विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ १९१
देव ! ये मुनि-मण्डलीसहित सप्तर्षि गाने योग्य दिव्य वाणीद्वारा स्वभावतः आपकी स्तुति करते हैं ॥ ४१ ॥
उत्तिष्ठ शतपत्राक्ष पद्मनाभ महाद्युते ।
कारणं किञ्चिदुत्पन्नं देवानां कार्यगौरवात् ॥ ४२ ॥
कमलनयन ! उठिये । महातेजस्वी पद्मनाभ ! देवताओंके गुरुतर कार्यवश आपको जगानेके लिये कुछ कारण उत्पन्न हो गया है ॥ ४२ ॥
वैशम्पायन उवाच
स संक्षिप्य जलं सर्वं तिमिरौघं विदारयन् ।
उदतिष्ठद्धृषीकेशः श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ४३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब सारे जलको समेटकर तथा अनधिकारियोंके लिये योगमायाने जो तमोमय आवरण लगा दिया था, उसको भी दूर करके भगवान् हृषीकेश अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए उठे ॥ ४३ ॥
स ददर्श सुरान् सर्वान् समेतान् सपितामहान् ।
विवक्षतः प्रक्षुभिताञ्जगदर्थे समागतान् ॥ ४४ ॥
उन्होंने देखा, ब्रह्मसहित समस्त देवता उपस्थित हैं। इनके मनमें क्षोभ उत्पन्न हुआ है और उसीके सम्बन्धमें ये कुछ कहना चाहते हैं। उन्हें यह भी ज्ञात हो गया कि ये लोग जगत्के हितके लिये ही यहाँ पधारे हैं ॥४४॥
तानुवाच हरिर्देवो निद्राविश्रान्तलोचनः ।
तत्त्वदृष्टार्थया वाचा धर्महेत्वर्थयुक्तया ॥ ४५ ॥
निद्राके द्वारा जिनके नेत्रोंको विश्राम मिल चुका था, उन भगवान् श्रीहरिने धर्मसम्मत, युक्तिसंगत तथा तात्त्विक अर्थसे युक्त वाणीद्वारा उस समय उन देवताओंसे इस प्रकार कहा ॥ ४५ ॥
श्रीभगवानुवाच
कुतो वो विग्रहो देवाः कुतो वो भयमागतम् ।
कस्य वा केन वा कार्यं किं वा मयि न वर्तते ॥ ४६॥
श्रीभगवान् बोले—देवताओ ! तुम्हारा किससे युद्ध छिड़ा हुआ है ? कहाँसे तुमपर भय आया है ? अथवा किस देवताको किस वस्तुकी आवश्यकता पड़ गयी है ? बताओ, कौन ऐसी वस्तु है, जो मेरे पास नहीं है ? (अर्थात् मेरे पास सब कुछ है और मैं तुम्हे सब कुछ दूँगा ) ॥ ४६ ॥
किं खल्वकुशलं लोके वर्तते दानवोत्थितम् ।
नृणामायासंजननं शीघ्रामिच्छामि वेदितुम् ॥ ४७ ॥
दानवोंकी ओरसे कौन-सा ऐसा कार्य किया गया है, जो लोकके लिये अमङ्गलकारी और मनुष्योंके लिये कष्टजनक सिद्ध हुआ है ? यह मैं शीघ्र जानना चाहता हूँ ॥४७॥
एष ब्रह्मविदां मध्ये विहाय शयनोत्तमम् ।
शिवाय भवतामर्थे स्थितः किं करवाणि वः ॥ ४८ ॥
आप सभी ब्रह्मवेत्ताओंके बीचमें इस उत्तम शय्याको त्यागकर यह मैं आपके कल्याण-साधनके लिये तैयार खड़ा हूँ । बताइये, आपकी क्या सेवा करूँ ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि विष्णोर्योगशयनोत्थाने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें भगवान् विष्णुका योगशय्यासे उत्थानविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
ब्रह्माजीका भगवान् विष्णुसे जगत्की वर्तमान अवस्थाका वर्णन करते हुए पृथ्वीका भार उतारनेके लिये मन्त्रणा करनेका अनुरोध
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा विष्णुगदितं ब्रह्मा लोकपितामहः ।
उवाच परमं वाक्यं हितं सर्वदिवौकसाम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् विष्णुका वह कथन सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने समस्त देवताओंके लिये हितकारक उत्तम बात कही—॥ १ ॥
नास्ति किंचिद् भयं विष्णो सुराणामसुरान्तक ।
येषां भवानभयदः कर्णधारो रणे रणे ॥ २ ॥
'असुरोंका संहार करनेवाले विष्णुदेव ! युद्धके अवसरोंपर जिनके आप-जैसे अभयदायक कर्णधार हों, उन देवताओंको कोई भय नहीं ॥ २ ॥
शक्रे जयति देवेशे त्वयि चासुरसूदने ।
धर्मे प्रयतमानानां मानवानां कुतो भयम् ॥ ३ ॥
'जबतक देवराज इन्द्र विजयी हैं और असुरोंका संहार करनेवाले आप रक्षाके लिये उद्यत हैं, तबतक धर्मके लिये प्रयत्नशील रहनेवाले मनुष्योंको भी किससे भय हो सकता है ॥ ३ ॥
सत्ये धर्मे च निरतान् मानवान् विगतज्वरान् ।
नाकाले धर्मिणो मृत्युः शक्नोति प्रसमीक्षितुम् ॥ ४ ॥