विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिरव्ययः ।
देवाञ्छक्रमुखान् सर्वानुवाच शुभया गिरा ॥ ६६ ॥
भगवान् ब्रह्माके ऐसा कहनेपर अविनाशी श्रीहरिने अपनी कल्याणमयी वाणीद्वारा इन्द्र आदि समस्त देवताओंसे इस प्रकार कहा ॥ ६६ ॥
विष्णुरुवाच
श्रूयतां त्रिदशाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः ।
श्रवणावहितैर्देहैः पुरस्कृत्य पुरंदरम् ॥ ६७ ॥
भगवान् विष्णु बोले—जितने देवता यहाँ आये हैं, वे सब लोग अपने शरीर और इन्द्रियोंको मेरी बात सुननेके लिये सावधान रखते हुए इन्द्रको आगे करके मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनें ॥ ६७ ॥
अस्मिन्तः समरे सर्वे कालनेमिमुखा हताः ।
दानवा विक्रमोपेताः शक्रादपि महत्तराः ॥ ६८ ॥
इस युद्धमें हमने इन्द्रसे भी बहुत बढ़े-चढ़े पराक्रमशाली कालनेमि आदि समस्त दानवोंको मार डाला है ॥ ६८ ॥
तस्मिन् महति संक्रन्दे द्वावेव तु विनिःसृतौ ।
वैरोचनश्च दैत्येन्द्रः स्वर्भानुश्च महाग्रहः ॥ ६९ ॥
इस महासंग्रामसे दो ही दैत्य बचकर निकले हैं—विरोचनकुमार दैत्यराज बलि और महान् ग्रह राहु ॥ ६९ ॥
तद्दिष्टां भजतां शक्रो दिशां वरुण एव च ।
याम्यां यमः पालयतामुत्तरां च धनाधिपः ॥ ७० ॥
अतः इन्द्र और वरुण अब अपनी-अपनी अभीष्ट दिशाको पुनः ग्रहण करें । यम दक्षिण दिशाका और धनाध्यक्ष कुबेर उत्तर दिशाका पालन करें ॥ ७० ॥
ऋक्षैः सह यथायोगं काले चरतु चन्द्रमाः ।
अब्दं चतुर्मुखं सूर्यो भजतामयनैः सह ॥ ७१ ॥
चन्द्रमा समयानुसार नक्षत्रोंके साथ यथायोग्य विचरें और सूर्य अयनोंसहित ऋतुप्रधान वर्षका आश्रय लें ॥ ७१ ॥
आज्यभागाः प्रवर्त्तन्तां सदस्यैरभिपूजिताः ।
हूयन्तामग्नयो विप्रैर्वेददृष्टेन कर्मणा ॥ ७२ ॥
(यज्ञमें) सदस्योंद्वारा सब ओरसे पूजित आज्यभाग देवताओंको अर्पित किये जायें और ब्राह्मणलोग वेदोक्त विधिसे अग्नियोंमें आहुति दें ॥ ७२ ॥
देवाश्च बलिहोमेन स्वाध्यायेन महर्षयः ।
श्राद्धेन पितरश्चैव तृप्तिं यान्तु यथा पुरा ॥ ७३ ॥
अब पुनः पहलेकी ही भाँति बलि और होमकर्मके द्वारा देवताओंको, स्वाध्यायके द्वारा महर्षियोंको तथा श्राद्धकर्मके सम्पादनसे पितरोंको संतुष्ट किया जाय और वे पूर्णतः तृप्त हों ॥ ७३ ॥
वायुश्चरतु मार्गस्थस्त्रिधा दीप्यतु पावकः ।
त्रयो वर्णाश्च लोकांस्त्रीन् वर्द्धयन्त्वात्मजैर्गुणैः ॥ ७४ ॥
वायुदेव अपने मार्गपर रहकर विचरण करें, अग्निदेव (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि तथा आहवनीय-इन) तीन-तीन रूपोंमें सदा प्रकाशित होते रहें तथा तीनों वर्णोंके लोग अपने (शम, दम, तप एवं शौच आदि) सहज गुणोंसे तीनों लोकोंकी वृद्धि करें ॥ ७४ ॥
क्रतवः सम्प्रवर्त्तन्तां दीक्षणीयैर्द्विजातिभिः ।
दक्षिणाश्चोपवर्त्तन्तां यथार्हं सर्वसत्रिणाम् ॥ ७५ ॥
यज्ञदीक्षाके अधिकारी द्विजातियोंद्वारा यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहे और समस्त यजमानोंके यज्ञोंमें यथायोग्य दक्षिणाएँ दी जायँ ॥ ७५ ॥
गांश्च सूर्यो रसान् सोमो वायुः प्राणांश्च प्राणिषु ।
तर्पयन्तः प्रवर्त्तन्तां शिवैः सौम्यैश्च कर्मभिः ॥ ७६ ॥
सूर्यदेव सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी, चन्द्रदेव रसोंकी तथा वायुदेव प्राणियोंके प्राणोंकी तृप्ति एवं पुष्टि करते हुए अपने कल्याणकारी एवं सौम्य कर्मोंद्वारा लोकहितमें प्रवृत्त हों ॥
यथावदानुपूर्व्येण महेन्द्रसलिलोद्भवाः ।
त्रैलोक्यमातरः सर्वाः सागरं यान्तु निम्नगाः ॥ ७७ ॥
देवराज इन्द्रद्वारा पर्वतोंपर बरसाये हुए जलसे प्रकट होनेवाली सम्पूर्ण सरितायें, जो सबको जलरूपी दुग्ध पिलानेके कारण तीनों लोकोंके प्राणियोंके लिये माताके समान हैं, यथोचित गतिसे बहती हुई क्रमशः समुद्रमें मिल जायें ॥ ७७ ॥
दैत्येभ्यस्त्यज्यतां भीश्च शान्तिं व्रजत देवताः ।
स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ ७८ ॥
देवताओ ! अब तुम दैत्योंसे होनेवाले भयको त्याग दो और मनमें शान्ति धारण करो । तुम सब लोगोंका कल्याण हो । अब मैं सनातन ब्रह्मलोकको जाऊँगा ॥ ७८ ॥
स्वगृहे सर्वलोके वा संग्रामे वा विशेषतः ।
विश्रम्भो वो न मन्तव्यो नित्यं क्षुद्रा हि दानवाः ॥ ७९ ॥
अपने घरमें अथवा समस्त जगत्में या विशेषतः संग्राममें तुम्हें दानवोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सदा ही नीचतापूर्ण बर्ताव करनेवाले होते हैं ॥ ७९ ॥
छिद्रेषु प्रहरन्त्येते न चैषां संस्थितिर्ध्रुवा ।
सौम्यानामऋजुभावानां भवतां चार्जवे मतिः ॥ ८० ॥
ये मौका पाते ही प्रहार कर बैठते हैं । इनकी मर्यादा सदा स्थिर रहनेवाली नहीं होती । तुमलोग सौम्य और सरल स्वभावके हो, अतः तुम्हारी बुद्धि सरलतापूर्ण बर्तावमें लगती है ॥ ८० ॥