विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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पृथिव्या सह विश्वात्मा विरराम महाद्युतिः ॥ ३३ ॥
महाराज जनमेजय ! सम्पूर्ण विश्वके आत्मा महातेजस्वी लोकपितामह ब्रह्मा, जो पृथ्वीके साथ आये थे, भगवान्से इतनी बात कहकर चुप हो गये ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि भारावतरणे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें (पृथ्वी-) भारावतरणविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
भगवान् विष्णु तथा सब देवताओंका मेरुपर्वतकी दिव्य सभामें उपस्थित होना और वहाँ पृथ्वीका भगवान्से भार उतारनेके लिये प्रार्थना करना
वैशम्पायन उवाच
बाढमित्येव सह तैर्दुद्दिनाम्भोदनिःस्वनः ।
प्रतस्थे दुर्दिनाकारः सदुर्दिन इवाचलः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तब 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् विष्णु उन सबके साथ वहाँसे चल दिये । उनकी वाणी वर्षाकालके मेघकी भाँति गम्भीर थी, उनका श्रीविग्रह मेघके समान श्याम था तथा वे मेघयुक्त पर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ १ ॥
समुत्कामणिविद्योतं सचन्द्राभ्भोदवर्चसम् ।
सजटामण्डलं कृत्स्नं स बिभ्रच्छ्रीधरो हरिः ॥ २ ॥
उनका जटामण्डलमण्डित उदरभाग मुक्तामणियॉकी मालासे उद्दीन होकर चन्द्रमाकी प्रभासे युक्त मेघके समान कान्ति धारण करता था । उस उदरको धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरि अपूर्व शोभासे सम्पन्न दिखायी देते थे ॥ २ ॥
स चास्योरसि विस्तीर्णे रोमाञ्चोद्गतराजिमान् ।
श्रीवत्सो राजते श्रीमांस्तनद्वयमुखाञ्चितः ॥ ३ ॥
उनके विस्तृत वक्षःस्थलमें उठी हुई रोमावलियोसे युक्त शोभाशाली श्रीवत्स दोनो स्तनोंके मुखतक फैलकर उद्भासित हो रहा था ॥ ३ ॥
पीते वसानो वसने लोकानां गुरुरव्ययः ।
हरिः सोऽभवदालक्ष्यः स संध्याभ्र इवाचलः ॥ ४ ॥
दो पीत वस्त्र धारण किये सम्पूर्ण जगत्के गुरु अविनाशी भगवान् विष्णु संध्याकालिक मेघोंसे युक्त पर्वतके समान मनोहर दिखायी देते थे ॥ ४ ॥
तं व्रजन्तं सुपर्णेन पद्मयोनिगतानुगम् ।
अनुजग्मुः सुराः सर्वे तद्गतासक्तचक्षुषः ॥ ५ ॥
ब्रह्माजीके पीछे-पीछे गरुड़पर बैठकर यात्रा करते हुए उन भगवान् नारायणका सभी देवता अनुसरण कर रहे थे । उन सबके नेत्र उन्हींकी ओर लगे हुए थे ॥ ५ ॥
नातिदीर्घेण कालेन सम्प्राप्ता रत्नपर्वतम् ।
ददृशुर्देवतास्तत्र तां सभां कामरूपिणीम् ॥ ६ ॥
थोड़े ही समयमें सब देवता रत्नमय मेरु पर्वतपर आ पहुँचे । वहाँ उन्होंने ब्रह्माजीकी उस सभाको देखा, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली थी ॥ ६ ॥
मेरोः शिखरविन्यस्तां संयुक्तां सूर्यवर्चसा ।
काञ्चनस्तम्भरचितां वज्रसंधानतोरणाम् ॥ ७ ॥
मेरु पर्वतके शिखरपर स्थापित हुई वह दिव्य सभा सूर्यके समान तेजसे सम्पन्न थी । उसमें सोनेके खंभे लगे थे तथा उसके फाटकमें रत्न जड़े हुए थे ॥ ७ ॥
मनोनिर्माणचित्राढ्यां विमानशतमालिनीम् ।
रत्नजालान्तरवर्ती कामगां रत्नभूषिताम् ॥ ८ ॥
मानसिक संकल्पके अनुसार स्वतः निर्मित हुए विचित्र चित्र उसकी शोभा बढ़ाते थे । सैकड़ों विमानोंकी पंक्तियाँ वहाँ विराजमान थीं । उसमे रत्नोंके बने झरोखे लगे थे । वह इच्छानुसार विचरण करनेवाली सभा नाना प्रकारके दिव्य रत्नोंसे सजी हुई थी ॥ ८ ॥
क्लृप्तरत्नसमाकीर्णां सर्वर्तुकुसुमोत्कटाम् ।
देवमायाधरां दिव्यां विहितां विश्वकर्मणा ॥ ९ ॥
उसमे बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे । सभी ऋतुओके फूलोंसे वह व्याप्त थी । उस दिव्य सभाका निर्माण साक्षात् विश्वकर्मा-ने किया था । वह देवताओंकी माया धारण करनेवाली थी ॥ ९ ॥
तां हृष्टमनसः सर्वे यथास्थानं यथाविधि ।
यथानिदेशं त्रिदशा विविशुस्ते सभां शुभाम् ॥ १० ॥
समस्त देवता ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक उस कल्याण-मयी सभामे प्रविष्ट हुए और यथायोग्य स्थानपर विधिपूर्वक बैठे ॥ १० ॥
ते निपेदुर्यथोक्तेषु विमानेष्वासनेषु च ।
भद्रासनेषु पीठेषु कुथास्वास्तरणेषु च ॥ ११ ॥