विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः १८९
किये जाते हैं। फिर वे चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने लिये बताये गये वेदोक्त कर्मका ( निष्कामभावसे ) अनुष्ठान करके अपनी परम गति ( परमात्मा ) को प्राप्त कर लेते हैं ॥१४॥
न तं वेद स्वयं ब्रह्मा नापि ब्रह्मर्षयोऽव्ययाः ।
विष्णोर्निद्रामयं योगं प्रविष्टं तमसावृतम् ॥ १५ ॥
योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करनेवाला जो भगवान् विष्णुका योगमायासे समावृत स्वरूप है, उसे स्वयं ब्रह्माजी तथा ( ब्रह्मलोकके ) अविनाशी ब्रह्मर्षि भी नहीं जान पाते हैं ॥ १५ ॥
ते तु ब्रह्मर्षयः सर्वे पितामहपुरोगमाः ।
न विदुस्तं क्वचित् सुप्तं क्वचिदासीनमासने ॥ १६ ॥
वे ब्रह्मा आदि सभी ब्रह्मर्षि किसी देश-कालमे सोये और किसी देश-कालमे आसनपर बैठकर जागते हुए भगवान्के स्वरूपको यथार्थरूपसे समझ नहीं पाते हैं ॥ १६ ॥
जागर्ति कोऽत्र कः शेते कश्च शक्तश्च नेङ्गते ।
को भोगवान् को द्युतिमान् कृष्णात् कृष्णतरश्च कः ॥१७॥
उन्हें यह ज्ञात नहीं होता कि यहाँ कौन जागता है ? कौन सोता है ? कौन सर्वशक्तिमान् होकर भी कोई चेष्टा नहीं करता है ? कौन भोगवान् है ? कौन परम कान्तिमान् है तथा कौन कृष्ण (सूक्ष्म) से भी कृष्णतर (अत्यन्त सूक्ष्म) है ? ॥ १७ ॥
विमृशन्ति स्म तं देवा दिव्याभिरुपपत्तिभिः ।
न चैनं शेकुरन्वेष्टुं कर्मतो जन्मतोडपि वा ॥ १८ ॥
देवता दिव्य युक्तियोंद्वारा इनके विषयमे विचार करते रहते हैं; परंतु वे अबतक इनके जन्म और कर्मके रहस्यका पता नहीं लगा सके हैं ॥ १८ ॥
गाथाभिस्तत्प्रदिष्टाभिर्ये तस्य चरितं विदुः ।
पुराणास्तं पुराणेषु ऋषयः सम्प्रचक्षते ॥ १९ ॥
उन परमात्माने अपने निःश्वासभूत वेदमन्त्रोंके द्वारा जिनका उपदेश किया है, उन वैदिकी गाथाओंद्वारा जो उनके चरित्रको जानते थे, उन पुरातन ऋषियोंने ही पुराणोंमें उन परमेश्वरके स्वरूपका विशद विवेचन किया है ॥ १९ ॥
श्रूयते चास्य चरितं देवेष्वपि पुरातनम् ।
महापुराणात् प्रभृति परं तस्य न विद्यते ॥ २० ॥
देवताओंके यहाँ भी महापुराण आदिसे इनके पुरातन चरित्रका श्रवण किया जाता है। उनका कहीं अन्त नहीं है ॥ २० ॥
यच्चास्य देवदेवस्य चरितं स्वप्रभावजम् ।
तेनेमाः श्रुतयो व्याप्ता वैदिक्यो लौकिकाश्च याः ॥ २१ ॥
१. यहाँ कृष्णका अर्थ कृश अर्थात् सूक्ष्म है।
उन देवाधिदेव परमात्माका उनके प्रभावसे ( पराक्रम आदिके द्वारा ) प्रकट हुआ जो लीला-चरित्र है, उसीसे ये वैदिकी और लौकिकी श्रुतियाँ भरी हुई हैं ॥ २१ ॥
भवकाले भवत्येष लोकानां लोकभावनः ।
दानवानामभावाय जागर्ति मधुसूदनः ॥ २२ ॥
लोकोंकी सृष्टिके समय ये लोकभावन मधुसूदन सगुणरूप-से प्रकट होते हैं और दानवोंके विनाशके लिये सदा जागरूक रहते हैं ॥ २२ ॥
यच्चैनं वीक्षितुं देवा न शेकुः सुप्तमव्ययम् ।
ततः स्वपिति घर्मान्ते जागर्ति जलदक्षये ॥ २३ ॥
जहाँ सो जानेपर इन अविनाशी प्रभुको देवता भी नहीं देख सके थे; वहीं ये वर्षाकालमें ( आषाढ़ शुक्ला एकादशीसे कार्तिक शुक्ला एकादशीतक ) सोते और वर्षा व्यतीत होनेपर जागते हैं ॥ २३२ ॥
स हि वेदाश्च यज्ञाश्च यज्ञाङ्गानि च सर्वशः ।
या तु यज्ञगतिः प्रोक्ता स एष पुरुषोत्तमः ॥ २४ ॥
भगवान् विष्णु ही वेद, यज्ञ तथा समस्त यज्ञाङ्ग ( यज्ञके उपकरण ) हैं। यज्ञोद्वारा प्राप्त होनेवाली जो परम गति बतायी गयी है, वह भी ये भगवान् पुरुषोत्तम ही हैं ॥ २४ ॥
तस्मिन् सुप्ते न वर्तन्ते मन्त्रपूताः क्रतुक्रियाः ।
शरत्प्रवृत्तयज्ञोऽयं जागर्ति मधुसूदनः ॥ २५ ॥
भगवान्के शयनकालमें मन्त्रपूत यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान नहीं होता है। शरद्ऋतुमें जब ये मधुसूदन जागते हैं, उस समय वाजपेय आदि यज्ञोंका अनुष्ठान आरम्भ हो जाता है ॥ २५ ॥
तदिदं वार्षिकं चक्रं कारयत्यम्बुदेश्वरः ।
वैष्णवं कर्म कुर्वाणः सुप्ते विष्णौ पुरंदरः ॥ २६ ॥
भगवान् विष्णुके शयन करनेपर मेघोंके स्वामी देवराज इन्द्र स्वयं ही प्रजापालन रूप वैष्णवकर्मका सम्पादन करते हैं और वे ही लोगोंसे वर्षा ऋतुमे होनेवाले जलसम्बन्धी कर्म ( उपाकर्म एवं श्राद्धतर्पण आदि ) का अनुष्ठान करवाते हैं ॥ २६ ॥
या ह्येषा गह्वरा माया निद्रेति जगति स्थिता ।
साकस्माद् द्वेषिणी घोरा कालरात्रिर्महेक्षिताम् ॥ २७॥
यह जो गहन तमोमयी माया है, वही संसारमें निद्रारूप-से स्थित है। वह अकारण ही सबसे द्वेष रखनेवाली और
२. श्रुति कहती है—'शरदि वाजपेयेन यजेत ।' अर्थात् 'शरद्ऋतुमें वाजपेय यज्ञके द्वारा भगवान्की आराधना करे।' (नी० क०)