भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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( ११ )

२८-पुष्करमें श्रीविष्णु आदिकी तपस्या और उसके प्रभावका वर्णन ... ... ८२१
२९-तपस्याके प्रभावसे देवताओंका उत्कर्ष ... ... ८२८
३०-पृथुका राज्याभिषेक तथा दैत्यों और देवताओं-द्वारा मन्दराचलके मन्थनदण्डद्वारा समुद्रका मन्थन, समुद्रसे अन्य रत्नोंके साथ अमृतका प्राकट्य और राहुके सिरका छेदन ... ८३०
३१-बलिके यज्ञमें वामनद्वारा त्रिलोकीके राज्यका अपहरण तथा कालान्तरमें देवताओं‌द्वारा बलिका राज्याभिषेक ... .... ८३२
३२-दक्ष-यज्ञ-विध्वंस .... .... ८३३
३३-वाराहावतारका उपक्रम .... .... ८३८
३४-भगवान् यज्ञवराहके द्वारा पृथ्वीका उद्धार .... ८४१
३५-भगवान् वाराहके द्वारा विभिन्न दिशाओंमें पर्वतों और नदियोंका निर्माण .... ८४४
३६-जगत्‌की सृष्टिका वर्णन .... ... ८४७
३७-ब्रह्माजीद्वारा विभिन्न वर्गके अधिपतियोंकी नियुक्ति .... .... ८५१
३८-देवासुर-संग्राम तथा हिरण्याक्षद्वारा देवराज इन्द्रका स्तम्भन = .... ८५४
३९-भगवान् वाराहद्वारा हिरण्याक्षका वध .... ८५६
४०-देवताओंको अपने प्रभुत्वकी प्राप्ति, देवराज इन्द्रकी सम्पूर्ण लोकोंके आधिपत्यपर प्रतिष्ठा, सत्-असत् पुरुषोंकी यथोचित गतिके लिये आदेश देकर भगवान्‌का अन्तर्धान होना तथा देवेन्द्रद्वारा पर्वतोंके पंखका छेदन .... ८५८
४१-हिरण्यकशिपुकी तपस्या, वरप्राप्ति, अत्याचार, देवताओंको ब्रह्माजीका आश्वासन, भगवान् विष्णुका नरसिंह‌रूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी सभा‌में जाना तथा उस सभाका वर्णन ... ८६०
४२-भगवान् नरसिंहका देवता, गन्धर्व, अप्सराओं तथा दैत्योंसे सेवित हिरण्यकशिपुको देखना ... ८६५
४३-प्रह्लादको नरसिंह-विग्रहमें समस्त त्रिलोकीका दर्शन .... .... ८६६


४४-दैत्यों तथा हिरण्यकशिपुद्वारा नृसिंहपर विभिन्न अस्त्रोंका प्रहार .... .... ८६७
४५-दैत्योंद्वारा किये गये प्रहारों और रची गयी मायाओंकी निष्फलता .... .... ८६९
४६-दैत्योंके विनाशकी सूचना देनेवाले महान् उत्पात, हिरण्यकशिपुका गदा लेकर धावा करना तथा उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी, पर्वत, नदी एवं देशोंका कम्पित होना .... ... ८७१
४७-देवताओंके अनुरोधसे भगवान् नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा देवताओं और ब्रह्माजीद्वारा उनकी स्तुति ... .... ८७६
४८-वामनावतारका उपक्रम, बलिका अभिषेक तथा दैत्योंका उनसे त्रैलोक्य-विजयके लिये अनुरोध .... ८७८
४९-देवताओंके साथ युद्धके लिये दैत्योंकी तैयारी .... ८८०
५०-पुलोमा, हयग्रीव, प्रह्लाद और शम्बरासुरका युद्धके लिये उद्योग .... .... ८८३
५१-अनुह्लाद, विरोचन, कुजम्भ, असिलोमा, वृत्र, एकचक्र, वृत्रभ्राता, राहु, विप्रचित्ति, केशी, वृषपर्वा तथा बलिका युद्धके लिये तैयार होकर आगे बढ़ना ... ... ८८५
५२-इन्द्र आदि देवताओं और लोकपालोंका युद्धके लिये उद्योग और प्रस्थान ... ... ८९३
५३-देवताओं और असुरोंका द्वन्द्वयुद्ध, भीषण उत्पात, ब्रह्माजी तथा सनकादि योगेश्वरोंका युद्ध देखनेके लिये आगमन ... ८९९
५४-देवताओं और असुरोंके युद्धका यज्ञके रूपमें वर्णन, दोनों सेनाओंका तुमुलयुद्ध तथा सावित्र और ध्रुवकी पराजय ... ... ९०२
५५-नमुचिद्वारा धर नामक वसुकी, मयासुरद्वारा त्वष्टाकी, वायुदेवद्वारा पुलोमाकी, हयग्रीवद्वारा पूषा देवताकी, शम्बरासुरद्वारा भगकी तथा चन्द्रदेवद्वारा समूची दैत्यसेनाकी पराजय ... ९०७