विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 211, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८८ | श्रीमन्महाभारते, खिलभागे | [ हरिवंशे |
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पूजित होकर सर्वेश्वर भगवान् विष्णुने पुराणप्रसिद्ध दिव्य ब्रह्मधाम (वैकुण्ठ) मे, जो उन श्रीनारायणदेवका आश्रम (विश्रामस्थान) है, प्रवेश किया ॥ १ ॥
स तद् विवेश हृष्टात्मा तानामन्त्र्य सदोगतान् ।
प्रणम्य चादिदेवाय ब्रह्मणे पद्मयोनये ॥ २ ॥
स्वेन नाम्ना परिज्ञातं स तं नारायणाश्रमम् ।
प्रविशन्नेव भगवानायुधानि व्यसर्जयत् ॥ ३ ॥
उन्होंने प्रसन्नचित्तसे उस यज्ञसभामे एकत्र हुए उन सब महर्षियोंसे विदा ले आदिदेव पद्मयोनि ब्रह्माजीको प्रणाम करके अपने ही नामसे प्रसिद्ध हुए उस नारायणाश्रममें प्रवेश किया। उसमें प्रवेश करते ही भगवान्ने सम्पूर्ण आयुधोंको त्याग दिया ॥ २-३ ॥
स तत्राम्बुपतिप्रख्यं ददर्शालयमात्मनः ।
स्वधिष्ठितं देवगणैः शाश्वतैश्च महर्षिभिः ॥ ४ ॥
वहाँ उन्हें अपना शयनागार दिखायी दिया, जो समुद्रके समान शोभा पा रहा था। उसमें सनातन देवगण और शाश्वत महर्षि निवास करते थे ॥ ४ ॥
संवर्तकाम्बुदोपेतं नक्षत्रस्थानसंकुलम् ।
तिमिरौघपरिक्षिप्तमप्रधृष्यं सुरासुरैः ॥ ५ ॥
संवर्तक (प्रलयकारी) मेघोंके अभिमानी देवता वहाँ विद्यमान थे। वह स्थान नक्षत्रोंके आश्रयभूत ज्योतिर्मण्डलसे व्याप्त था। जो वहाँ जानेके अधिकारी नहीं हैं, उनके लिये वह दिव्य धाम अन्धकारसे आवृत्त है अर्थात् उनकी वहाँपर पहुँच नहीं हो पाती है। देवताओं और असुरोंके लिये भी वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है ॥ ५ ॥
न तत्र विषयो वायोर्नन्दोर्न च विवस्वतः ।
वपुषः पद्मनाभस्य स देशस्तेजसाऽऽवृतः ॥ ६ ॥
वहाँ न तो वायुकी, न चन्द्रमाकी और न सूर्यकी ही पहुँच हो पाती है। वह दिव्य देश भगवान् पद्मनाभके सच्चिदानन्दमय श्रीविग्रहकी तेजोऱाशिसे ही आवृत्त एवं प्रकाशित है॥
स तत्र प्रविशन्नेव जटाभारं समुद्वहन् ।
सहस्रशीर्षा भूत्वा तु शयनायोपचक्रमे ॥ ७ ॥
जो पहले सहस्रों मस्तकोंसे विभूषित विराट्रूपधारी होकर शोभा पाते थे, उन्हीं भगवान्ने उस दिव्य धाममे प्रवेश करते ही जगत्के प्राणियोंकी कर्मवासनामयी जटाका भार सिरपर धारण किये वहाँ सोनेकी तैयारी की ॥ ७ ॥
लोकानामन्तकालज्ञा काली नयनशालिनी ।
उपतस्थे महात्मानं निद्रा तं कालरूपिणी ॥ ८ ॥
तदनन्तर लोकोंके अन्तकालको जाननेवाली कृष्णवर्णा कालरूपिणी निद्रा, जो नेत्रोंका आश्रय लेकर शोभा पाती है, उन परमात्मा श्रीहरिकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ ८ ॥
स शिश्ये शयने दिव्ये समुद्राम्भोदशीतले ।
हरिरेकार्णवोक्तेन व्रतेन व्रतिनां वरः ॥ ९ ॥
व्रतधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीहरिने समुद्र और मेघोंके जलसे शीतल दिव्य शय्यापर शयन किया। प्रलयकालमें सारे जगत्के एकार्णवमग्न हो जानेपर जिस नियमसे भगवान्के शयनका वर्णन पुराणोंमें मिलता है, उसीके अनुसार उस समय भी भगवान्ने शयन किया था*॥ ९ ॥
तं शयानं महात्मानं भवाय जगतः प्रभुम् ।
उपासाञ्चक्रिरे विष्णुं देवाः सर्षिगणास्तथा ॥ १० ॥
जगत्के अभ्युदयके लिये शयन करनेवाले उन सर्वसमर्थ महात्मा विष्णुकी वहाँ रहनेवाले देवता और ऋषि उपासना करने लगे ॥ १० ॥
तस्य सुप्तस्य शुशुभे नाभिमध्यात् समुत्थितम् ।
आद्यं तस्यासनं पद्मं ब्रह्मणः सूर्यवर्चसम् ।
सहस्रपत्रं वर्णाढ्यं सुकुमारं सुपुष्पितम् ॥ ११ ॥
सोये हुए भगवान्की नाभिके मध्यभागसे एक कमल प्रकट होकर शोभा पाने लगा। उसकी कान्ति सूर्यके समान थी। वही ब्रह्माका आदि आसन है। उसमे सहस्र दल हैं, वह बीजरूपी विभिन्न वर्णोंसे अङ्कित, अत्यन्त कोमल एवं अच्छी तरह खिला हुआ है ॥ ११ ॥
ब्रह्मसूत्रोद्यतकरः स्वपन्नेव महामुनिः ।
आवर्तयति लोकानां सर्वेषां कालपर्ययम् ॥ १२ ॥
ब्रह्माजीकी जो पूर्वजन्मोंकी वासना (कर्म-संस्कार) है, वही सूत्ररूपसे मानो भगवान्का उठा हुआ हाथ है, उसके द्वारा वे सृष्टि आदिके लिये संकेत करते रहते हैं। इस प्रकार वे महामुनि श्रीहरि सोते हुए ही समस्त लोकोंके कालजनित उलट-फेर (सृष्टि-संहार) की आवृत्ति किया करते हैं ॥१२॥
विवृतात् तस्य वदनान्निःश्वासपवनेरिताः ।
प्रजानां पङ्क्तयो ह्युच्चैर्निष्पतन्त्युत्पतन्ति च ॥ १३ ॥
उनके खुले हुए मुखसे जो निःश्वास वायु निर्गत होती है, उससे प्रेरित होकर प्रजाओंकी विभिन्न श्रेणियाँ बड़े वेगसे निकलती और उत्पन्न होती रहती हैं ॥ १३ ॥
ते सृष्टाः प्राणिनो मेध्या विभक्ता ब्रह्मणा स्वयम् ।
चतुर्धा खां गतिं जग्मुः कृतान्तोक्तेन कर्मणा ॥ १४ ॥
वे उत्पन्न हुए पवित्र प्राणी साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्ररूपसे चार भागोंमें विभक्त
* यहाँ आचार्य नीलकण्ठने शयनका अर्थ समाधि किया है, उनके मतमें यहाँ समुद्रसे निर्विकल्प समाधि और मेघसे सविकल्प समाधि परिलक्षित होती हैं और शीतलका अर्थ वे तापरहित करते हैं, जो समाधिका विशेषण है। इसी तरह वे एकार्णवोक्त व्रतका अर्थ निर्विकल्प समाधिके लिये बताया गया 'संयम' मानते हैं।