विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
वैशम्पायन उवाच
शृणु नारायणस्यादौ विस्तरेण प्रवृत्तयः।
ब्रह्मलोकं यथारूढो ब्रह्मणा सह मोदते ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय ! भगवान् नारायणके जो कर्म हैं और जिस प्रकार वे ब्रह्मलोकमें स्थित होकर ब्रह्माजीके साथ आनन्दका अनुभव करते हैं, वह सब पहले मुझसे सुनो ॥ ७ ॥
कामं तस्य गतिः सूक्ष्मा देवैरपि दुरासदा।
यत् तु वक्ष्याम्यहं राजंस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ ८ ॥
राजन् ! उनकी गति (लीला या चरित्र) उन्हींकी इच्छाके अनुरूप होती है, वह सूक्ष्म है, उसके तत्त्वको ठीक-ठीक समझ पाना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। इस समय मैं भगवान्के जिस चरित्रका वर्णन करने जा रहा हूँ, उसे तुम मेरे कथनानुसार सुनो ॥ ८ ॥
एष लोकमयो देवो लोकाश्चैतन्मयास्त्रयः।
एष देवमयश्चैव देवाश्चैतन्मया दिवि ॥ ९ ॥
ये श्रीनारायणदेव सर्वलोकमय हैं और ये तीनों लोक भी इन्हींके स्वरूप (विष्णुमय) हैं। ये ही सर्वदेवमय हैं और स्वर्गके सम्पूर्ण देवता एतन्मय (इन्हींके स्वरूप अर्थात् विष्णुमय) हैं ॥ ९ ॥
तस्य पारं न पश्यन्ति बहवः पारचिन्तकाः।
एष पारं परं चैव लोकानां वेद माधवः ॥ १० ॥
प्रत्येक वस्तुके पार तत्त्व (अन्त, इयत्ता या चरम सीमा) का चिन्तन करनेवाले बहुत-से विचारक उन भगवान्का पार नहीं देख पाते हैं, परंतु ये भगवान् माधव सम्पूर्ण जगत्के परम पार (अपने आप) को भलीभाँति जानते हैं ॥ १० ॥
अस्य देवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य दैवतैः।
शृणु वै यत् तदा वृत्तं ब्रह्मलोके पुरातनम् ॥ ११ ॥
ये इन्द्रियोंके अविषय हैं और सम्पूर्ण देवता इन्हींका अनुसंधान करते रहते हैं। इन्हीं भगवान् विष्णुका उस समय ब्रह्मलोकमें घटित हुआ जो प्राचीन वृत्तान्त है, उसे सुनो ॥ ११ ॥
स गत्वा ब्रह्मणो लोकं दृष्ट्वा पैतामहं पदम्।
ववन्दे तानृषीन् सर्वान् विष्णुरार्षेण कर्मणा ॥ १२ ॥
उन भगवान् विष्णुने ब्रह्मलोकमें जाकर पितामहके निवासस्थानका दर्शन करके वेदोक्त विधिसे वहाँके समस्त ऋषियोंको प्रणाम किया ॥ १२ ॥
सोऽग्निं प्राक्सवने दृष्ट्वा हूयमानं महर्षिभिः।
अवन्दत महातेजाः कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् ॥ १३ ॥
उन महातेजस्वी श्रीहरिने पूर्वाह्नकालकी क्रिया पूर्ण करके प्रातःसवनके समय महर्षियोंकी दी हुई आहुति ग्रहण करनेवाले अग्निदेवका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया ॥ १३ ॥
स ददर्श मखेष्वाज्यैर्यज्यमानं महर्षिभिः।
भागं यज्ञियमश्नन्तं स्वदेहम्परं स्थितम् ॥ १४ ॥
उन्होंने वहाँ अपने ही दूसरे विग्रहको विराजमान देखा, जिसका यज्ञोंमें महर्षिगण घीकी आहुतियोंद्वारा यजन (पूजन) कर रहे थे और जो प्राप्त हुए यज्ञभागको स्वयं ही ग्रहण कर रहा था ॥ १४ ॥
अभिवाद्याभिवाद्यानामृषीणां ब्रह्मवर्चसाम्।
परिचक्राम सोऽचिन्त्यो ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ १५ ॥
उन अचिन्त्यस्वरूप भगवान्ने ब्रह्मतेजसे सम्पन्न एवं वन्दनीय ऋषियोंको प्रणाम करके उस सनातन ब्रह्मलोकमें घूमना आरम्भ किया ॥ १५ ॥
स ददर्शोच्छ्रितान् यूपॉंश्चापालाग्रविभूषितान्।
मखेषु च ब्रह्मर्षिभिः शतशः कृतलक्षणान् ॥ १६ ॥
उन्होंने वहाँ यज्ञोंमें स्थापित किये गये बहुत-से ऊँचे-ऊँचे यूपों (यज्ञ-स्तम्भों) को देखा, जो सिरेपर काठके बने हुए छल्लोंसे विभूषित थे। ब्रह्मर्षियोंने उनमें सैकड़ों प्रकारके चिह्न अङ्कित किये थे ॥ १६ ॥
आज्यधूमं समाघ्राय शृण्वन् वेदान् द्विजोरितान्।
यज्ञैर्यज्यन्तमात्मानं पश्यंस्तत्र चचार ह ॥ १७ ॥
वे घीकी आहुतियोंसे प्रकट हुए धूमकी सुगन्ध लेते, ब्राह्मणोंद्वारा उच्चारित वेदमन्त्रोंको सुनते और यज्ञोंद्वारा होती हुई अपनी ही आराधनाको देखते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे ॥ १७ ॥
ऊचुस्तमप्रयो देवाः सदस्याः सदसि स्थिताः।
अर्घ्योद्यतभुजाः सर्वे पवित्रान्तरपाणयः ॥ १८ ॥
जो यज्ञमण्डपमें सदस्यरूपसे विराजमान थे, वे सब देवता और ऋषि हाथोंमें पवित्री धारण करके अर्घ्य देनेके लिये दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर उन भगवान्के विषयमें परस्पर इस प्रकार कह रहे थे—॥ १८ ॥
देवेषु वर्तते यद् वै तद्धि सर्वं जनार्दनात्।
यत् प्रवृत्तं च देवेभ्यस्तद् विद्धि मधुसूदनात् ॥ १९ ॥
'देवताओंमें जो भी शक्ति-सामर्थ्य आदि है, वह सब उन्हें भगवान् जनार्दनसे ही प्राप्त हुआ है। देवताओंसे भी जो कुछ प्राप्त होता है, उसे भगवान् मधुसूदनका ही प्रसाद समझो ॥ १९ ॥
अग्नीषोममयं लोकं यं विदुर्विदुषो जनाः।
तं सोममग्निं लोकं च वेद विष्णुं सनातनम् ॥ २० ॥
'संसारके मनुष्य विद्वानोंके मुखसे जिस जगत्को अग्नि