विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| [ हरिवंशपर्व ] | पञ्चाशत्तमोऽध्यायः | १८७ |
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और सोमका कार्य जानते हैं, उसके कारणभूत वे सोम और अग्नि तथा यह कार्यभूत जगत् भी सनातन विष्णुरूप ही है, यह बात तुम्हे भी विदित है ॥ २० ॥
क्षीराद् यथा दधि भवेद् दध्नः सर्पिर्भवेद् यथा।
मध्यमानेषु भूतेषु तथा लोको जनार्दनात् ॥ २१ ॥
'जैसे दूधसे दही बनता है और दहीसे मन्थन करनेपर घी प्रकट होता है, उसी प्रकार भूतों (देह और इन्द्रिय आदि) के मथे जानेपर अर्थात् चित्तको एकाग्र करके सूक्ष्म तत्त्वका चिन्तन करनेपर यह ज्ञात हो जाता है कि सारा संसार भगवान् जनार्दनसे ही प्रकट हुआ है ॥ २१ ॥
यथेन्द्रियैश्च भूतैश्च परमात्मा विधीयते।
तथा देवैश्च वेदैश्च लोकैश्च विहितो हरिः ॥ २२ ॥
'जैसे चेतनासे व्याप्त भूतो (शरीरो) और इन्द्रियोंद्वारा उनके नियन्ता परमात्माका स्वतः ज्ञापन या प्रतिपादन हो जाता है, उसी प्रकार अनुग्रह आदि गुणोंसे युक्त देवताओं, वेदों और लोकोंद्वारा (उनके अन्तर्यामी आत्मारूपसे) श्रीहरिका बोध हो जाता है ॥ २२ ॥
यथा भूतेन्द्रियावाप्तिर्विहिता भुवि देहिनाम्।
तथा प्राणेश्वरावाप्तिर्देवानां दिवि वैष्णवी ॥ २३ ॥
'जैसे भूतलपर देहधारी प्राणियोंको जो देह और इन्द्रियोंकी प्राप्ति हुई है, उनका सम्बन्ध पार्थिव भूतोंसे है, उसी प्रकार स्वर्गलोकमे देवताओंको जो बल और ऐश्वर्य प्राप्त हुए हैं, उनका सम्बन्ध भगवान् विष्णुसे ही है ॥ २३ ॥
सत्रिणां सत्रफलदः पवित्रं परमात्मवान्।
लोकतन्त्रधरो ह्येष मन्त्रैर्मन्त्र इवोच्यते ॥ २४ ॥
'ये भगवान् विष्णु ही यज्ञ करनेवाले यजमानोंको उनके यज्ञोका फल प्रदान करते हैं। ये परम पवित्र और स्वतन्त्र हैं। सम्पूर्ण लोकोंका संचालनसूत्र इन्हींके हाथमे है। जैसे वाणीके माधुर्यका वर्णन वाणीद्वारा ही सम्भव होता है, उसी प्रकार श्रीविष्णुके स्वरूपका प्रतिपादन स्वयं विष्णु ही कर सकते हैं, दूसरोंके लिये इनकी महिमा अनिर्वचनीय है' ॥
ऋषय ऊचुः
स्वागतं ते सुरश्रेष्ठ पद्मनाभ महाद्युते।
इदं यज्ञियमातिथ्यं मन्त्रतः प्रतिगृह्यताम् ॥ २५ ॥
तदनन्तर भगवान्को देखकर ऋषि बोले— सुरश्रेष्ठ ! आपका स्वागत है, महातेजस्वी पद्मनाभ ! आप वेदमन्त्रोंद्वारा यह यज्ञसम्बन्धी आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करें ॥
त्वमस्य यज्ञपूतस्य पात्रं पाद्यस्य पावनः।
अतिथिस्त्वं हि मन्त्रोक्तः सदृष्टः संततं मतः ॥ २६ ॥
इस यज्ञपूत पाद्यके आप ही उत्तम पात्र हैं, क्योंकि आप ही वेदमन्त्रोंद्वारा पावन अतिथि बताये गये हैं। जिनके विषयमें हम सदा सुनते और जानते आये हैं, उन्हींका आज प्रत्यक्ष दर्शन हुआ (यह हमारे लिये सौभाग्यकी बात है) ॥ २६ ॥
त्वयि योद्धुं गते विष्णौ न प्रावर्तन्त नः क्रियाः।
अवैष्णवस्य यज्ञस्य न हि कर्म विधीयते ॥ २७ ॥
आप सर्वव्यापी श्रीहरि जब युद्धके लिये चले गये थे, तब हमारे यज्ञकर्म ठीक तरहसे हो नहीं पाते थे। जिसका सम्बन्ध भगवान् विष्णुसे न हो अर्थात् जिसमे वे उपस्थित न हों, उस यज्ञका कार्य ठीकसे सम्पन्न नहीं होता है ॥ २७ ॥
सदक्षिणस्य यज्ञस्य त्वत्प्रसूतिः फलं लभेत्।
अद्यात्मानमिहास्माभिरिज्यमानं निरीक्षसे ॥ २८ ॥
(आज आपकी उपस्थितिसे हमारा यज्ञ सफल हो गया।) आपका प्रकट होना ही दक्षिणाओंसे सम्पन्न यज्ञका प्रमुख फल है। आज आप यहाँ अपने आपको हमारेद्वारा पूजित देखेंगे ॥ २८ ॥
एवमस्त्विति तान् सर्वान् भगवान् प्रत्यपूजयत्।
मुमुदे ब्रह्मलोकस्थो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ २९ ॥
तब 'एवमस्तु' कहकर भगवान् विष्णुने उन सबका सम्मान किया। उनके द्वारा सम्मानित हो लोकपितामह ब्रह्मा भी अपने लोकमे स्थित हो परम आनन्दका अनुभव करने लगे ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि लोकवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें ब्रह्मलोकका वर्णननामक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
नारायणाश्रममें भगवान् विष्णुका शयन और उत्थान तथा पास आये हुए ब्रह्मा आदि देवताओंसे उनके आगमनका प्रयोजन पूछना
वैशम्पायन उवाच
ऋषिभिः पूजितस्तैस्तु विवेश हरिरीश्वरः।
पौराणं ब्रह्मसदनं दिव्यं नारायणाश्रमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन ऋषियोंसे