विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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'जो मनुष्य सत्य और धर्ममें तत्पर रहकर चिन्तारहित हो धर्मके अनुष्ठानमे लगे हुए हैं, उनकी ओर अकालमृत्यु आँख उठाकर देख भी नहीं सकती है ॥ ४ ॥
मानवानां च पतयः पार्थिवाश्च परस्परम्।
षड्भागमुपभुञ्जाना न भयं कुर्वते मिथः ॥ ५ ॥
'मनुष्योंके अधिपति जो पृथ्वीपालक नरेश हैं, वे भी प्रजाकी आयके छठे भागका करके रूपमें उपभोग करते हुए आपसमें कभी भेद या कलह नहीं करते हैं ॥ ५ ॥
ते प्रजानां शुभकराः करदैरविगर्हिताः।
सुकरैर्विप्रयुक्तार्थैः कोशमापूरयन्त्युत ॥ ६ ॥
'वे सदा ही प्रजाकी भलाई करते हैं, इसलिये कर देने-वाले लोग उनकी निन्दा नहीं करते। राजाओंको जब अर्थकी कमी पड़ती है, तब वे न्यायोचित करोंके द्वारा ही अपना खजाना भरते हैं ॥ ६ ॥
स्फीताञ्जनपदान् सर्वान् पालयन्तः क्षमापराः।
अतीक्ष्णदण्डांश्चतुरो वर्णाञ्जुगुपुरञ्जसा ॥ ७ ॥
वे क्षमापरायण हो अपने समस्त समृद्धिशाली जनपदोंका पालन करते हैं। कभी किसीको कठोर दण्ड नहीं देते हैं तथा चारों वर्णोंकी यथोचित रीतिसे रक्षा करते हैं ॥ ७ ॥
नोद्वेजनीया भूतानां सचिवैः साधुपूजिताः।
चतुरङ्गबलैर्गूप्ताः षड्गुणानुपयुञ्जते ॥ ८ ॥
'(वे स्वयं किसीको उद्विग्न नहीं करते हैं, इसलिये) कोई भी प्राणी उन्हें उद्वेगमें नहीं डालते हैं। मन्त्रियोंद्वारा वे भलीभाँति सम्मानित होते हैं तथा चतुरङ्गिणी सेनाओंसे सुरक्षित होकर (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन) छः गुणोंका यथावसर उपयोग करते रहते हैं ॥ ८ ॥
धनुर्वेदपराः सर्वे सर्वे वेदेषु निष्ठिताः।
यजन्ते च यथाकालं यज्ञैर्विपुलदक्षिणैः ॥ ९ ॥
'सभी नरेश धनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर हैं, सभी वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान् हैं और यथासमय प्रचुर दक्षिणायुक्त यज्ञोंद्वारा भगवान्की आराधना करते रहते हैं ॥ ९ ॥
वेदानधीत्य दीक्षाभिर्महर्षीन् ब्रह्मचर्यया।
श्राद्धैश्च मेध्यैः शतशस्तर्पयन्ति पितामहान् ॥ १० ॥
'वे दीक्षा ग्रहण एवं ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक वेदोंका अध्ययन करके महर्षियोंको तथा पवित्र श्राद्ध-कर्मोंद्वारा सैकड़ों बार पितरोंको तृप्त करते रहते हैं ॥ १० ॥
नैषामविदितं किंचित् त्रिविधं भुवि दृश्यते।
वैदिकं लौकिकं चैव धर्मशास्त्रोक्तमेव च ॥ ११ ॥
'भूतलपर जो वैदिक, लौकिक तथा धर्मशास्त्रकथित—तीन प्रकारके कर्म दृष्टिगोचर होते हैं, उनमेंसे कोई भी कर्म इन राजाओंको अज्ञात नहीं है ॥ ११ ॥
ते परावरदृष्टार्था महर्षिसमतेजसः।
भूयः कृतयुगं कर्तुमुत्सहन्ते नराधिपाः ॥ १२ ॥
'उन्हें परावर-तत्त्वका साक्षात्कार हो चुका है। वे सभी नरेश महर्षियोंके समान तेजस्वी हैं और पुनः इस पृथ्वीपर सत्ययुगको लानेका उत्साह रखते हैं ॥ १२ ॥
तेषामेव प्रभावेण शिवं वर्षति वासवः।
यथार्थं च ववुर्वाता विरजस्का दिशो दश ॥ १३ ॥
'उन्हींके प्रभावसे देवराज इन्द्र जगत्मे कल्याणकारी जलकी वर्षा करते हैं, वायु यथोचित गतिसे प्रवाहित होती है और दसों दिशाएँ स्वच्छ रहती हैं ॥ १३ ॥
निरुत्पाता च वसुधा सुप्रचाराश्च खे ग्रहाः।
चन्द्रमाश्च सनक्षत्रः सौम्यं चरति योगतः ॥ १४ ॥
'पृथ्वीपर कोई उत्पात नहीं होता, आकाशमें सभी ग्रह समुचित गतिसे विचरण करते हैं तथा नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा भी उनके साथ संयुक्त होकर सौम्यगतिसे विचरण कर रहे हैं ॥ १४ ॥
अनुलोमकरः सूर्यस्त्वयने द्वे चचार ह।
हव्यैश्च विविधैस्तृप्तः शुभगन्धो हुताशनः ॥ १५ ॥
'जगत्के लिये अनुकूल किरणोंसे युक्त हुए भगवान् सूर्य दोनों अयनोंमें विचरते हैं तथा उत्तम गन्धसे सुवासित अग्निदेव नाना प्रकारके हविष्योंकी आहुति पाकर तृप्त होते हैं ॥ १५ ॥
एवं सम्यक् प्रवृत्तेषु विवृद्धेषु मखादिषु।
तर्पयत्सु महीं कृत्स्नां नृणां कालभयं कुतः ॥ १६ ॥
'जब इस प्रकार राजालोग भलीभाँति सत्कर्मोंमें प्रवृत्त हैं, यज्ञ आदि कर्म दिनोंदिन बढ़ रहे हैं और वे नरेश समस्त भूमण्डलको निरन्तर तृप्त एवं संतुष्ट कर रहे हैं, तब मनुष्योंको कालका भय कैसे हो सकता है ॥ १६ ॥
तेषां ज्वलितकीर्तीनामन्योन्यवशवर्तिनाम्।
राज्ञां बलैर्बलवतां पीड्यते वसुधातलम् ॥ १७ ॥
'परंतु जिनकी कीर्ति सब ओर जगमग हो रही है तथा जो एक दूसरेके वशवर्ती होकर मेल-मिलापसे रहते हैं, उन बलवान् राजाओंके पास जो असंख्य सेनाएँ हैं, उनके भारसे पृथ्वीको बड़ी पीड़ा हो रही है ॥ १७ ॥
सेयं भारपरिश्रान्ता पीड्यमाना नराधिपैः।
पृथिवी समनुप्राप्ता नौरिवासन्नविप्लवा ॥ १८ ॥
'इस प्रकार भारसे थकी हुई यह पृथ्वी उन नरेशोंसे पीड़ित होकर आपकी शरणमें आयी है। इसकी दशा उस