भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

हरिवंशपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः १६३


उदयास्तमयं चक्रे मेरुपर्यन्तगामिना।
त्रिदिवद्वारचक्रेण तपता लोकमव्ययम्॥ २२॥

सूर्यदेव सात घोड़ोंसे युक्त आकाशगामी रथके द्वारा युद्धभूमिमें आये थे। उनका वह रथ उत्तम शोभा तथा दीप्तिमान् किरणोंसे जगमगा रहा था। वह मेरु पर्वतके चारों ओर चक्कर लगानेवाला, स्वर्गके द्वारपर चक्रकी भाँति घूमनेवाला और जो प्रवाहरूपसे अक्षय बने रहते हैं, उन समस्त लोकोंको प्रकाशित करनेवाला था। उसीके द्वारा सूर्यदेव संसारमें उदय और अस्तकी झाँकी कराते हैं॥ २१-२२॥

सहस्ररश्मियुक्तेन भ्राजमानः स्वतेजसा।
चचार मध्ये देवानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः॥ २३॥

सहस्रों किरणोंसे सम्पन्न अपने ही तेजसे प्रकाशित होनेवाले, द्वादश रूपधारी भगवान् दिनेश (सूर्य) पूर्वोक्त रथके द्वारा आकर देव-सेनाके बीचमें विचरने लगे॥ २३॥

सोमः श्वेतहयैर्भाति स्यन्दने शीतरश्मिवान्।
हिमतोयप्रपूर्णाभिर्भाभिराह्लादयञ्जगत् ॥ २४॥

शीतल किरणोंवाले चन्द्रमा श्वेत घोड़ोंसे युक्त रथमें बैठे हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। वे हिम और जलसे भरी हुई अपनी प्रभाओंद्वारा सम्पूर्ण जगत्‌को आह्लाद प्रदान करते थे॥ २४॥

तमृक्षयोगानुगतं शिशिरांशुं द्विजेश्वरम्।
जगच्छायाङ्किततनुं नैशस्य तमसः क्षयम्॥ २५॥
ज्योतिषामीश्वरं व्योम्नि रसानां रसनं प्रभुम्।
ओषधीनां परित्राणं निधानममृतस्य च॥ २६॥
जगतः प्रथमं भागं सौम्यं शीतमयं रसम्।
ददृशुर्दानवाः सोमं हिमप्रहरणस्थितम्॥ २७॥

नक्षत्र और योग जिनका अनुसरण करते हैं, जो शीतल किरणोंसे सुशोभित हैं, ब्राह्मणोंके राजा हैं, जिनका शरीर नीले धब्बेके रूपमें पृथ्वीकी छायासे अङ्कित रहता है, जो रात्रिके अन्धकारका नाश करनेवाले हैं, आकाशमें स्थित ज्योतिर्मयी तारिकाओंके अधीश्वर हैं, रसोंके आश्रय एवं प्रभु हैं, ओषधियोंके रक्षक तथा अमृतकी निधि हैं, (अग्नीषोमात्मक) जगत्‌के प्रथम (मुख्य) भाग हैं और सौम्य तथा शीतल रस हैं, उन्हीं चन्द्रमाको दैत्योंने हिमका आयुध ग्रहण करके खड़ा हुआ देखा॥ २५-२७॥

यः प्राणः सर्वभूतानां पञ्चधा भिद्यते नृषु।
सप्तस्कन्धगतो लोकांस्त्रीन् दधार चराचरान्॥ २८॥
यमाहुरग्नेर्यन्तारं सर्वप्रभवमीश्वरम्।
सप्तस्वरगता यस्य योनिर्गीतिरुदीर्यते॥ २९॥
यं वदन्त्युत्तमं भूतं यं वदन्त्यशरीरिणम्।
यमाहुराकाशगमं शीघ्रगं शब्दयोनिजम्॥ ३०॥
स वायुः सर्वभूतायुरुद्धतः स्वेन तेजसा।
ववौ प्रव्यथयन् दैत्यान् प्रतिलोमः सतोयदः॥ ३१॥

जो समस्त भूतोंके प्राण हैं, मनुष्य आदि जीवोंके भीतर प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—इन पाँच रूपोंमें विभक्त होकर निवास करते हैं, आवह, प्रवह आदि सात स्कन्धोंमें स्थित हो त्रिलोकीके चराचर जीवोंको धारण करते हैं, जिन्हें अग्निका सारथि कहा जाता है, जो सबके उत्पत्तिस्थान और ईश्वर हैं, जिनके कारणभूत आकाशकी शब्दतन्मात्रा निषाद ऋषभ आदि स्वरोंमें उतर आनेपर गीति कहलाती है, जिन्हें पाँच महाभूतोंमें उत्तम तथा शरीररहित बताते हैं, जिनको आकाशचारी और शीघ्रगामी भी कहते हैं तथा शब्दयोनि (आकाश) से जिनकी उत्पत्ति बतायी गयी है, वे समस्त प्राणियोंके जीवनरूप वायुदेव अपने तेजसे दैत्योंको व्यथित करते हुए वहाँ मेघोंके साथ प्रतिकूल एवं प्रचण्ड गतिसे प्रवाहित होने लगे॥ २८-३१॥

मरुतो देवगन्धर्वा विद्याधरगणैः सह।
चिक्रीडुरसिभिः शुभ्रैर्निर्मुक्त्तैरिव पन्नगैः॥ ३२॥

उनचास मरुत, देवता और गन्धर्व, विद्याधरगणोंके साथ आकर केंचुलसे निकले हुए सर्पोंके समान, म्यानसे बाहर निकाली हुई चमचमाती तलवारोंसे खेलने लगे॥ ३२॥

सृजन्तः सर्पपतयस्तीव्रं रोषमयं विषम्।
शरभूताः सुरेन्द्राणां चेरुर्व्यात्तमुखा दिवि॥ ३३॥

देवेश्वरोंके बाण बने हुए बहुसंख्यक नागराज अपने मुखको फैलाकर तीव्र रोषमय विष उगलते हुए आकाशमें घूमने लगे॥ ३३॥

पर्वतास्तु शिलाभृङ्गैः शतशाखैश्च पादपैः।
उपतस्थुः सुरगणान् प्रहर्तुं दानवं वलम्॥ ३४॥

पर्वतोंके अधिष्ठाता देवता भी बहुत-सी चट्टानों, शिखरों तथा सौ-सौ डालियोंवाले वृक्षोंद्वारा दानवदलपर प्रहार करनेके लिये देवगणोंकी सेवामें उपस्थित थे॥ ३४॥

यः स देवो हृषीकेशः पद्मनाभस्त्रिविक्रमः।
कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो विश्वस्य जगतः प्रभुः॥ ३५॥
समुद्रयोनिर्मधुहा हव्यभुक्तुतसत्कृतः।
भूरापोव्योमभूतात्मा समः शान्तिकरोऽरिहा॥ ३६॥
जगद्योनिर्जगद्बीजो जगद्गुरुस्दारधीः।
सोऽर्कमग्निसिवोद्यन्तमुद्यम्योत्तमतेजसम् ॥ ३७॥
अरिप्रममरानीके चक्रं चक्रगदाधरः।
सपरीवेपमुद्यन्तं सवितुर्मण्डलं यथा॥ ३८॥

जो हृषीकेशके नामसे प्रसिद्ध हैं, सबके आराध्यदेव हैं, सृष्टिके आरम्भमें जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ था, जो अपने तीन डगोंसे सम्पूर्ण त्रिलोकीको नाप चुके हैं, प्रलयकाल-