भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 208
[ हरिवंशपर्व ]एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः१८५

अहं तु दुष्टभावानां युष्मासु सुदुरात्मनाम् ।
असम्यग्वर्तमानानां मोहं दास्यामि देवताः ॥ ८१ ॥
देवताओ ! तुम्हारे प्रति दुर्भाव रखकर अनुचित बर्ताव करनेवाले दुरात्मा दैत्योंको मैं अवश्य ही मोहमें डाल दूँगा ॥ ८१ ॥

यदा च सुदुराधर्षं दानवेभ्यो भयं भवेत् ।
तदा समुपगम्याशु विधास्ये वस्ततोऽभयम् ॥ ८२ ॥
जब दानवोंकी ओरसे तुमलोगोंको दुर्निवार्य भय प्राप्त होगा, तब शीघ्र ही आकर मैं तुम्हे उनकी ओरसे निर्भय कर दूँगा ॥ ८२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सुरगणान् विष्णुः सत्यपराक्रमः ।
जगाम ब्रह्मणा सार्धं ब्रह्मलोकं महायशाः ॥ ८३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवताओंसे ऐसा कहकर महायशस्वी तथा सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णु ब्रह्माजीके साथ ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ८३ ॥

एतदाश्चर्यमभवत् संग्रामे तारकामये ।
दानवानां च विष्णोश्च यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ८४ ॥
राजन् ! तुमने मुझसे जो बात पूछी थी, उसका उत्तर मैंने दे दिया । तारकामय संग्रामके अवसरपर दानवो और भगवान् विष्णुके बीचमें यही आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी ॥ ८४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि कालनेमिवधेऽष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें कालनेमिका वधविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥


एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

ब्रह्मलोकमें भगवान् विष्णुका सत्कार

जनमेजय उवाच
ब्रह्मणा देवदेवेन सार्धं सलिलयोनिना ।
ब्रह्मलोकगतो ब्रह्मन् वैकुण्ठः किं चकार ह ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन् ! देवाधिदेव कमलयोनि ब्रह्माजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाकर भगवान् विष्णुने क्या किया ? ॥ १* ॥

किमर्थं चादिदेवेन नीतः कमलयोनिना ।
विष्णुर्दैत्यवधे वृत्ते देवैश्च कृतसत्क्रियः ॥ २ ॥
दैत्योंके संहारका कार्य पूर्ण हो जानेपर देवताओं द्वारा जिनका भलीभाँति सत्कार किया गया था, उन भगवान् विष्णुको आदिदेव ब्रह्माजी ब्रह्मलोकमे किसलिये ले गये ? ॥ २ ॥

ब्रह्मलोके च किं स्थानं कं वा योगमुपास्त सः ।
कं वा दधार नियमं स विभुर्भूतभावनः ॥ ३ ॥
ब्रह्मलोकमें उनका कौन-सा स्थान है ? वहाँ उन्होंने किस योगका आश्रय लिया अथवा उन भूतभावन सर्वव्यापी श्रीहरिने किस नियमको धारण किया ? ॥ ३ ॥

कथं तस्याऽऽसतस्तत्र विश्वं जगदिदं महत् ।
श्रियमाप्नोति विपुलां सुरासुरनरार्चिताम् ॥ ४ ॥
वहाँ रहते हुए भगवान् विष्णुकी विपुल सम्पत्तिको, जिसकी देवता, असुर और मनुष्य सभी पूजा करते हैं, यह सारा विशाल जगत् कैसे पाता है ? ॥ ४ ॥

कथं स्वपिति घर्मान्ते बुध्यते चाम्बुदप्लवे ।
कथं च ब्रह्मलोकस्थो धुरं वहति लौकिकीम् ॥ ५ ॥
ग्रीष्म ऋतुके अन्तमें (आषाढ़ मासकी शुक्ला एकादशीको) भगवान् कैसे शयन करते हैं ? वर्षाकाल बीतनेपर (कार्तिक-की शुक्ला एकादशीको) किस प्रकार जागते हैं ? तथा ब्रह्मलोक (नारायणाश्रम) में रहकर वे सम्पूर्ण जगत्की रक्षाका भार कैसे वहन करते हैं ? ॥ ५ ॥

चरितं तस्य विप्रेन्द्र दिव्यं भगवतो दिवि ।
विस्तरेण यथातत्त्वं सर्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ ६ ॥
विप्रवर ! दिव्य धाममें स्थित भगवान् विष्णुका जो दिव्य चरित्र है, वह सब यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक मैं सुनना चाहता हूँ* ॥ ६ ॥


* यहाँ कुल आठ प्रश्न हैं । पहले श्लोकमें जो प्रथम प्रश्न है, उसका उत्तर इसी अध्यायके श्लोक १२ से लेकर १७ तक देखना चाहिये । दूसरे श्लोकमें दूसरा प्रश्न अङ्कित है । इसका उत्तर इसी अध्यायके २५ से २८ तकके श्लोकोंमें गूढ़ भावसे दिया गया है । तीसरे श्लोकमें तीन प्रश्न हैं—तीसरा, चौथा और पाँचवाँ । उनमेंसे तीसरे प्रश्नका उत्तर अध्याय ५० के १ से ६ तकके श्लोकोंमें उपलब्ध होता है । चौथे और पाँचवें प्रश्नोंका उत्तर उसी अध्यायके ७ से ९ तकके श्लोकोंमें देखें । चौथे श्लोकमें जो छठा प्रश्न अङ्कित है, उसका उत्तर गूढ़ भावसे अध्याय ५० के श्लोक १२ से २२ तकमें है । सातवाँ और आठवाँ प्रश्न पाँचवें, छठे श्लोकोंमें अङ्कित हैं । इनमें सातवेंका उत्तर अध्याय ५० के २२ से ४३ तकके श्लोकोंमें वर्णित है और चरित्र-विषयक आठवें प्रश्नका उत्तर अध्याय ५० के ४४ वें श्लोकसे आरम्भ होकर आगेके सभी अध्यायोंमें है ।