भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 173
१५०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंश

यद्यपि दैत्य हिरण्यकशिपु अत्यन्त बलवान्, तेजस्वी, दर्पमें भरे हुए सिंहके समान पराक्रमी तथा बलाभिमानी दैत्योंद्वारा सुरक्षित था, तो भी भगवान् नृसिंहने उसे एक ही थप्पड़से मारकर यमलोक पहुँचा दिया ॥ ७८ ॥

नृसिंह एष कथितो भूयोऽयं वामनोऽपरः ।
यत्र वामनमाश्रित्य रूपं दैत्यविनाशकृत् ॥ ७९ ॥

यह नृसिंहावतारकी कथा कही गयी । अब दूसरे वामन-अवतारका वर्णन सुनो, जिसमें वामनरूप धारण करके भगवान्ने दैत्योंका विनाश किया था ॥ ७९ ॥

बलेर्बलवतो यज्ञे वलिना विष्णुना पुरा ।
विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्याः क्षोभितास्ते महासुराः ॥ ८० ॥

पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णु (वामनरूप धारणकर ) बलवान् बलिके यज्ञमें गये और वहाँ उन्होंने अपने तीन ही पगोंसे ( त्रिलोकीको नापकर ) किसीसे क्षुब्ध न होनेवाले बड़े-बड़े असुरोंको क्षुब्ध कर डाला ॥ ८० ॥

विप्रचित्तिः शिविः शङ्कुरयःशङ्कुस्तथैव च ।
अयःशिराः शङ्कुशिरा हयग्रीवश्च वीर्यवान् ॥ ८१ ॥
वेगवान् केतुमांनुग्रः सोमव्यग्रो महासुरः ।
पुष्करः पुष्कलश्चैव वेपनश्च महारथः ॥ ८२ ॥
बृहत्कीर्तिर्महाजिह्वः साश्वोऽश्वपतिरेव च ।
प्रह्रादोऽश्वशिराः कुम्भः संह्लादो गगनप्रियः ।
अनुह्लादो हरिहरौ वराहः शंकरो रुजः ॥ ८३ ॥
शरभः शलभश्चैव कुपनः कोपनः क्रथः ।
वृहतकीर्तिर्महाजिह्वः शङ्कुकर्णो महास्वनः ॥ ८४ ॥
दीर्घजिह्वोऽर्कनयनो मृदुचापो मृदुप्रियः ।
वायुर्यविष्ठो नमुचिः शम्बरो विज्वरो महान् ॥ ८५ ॥
चन्द्रहन्ता क्रोधहन्ता क्रोधवर्धन एव च ।
कालकः कालकेयश्च वृत्रः क्रोधो विरोचनः ॥ ८६ ॥
गरिष्ठश्च वरिष्ठश्च प्रलम्बन नरकावुभौ ।
इन्द्रतापनवातापी केतुमान् बलदर्पितः ॥ ८७ ॥
असिलोमा पुलोमा च वाकलः प्रमदो मदः ।
खस्रमः कालवदनः करालः कौशिकः शरः ॥ ८८ ॥
एकाक्षश्चन्द्रहा राहुः संह्रादः सुमरः खनः ।
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा परिघपाणयः ॥ ८९ ॥
महाशिलाप्रहरणाः शूलहस्ताश्च दानवाः ।
अश्मयन्त्नायुधोपेता भिन्दिपालायुधास्तथा ॥ ९० ॥
शूलोलूखलहस्ताश्च परश्वधधरास्तथा ।
पाशमुद्गरहस्ता वै तथा मुसलपाणयः ॥ ९१ ॥
नानाप्रहरणा घोरा नानावेषा महाजवाः ।
कूर्मकुक्कुटवक्त्राश्च शशोल्लूकमुखास्तथा ॥ ९२ ॥
खरोष्ट्रवदनाश्चैव वराहवदनास्तथा ।
भीमा मकरवक्त्राश्च क्रोष्टुवक्त्राश्च दानवाः ।
आखुद्दुर्दुरवक्त्राश्च घोरा वृकमुखास्तथा ॥ ९३ ॥
मार्जारगजवक्त्राश्च महावक्त्रास्तथापरे ।
नक्रमेषाननाः शूरा गोऽजाविमहिषाननाः ॥ ९४ ॥
गोधामल्यकवक्त्राश्च क्रौञ्चवक्त्राश्च दानवाः ।
गरुडाननाः खड्गमुखा मयूरवदनास्तथा ॥ ९५ ॥
गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बराः ।
चीरसंवृतदेहाश्च तथा वल्कलवाससः ॥ ९६ ॥
उष्णीषिणो मुकुटिनस्तथा कुण्डलिनोऽसुराः ।
किरीटिनो लम्बशिखाः कम्बुग्रीवाः सुवर्चसः ।
नानावेषधरा दैत्या नानामाल्यानुलेपनाः ॥ ९७ ॥
खान्ययुधानि संगृह्य प्रदीप्तान्यतितैजसा ।
क्रममाणं हृषीकेशमुपावर्तन्त सर्वशः ॥ ९८ ॥

जिस समय भगवान् हृषीकेश अपने डग बढ़ा रहे थे, उस समय विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कूरय और शङ्कु, अयःशिरा तथा शङ्कुशिरा, पराक्रमी हयग्रीव, वेगवान्, केतुमान्, उग्र, महान् असुर सोमव्यग्र, पुष्कर और पुष्कल तथा महारथी वेपन, बृहत्कीर्ति, महाजिह्व तथा अश्वसहित अश्वपति, प्रह्लाद, अश्वशिरा, कुम्भ, संह्राद, गगनप्रिय, अनुह्लाद, हरि और हर, वराह, शंकर, रुज, शरभ तथा शलभ, कुपन, कोपन, क्रथ, बृहत्कीर्ति, महाजिह्व, शङ्कुकर्ण, महास्वन, दीर्घजिह्व, अर्कनयन, मृदुचाप, मृदुप्रिय, वायु, यविष्ठ, नमुचि, शम्बर, महाकाय विज्वर, चन्द्रहन्ता, क्रोधहन्ता एवं क्रोधवर्धन, कालक तथा कालकेय, वृत्र, क्रोध, विरोचन, गरिष्ठ और वरिष्ठ, प्रलम्ब और नरक नामक दो दैत्य, इन्द्रतापन और वातापि, बलाभिमानी केतुमान्, असिलोमा तथा पुलोमा, वाकल, प्रमद, मद, खस्रम, कालवदन, कराल, कौशिक, शर, एकाक्ष, चन्द्रहा, राहु, संह्राद, सुमर और खन आदि दैत्य चारों ओरसे भगवान्‌को घेरकर खड़े हो गये। उनमेंसे किसीके हाथमें शतघ्नी (बंदूक) थी और किसीके हाथमें चक्र। बहुततेरे अपने हाथोंमें परिघ लिये खड़े थे। कुछ दानव बड़ी-बड़ी शिलाओंसे प्रहार करते थे। कितनोंके हाथोंमें शूल थे। कितने ही पत्थरके गोले फेंकनेवाले यन्त्ररूपी आयुधसे सम्पन्न थे। बहुततेरे भिन्दिपाल नामक अस्त्रका प्रयोग करते थे। कितने ही दैत्योंने अपने हाथोंमें शूल, ऊखल, फरसे, पाश, मुद्गर और मुसल ले रखे थे। इस प्रकार वे भाँति-भाँतिके आयुध धारण किये हुए थे। उनके वेष भी कई तरहके थे। वे सब-के-सब महान् वेगशाली और भयंकर थे। किन्हींके मुख कछुओं और मुर्गोंके समान थे तो किन्हींके खरहे और घुघूओंके सदृश। कितने ही दानवोंके मुख गदहे, ऊँट, सूअर, मगर और सियारोंके समान थे। वे सभी बड़े भयानक जान पड़ते थे। कुछ घोर रूपधारी दैत्योंके मुख चूहों और मेढकोंके समान थे। कितनोंके मुख भेड़ियोंसे मिलते-जुलते थे। किन्हींके मुख बिलाव-जैसे थे तो किन्हींके हाथियोंके समान। कोई-कोई इससे भी बड़े मुखवाले थे।