भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 185
१६२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

रही थीं तथा यज्ञमें सहायता करनेवाले सहस्रों दीप्तिमान् ब्रह्मर्षि स्तुति करते हुए चल रहे थे ॥ ५ ॥

वज्रविस्फूर्जितोद्भूतैर्विद्युदिन्द्रायुधान्वितैः ।
गुप्तो वलाहकगणैः कामगैरिव पर्वतैः ॥ ६ ॥

वज्र (गाज) की गड़गड़ाहटसे फटते हुए तथा बिजली एवं इन्द्रधनुषसे युक्त मेघसमूह देवराजके साथ चल रहे थे। वे ऐसे लगते थे मानो इच्छानुसार चलनेवाले पर्वत हों। इन्द्रका वह रथ उन मेघोंद्वारा सुरक्षित था ॥ ६ ॥

समारूढः स भगवान् पर्यति मघवा गजम् ।
हविर्धानेषु गायन्ति विप्राः सोममखे स्थिताः ॥ ७ ॥
स्वर्गे शक्रानुयानेषु देवतूर्यनिनादिषु ।
इन्द्रं समुपवृत्त्यन्ति शतशो ह्यप्सरोगणाः ॥ ८ ॥

सोमयागमें भाग लेनेवाले ब्राह्मण हविष्य रखनेके स्थानोंमें हविष्य रखते समय जिनकी स्तुति करते हैं, स्वर्गमें जिनकी सवारियोंके अवसरपर देवताओंकी तुरहियाँ बजती हैं और जिनके साथ अप्सराओंकी सैकड़ों मण्डलियाँ नाचती हुई चलती हैं, वे ही भगवान् इन्द्र हाथीपर सवार होकर चल रहे थे ॥ ७-८॥

केतुना वंशजातेन राजमानो यथा रविः ।
युक्तो हरिसहस्रेण मनोमारुतरंहसा ॥ ९ ॥

बाँसकी ध्वजासे सुशोभित तथा मन और वायुके समान वेगवाले हजार घोड़ोंसे खींचा जानेवाला इन्द्रका रथ सूर्यकी तरह दमक रहा था ॥ ९ ॥

स स्यन्दनवरो भाति युक्तो मातलिना तदा ।
कृत्स्नः परिवृतो मेरुर्भास्करस्येव तेजसा ॥ १० ॥

(इन्द्रके सारथि) मातलिस युक्त वह रथ सूर्यके तेजसे घिरा हुआ सम्पूर्ण मेरुपर्वत-सा दीखता था ॥ १० ॥

यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालयुक्तं च मुद्गरम् ।
तस्थौ सुरगणानीके दैत्यान् नादेन भीषयन् ॥ ११ ॥

यमराज मृत्यु-देवताके द्वारा अधिष्ठित दण्ड तथा मुद्गरको धारण कर अपने सिंहनादसे दैत्योंको भयभीत करते हुए देवताओंकी सेनाके मुहानेपर डट गये ॥ ११ ॥

चतुर्भिः सागरैर्गुप्तो लेलिहानैश्च पन्नगैः ।
शङ्खमुक्ताङ्गदधरो बिभ्रत्तोयमयं वपुः ॥ १२ ॥
कालपाशं समाविध्य हयैः शशिकरोपमैः ।
वाय्वीरितजलोद्वारैः कुर्वँल्लीलाः सहस्रशः ॥ १३ ॥
पाण्डुरोद्धूतवसनः प्रवालरुचिराधरः ।
मणिश्यामोत्तमवपुर्हारभारापिंतोदरः ॥ १४ ॥
वरुणः पाशभृन्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान् ।
युद्धवेलामभिलपन् भिन्नवेल इवार्णवः ॥ १५ ॥

युद्धका अवसर चाहते हुए पाशधारी वरुण किनारेको तोड़कर आगे बढ़नेवाले समुद्रकी भाँति देवताओंकी सेनाके बीचमें आकर डट गये। वे चारों समुद्रों और जीभ लपलपाते हुए सर्पोंसे सुरक्षित थे। उन्होंने शङ्ख और मोतियोंके बाजूबन्द धारण कर रखे थे। उनका शरीर जलमय था। वे कालपाशको घुमाते हुए चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत रंगके घोड़ोंसे और वायुके द्वारा उछाले जानेवाले जलके उद्गारोंसे सहस्रों प्रकारकी क्रीड़ाएँ कर रहे थे। उनका श्वेत वस्त्र फहरा रहा था। उनके सुन्दर ओठ मूँगे एवं नूतन पल्लवोंके समान लाल-लाल थे। मणिमय आभूषणोंसे विभूषित हुए उनके श्याम अङ्गोंकी बड़ी उत्तम शोभा हो रही थी तथा हारोंका भार उनके उदरपर पड़ रहा था ॥ १२-१५ ॥

यक्षराक्षससैन्येन गुह्यकानां गणैरपि ।
मणिश्यामोत्तमवपुः कुबेरो नरवाहनः ॥ १६ ॥
युक्तश्च शङ्खपद्माभ्यां निधीनामधिपः प्रभुः ।
राजराजेश्वरः श्रीमान् गदापाणिर्दृश्यत ॥ १७ ॥

नवों निधियोंके स्वामी, महान् शक्तिशाली, राजराजेश्वर श्रीमान् कुबेर, जिनका उत्तम शरीर नीलमणिके समान श्याम कान्तिसे सुशोभित था और जो मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकीमें सवार होते हैं, मूर्त्तिमान् शङ्ख और पद्म नामकी निधियोंको साथ लेकर हाथमें गदा धारण किये दिखायी दिये। उनके साथ यक्ष और राक्षसोंकी सेना तथा गुह्यकोंके गण विद्यमान थे ॥ १६-१७ ॥

विमानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थितः ।
स राजराजः शुशुभे युद्धार्थी नरवाहनः ।
प्रेक्ष्यमाणः शिवसखः साक्षादिव शिवः स्वयं ॥ १८ ॥

विमानमें बैठकर युद्ध करनेवाले, शिवजीके मित्र, राजाधिराज नरवाहन कुबेर युद्धके लिये पुष्पक विमानमें स्थित हो बड़ी शोभा पा रहे थे। उस समय वे साक्षात् भगवान् शिवके समान दृष्टिगोचर होते थे ॥ १८ ॥

पूर्वं पक्षं सहस्राक्षः पितृराजस्तु दक्षिणम् ।
वरुणः पश्चिमं पक्षमुत्तरं नरवाहनः ॥ १९ ॥
चतुर्षु युक्ताश्चत्वारो लोकपाला बलोत्कटाः ।
स्वासु दिक्ष्वभ्यरक्षन् वै तस्य देवबलस्य ह ॥ २० ॥

उस देवसेनाके पूर्वपक्षकी देखभाल सहस्रलोचन देवराज इन्द्र कर रहे थे। दक्षिण-पक्षकी देखभालका भार पितृराज यमने सम्हाला। पश्चिम-पक्षकी देख-रेख वरुणदेवने की और उत्तर-पक्षका निरीक्षण नरवाहन कुबेरने किया। इस प्रकार चारों दिशाओंमें सावधानीके साथ खड़े हुए चारों उत्कट बलशाली लोकपाल अपनी-अपनी दिशाकी ओरसे उस सेनाकी रक्षा कर रहे थे ॥ १९-२० ॥

सूर्यः सप्ताश्वयुक्तेन रथेनाम्बरगामिना ।
श्रिया जाज्वल्यमानेन दीप्यमानैश्च रश्मिभिः ॥ २१ ॥