृतं सेतुं को भित्त्वा स्वस्तिमान् भवेत् ॥ २६ ॥
'दैत्य ! मैं तो देखता हूँ—तू अपने पूर्वजोंके ही मार्गपर जानेवाला है। भला ! प्रजापतिद्वारा नियत की हुई मर्यादाको भङ्ग करके कौन सकुशल रह सकता है ॥ २६ ॥
अद्य त्वां नाशयिष्यामि देवव्यापारकारकम् ।
स्वेषु स्वेषु च स्थानेषु स्थापयिष्यामि देवताः ॥ २७ ॥
'तू दानव होकर देवताओंका कार्य व्यर्थ कर रहा है—तूने उनका अधिकार उनसे छीन लिया है, इसलिये आज मैं तेरा विनाश कर डालूँगा और देवताओंको पुनः अपने-अपने स्थानों (पदों) पर स्थापित कर दूँगा' ॥ २७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवति तद् वाक्यं मृधे श्रीवत्सधारिणि ।
जहास दानवः क्रोधाद्धस्तांश्चक्रे च सायुधान् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न धारण करनेवाले भगवान् नारायण जब उस रणभूमिमें ऐसी बातें कह रहे थे, उस समय वह दानव वहाँ क्रोधपूर्वक हँसने लगा। उसने तुरंत ही अपने हाथोंमें हथियार ले लिये ॥ २८ ॥
स बाहुशतमुद्यम्य सर्वास्त्रग्रहणं रणे ।
क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो विष्णुं वक्षस्यताडयत् ॥ २९ ॥
उसने समरभूमिमें सब प्रकारके अस्त्रोंको ग्रहण करनेवाली अपनी सौ भुजाओंको ऊपर उठाकर भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें प्रहार किया। उस समय उनकी आँखें क्रोधके कारण दुगुनी लाल हो रही थीं ॥ २९ ॥
दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमाः ।
उद्यतायुधनिस्त्रिंशा दृष्ट्वा विष्णुमथाद्रवन् ॥ ३० ॥
मय और तार आदि दानव भी रणभूमिमें भगवान् विष्णुको उपस्थित देख हाथोंमें भाँति-भाँतिके आयुध और तलवार लिये उनकी ओर दौड़े ॥ ३० ॥
स ताड्यमानोऽतिबलैर्दैत्यैः सर्वायुधोद्यतैः ।
न चचाल हरिर्युद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः ॥ ३१ ॥
सब प्रकारके आयुध लेकर उद्यत हुए अत्यन्त बलशाली दैत्योंके प्रहार करनेपर भी भगवान् श्रीहरि युद्धभूमिमें कभी कम्पित न होनेवाले पर्वतके समान विचलित नहीं हुए (अविचल भावसे खड़े रहे) ॥ ३१ ॥
संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः ।
सर्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्य बाहुभिः ॥ ३२ ॥
मुमोच ज्वलितां घोरां संरब्धो गरुडोपरि ।
कर्मणा तेन दैत्यस्य विष्णुर्विस्मयमागतः ॥ ३३ ॥
इतनेहीमें महान् असुर कालनेमि गरुड़के साथ उलझ गया। उसने अपनी भुजाओंद्वारा सारी शक्ति लगाकर एक विशाल गदा उठायी, जो तेजसे प्रज्वलित हो रही थी। उस भयंकर गदाको उसने रोषमें भरकर गरुड़पर छोड़ दिया। उस दैत्यके इस कर्मसे भगवान् विष्णुको भी बड़ा विस्मय हुआ ॥ ३२-३३ ॥
१८२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
यदा तस्य सुपर्णस्य पतिता मूर्ध्नि सा गदा । तदाऽऽगमत् पद्भ्यां भूमिं पक्षी व्यथितविग्रहः ॥ ३४ ॥
जिस समय गरुड़के मस्तकपर वह गदा गिरी, उस समय वह पंजोंके बलसे पृथ्वीपर आकर टिक गये। उनका सारा शरीर व्यथित हो गया था ॥ ३४ ॥
सुपर्णं व्यथितं दृष्ट्वा क्षतं च वपुरात्मनः । क्रोधात् संरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे ॥ ३५ ॥
गरुड़को गदाके आघातसे पीड़ित और अपने शरीरको भी क्षत-विक्षत देखकर भगवान् विष्णुके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उन्होंने चक्र हाथमें ले लिया ॥ ३५ ॥
व्यवधर्त च वेगेन सुपर्णेन समं प्रभुः । भुजाश्चास्य व्यवर्धन्त व्याप्नुवन्तो दिशो दश ॥ ३६ ॥
तदनन्तर भगवान् नारायणका वेग गरुड़के समान ही बढ़ने लगा। उनकी चारों भुजाएँ दसों दिशाओंको व्याप्त करती हुई बढ़ने लगीं ॥ ३६ ॥
स दिशः प्रदिशश्चैव खं च गां चैव पूरयन् । ववृधे स पुनर्लोकान् क्रान्तुकाम इवौजसा ॥ ३७ ॥
वे दिशाओं, अवान्तर दिशाओं, आकाश और पृथ्वीको परिपूर्ण करते हुए इस प्रकार बढ़ने लगे, मानो पुनः बलपूर्वक तीनों लोकोंको आक्रान्त करना चाहते हों ॥ ३७ ॥
तं जायय सुरेन्द्राणां वर्धमानं नभस्तले । ऋषयः सह गन्धर्वैस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३८ ॥
देवेश्वरोंकी विजयके लिये आकाशमें बढ़ते हुए उन भगवान् मधुसूदनकी गन्धर्वोंसहित ऋषि स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥
स द्यां किरीटेन लिखन् साभ्रमम्बरमम्बरैः । पद्भ्यामाक्रम्य वसुधां दिशः प्रच्छाद्य बाहुभिः ॥ ३९ ॥
वे अपने मस्तकके किरीटसे स्वर्गलोककी भूमिपर रेखा-सी खींचते, फहराते हुए वस्त्रोंद्वारा बादलोंसहित आकाशको ढकते और चारों बांहोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करते हुए अपने दोनों पैरोंसे पृथ्वीको दबाकर खड़े हो गये ॥ ३९ ॥
सूर्यस्य रश्मितुल्याभं सहस्रारमरिक्षयम् । दीप्ताग्निसदृशं घोरं दर्शनीयं सुदर्शनम् ॥ ४० ॥ सुवर्णनेमिपर्यन्तं वज्रनाभं भयावहम् । मेदोमज्जास्थिरुधिरैर्दिग्धं दानवसम्भवैः ॥ ४१ ॥ अद्वितीयं प्रहारेषु क्षुरपर्यन्तमण्डलम् । स्रग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम् ॥ ४२ ॥ स्वयं स्वयम्भुवा सृष्टं भयदं सर्वविद्विषाम् । महर्षिरोषैराविष्टं नित्यमाहवदर्पितम् ॥ ४३ ॥ क्षेपणाद् यस्य मुह्यन्ति लोकाःसस्थाणुजङ्गमाः । क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महाहवे ॥ ४४ ॥ तमप्रतिमकर्माणं समानं सूर्यवर्चसा । चक्रमुद्यम्य समरे क्रोधदीप्तो गदाधरः ॥ ४५ ॥
जिसकी प्रभा सूर्यकी किरणोंके समान उद्भासित होती है, जिसमें एक सहस्र अरे लगे हुए हैं, जो शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ है, जिसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बताया गया है, जो भयंकर होनेपर भी दर्शनीय है, इसीलिये जिसे सुदर्शन कहते हैं, जिसके किनारेपर सुवर्णमयी नेमि (हाल) लगी हुई है, जिसकी नाभि वज्रके समान सुदृढ़ है, जो शत्रुओंको भय देनेवाला है, दानवोंके मेद, मज्जा, अस्थि तथा रुधिरसे जिसकी पुष्टि हुई है, जो प्रहारके साधनोंमें अद्वितीय (अनुपम) है, उसके प्रान्तभागमें मण्डलाकार छुरे लगे हुए हैं, जो फूल-मालाकी लड़ियोंके समान विस्तृत है, इच्छानुसार चलने और मनमाना रूप धारण करनेमें समर्थ है, समस्त शत्रुओंको भय देनेवाले जिस दिव्य अस्त्रकी साक्षात् ब्रह्माजीने सृष्टि की है, अत्याचारी असुरोंके प्रति महर्षियोंके मनमें जो रोष होते हैं, उनसे जो सदा आविष्ट रहता है, युद्धके अवसरोंपर जो दर्पसे भरा होता है, जिसके प्रहारसे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोक मोहमें पड़ जाते हैं और महासमरमें जिसके प्रभावसे मांसभक्षी प्राणियोंको तृप्ति प्राप्त होती है, उस अनुपम कर्म करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रको हाथमें उठाकर भगवान् गदाधर समराङ्गणमें क्रोधसे उद्दीप्त हो उठे ॥ ४०--४५ ॥
सम्मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा । चिच्छेद बाहूं चक्रेण श्रीधरः कालनेमिनः ॥ ४६ ॥
लक्ष्मीको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले श्रीहरिने समरभूमि-में अपने तेजसे दानवोंके तेजका अपहरण करके उस चक्रसे कालनेमिकी भुजाओंको काट डाला ॥ ४६ ॥
तच्च वक्त्रशतं घोरं साग्निकूर्णाट्टहासिनम् । तस्य दैत्यस्य चक्रेण प्रममाथ बलाद्धरिः ॥ ४७ ॥
साथ ही जिनके अट्टहास करनेपर अग्निचूर्ण प्रकट होते थे, उस दैत्यके उन सौ भयंकर मुखोंको भी भगवान् विष्णुने उस चक्रके द्वारा बलपूर्वक मथ डाला ॥ ४७ ॥
स छिन्नबाहुर्विशिरा न प्राकम्पत दानवः । कबन्धोऽवस्थितः संख्ये विशाख इव पादपः ॥ ४८ ॥
भुजाओं और मस्तकोंके कट जानेपर भी वह दानव कम्पित नहीं हुआ। उसका धड़ युद्धस्थलमें शाखारहित वृक्ष-के समान खड़ा रहा ॥ ४८ ॥
तं वितत्य महापक्षी वायोः कृत्वा समं जवम् । उरसा पातयामास गरुडः कालनेमिनम् ॥ ४९ ॥
तब महापक्षी गरुड़ने अपने पंख फैलाकर वायुके समान
हरिवंशपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः १८३
वेग प्रकट करके कालनेमिको अपनी छातीके धक्केसे गिरा दिया ॥ ४९ ॥
सतस्य देहो विमुखो विशाखः खात् परिभ्रमन् ।
निपपात दिवं त्यक्त्वा क्षोभयन् धरणीतलम् ॥ ५० ॥
उसका वह मस्तक और भुजाओंसे रहित शरीर स्वर्गलोकको त्यागकर आकाशसे चक्कर काटता और भूतलको क्षुब्ध करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ५० ॥
तस्मिन्निपतिते दैत्ये देवाः सर्षिगणास्तदा ।
साधु साध्विति वैकुण्ठं समेताः प्रत्यपूजयन् ॥ ५१ ॥
उस दैत्यके धराशायी होनेपर ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता साधु-साधु कहते हुए वहाँ आये और भगवान् विष्णुकी पूजा एवं प्रशंसा करने लगे ॥ ५१ ॥
अपरे ये तु दैत्या वै युद्धे दुष्टपराक्रमाः ।
ते सर्वे बाहुभिर्व्याप्ता न शेकुश्चलितुं रणे ॥ ५२ ॥
उसके सिवा जो दूसरे दुष्ट पराक्रमी दैत्य थे, वे सब भगवान् विष्णुकी भुजाओंसे अवरुद्ध होकर रणभूमिमें हिल-डुल भी न सके ॥ ५२ ॥
कांश्चित्केशेषु जग्राह कांश्चित्कण्ठेऽभ्यपीडयत् ।
पाटयामास कस्यचिद् वक्त्रं मध्ये कांश्चिदथाग्रहीत् ॥ ५३ ॥
भगवान्ने किन्हींके केश पकड़कर उन्हें टाँग लिया, किन्हींके गले दबा दिये, किन्हींके मुख फाड़ दिये और कुछ दैत्योंकी कमर पकड़कर तोड़ डाली ॥ ५३ ॥
ते गदाचक्रनिर्दग्धा गतसत्त्वा गतासवः ।
गगनाद् भ्रष्टसर्वाङ्गा निपेतुर्धरणीतले ॥ ५४ ॥
वे दैत्य गदा और चक्रके तेजसे दग्ध हो अपने धैर्य और प्राण खो बैठे । उनके सारे अङ्ग आकाशसे भ्रष्ट होकर भूतलपर गिर पड़े ॥ ५४ ॥
तेषु सर्वेषु दैत्येषु हतेषु पुरुषोत्तमः ।
तस्थौ शक्रप्रियं कृत्वा कृतकर्मा गदाधरः ॥ ५५ ॥
उन सब दैत्योंके मारे जानेपर इन्द्रका प्रिय करके कृतकृत्य हुए गदाधारी भगवान् पुरुषोत्तम वहाँ चुपचाप खड़े हो गये ॥ ५५ ॥
तस्मिन् विमर्दे निर्वृत्ते संग्रामे तारकामये ।
तं देशमाजगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५६ ॥
सर्वैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं गन्धर्वैः साप्सरोगणैः ।
देवदेवो हरिं देवं पूजयन् वाक्यमब्रवीत् ॥ ५७ ॥
तारकामय संग्रामकी वह मार-काट समाप्त होनेपर देवाधिदेव लोकपितामह ब्रह्मा समस्त ब्रह्मर्षियों, गन्धर्वों और अप्सराओंके साथ शीघ्र ही उस प्रदेशमें आ पहुँचे और श्रीनारायणदेवकी पूजा करते हुए बोले ॥ ५६-५७ ॥
ब्रह्मोवाच
कृतं देव महत्कर्म सुराणां शल्यमुद्धृतम् ।
वधेनानेन दैत्यानां वयं हि परितोषिताः ॥ ५८ ॥
ब्रह्माजीने कहा—देव ! आपने यह बहुत बड़ा कार्य किया। देवताओंका काँटा निकालदिया। दैत्योंके इस वधसे हमें बड़ा संतोष हुआ है ॥ ५८ ॥
योऽयं हतस्त्वया विष्णो कालनेमी महासुरः ।
त्वमेकोऽस्य मृधे हन्ता नान्यः कश्चन विद्यते ॥ ५९ ॥
विष्णो ! आपके द्वारा जो यह कालनेमि नामक महान् असुर मारा गया है, इसे एकमात्र आप ही युद्धमें मार सकते थे; दूसरा कोई ऐसा नहीं है ॥ ५९ ॥
एष देवान् परिभवँल्लोकांश्च सचराचरान् ।
ऋषीणां कदनं कृत्वा मामपि प्रतिगर्जति ॥ ६० ॥
यह देवताओं तथा चराचर प्राणियोंसहित समस्त लोकोंका तिरस्कार करता था और ऋषियोंका संहार करके मेरे सामने भी गर्जना किया करता था ॥ ६० ॥
तदनेन तवोग्रेण परितुष्टोऽस्मि कर्मणा ।
यदयं कालतुल्याभः कालनेमी निपातितः ॥ ६१ ॥
अतः आपने जो कालके समान प्रतीत होनेवाले इस कालनेमि नामक दैत्यको मार गिराया है, आपके इस उग्र पराक्रमसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ॥ ६१ ॥
तदागच्छस्व भद्रं ते गच्छाम दिवमुत्तमम् ।
ब्रह्मर्षयस्त्वां तत्रस्थाः प्रतीक्षन्ते सदोगताः ॥ ६२ ॥
इसलिये आइये, आपका कल्याण हो । अब हमलोग उत्तम दिव्य लोकको चलें । वहाँ दिव्य सभामें बैठे हुए वहाँके निवासी ब्रह्मर्षि आपकी प्रतीक्षा करते हैं ॥ ६२ ॥
अहं महर्षयश्चैव तत्र त्वां वदतां वर ।
विविधैरर्चयिष्यामो गीर्भिर्दिव्याभिरच्युत ॥ ६३ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ अच्युत ! वहाँ मैं तथा महर्षिगण दिव्य वाणीद्वारा आपकी विधिवत् अर्चना करेंगे ॥ ६३ ॥
किं चाहं तव दास्यामि वरं वरभृतां वर ।
सुरेष्वपि सदैत्येषु वराणां वरदो भवान् ॥ ६४ ॥
वर धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ नारायण ! मैं आपको क्या वर दूँगा । दैत्यों और देवताओंमें जितने भी वर (श्रेष्ठ मनोरथ) हैं, उन सबके दाता तो आप ही हैं ॥ ६४ ॥
निर्यातयैतत् त्रैलोक्यं स्फीतं निहतकण्टकम् ।
अस्मिन्नेव मृधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने ॥ ६५ ॥
विष्णो ! इस युद्धस्थलमें ही आप महात्मा इन्द्रको त्रिलोकीका यह समृद्धिशाली और अकण्टक राज्य लौटा दीजिये ॥ ६५ ॥
| १८४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिरव्ययः ।
देवाञ्छक्रमुखान् सर्वानुवाच शुभया गिरा ॥ ६६ ॥
भगवान् ब्रह्माके ऐसा कहनेपर अविनाशी श्रीहरिने अपनी कल्याणमयी वाणीद्वारा इन्द्र आदि समस्त देवताओंसे इस प्रकार कहा ॥ ६६ ॥
विष्णुरुवाच
श्रूयतां त्रिदशाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः ।
श्रवणावहितैर्देहैः पुरस्कृत्य पुरंदरम् ॥ ६७ ॥
भगवान् विष्णु बोले—जितने देवता यहाँ आये हैं, वे सब लोग अपने शरीर और इन्द्रियोंको मेरी बात सुननेके लिये सावधान रखते हुए इन्द्रको आगे करके मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनें ॥ ६७ ॥
अस्मिन्तः समरे सर्वे कालनेमिमुखा हताः ।
दानवा विक्रमोपेताः शक्रादपि महत्तराः ॥ ६८ ॥
इस युद्धमें हमने इन्द्रसे भी बहुत बढ़े-चढ़े पराक्रमशाली कालनेमि आदि समस्त दानवोंको मार डाला है ॥ ६८ ॥
तस्मिन् महति संक्रन्दे द्वावेव तु विनिःसृतौ ।
वैरोचनश्च दैत्येन्द्रः स्वर्भानुश्च महाग्रहः ॥ ६९ ॥
इस महासंग्रामसे दो ही दैत्य बचकर निकले हैं—विरोचनकुमार दैत्यराज बलि और महान् ग्रह राहु ॥ ६९ ॥
तद्दिष्टां भजतां शक्रो दिशां वरुण एव च ।
याम्यां यमः पालयतामुत्तरां च धनाधिपः ॥ ७० ॥
अतः इन्द्र और वरुण अब अपनी-अपनी अभीष्ट दिशाको पुनः ग्रहण करें । यम दक्षिण दिशाका और धनाध्यक्ष कुबेर उत्तर दिशाका पालन करें ॥ ७० ॥
ऋक्षैः सह यथायोगं काले चरतु चन्द्रमाः ।
अब्दं चतुर्मुखं सूर्यो भजतामयनैः सह ॥ ७१ ॥
चन्द्रमा समयानुसार नक्षत्रोंके साथ यथायोग्य विचरें और सूर्य अयनोंसहित ऋतुप्रधान वर्षका आश्रय लें ॥ ७१ ॥
आज्यभागाः प्रवर्त्तन्तां सदस्यैरभिपूजिताः ।
हूयन्तामग्नयो विप्रैर्वेददृष्टेन कर्मणा ॥ ७२ ॥
(यज्ञमें) सदस्योंद्वारा सब ओरसे पूजित आज्यभाग देवताओंको अर्पित किये जायें और ब्राह्मणलोग वेदोक्त विधिसे अग्नियोंमें आहुति दें ॥ ७२ ॥
देवाश्च बलिहोमेन स्वाध्यायेन महर्षयः ।
श्राद्धेन पितरश्चैव तृप्तिं यान्तु यथा पुरा ॥ ७३ ॥
अब पुनः पहलेकी ही भाँति बलि और होमकर्मके द्वारा देवताओंको, स्वाध्यायके द्वारा महर्षियोंको तथा श्राद्धकर्मके सम्पादनसे पितरोंको संतुष्ट किया जाय और वे पूर्णतः तृप्त हों ॥ ७३ ॥
वायुश्चरतु मार्गस्थस्त्रिधा दीप्यतु पावकः ।
त्रयो वर्णाश्च लोकांस्त्रीन् वर्द्धयन्त्वात्मजैर्गुणैः ॥ ७४ ॥
वायुदेव अपने मार्गपर रहकर विचरण करें, अग्निदेव (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि तथा आहवनीय-इन) तीन-तीन रूपोंमें सदा प्रकाशित होते रहें तथा तीनों वर्णोंके लोग अपने (शम, दम, तप एवं शौच आदि) सहज गुणोंसे तीनों लोकोंकी वृद्धि करें ॥ ७४ ॥
क्रतवः सम्प्रवर्त्तन्तां दीक्षणीयैर्द्विजातिभिः ।
दक्षिणाश्चोपवर्त्तन्तां यथार्हं सर्वसत्रिणाम् ॥ ७५ ॥
यज्ञदीक्षाके अधिकारी द्विजातियोंद्वारा यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहे और समस्त यजमानोंके यज्ञोंमें यथायोग्य दक्षिणाएँ दी जायँ ॥ ७५ ॥
गांश्च सूर्यो रसान् सोमो वायुः प्राणांश्च प्राणिषु ।
तर्पयन्तः प्रवर्त्तन्तां शिवैः सौम्यैश्च कर्मभिः ॥ ७६ ॥
सूर्यदेव सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी, चन्द्रदेव रसोंकी तथा वायुदेव प्राणियोंके प्राणोंकी तृप्ति एवं पुष्टि करते हुए अपने कल्याणकारी एवं सौम्य कर्मोंद्वारा लोकहितमें प्रवृत्त हों ॥
यथावदानुपूर्व्येण महेन्द्रसलिलोद्भवाः ।
त्रैलोक्यमातरः सर्वाः सागरं यान्तु निम्नगाः ॥ ७७ ॥
देवराज इन्द्रद्वारा पर्वतोंपर बरसाये हुए जलसे प्रकट होनेवाली सम्पूर्ण सरितायें, जो सबको जलरूपी दुग्ध पिलानेके कारण तीनों लोकोंके प्राणियोंके लिये माताके समान हैं, यथोचित गतिसे बहती हुई क्रमशः समुद्रमें मिल जायें ॥ ७७ ॥
दैत्येभ्यस्त्यज्यतां भीश्च शान्तिं व्रजत देवताः ।
स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ ७८ ॥
देवताओ ! अब तुम दैत्योंसे होनेवाले भयको त्याग दो और मनमें शान्ति धारण करो । तुम सब लोगोंका कल्याण हो । अब मैं सनातन ब्रह्मलोकको जाऊँगा ॥ ७८ ॥
स्वगृहे सर्वलोके वा संग्रामे वा विशेषतः ।
विश्रम्भो वो न मन्तव्यो नित्यं क्षुद्रा हि दानवाः ॥ ७९ ॥
अपने घरमें अथवा समस्त जगत्में या विशेषतः संग्राममें तुम्हें दानवोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सदा ही नीचतापूर्ण बर्ताव करनेवाले होते हैं ॥ ७९ ॥
छिद्रेषु प्रहरन्त्येते न चैषां संस्थितिर्ध्रुवा ।
सौम्यानामऋजुभावानां भवतां चार्जवे मतिः ॥ ८० ॥
ये मौका पाते ही प्रहार कर बैठते हैं । इनकी मर्यादा सदा स्थिर रहनेवाली नहीं होती । तुमलोग सौम्य और सरल स्वभावके हो, अतः तुम्हारी बुद्धि सरलतापूर्ण बर्तावमें लगती है ॥ ८० ॥
| [ हरिवंशपर्व ] | एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | १८५ |
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अहं तु दुष्टभावानां युष्मासु सुदुरात्मनाम् ।
असम्यग्वर्तमानानां मोहं दास्यामि देवताः ॥ ८१ ॥
देवताओ ! तुम्हारे प्रति दुर्भाव रखकर अनुचित बर्ताव करनेवाले दुरात्मा दैत्योंको मैं अवश्य ही मोहमें डाल दूँगा ॥ ८१ ॥
यदा च सुदुराधर्षं दानवेभ्यो भयं भवेत् ।
तदा समुपगम्याशु विधास्ये वस्ततोऽभयम् ॥ ८२ ॥
जब दानवोंकी ओरसे तुमलोगोंको दुर्निवार्य भय प्राप्त होगा, तब शीघ्र ही आकर मैं तुम्हे उनकी ओरसे निर्भय कर दूँगा ॥ ८२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सुरगणान् विष्णुः सत्यपराक्रमः ।
जगाम ब्रह्मणा सार्धं ब्रह्मलोकं महायशाः ॥ ८३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवताओंसे ऐसा कहकर महायशस्वी तथा सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णु ब्रह्माजीके साथ ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ८३ ॥
एतदाश्चर्यमभवत् संग्रामे तारकामये ।
दानवानां च विष्णोश्च यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ८४ ॥
राजन् ! तुमने मुझसे जो बात पूछी थी, उसका उत्तर मैंने दे दिया । तारकामय संग्रामके अवसरपर दानवो और भगवान् विष्णुके बीचमें यही आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी ॥ ८४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि कालनेमिवधेऽष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें कालनेमिका वधविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
ब्रह्मलोकमें भगवान् विष्णुका सत्कार
जनमेजय उवाच
ब्रह्मणा देवदेवेन सार्धं सलिलयोनिना ।
ब्रह्मलोकगतो ब्रह्मन् वैकुण्ठः किं चकार ह ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन् ! देवाधिदेव कमलयोनि ब्रह्माजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाकर भगवान् विष्णुने क्या किया ? ॥ १* ॥
किमर्थं चादिदेवेन नीतः कमलयोनिना ।
विष्णुर्दैत्यवधे वृत्ते देवैश्च कृतसत्क्रियः ॥ २ ॥
दैत्योंके संहारका कार्य पूर्ण हो जानेपर देवताओं द्वारा जिनका भलीभाँति सत्कार किया गया था, उन भगवान् विष्णुको आदिदेव ब्रह्माजी ब्रह्मलोकमे किसलिये ले गये ? ॥ २ ॥
ब्रह्मलोके च किं स्थानं कं वा योगमुपास्त सः ।
कं वा दधार नियमं स विभुर्भूतभावनः ॥ ३ ॥
ब्रह्मलोकमें उनका कौन-सा स्थान है ? वहाँ उन्होंने किस योगका आश्रय लिया अथवा उन भूतभावन सर्वव्यापी श्रीहरिने किस नियमको धारण किया ? ॥ ३ ॥
कथं तस्याऽऽसतस्तत्र विश्वं जगदिदं महत् ।
श्रियमाप्नोति विपुलां सुरासुरनरार्चिताम् ॥ ४ ॥
वहाँ रहते हुए भगवान् विष्णुकी विपुल सम्पत्तिको, जिसकी देवता, असुर और मनुष्य सभी पूजा करते हैं, यह सारा विशाल जगत् कैसे पाता है ? ॥ ४ ॥
कथं स्वपिति घर्मान्ते बुध्यते चाम्बुदप्लवे ।
कथं च ब्रह्मलोकस्थो धुरं वहति लौकिकीम् ॥ ५ ॥
ग्रीष्म ऋतुके अन्तमें (आषाढ़ मासकी शुक्ला एकादशीको) भगवान् कैसे शयन करते हैं ? वर्षाकाल बीतनेपर (कार्तिक-की शुक्ला एकादशीको) किस प्रकार जागते हैं ? तथा ब्रह्मलोक (नारायणाश्रम) में रहकर वे सम्पूर्ण जगत्की रक्षाका भार कैसे वहन करते हैं ? ॥ ५ ॥
चरितं तस्य विप्रेन्द्र दिव्यं भगवतो दिवि ।
विस्तरेण यथातत्त्वं सर्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ ६ ॥
विप्रवर ! दिव्य धाममें स्थित भगवान् विष्णुका जो दिव्य चरित्र है, वह सब यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक मैं सुनना चाहता हूँ* ॥ ६ ॥
* यहाँ कुल आठ प्रश्न हैं । पहले श्लोकमें जो प्रथम प्रश्न है, उसका उत्तर इसी अध्यायके श्लोक १२ से लेकर १७ तक देखना चाहिये । दूसरे श्लोकमें दूसरा प्रश्न अङ्कित है । इसका उत्तर इसी अध्यायके २५ से २८ तकके श्लोकोंमें गूढ़ भावसे दिया गया है । तीसरे श्लोकमें तीन प्रश्न हैं—तीसरा, चौथा और पाँचवाँ । उनमेंसे तीसरे प्रश्नका उत्तर अध्याय ५० के १ से ६ तकके श्लोकोंमें उपलब्ध होता है । चौथे और पाँचवें प्रश्नोंका उत्तर उसी अध्यायके ७ से ९ तकके श्लोकोंमें देखें । चौथे श्लोकमें जो छठा प्रश्न अङ्कित है, उसका उत्तर गूढ़ भावसे अध्याय ५० के श्लोक १२ से २२ तकमें है । सातवाँ और आठवाँ प्रश्न पाँचवें, छठे श्लोकोंमें अङ्कित हैं । इनमें सातवेंका उत्तर अध्याय ५० के २२ से ४३ तकके श्लोकोंमें वर्णित है और चरित्र-विषयक आठवें प्रश्नका उत्तर अध्याय ५० के ४४ वें श्लोकसे आरम्भ होकर आगेके सभी अध्यायोंमें है ।
१८६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
वैशम्पायन उवाच
शृणु नारायणस्यादौ विस्तरेण प्रवृत्तयः।
ब्रह्मलोकं यथारूढो ब्रह्मणा सह मोदते ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय ! भगवान् नारायणके जो कर्म हैं और जिस प्रकार वे ब्रह्मलोकमें स्थित होकर ब्रह्माजीके साथ आनन्दका अनुभव करते हैं, वह सब पहले मुझसे सुनो ॥ ७ ॥
कामं तस्य गतिः सूक्ष्मा देवैरपि दुरासदा।
यत् तु वक्ष्याम्यहं राजंस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ ८ ॥
राजन् ! उनकी गति (लीला या चरित्र) उन्हींकी इच्छाके अनुरूप होती है, वह सूक्ष्म है, उसके तत्त्वको ठीक-ठीक समझ पाना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। इस समय मैं भगवान्के जिस चरित्रका वर्णन करने जा रहा हूँ, उसे तुम मेरे कथनानुसार सुनो ॥ ८ ॥
एष लोकमयो देवो लोकाश्चैतन्मयास्त्रयः।
एष देवमयश्चैव देवाश्चैतन्मया दिवि ॥ ९ ॥
ये श्रीनारायणदेव सर्वलोकमय हैं और ये तीनों लोक भी इन्हींके स्वरूप (विष्णुमय) हैं। ये ही सर्वदेवमय हैं और स्वर्गके सम्पूर्ण देवता एतन्मय (इन्हींके स्वरूप अर्थात् विष्णुमय) हैं ॥ ९ ॥
तस्य पारं न पश्यन्ति बहवः पारचिन्तकाः।
एष पारं परं चैव लोकानां वेद माधवः ॥ १० ॥
प्रत्येक वस्तुके पार तत्त्व (अन्त, इयत्ता या चरम सीमा) का चिन्तन करनेवाले बहुत-से विचारक उन भगवान्का पार नहीं देख पाते हैं, परंतु ये भगवान् माधव सम्पूर्ण जगत्के परम पार (अपने आप) को भलीभाँति जानते हैं ॥ १० ॥
अस्य देवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य दैवतैः।
शृणु वै यत् तदा वृत्तं ब्रह्मलोके पुरातनम् ॥ ११ ॥
ये इन्द्रियोंके अविषय हैं और सम्पूर्ण देवता इन्हींका अनुसंधान करते रहते हैं। इन्हीं भगवान् विष्णुका उस समय ब्रह्मलोकमें घटित हुआ जो प्राचीन वृत्तान्त है, उसे सुनो ॥ ११ ॥
स गत्वा ब्रह्मणो लोकं दृष्ट्वा पैतामहं पदम्।
ववन्दे तानृषीन् सर्वान् विष्णुरार्षेण कर्मणा ॥ १२ ॥
उन भगवान् विष्णुने ब्रह्मलोकमें जाकर पितामहके निवासस्थानका दर्शन करके वेदोक्त विधिसे वहाँके समस्त ऋषियोंको प्रणाम किया ॥ १२ ॥
सोऽग्निं प्राक्सवने दृष्ट्वा हूयमानं महर्षिभिः।
अवन्दत महातेजाः कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् ॥ १३ ॥
उन महातेजस्वी श्रीहरिने पूर्वाह्नकालकी क्रिया पूर्ण करके प्रातःसवनके समय महर्षियोंकी दी हुई आहुति ग्रहण करनेवाले अग्निदेवका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया ॥ १३ ॥
स ददर्श मखेष्वाज्यैर्यज्यमानं महर्षिभिः।
भागं यज्ञियमश्नन्तं स्वदेहम्परं स्थितम् ॥ १४ ॥
उन्होंने वहाँ अपने ही दूसरे विग्रहको विराजमान देखा, जिसका यज्ञोंमें महर्षिगण घीकी आहुतियोंद्वारा यजन (पूजन) कर रहे थे और जो प्राप्त हुए यज्ञभागको स्वयं ही ग्रहण कर रहा था ॥ १४ ॥
अभिवाद्याभिवाद्यानामृषीणां ब्रह्मवर्चसाम्।
परिचक्राम सोऽचिन्त्यो ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ १५ ॥
उन अचिन्त्यस्वरूप भगवान्ने ब्रह्मतेजसे सम्पन्न एवं वन्दनीय ऋषियोंको प्रणाम करके उस सनातन ब्रह्मलोकमें घूमना आरम्भ किया ॥ १५ ॥
स ददर्शोच्छ्रितान् यूपॉंश्चापालाग्रविभूषितान्।
मखेषु च ब्रह्मर्षिभिः शतशः कृतलक्षणान् ॥ १६ ॥
उन्होंने वहाँ यज्ञोंमें स्थापित किये गये बहुत-से ऊँचे-ऊँचे यूपों (यज्ञ-स्तम्भों) को देखा, जो सिरेपर काठके बने हुए छल्लोंसे विभूषित थे। ब्रह्मर्षियोंने उनमें सैकड़ों प्रकारके चिह्न अङ्कित किये थे ॥ १६ ॥
आज्यधूमं समाघ्राय शृण्वन् वेदान् द्विजोरितान्।
यज्ञैर्यज्यन्तमात्मानं पश्यंस्तत्र चचार ह ॥ १७ ॥
वे घीकी आहुतियोंसे प्रकट हुए धूमकी सुगन्ध लेते, ब्राह्मणोंद्वारा उच्चारित वेदमन्त्रोंको सुनते और यज्ञोंद्वारा होती हुई अपनी ही आराधनाको देखते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे ॥ १७ ॥
ऊचुस्तमप्रयो देवाः सदस्याः सदसि स्थिताः।
अर्घ्योद्यतभुजाः सर्वे पवित्रान्तरपाणयः ॥ १८ ॥
जो यज्ञमण्डपमें सदस्यरूपसे विराजमान थे, वे सब देवता और ऋषि हाथोंमें पवित्री धारण करके अर्घ्य देनेके लिये दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर उन भगवान्के विषयमें परस्पर इस प्रकार कह रहे थे—॥ १८ ॥
देवेषु वर्तते यद् वै तद्धि सर्वं जनार्दनात्।
यत् प्रवृत्तं च देवेभ्यस्तद् विद्धि मधुसूदनात् ॥ १९ ॥
'देवताओंमें जो भी शक्ति-सामर्थ्य आदि है, वह सब उन्हें भगवान् जनार्दनसे ही प्राप्त हुआ है। देवताओंसे भी जो कुछ प्राप्त होता है, उसे भगवान् मधुसूदनका ही प्रसाद समझो ॥ १९ ॥
अग्नीषोममयं लोकं यं विदुर्विदुषो जनाः।
तं सोममग्निं लोकं च वेद विष्णुं सनातनम् ॥ २० ॥
'संसारके मनुष्य विद्वानोंके मुखसे जिस जगत्को अग्नि
| [ हरिवंशपर्व ] | पञ्चाशत्तमोऽध्यायः | १८७ |
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और सोमका कार्य जानते हैं, उसके कारणभूत वे सोम और अग्नि तथा यह कार्यभूत जगत् भी सनातन विष्णुरूप ही है, यह बात तुम्हे भी विदित है ॥ २० ॥
क्षीराद् यथा दधि भवेद् दध्नः सर्पिर्भवेद् यथा।
मध्यमानेषु भूतेषु तथा लोको जनार्दनात् ॥ २१ ॥
'जैसे दूधसे दही बनता है और दहीसे मन्थन करनेपर घी प्रकट होता है, उसी प्रकार भूतों (देह और इन्द्रिय आदि) के मथे जानेपर अर्थात् चित्तको एकाग्र करके सूक्ष्म तत्त्वका चिन्तन करनेपर यह ज्ञात हो जाता है कि सारा संसार भगवान् जनार्दनसे ही प्रकट हुआ है ॥ २१ ॥
यथेन्द्रियैश्च भूतैश्च परमात्मा विधीयते।
तथा देवैश्च वेदैश्च लोकैश्च विहितो हरिः ॥ २२ ॥
'जैसे चेतनासे व्याप्त भूतो (शरीरो) और इन्द्रियोंद्वारा उनके नियन्ता परमात्माका स्वतः ज्ञापन या प्रतिपादन हो जाता है, उसी प्रकार अनुग्रह आदि गुणोंसे युक्त देवताओं, वेदों और लोकोंद्वारा (उनके अन्तर्यामी आत्मारूपसे) श्रीहरिका बोध हो जाता है ॥ २२ ॥
यथा भूतेन्द्रियावाप्तिर्विहिता भुवि देहिनाम्।
तथा प्राणेश्वरावाप्तिर्देवानां दिवि वैष्णवी ॥ २३ ॥
'जैसे भूतलपर देहधारी प्राणियोंको जो देह और इन्द्रियोंकी प्राप्ति हुई है, उनका सम्बन्ध पार्थिव भूतोंसे है, उसी प्रकार स्वर्गलोकमे देवताओंको जो बल और ऐश्वर्य प्राप्त हुए हैं, उनका सम्बन्ध भगवान् विष्णुसे ही है ॥ २३ ॥
सत्रिणां सत्रफलदः पवित्रं परमात्मवान्।
लोकतन्त्रधरो ह्येष मन्त्रैर्मन्त्र इवोच्यते ॥ २४ ॥
'ये भगवान् विष्णु ही यज्ञ करनेवाले यजमानोंको उनके यज्ञोका फल प्रदान करते हैं। ये परम पवित्र और स्वतन्त्र हैं। सम्पूर्ण लोकोंका संचालनसूत्र इन्हींके हाथमे है। जैसे वाणीके माधुर्यका वर्णन वाणीद्वारा ही सम्भव होता है, उसी प्रकार श्रीविष्णुके स्वरूपका प्रतिपादन स्वयं विष्णु ही कर सकते हैं, दूसरोंके लिये इनकी महिमा अनिर्वचनीय है' ॥
ऋषय ऊचुः
स्वागतं ते सुरश्रेष्ठ पद्मनाभ महाद्युते।
इदं यज्ञियमातिथ्यं मन्त्रतः प्रतिगृह्यताम् ॥ २५ ॥
तदनन्तर भगवान्को देखकर ऋषि बोले— सुरश्रेष्ठ ! आपका स्वागत है, महातेजस्वी पद्मनाभ ! आप वेदमन्त्रोंद्वारा यह यज्ञसम्बन्धी आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करें ॥
त्वमस्य यज्ञपूतस्य पात्रं पाद्यस्य पावनः।
अतिथिस्त्वं हि मन्त्रोक्तः सदृष्टः संततं मतः ॥ २६ ॥
इस यज्ञपूत पाद्यके आप ही उत्तम पात्र हैं, क्योंकि आप ही वेदमन्त्रोंद्वारा पावन अतिथि बताये गये हैं। जिनके विषयमें हम सदा सुनते और जानते आये हैं, उन्हींका आज प्रत्यक्ष दर्शन हुआ (यह हमारे लिये सौभाग्यकी बात है) ॥ २६ ॥
त्वयि योद्धुं गते विष्णौ न प्रावर्तन्त नः क्रियाः।
अवैष्णवस्य यज्ञस्य न हि कर्म विधीयते ॥ २७ ॥
आप सर्वव्यापी श्रीहरि जब युद्धके लिये चले गये थे, तब हमारे यज्ञकर्म ठीक तरहसे हो नहीं पाते थे। जिसका सम्बन्ध भगवान् विष्णुसे न हो अर्थात् जिसमे वे उपस्थित न हों, उस यज्ञका कार्य ठीकसे सम्पन्न नहीं होता है ॥ २७ ॥
सदक्षिणस्य यज्ञस्य त्वत्प्रसूतिः फलं लभेत्।
अद्यात्मानमिहास्माभिरिज्यमानं निरीक्षसे ॥ २८ ॥
(आज आपकी उपस्थितिसे हमारा यज्ञ सफल हो गया।) आपका प्रकट होना ही दक्षिणाओंसे सम्पन्न यज्ञका प्रमुख फल है। आज आप यहाँ अपने आपको हमारेद्वारा पूजित देखेंगे ॥ २८ ॥
एवमस्त्विति तान् सर्वान् भगवान् प्रत्यपूजयत्।
मुमुदे ब्रह्मलोकस्थो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ २९ ॥
तब 'एवमस्तु' कहकर भगवान् विष्णुने उन सबका सम्मान किया। उनके द्वारा सम्मानित हो लोकपितामह ब्रह्मा भी अपने लोकमे स्थित हो परम आनन्दका अनुभव करने लगे ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि लोकवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें ब्रह्मलोकका वर्णननामक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
नारायणाश्रममें भगवान् विष्णुका शयन और उत्थान तथा पास आये हुए ब्रह्मा आदि देवताओंसे उनके आगमनका प्रयोजन पूछना
वैशम्पायन उवाच
ऋषिभिः पूजितस्तैस्तु विवेश हरिरीश्वरः।
पौराणं ब्रह्मसदनं दिव्यं नारायणाश्रमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन ऋषियोंसे
| १८८ | श्रीमन्महाभारते, खिलभागे | [ हरिवंशे |
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पूजित होकर सर्वेश्वर भगवान् विष्णुने पुराणप्रसिद्ध दिव्य ब्रह्मधाम (वैकुण्ठ) मे, जो उन श्रीनारायणदेवका आश्रम (विश्रामस्थान) है, प्रवेश किया ॥ १ ॥
स तद् विवेश हृष्टात्मा तानामन्त्र्य सदोगतान् ।
प्रणम्य चादिदेवाय ब्रह्मणे पद्मयोनये ॥ २ ॥
स्वेन नाम्ना परिज्ञातं स तं नारायणाश्रमम् ।
प्रविशन्नेव भगवानायुधानि व्यसर्जयत् ॥ ३ ॥
उन्होंने प्रसन्नचित्तसे उस यज्ञसभामे एकत्र हुए उन सब महर्षियोंसे विदा ले आदिदेव पद्मयोनि ब्रह्माजीको प्रणाम करके अपने ही नामसे प्रसिद्ध हुए उस नारायणाश्रममें प्रवेश किया। उसमें प्रवेश करते ही भगवान्ने सम्पूर्ण आयुधोंको त्याग दिया ॥ २-३ ॥
स तत्राम्बुपतिप्रख्यं ददर्शालयमात्मनः ।
स्वधिष्ठितं देवगणैः शाश्वतैश्च महर्षिभिः ॥ ४ ॥
वहाँ उन्हें अपना शयनागार दिखायी दिया, जो समुद्रके समान शोभा पा रहा था। उसमें सनातन देवगण और शाश्वत महर्षि निवास करते थे ॥ ४ ॥
संवर्तकाम्बुदोपेतं नक्षत्रस्थानसंकुलम् ।
तिमिरौघपरिक्षिप्तमप्रधृष्यं सुरासुरैः ॥ ५ ॥
संवर्तक (प्रलयकारी) मेघोंके अभिमानी देवता वहाँ विद्यमान थे। वह स्थान नक्षत्रोंके आश्रयभूत ज्योतिर्मण्डलसे व्याप्त था। जो वहाँ जानेके अधिकारी नहीं हैं, उनके लिये वह दिव्य धाम अन्धकारसे आवृत्त है अर्थात् उनकी वहाँपर पहुँच नहीं हो पाती है। देवताओं और असुरोंके लिये भी वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है ॥ ५ ॥
न तत्र विषयो वायोर्नन्दोर्न च विवस्वतः ।
वपुषः पद्मनाभस्य स देशस्तेजसाऽऽवृतः ॥ ६ ॥
वहाँ न तो वायुकी, न चन्द्रमाकी और न सूर्यकी ही पहुँच हो पाती है। वह दिव्य देश भगवान् पद्मनाभके सच्चिदानन्दमय श्रीविग्रहकी तेजोऱाशिसे ही आवृत्त एवं प्रकाशित है॥
स तत्र प्रविशन्नेव जटाभारं समुद्वहन् ।
सहस्रशीर्षा भूत्वा तु शयनायोपचक्रमे ॥ ७ ॥
जो पहले सहस्रों मस्तकोंसे विभूषित विराट्रूपधारी होकर शोभा पाते थे, उन्हीं भगवान्ने उस दिव्य धाममे प्रवेश करते ही जगत्के प्राणियोंकी कर्मवासनामयी जटाका भार सिरपर धारण किये वहाँ सोनेकी तैयारी की ॥ ७ ॥
लोकानामन्तकालज्ञा काली नयनशालिनी ।
उपतस्थे महात्मानं निद्रा तं कालरूपिणी ॥ ८ ॥
तदनन्तर लोकोंके अन्तकालको जाननेवाली कृष्णवर्णा कालरूपिणी निद्रा, जो नेत्रोंका आश्रय लेकर शोभा पाती है, उन परमात्मा श्रीहरिकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ ८ ॥
स शिश्ये शयने दिव्ये समुद्राम्भोदशीतले ।
हरिरेकार्णवोक्तेन व्रतेन व्रतिनां वरः ॥ ९ ॥
व्रतधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीहरिने समुद्र और मेघोंके जलसे शीतल दिव्य शय्यापर शयन किया। प्रलयकालमें सारे जगत्के एकार्णवमग्न हो जानेपर जिस नियमसे भगवान्के शयनका वर्णन पुराणोंमें मिलता है, उसीके अनुसार उस समय भी भगवान्ने शयन किया था*॥ ९ ॥
तं शयानं महात्मानं भवाय जगतः प्रभुम् ।
उपासाञ्चक्रिरे विष्णुं देवाः सर्षिगणास्तथा ॥ १० ॥
जगत्के अभ्युदयके लिये शयन करनेवाले उन सर्वसमर्थ महात्मा विष्णुकी वहाँ रहनेवाले देवता और ऋषि उपासना करने लगे ॥ १० ॥
तस्य सुप्तस्य शुशुभे नाभिमध्यात् समुत्थितम् ।
आद्यं तस्यासनं पद्मं ब्रह्मणः सूर्यवर्चसम् ।
सहस्रपत्रं वर्णाढ्यं सुकुमारं सुपुष्पितम् ॥ ११ ॥
सोये हुए भगवान्की नाभिके मध्यभागसे एक कमल प्रकट होकर शोभा पाने लगा। उसकी कान्ति सूर्यके समान थी। वही ब्रह्माका आदि आसन है। उसमे सहस्र दल हैं, वह बीजरूपी विभिन्न वर्णोंसे अङ्कित, अत्यन्त कोमल एवं अच्छी तरह खिला हुआ है ॥ ११ ॥
ब्रह्मसूत्रोद्यतकरः स्वपन्नेव महामुनिः ।
आवर्तयति लोकानां सर्वेषां कालपर्ययम् ॥ १२ ॥
ब्रह्माजीकी जो पूर्वजन्मोंकी वासना (कर्म-संस्कार) है, वही सूत्ररूपसे मानो भगवान्का उठा हुआ हाथ है, उसके द्वारा वे सृष्टि आदिके लिये संकेत करते रहते हैं। इस प्रकार वे महामुनि श्रीहरि सोते हुए ही समस्त लोकोंके कालजनित उलट-फेर (सृष्टि-संहार) की आवृत्ति किया करते हैं ॥१२॥
विवृतात् तस्य वदनान्निःश्वासपवनेरिताः ।
प्रजानां पङ्क्तयो ह्युच्चैर्निष्पतन्त्युत्पतन्ति च ॥ १३ ॥
उनके खुले हुए मुखसे जो निःश्वास वायु निर्गत होती है, उससे प्रेरित होकर प्रजाओंकी विभिन्न श्रेणियाँ बड़े वेगसे निकलती और उत्पन्न होती रहती हैं ॥ १३ ॥
ते सृष्टाः प्राणिनो मेध्या विभक्ता ब्रह्मणा स्वयम् ।
चतुर्धा खां गतिं जग्मुः कृतान्तोक्तेन कर्मणा ॥ १४ ॥
वे उत्पन्न हुए पवित्र प्राणी साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्ररूपसे चार भागोंमें विभक्त
* यहाँ आचार्य नीलकण्ठने शयनका अर्थ समाधि किया है, उनके मतमें यहाँ समुद्रसे निर्विकल्प समाधि और मेघसे सविकल्प समाधि परिलक्षित होती हैं और शीतलका अर्थ वे तापरहित करते हैं, जो समाधिका विशेषण है। इसी तरह वे एकार्णवोक्त व्रतका अर्थ निर्विकल्प समाधिके लिये बताया गया 'संयम' मानते हैं।
हरिवंशपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः १८९
किये जाते हैं। फिर वे चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने लिये बताये गये वेदोक्त कर्मका ( निष्कामभावसे ) अनुष्ठान करके अपनी परम गति ( परमात्मा ) को प्राप्त कर लेते हैं ॥१४॥
न तं वेद स्वयं ब्रह्मा नापि ब्रह्मर्षयोऽव्ययाः ।
विष्णोर्निद्रामयं योगं प्रविष्टं तमसावृतम् ॥ १५ ॥
योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करनेवाला जो भगवान् विष्णुका योगमायासे समावृत स्वरूप है, उसे स्वयं ब्रह्माजी तथा ( ब्रह्मलोकके ) अविनाशी ब्रह्मर्षि भी नहीं जान पाते हैं ॥ १५ ॥
ते तु ब्रह्मर्षयः सर्वे पितामहपुरोगमाः ।
न विदुस्तं क्वचित् सुप्तं क्वचिदासीनमासने ॥ १६ ॥
वे ब्रह्मा आदि सभी ब्रह्मर्षि किसी देश-कालमे सोये और किसी देश-कालमे आसनपर बैठकर जागते हुए भगवान्के स्वरूपको यथार्थरूपसे समझ नहीं पाते हैं ॥ १६ ॥
जागर्ति कोऽत्र कः शेते कश्च शक्तश्च नेङ्गते ।
को भोगवान् को द्युतिमान् कृष्णात् कृष्णतरश्च कः ॥१७॥
उन्हें यह ज्ञात नहीं होता कि यहाँ कौन जागता है ? कौन सोता है ? कौन सर्वशक्तिमान् होकर भी कोई चेष्टा नहीं करता है ? कौन भोगवान् है ? कौन परम कान्तिमान् है तथा कौन कृष्ण (सूक्ष्म) से भी कृष्णतर (अत्यन्त सूक्ष्म) है ? ॥ १७ ॥
विमृशन्ति स्म तं देवा दिव्याभिरुपपत्तिभिः ।
न चैनं शेकुरन्वेष्टुं कर्मतो जन्मतोडपि वा ॥ १८ ॥
देवता दिव्य युक्तियोंद्वारा इनके विषयमे विचार करते रहते हैं; परंतु वे अबतक इनके जन्म और कर्मके रहस्यका पता नहीं लगा सके हैं ॥ १८ ॥
गाथाभिस्तत्प्रदिष्टाभिर्ये तस्य चरितं विदुः ।
पुराणास्तं पुराणेषु ऋषयः सम्प्रचक्षते ॥ १९ ॥
उन परमात्माने अपने निःश्वासभूत वेदमन्त्रोंके द्वारा जिनका उपदेश किया है, उन वैदिकी गाथाओंद्वारा जो उनके चरित्रको जानते थे, उन पुरातन ऋषियोंने ही पुराणोंमें उन परमेश्वरके स्वरूपका विशद विवेचन किया है ॥ १९ ॥
श्रूयते चास्य चरितं देवेष्वपि पुरातनम् ।
महापुराणात् प्रभृति परं तस्य न विद्यते ॥ २० ॥
देवताओंके यहाँ भी महापुराण आदिसे इनके पुरातन चरित्रका श्रवण किया जाता है। उनका कहीं अन्त नहीं है ॥ २० ॥
यच्चास्य देवदेवस्य चरितं स्वप्रभावजम् ।
तेनेमाः श्रुतयो व्याप्ता वैदिक्यो लौकिकाश्च याः ॥ २१ ॥
१. यहाँ कृष्णका अर्थ कृश अर्थात् सूक्ष्म है।
उन देवाधिदेव परमात्माका उनके प्रभावसे ( पराक्रम आदिके द्वारा ) प्रकट हुआ जो लीला-चरित्र है, उसीसे ये वैदिकी और लौकिकी श्रुतियाँ भरी हुई हैं ॥ २१ ॥
भवकाले भवत्येष लोकानां लोकभावनः ।
दानवानामभावाय जागर्ति मधुसूदनः ॥ २२ ॥
लोकोंकी सृष्टिके समय ये लोकभावन मधुसूदन सगुणरूप-से प्रकट होते हैं और दानवोंके विनाशके लिये सदा जागरूक रहते हैं ॥ २२ ॥
यच्चैनं वीक्षितुं देवा न शेकुः सुप्तमव्ययम् ।
ततः स्वपिति घर्मान्ते जागर्ति जलदक्षये ॥ २३ ॥
जहाँ सो जानेपर इन अविनाशी प्रभुको देवता भी नहीं देख सके थे; वहीं ये वर्षाकालमें ( आषाढ़ शुक्ला एकादशीसे कार्तिक शुक्ला एकादशीतक ) सोते और वर्षा व्यतीत होनेपर जागते हैं ॥ २३२ ॥
स हि वेदाश्च यज्ञाश्च यज्ञाङ्गानि च सर्वशः ।
या तु यज्ञगतिः प्रोक्ता स एष पुरुषोत्तमः ॥ २४ ॥
भगवान् विष्णु ही वेद, यज्ञ तथा समस्त यज्ञाङ्ग ( यज्ञके उपकरण ) हैं। यज्ञोद्वारा प्राप्त होनेवाली जो परम गति बतायी गयी है, वह भी ये भगवान् पुरुषोत्तम ही हैं ॥ २४ ॥
तस्मिन् सुप्ते न वर्तन्ते मन्त्रपूताः क्रतुक्रियाः ।
शरत्प्रवृत्तयज्ञोऽयं जागर्ति मधुसूदनः ॥ २५ ॥
भगवान्के शयनकालमें मन्त्रपूत यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान नहीं होता है। शरद्ऋतुमें जब ये मधुसूदन जागते हैं, उस समय वाजपेय आदि यज्ञोंका अनुष्ठान आरम्भ हो जाता है ॥ २५ ॥
तदिदं वार्षिकं चक्रं कारयत्यम्बुदेश्वरः ।
वैष्णवं कर्म कुर्वाणः सुप्ते विष्णौ पुरंदरः ॥ २६ ॥
भगवान् विष्णुके शयन करनेपर मेघोंके स्वामी देवराज इन्द्र स्वयं ही प्रजापालन रूप वैष्णवकर्मका सम्पादन करते हैं और वे ही लोगोंसे वर्षा ऋतुमे होनेवाले जलसम्बन्धी कर्म ( उपाकर्म एवं श्राद्धतर्पण आदि ) का अनुष्ठान करवाते हैं ॥ २६ ॥
या ह्येषा गह्वरा माया निद्रेति जगति स्थिता ।
साकस्माद् द्वेषिणी घोरा कालरात्रिर्महेक्षिताम् ॥ २७॥
यह जो गहन तमोमयी माया है, वही संसारमें निद्रारूप-से स्थित है। वह अकारण ही सबसे द्वेष रखनेवाली और
२. श्रुति कहती है—'शरदि वाजपेयेन यजेत ।' अर्थात् 'शरद्ऋतुमें वाजपेय यज्ञके द्वारा भगवान्की आराधना करे।' (नी० क०)
| १९० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
भयंकर है तथा युद्धक्षेत्रमें उतरे हुए राजाओंके लिये कालरात्रिके समान है ॥ २७ ॥
तस्यास्तनुस्तमोद्वारा निशा दिवसनाशिनी ।
जीवितार्धहरा घोरा सर्वप्राणभृतां भुवि ॥ २८ ॥
उस तामसी मायाका शरीर है रात्रि, जिसका द्वार है अन्धकार । वह दिनका नाश करनेवाली तथा निद्राद्वारा भूतलके समस्त प्राणियोंके आधे जीवनको हर लेनेवाली है । उसका स्वरूप भयंकर है ॥ २८ ॥
नैतया कश्चिदाविष्टो जृम्भमाणो मुहुर्मुहुः ।
शक्तः प्रसहिनुं वेगं मज्जन्निव महार्णवे ॥ २९ ॥
इस निशा एवं निद्रारूपिणी मायासे आविष्ट हुआ कोई भी प्राणी बारंबार जँभाई लेने लगता है और महासागरमें डूबते हुए मनुष्यके समान विवश होकर उसके वेगको सहन नहीं कर पाता है ॥ २९ ॥
अन्नजा भुवि मर्त्यानां श्रमजा वा कथंचन ।
सैषा भवति लोकस्य निद्रा सर्वस्य लौकिकी ॥ ३० ॥
पृथ्वीपर रहनेवाले मरणधर्मा मनुष्योंको यह निद्रा भोजन अथवा किसी प्रकारके परिश्रमके कारण प्राप्त होती है । इस प्रकार यह लौकिकी निद्रा जगत्के सभी प्राणियोंको आती है ॥ ३० ॥
स्वप्नान्ते क्षीयते ह्येषा प्रायशो भुवि देहिनाम् ।
मृत्युकाले च भूतानां प्राणान् नाशयते भृशम् ॥ ३१ ॥
पृथ्वीपर देहधारियोंको जो निद्रा आती है, वह प्रायः सो लेनेके बाद स्वयं ही नष्ट हो जाती है, परंतु जब प्राणियोंका मृत्युकाल उपस्थित होता है, उस समय यह उनके प्राणोंका प्रबल वेगसे नाश कर डालती है ॥ ३१ ॥
देवेष्वपि दधारैनां नान्यो नारायणाहते ।
सखी सर्वहरस्यैषा माया विष्णुशरीरजा ॥ ३२ ॥
देवताओंमें भी भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कोई इसे धारण नहीं कर सका (और न इसपर काबू ही पा सका है)। भगवान् विष्णुके शरीरसे प्रकट हुई यह माया सर्वसंहारकारी कालकी सखी (सहायिका) है ॥ ३२ ॥
सैषा नारायणमुखे दृष्टा कमललोचना ।
लोकानल्पेन कालेन ग्रसते लोकमोहिनी ॥ ३३ ॥
वही यह माया भगवान् नारायणके मुखमण्डलमें उनके नेत्रकमलोंके भीतर स्थित देखी गयी है। यही कमलनयनी नारीके रूपमें भी प्रकट होती है। सम्पूर्ण विश्वको मोहमें डालनेवाली निद्रामयी माया अल्पकालमें ही समस्त लोकोंको ग्रस लेती है ॥ ३३ ॥
एवमेषा हितार्थाय लोकानां कृष्णवर्त्मना ।
ध्रियते सेवनीया हि पत्येव च पतिव्रता ॥ ३४ ॥
जिनका मार्ग सूक्ष्म है, उन परमात्मा श्रीहरिने समस्त लोकोंके हितके लिये (अर्थात् उन्हें विश्रामसुखका अनुभव करानेके लिये) इस निद्राको धारण किया है। जैसे पति पतिव्रता स्त्रीका सेवन करता है, उसी प्रकार विश्राम-सुखकी इच्छावाले प्रत्येक व्यक्तिको समय-समयपर इसका सेवन करना चाहिये ॥ ३४ ॥
स तया निद्रया च्छन्नस्तस्मिन् नारायणाश्रमे ।
स्वपिति स्म तदा विष्णुर्मोहयञ्जगदव्ययः ॥ ३५ ॥
इस तरह अविनाशी भगवान् विष्णु उस योगनिद्रासे आच्छन्न हो सम्पूर्ण जगत्को मोहमें डालते हुए उस समय नारायणाश्रममें शयन करने लगे ॥ ३५ ॥
तस्य वर्षसहस्राणि शयानस्य महात्मनः ।
जग्मुः कृतयुगं चैव त्रेता चैव युगोत्तमम् ॥ ३६ ॥
वहाँ सोते हुए महात्मा नारायणके हजारों वर्ष बीत गये । सत्ययुग तथा उत्तम त्रेतायुग भी समाप्त हो गये ॥ ३६ ॥
स तु द्वापरपर्यन्ते ज्ञात्वा लोकान् सुदुःखितान् ।
प्राबुध्यत महातेजाः स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ ३७ ॥
द्वापरके अन्तमें समस्त लोकोंको अत्यन्त दुःखसे पीड़ित जान महर्षियोंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए वे महातेजस्वी भगवान् श्रीहरि जाग उठे ॥ ३७ ॥
ऋषय ऊचुः
जहीहि निद्रां सहजां भुक्तपूर्वामिव स्रजम् ।
इमे ते ब्रह्मणा सार्धं देवा दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ३८ ॥
ऋषि बोले—भगवन् ! जैसे पहलेके उपभोगमे लगी हुई फूलमालाको त्याग दिया जाता है, उसी प्रकार आप अपनी इस सहज निद्राको त्याग दीजिये। ब्रह्माजीके साथ ये समस्त देवता आपके दर्शनकी अभिलाषासे खड़े हैं ॥ ३८ ॥
इमे त्वां ब्रह्मविद्वांसो ब्रह्मसंस्तववादिनः ।
वर्धयन्ति हृषीकेश ऋषयः संशितव्रताः ॥ ३९ ॥
हृषीकेश ! ये उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मवेत्ता महर्षि वेदोक्त स्तोत्रोंका पाठ करते हुए आपका अभिनन्दन करते (आपको बधाई देते) हैं ॥ ३९ ॥
एतेषामात्मभूतानां भूतानां भूतभावन ।
शृणु विष्णो शुभा वाचो भूव्योमाग्न्यनिलाम्भसाम् ॥ ४० ॥
भूतभावन विष्णो ! ये जो आपके ही स्वरूपभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशरूप महाभूतोंके अधिष्ठाता देवता हैं, इनके शुभ वचन आप सुनें ॥ ४० ॥
इमे त्वां सप्त मुनयः सहिता मुनिमण्डलैः ।
स्तुवन्ति देव दिव्याभिर्गीर्गाभिर्भरतर्षभ ॥ ४१ ॥
हरिवंशपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ १९१
देव ! ये मुनि-मण्डलीसहित सप्तर्षि गाने योग्य दिव्य वाणीद्वारा स्वभावतः आपकी स्तुति करते हैं ॥ ४१ ॥
उत्तिष्ठ शतपत्राक्ष पद्मनाभ महाद्युते ।
कारणं किञ्चिदुत्पन्नं देवानां कार्यगौरवात् ॥ ४२ ॥
कमलनयन ! उठिये । महातेजस्वी पद्मनाभ ! देवताओंके गुरुतर कार्यवश आपको जगानेके लिये कुछ कारण उत्पन्न हो गया है ॥ ४२ ॥
वैशम्पायन उवाच
स संक्षिप्य जलं सर्वं तिमिरौघं विदारयन् ।
उदतिष्ठद्धृषीकेशः श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ४३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब सारे जलको समेटकर तथा अनधिकारियोंके लिये योगमायाने जो तमोमय आवरण लगा दिया था, उसको भी दूर करके भगवान् हृषीकेश अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए उठे ॥ ४३ ॥
स ददर्श सुरान् सर्वान् समेतान् सपितामहान् ।
विवक्षतः प्रक्षुभिताञ्जगदर्थे समागतान् ॥ ४४ ॥
उन्होंने देखा, ब्रह्मसहित समस्त देवता उपस्थित हैं। इनके मनमें क्षोभ उत्पन्न हुआ है और उसीके सम्बन्धमें ये कुछ कहना चाहते हैं। उन्हें यह भी ज्ञात हो गया कि ये लोग जगत्के हितके लिये ही यहाँ पधारे हैं ॥४४॥
तानुवाच हरिर्देवो निद्राविश्रान्तलोचनः ।
तत्त्वदृष्टार्थया वाचा धर्महेत्वर्थयुक्तया ॥ ४५ ॥
निद्राके द्वारा जिनके नेत्रोंको विश्राम मिल चुका था, उन भगवान् श्रीहरिने धर्मसम्मत, युक्तिसंगत तथा तात्त्विक अर्थसे युक्त वाणीद्वारा उस समय उन देवताओंसे इस प्रकार कहा ॥ ४५ ॥
श्रीभगवानुवाच
कुतो वो विग्रहो देवाः कुतो वो भयमागतम् ।
कस्य वा केन वा कार्यं किं वा मयि न वर्तते ॥ ४६॥
श्रीभगवान् बोले—देवताओ ! तुम्हारा किससे युद्ध छिड़ा हुआ है ? कहाँसे तुमपर भय आया है ? अथवा किस देवताको किस वस्तुकी आवश्यकता पड़ गयी है ? बताओ, कौन ऐसी वस्तु है, जो मेरे पास नहीं है ? (अर्थात् मेरे पास सब कुछ है और मैं तुम्हे सब कुछ दूँगा ) ॥ ४६ ॥
किं खल्वकुशलं लोके वर्तते दानवोत्थितम् ।
नृणामायासंजननं शीघ्रामिच्छामि वेदितुम् ॥ ४७ ॥
दानवोंकी ओरसे कौन-सा ऐसा कार्य किया गया है, जो लोकके लिये अमङ्गलकारी और मनुष्योंके लिये कष्टजनक सिद्ध हुआ है ? यह मैं शीघ्र जानना चाहता हूँ ॥४७॥
एष ब्रह्मविदां मध्ये विहाय शयनोत्तमम् ।
शिवाय भवतामर्थे स्थितः किं करवाणि वः ॥ ४८ ॥
आप सभी ब्रह्मवेत्ताओंके बीचमें इस उत्तम शय्याको त्यागकर यह मैं आपके कल्याण-साधनके लिये तैयार खड़ा हूँ । बताइये, आपकी क्या सेवा करूँ ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि विष्णोर्योगशयनोत्थाने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें भगवान् विष्णुका योगशय्यासे उत्थानविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
ब्रह्माजीका भगवान् विष्णुसे जगत्की वर्तमान अवस्थाका वर्णन करते हुए पृथ्वीका भार उतारनेके लिये मन्त्रणा करनेका अनुरोध
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा विष्णुगदितं ब्रह्मा लोकपितामहः ।
उवाच परमं वाक्यं हितं सर्वदिवौकसाम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् विष्णुका वह कथन सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने समस्त देवताओंके लिये हितकारक उत्तम बात कही—॥ १ ॥
नास्ति किंचिद् भयं विष्णो सुराणामसुरान्तक ।
येषां भवानभयदः कर्णधारो रणे रणे ॥ २ ॥
'असुरोंका संहार करनेवाले विष्णुदेव ! युद्धके अवसरोंपर जिनके आप-जैसे अभयदायक कर्णधार हों, उन देवताओंको कोई भय नहीं ॥ २ ॥
शक्रे जयति देवेशे त्वयि चासुरसूदने ।
धर्मे प्रयतमानानां मानवानां कुतो भयम् ॥ ३ ॥
'जबतक देवराज इन्द्र विजयी हैं और असुरोंका संहार करनेवाले आप रक्षाके लिये उद्यत हैं, तबतक धर्मके लिये प्रयत्नशील रहनेवाले मनुष्योंको भी किससे भय हो सकता है ॥ ३ ॥
सत्ये धर्मे च निरतान् मानवान् विगतज्वरान् ।
नाकाले धर्मिणो मृत्युः शक्नोति प्रसमीक्षितुम् ॥ ४ ॥
| १९२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
'जो मनुष्य सत्य और धर्ममें तत्पर रहकर चिन्तारहित हो धर्मके अनुष्ठानमे लगे हुए हैं, उनकी ओर अकालमृत्यु आँख उठाकर देख भी नहीं सकती है ॥ ४ ॥
मानवानां च पतयः पार्थिवाश्च परस्परम्।
षड्भागमुपभुञ्जाना न भयं कुर्वते मिथः ॥ ५ ॥
'मनुष्योंके अधिपति जो पृथ्वीपालक नरेश हैं, वे भी प्रजाकी आयके छठे भागका करके रूपमें उपभोग करते हुए आपसमें कभी भेद या कलह नहीं करते हैं ॥ ५ ॥
ते प्रजानां शुभकराः करदैरविगर्हिताः।
सुकरैर्विप्रयुक्तार्थैः कोशमापूरयन्त्युत ॥ ६ ॥
'वे सदा ही प्रजाकी भलाई करते हैं, इसलिये कर देने-वाले लोग उनकी निन्दा नहीं करते। राजाओंको जब अर्थकी कमी पड़ती है, तब वे न्यायोचित करोंके द्वारा ही अपना खजाना भरते हैं ॥ ६ ॥
स्फीताञ्जनपदान् सर्वान् पालयन्तः क्षमापराः।
अतीक्ष्णदण्डांश्चतुरो वर्णाञ्जुगुपुरञ्जसा ॥ ७ ॥
वे क्षमापरायण हो अपने समस्त समृद्धिशाली जनपदोंका पालन करते हैं। कभी किसीको कठोर दण्ड नहीं देते हैं तथा चारों वर्णोंकी यथोचित रीतिसे रक्षा करते हैं ॥ ७ ॥
नोद्वेजनीया भूतानां सचिवैः साधुपूजिताः।
चतुरङ्गबलैर्गूप्ताः षड्गुणानुपयुञ्जते ॥ ८ ॥
'(वे स्वयं किसीको उद्विग्न नहीं करते हैं, इसलिये) कोई भी प्राणी उन्हें उद्वेगमें नहीं डालते हैं। मन्त्रियोंद्वारा वे भलीभाँति सम्मानित होते हैं तथा चतुरङ्गिणी सेनाओंसे सुरक्षित होकर (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन) छः गुणोंका यथावसर उपयोग करते रहते हैं ॥ ८ ॥
धनुर्वेदपराः सर्वे सर्वे वेदेषु निष्ठिताः।
यजन्ते च यथाकालं यज्ञैर्विपुलदक्षिणैः ॥ ९ ॥
'सभी नरेश धनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर हैं, सभी वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान् हैं और यथासमय प्रचुर दक्षिणायुक्त यज्ञोंद्वारा भगवान्की आराधना करते रहते हैं ॥ ९ ॥
वेदानधीत्य दीक्षाभिर्महर्षीन् ब्रह्मचर्यया।
श्राद्धैश्च मेध्यैः शतशस्तर्पयन्ति पितामहान् ॥ १० ॥
'वे दीक्षा ग्रहण एवं ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक वेदोंका अध्ययन करके महर्षियोंको तथा पवित्र श्राद्ध-कर्मोंद्वारा सैकड़ों बार पितरोंको तृप्त करते रहते हैं ॥ १० ॥
नैषामविदितं किंचित् त्रिविधं भुवि दृश्यते।
वैदिकं लौकिकं चैव धर्मशास्त्रोक्तमेव च ॥ ११ ॥
'भूतलपर जो वैदिक, लौकिक तथा धर्मशास्त्रकथित—तीन प्रकारके कर्म दृष्टिगोचर होते हैं, उनमेंसे कोई भी कर्म इन राजाओंको अज्ञात नहीं है ॥ ११ ॥
ते परावरदृष्टार्था महर्षिसमतेजसः।
भूयः कृतयुगं कर्तुमुत्सहन्ते नराधिपाः ॥ १२ ॥
'उन्हें परावर-तत्त्वका साक्षात्कार हो चुका है। वे सभी नरेश महर्षियोंके समान तेजस्वी हैं और पुनः इस पृथ्वीपर सत्ययुगको लानेका उत्साह रखते हैं ॥ १२ ॥
तेषामेव प्रभावेण शिवं वर्षति वासवः।
यथार्थं च ववुर्वाता विरजस्का दिशो दश ॥ १३ ॥
'उन्हींके प्रभावसे देवराज इन्द्र जगत्मे कल्याणकारी जलकी वर्षा करते हैं, वायु यथोचित गतिसे प्रवाहित होती है और दसों दिशाएँ स्वच्छ रहती हैं ॥ १३ ॥
निरुत्पाता च वसुधा सुप्रचाराश्च खे ग्रहाः।
चन्द्रमाश्च सनक्षत्रः सौम्यं चरति योगतः ॥ १४ ॥
'पृथ्वीपर कोई उत्पात नहीं होता, आकाशमें सभी ग्रह समुचित गतिसे विचरण करते हैं तथा नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा भी उनके साथ संयुक्त होकर सौम्यगतिसे विचरण कर रहे हैं ॥ १४ ॥
अनुलोमकरः सूर्यस्त्वयने द्वे चचार ह।
हव्यैश्च विविधैस्तृप्तः शुभगन्धो हुताशनः ॥ १५ ॥
'जगत्के लिये अनुकूल किरणोंसे युक्त हुए भगवान् सूर्य दोनों अयनोंमें विचरते हैं तथा उत्तम गन्धसे सुवासित अग्निदेव नाना प्रकारके हविष्योंकी आहुति पाकर तृप्त होते हैं ॥ १५ ॥
एवं सम्यक् प्रवृत्तेषु विवृद्धेषु मखादिषु।
तर्पयत्सु महीं कृत्स्नां नृणां कालभयं कुतः ॥ १६ ॥
'जब इस प्रकार राजालोग भलीभाँति सत्कर्मोंमें प्रवृत्त हैं, यज्ञ आदि कर्म दिनोंदिन बढ़ रहे हैं और वे नरेश समस्त भूमण्डलको निरन्तर तृप्त एवं संतुष्ट कर रहे हैं, तब मनुष्योंको कालका भय कैसे हो सकता है ॥ १६ ॥
तेषां ज्वलितकीर्तीनामन्योन्यवशवर्तिनाम्।
राज्ञां बलैर्बलवतां पीड्यते वसुधातलम् ॥ १७ ॥
'परंतु जिनकी कीर्ति सब ओर जगमग हो रही है तथा जो एक दूसरेके वशवर्ती होकर मेल-मिलापसे रहते हैं, उन बलवान् राजाओंके पास जो असंख्य सेनाएँ हैं, उनके भारसे पृथ्वीको बड़ी पीड़ा हो रही है ॥ १७ ॥
सेयं भारपरिश्रान्ता पीड्यमाना नराधिपैः।
पृथिवी समनुप्राप्ता नौरिवासन्नविप्लवा ॥ १८ ॥
'इस प्रकार भारसे थकी हुई यह पृथ्वी उन नरेशोंसे पीड़ित होकर आपकी शरणमें आयी है। इसकी दशा उस
[ हरिवंशपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः १९३
नावकी-सी हो रही है, जिसके डूबनेका समय अत्यन्त निकट हो ॥ १८ ॥
युगान्तसदृशै रूपैः शैलोच्छलितबन्धना ।
जलोत्पीडाकुला स्वेदं धारयन्ती मुहुर्मुहुः ॥ १९ ॥
'उन राजाओंके रूप प्रलयकालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं। उनसे पीड़ित होनेके कारण इस पृथ्वीके पर्वतरूपी बन्धन ढीले पड़ने लगे हैं अर्थात् इस नौकारूपिणी पृथ्वीमें जो कीलें ठुकी हुई थीं, वे अब उखड़ने लगी हैं; अतः वह रसातलकी जलराशिमे डूबनेकी आशङ्कासे व्याकुल हो उठी है और इसके शरीरमें बारंबार पसीना आ रहा है ॥ १९ ॥
क्षत्रियाणां वपुर्भिंश्च तेजसा च बलेन च ।
नृणां च राष्ट्रैर्विस्तीर्णैः श्राम्यतीव वसुन्धरा ॥ २० ॥
'क्षत्रियोंके शरीर, तेज और बलसे तथा मनुष्योंके दूर-तक फैले हुए राज्योंसे यह पृथ्वी थकती-सी जा रही है ॥ २० ॥
पुरे पुरे नरपतिः कोटिसंख्यैर्बलैर्वृतः ।
राष्ट्रे राष्ट्रे च बहवो ग्रामाः शतसहस्रशः ॥ २१ ॥
'नगर-नगरमें वहाँका नरेश एक-एक करोड़ सैनिकोसे सम्पन्न है तथा प्रत्येक राज्यमे कई लाख ग्राम हैं ॥ २१ ॥
भूमिपानां सहस्रैश्च तेषां च बलिनां बलैः ।
ग्रामायुताढ्यै राष्ट्रैश्च भूमिर्निर्विवराकृता ॥ २२ ॥
'सहस्रों भूपालों, उन बलवान् भूपालोकी सेनाओं तथा दस-दस हजार गाँवोंसे युक्त उनके राष्ट्रोंसे यह भूमि इतनी भर गयी है कि कहीं थोड़ी-सी भी जगह खाली नहीं है ॥ २२ ॥
सेयं निरामयं कृत्वा निश्चेष्टा कालमग्रतः ।
प्राप्ता ममालयं विष्णो भवांश्चास्याः परा गतिः ॥ २३ ॥
'विष्णुदेव ! यह पृथ्वी निश्चेष्ट होकर निरामय कालको आगे करके मेरे निवासस्थानमें आयी थी। अब आप इसकी परम गति हैं ॥ २३ ॥
कर्मभूमिरिमंनुष्याणां भूमिरेशा व्यथां गता ।
यथा न सीदेत् तत् कार्यं जगत्येषा हि शाश्वती ॥ २४ ॥
'जगत्की आधारभूता यह सदा रहनेवाली भूमि, जो मनुष्योंकी कर्मभूमि है, बड़ा कष्ट पा रही है। यह अधिक भारके कारण दबकर बिखर न जाय, ऐसा कोई उपाय करना चाहिये ॥ २४ ॥
अस्या हि पीडने दोषो महान् स्यान्मधुसूदन ।
क्रियालोपश्च लोकानां पीडितं च जगद् भवेत् ॥ २५ ॥
'मधुसूदन ! इसके पीड़ित होनेपर महान् दोष प्राप्त हो सकता है। सब लोगोंकी सारी क्रियाएँ लुप्त हो जायँगी और सारा जगत् पीड़ित होने लगेगा ॥ २५ ॥
श्राम्यते व्यक्तमेवेयं पार्थिवौघप्रपीडिता ।
सहजां या क्षमां त्यक्त्वा चलत्वमचला गता ॥ २६ ॥
'निश्चय ही यह राजाओके भारी सैन्यसमुदायसे पीड़ित होकर थकती चली जा रही है। यह बात इसीसे स्पष्ट है कि यह अचला भूमि अपनी स्वाभाविक क्षमाको त्यागकर विचलित हो उठी है ॥ २६ ॥
तदस्याः श्रुतवन्तः स्म तच्चापि भवता श्रुतम् ।
भारावतरणार्थं हि मन्त्रयाम सह त्वया ॥ २७ ॥
'हमने इसीसे इसकी सारी बातें सुनी है और आपने भी उन्हें सुन लिया, अतः हम इसका भार दूर करनेके लिये आपके साथ मन्त्रणा (विचार) करना चाहते हैं ॥ २७ ॥
सत्यपथे हि स्थिताः सर्वे राजानो राष्ट्रवर्धनाः ।
नराणां च त्रयो वर्णा ब्राह्मणाननुयायिनः ॥ २८ ॥
'भूतलके समस्त राजा सन्मार्गमें स्थित हो अपने राष्ट्रों-की वृद्धि कर रहे हैं। मनुष्योंके क्षत्रिय आदि तीनों वर्ण ब्राह्मणोंके अनुगामी हैं ॥ २८ ॥
सर्वे सत्यपरं वाक्यं वर्णा धर्मपरास्तथा ।
सर्वे वेदपरा विप्राः सर्वे विप्रपरा नराः ॥ २९ ॥
'मनुष्योंकी सारी बातें सत्यके ही आश्रित हैं। सभी वर्ण अपने-अपने धर्ममें तत्पर हैं। समस्त ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्याय-मे लगे हुए हैं तथा सभी मनुष्य ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहते है ॥ २९ ॥
एवं जगति वर्तन्ते मनुष्या धर्मकारणात् ।
यथा धर्मक्षयो न स्यात् तथा मन्त्रः प्रवर्त्यताम् ॥ ३० ॥
'इस प्रकार संसारके सभी मानव धर्मपूर्वक बर्ताव करते हैं। अतः ऐसी कोई मन्त्रणा की जाय, जिससे पृथ्वीका भार तो कम हो जाय, परंतु धर्मको हानि न पहुँचे ॥ ३० ॥
सतां गतिरियं नान्या धर्मश्चास्याः सुसाधनम् ।
राज्ञां चैव वधः कार्यों धरण्या भारनिर्णये ॥ ३१ ॥
'यही सत्पुरुषोंकी गति है, दूसरी नहीं और धर्म ही इसका उत्तम साधन है। इस पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये राजाओका वध आवश्यक कार्य है ॥ ३१ ॥
तदागच्छ महाभाग सह वै मन्त्रकारणात् ।
व्रजामो मेरुशिखरं पुरस्कृत्य वसुंधराम् ॥ ३२ ॥
'अतः महाभाग ! आइये, हम सब लोग इस विषयपर एक साथ विचार करनेके लिये पृथ्वीको आगे करके मेरु पर्वतके शिखरपर चलें' ॥ ३२ ॥
एतावदुक्त्वा राजेन्द्र ब्रह्मा लोकपितामहः ।
म० ह० ७