भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

हरिवंशपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ १९५


वे वहाँ योग्यतानुसार बताये हुए विमानों, आसनों, भद्रासनों, पीठों, कालीनों तथा दूसरे-दूसरे बिछौनोंपर विराजमान हुए ॥ ११ ॥
ततः प्रभञ्जनो वायुर्ब्रह्मणा साधु चोदितः।
मा शब्दमिति सर्वत्र प्रचक्रामाथ तां सभाम् ॥ १२ ॥
तब ब्रह्माजीके भलीभाँति आज्ञा देनेपर अपने वेगसे बड़े-बड़े वृक्षोंको तोड़ देनेवाले वायुदेव उठे और 'कोई एक शब्द भी मुँहसे न निकाले। सब लोग मौन रहें।' ऐसा कहते हुए सारी सभामें सब ओर घूम आये ॥ १२ ॥
निःशब्दस्तिमिते तस्मिन् समाजे त्रिदिवौकसाम्।
बभाषे धरणी वाक्यं खेदात् करुणभाषिणी ॥ १३ ॥
जब देवताओंका वह समुदाय भलीभाँति नीरव तथा निस्तब्ध हो गया, तब वहाँ करुणाजनक वचन बोलनेवाली पृथ्वीने दुःखपूर्वक यह बात कही ॥ १३ ॥
धरण्युवाच
त्वया धार्यो त्वहं देव त्वया वै धार्यते जगत्।
त्वं धारयसि भूतानि भुवनानि बिभर्षि च ॥ १४ ॥
**पृथ्वी बोली--**देव ! (मैं रसातलमें धंसी जा रही हूँ अतः) आप मुझे धारण करें; क्योंकि आपके आधार पर ही यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है। आप ही समस्त भूतोंको धारण और सभी भुवनोंका भरण-पोषण करते हैं ॥ १४ ॥
यत् त्वया धार्यते किञ्चित् तेजसा च बलेन च।
तत्तस्तव प्रसादेन मया यत्नाच्च धार्यते ॥ १५ ॥
आप अपने ही तेज और बलसे जो कुछ भी धारण करते हैं, उसीको आपके प्रसादसे मैं भी यत्नपूर्वक धारण करती हूँ ॥ १५ ॥
त्वया धृतं धारयामि नाधृतं धारयाम्यहम्।
न हि तद् विद्यते भूतं यत् त्वया नानुधार्यते ॥ १६ ॥
आपके धारण किये हुएको ही मैं धारण करती हूँ। जिसे आपने धारण न कर रखा हो, ऐसी किसी वस्तुको मैं धारण नहीं करती। ऐसा कोई भूत नहीं है, जिसे आप निरन्तर धारण न करते हों ॥ १६ ॥
त्वमेव कुरुषे देव नारायण युगे युगे।
मम भारावतरणं जगतो हितकाम्यया ॥ १७ ॥
देव ! नारायण ! आप ही प्रत्येक युगमे जगत्के हितकी कामनासे मेरा भार उतारते हैं ॥ १७ ॥
तवैव तेजसाऽऽक्रान्तां रसातलगतां गताम्।
त्रायस्व मां सुरश्रेष्ठ त्वामेव शरणं गताम् ॥ १८ ॥
सुरश्रेष्ठ ! आपकीके तेजसे आक्रान्त होकर मैं रसातल-को जा पहुँची हूँ और अपने उद्धारके लिये आपकी ही शरणमें आयी हूँ। आप मेरी रक्षा करे ॥ १८ ॥
दानवैः पीड्यमानाहं राक्षसैश्च दुरात्मभिः।
त्वामेव शरणं नित्यमुपयास्ये सनातनम् ॥ १९ ॥
दानवों तथा दुरात्मा राक्षसोंसे पीड़ित होकर मैं सदा आप सनातन पुरुषकी ही शरणमे आती हूँ और आती रहूँगी ॥ १९ ॥
तावन्मेऽस्ति भयं भूयो यावन्न त्वां ककुद्मिनम्।
शरणं यामि मनसा शतशो ह्युपलक्षये ॥ २० ॥
मुझे तभीतक अधिक भय रहता है, जबतक कि मैं अपना भार धारण करनेवाले आप परमेश्वरकी मनसे शरण नहीं लेती हूँ। इस बातको मैं सैकड़ो बार देख चुकी हूँ ॥ २० ॥
अहमादौ पुराणस्य संक्षिप्ता पद्मयोनिना।
मां च बद्ध्वा कृतौ पूर्वं मृन्मयौ द्वौ महासुरौ ॥ २१ ॥
पुरातन युगके प्रारम्भकालमे कमलयोनि ब्रह्माजीने मुझे जलके ऊपर स्थापित किया था और मेरी मृत्तिकाको मुट्ठीमें बाँधकर उसके द्वारा पहले दो बड़े-बड़े असुरोंकी मूर्तियाँ बनायीं ॥ २१ ॥
कर्णस्रोतोद्भवौ तौ हि विष्णोरस्य महात्मनः।
महार्णवे प्रखपतः काष्ठकुड्यसमौ स्थितौ ॥ २२ ॥
वे दोनों पहले-पहल महासागरमें सोते हुए इन महात्मा भगवान् विष्णुके कानोंकी मैलसे उत्पन्न हुए थे और काठ एवं दीवारके समान अचेतन अवस्थामे स्थित थे (इन्हींकी आकृतियोंको भगवान्ने मिट्टीसे सँवारा था) ॥ २२ ॥
तौ विवेश स्वयं वायुर्ब्रह्मणा साधु चोदितः।
दिवं प्रच्छादयन्तौ तु ववृधाते महासुरौ ॥ २३ ॥
फिर ब्रह्माजीकी उत्तम प्रेरणासे स्वयं वायुदेवने उनके भीतर प्रवेश किया। इसके बाद वे दोनो महान् असुर आकाशको आच्छादित करते हुए बढ़ने लगे ॥ २३ ॥
वायुप्राणौ तु तौ गृह्य ब्रह्मा पर्यमृशच्छनैः।
एकं मृदुतरं मेने कठिनं वेद चापरम् ॥ २४ ॥
वायुरूपी प्राणसे युक्त हुए उन दोनो असुरोको गोदमें लेकर ब्रह्माजीने उनके अङ्गोंपर धीरे-धीरे हाथ फेरा। उनमेंसे एकका शरीर तो उन्हें अत्यन्त कोमल प्रतीत हुआ और दूसरे-का कठोर ॥ २४ ॥
नामनी तु तयोश्चक्रे स विभुः सलिलोद्भवः।
मृदुस्त्वयं मधुर्नाम कठिनः कैटभोऽभवत् ॥ २५ ॥
तब जलजन्मना भगवान् ब्रह्माने उन दोनोंका नामकरण-संस्कार किया और कहा-यह जो मृदु (कोमल) है, इसका नाम 'मधु' होगा और जो कठोर है, वह 'कैटभ' कहलायेगा ॥ २५ ॥
तौ दैत्यौ कृतनामानौ चेरतुर्बलदर्पितौ।
सर्वमेकार्णवं लोकं योद्धुकामो सुदुर्जयौ ॥ २६ ॥