विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भयंकर है तथा युद्धक्षेत्रमें उतरे हुए राजाओंके लिये कालरात्रिके समान है ॥ २७ ॥
तस्यास्तनुस्तमोद्वारा निशा दिवसनाशिनी ।
जीवितार्धहरा घोरा सर्वप्राणभृतां भुवि ॥ २८ ॥
उस तामसी मायाका शरीर है रात्रि, जिसका द्वार है अन्धकार । वह दिनका नाश करनेवाली तथा निद्राद्वारा भूतलके समस्त प्राणियोंके आधे जीवनको हर लेनेवाली है । उसका स्वरूप भयंकर है ॥ २८ ॥
नैतया कश्चिदाविष्टो जृम्भमाणो मुहुर्मुहुः ।
शक्तः प्रसहिनुं वेगं मज्जन्निव महार्णवे ॥ २९ ॥
इस निशा एवं निद्रारूपिणी मायासे आविष्ट हुआ कोई भी प्राणी बारंबार जँभाई लेने लगता है और महासागरमें डूबते हुए मनुष्यके समान विवश होकर उसके वेगको सहन नहीं कर पाता है ॥ २९ ॥
अन्नजा भुवि मर्त्यानां श्रमजा वा कथंचन ।
सैषा भवति लोकस्य निद्रा सर्वस्य लौकिकी ॥ ३० ॥
पृथ्वीपर रहनेवाले मरणधर्मा मनुष्योंको यह निद्रा भोजन अथवा किसी प्रकारके परिश्रमके कारण प्राप्त होती है । इस प्रकार यह लौकिकी निद्रा जगत्के सभी प्राणियोंको आती है ॥ ३० ॥
स्वप्नान्ते क्षीयते ह्येषा प्रायशो भुवि देहिनाम् ।
मृत्युकाले च भूतानां प्राणान् नाशयते भृशम् ॥ ३१ ॥
पृथ्वीपर देहधारियोंको जो निद्रा आती है, वह प्रायः सो लेनेके बाद स्वयं ही नष्ट हो जाती है, परंतु जब प्राणियोंका मृत्युकाल उपस्थित होता है, उस समय यह उनके प्राणोंका प्रबल वेगसे नाश कर डालती है ॥ ३१ ॥
देवेष्वपि दधारैनां नान्यो नारायणाहते ।
सखी सर्वहरस्यैषा माया विष्णुशरीरजा ॥ ३२ ॥
देवताओंमें भी भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कोई इसे धारण नहीं कर सका (और न इसपर काबू ही पा सका है)। भगवान् विष्णुके शरीरसे प्रकट हुई यह माया सर्वसंहारकारी कालकी सखी (सहायिका) है ॥ ३२ ॥
सैषा नारायणमुखे दृष्टा कमललोचना ।
लोकानल्पेन कालेन ग्रसते लोकमोहिनी ॥ ३३ ॥
वही यह माया भगवान् नारायणके मुखमण्डलमें उनके नेत्रकमलोंके भीतर स्थित देखी गयी है। यही कमलनयनी नारीके रूपमें भी प्रकट होती है। सम्पूर्ण विश्वको मोहमें डालनेवाली निद्रामयी माया अल्पकालमें ही समस्त लोकोंको ग्रस लेती है ॥ ३३ ॥
एवमेषा हितार्थाय लोकानां कृष्णवर्त्मना ।
ध्रियते सेवनीया हि पत्येव च पतिव्रता ॥ ३४ ॥
जिनका मार्ग सूक्ष्म है, उन परमात्मा श्रीहरिने समस्त लोकोंके हितके लिये (अर्थात् उन्हें विश्रामसुखका अनुभव करानेके लिये) इस निद्राको धारण किया है। जैसे पति पतिव्रता स्त्रीका सेवन करता है, उसी प्रकार विश्राम-सुखकी इच्छावाले प्रत्येक व्यक्तिको समय-समयपर इसका सेवन करना चाहिये ॥ ३४ ॥
स तया निद्रया च्छन्नस्तस्मिन् नारायणाश्रमे ।
स्वपिति स्म तदा विष्णुर्मोहयञ्जगदव्ययः ॥ ३५ ॥
इस तरह अविनाशी भगवान् विष्णु उस योगनिद्रासे आच्छन्न हो सम्पूर्ण जगत्को मोहमें डालते हुए उस समय नारायणाश्रममें शयन करने लगे ॥ ३५ ॥
तस्य वर्षसहस्राणि शयानस्य महात्मनः ।
जग्मुः कृतयुगं चैव त्रेता चैव युगोत्तमम् ॥ ३६ ॥
वहाँ सोते हुए महात्मा नारायणके हजारों वर्ष बीत गये । सत्ययुग तथा उत्तम त्रेतायुग भी समाप्त हो गये ॥ ३६ ॥
स तु द्वापरपर्यन्ते ज्ञात्वा लोकान् सुदुःखितान् ।
प्राबुध्यत महातेजाः स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ ३७ ॥
द्वापरके अन्तमें समस्त लोकोंको अत्यन्त दुःखसे पीड़ित जान महर्षियोंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए वे महातेजस्वी भगवान् श्रीहरि जाग उठे ॥ ३७ ॥
ऋषय ऊचुः
जहीहि निद्रां सहजां भुक्तपूर्वामिव स्रजम् ।
इमे ते ब्रह्मणा सार्धं देवा दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ३८ ॥
ऋषि बोले—भगवन् ! जैसे पहलेके उपभोगमे लगी हुई फूलमालाको त्याग दिया जाता है, उसी प्रकार आप अपनी इस सहज निद्राको त्याग दीजिये। ब्रह्माजीके साथ ये समस्त देवता आपके दर्शनकी अभिलाषासे खड़े हैं ॥ ३८ ॥
इमे त्वां ब्रह्मविद्वांसो ब्रह्मसंस्तववादिनः ।
वर्धयन्ति हृषीकेश ऋषयः संशितव्रताः ॥ ३९ ॥
हृषीकेश ! ये उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मवेत्ता महर्षि वेदोक्त स्तोत्रोंका पाठ करते हुए आपका अभिनन्दन करते (आपको बधाई देते) हैं ॥ ३९ ॥
एतेषामात्मभूतानां भूतानां भूतभावन ।
शृणु विष्णो शुभा वाचो भूव्योमाग्न्यनिलाम्भसाम् ॥ ४० ॥
भूतभावन विष्णो ! ये जो आपके ही स्वरूपभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशरूप महाभूतोंके अधिष्ठाता देवता हैं, इनके शुभ वचन आप सुनें ॥ ४० ॥
इमे त्वां सप्त मुनयः सहिता मुनिमण्डलैः ।
स्तुवन्ति देव दिव्याभिर्गीर्गाभिर्भरतर्षभ ॥ ४१ ॥