भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

१९६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

नाम निश्चित हो जानेपर वे दोनों अत्यन्त दुर्जय दैत्य बलके घमंडसे मत्तवाले होकर युद्धकी इच्छासे समस्त एकार्णव जगत्में विचरने लगे ॥ २६ ॥

तावागतौ समालोक्य ब्रह्मा लोकपितामहः।
एकार्णवाम्बुनिचये तत्रैवान्तरधीयत ॥ २७ ॥

उन दोनोंको युद्धके लिये आया देख लोकपितामह ब्रह्मा वहीं एकार्णवकी जलराशिमें अदृश्य हो गये ॥ २७ ॥

स पद्मे पद्मनाभस्य नाभिमध्यात् समुत्थिते।
रोचयामास वसतिं गुहां ब्रह्मा चतुर्मुखः ॥ २८ ॥

उन चतुर्मुख ब्रह्माने भगवान् पद्मनाभकी नाभिके मध्य-भागसे प्रकट हुए कमलपर ही गुप्तरूपसे निवास करना पसंद किया ॥ २८ ॥

तावुभौ जलगर्भस्थौ नारायणपितामहौ।
बहून् वर्षगणानप्सु शयानौ न चकम्पतुः ॥ २९ ॥

वे दोनों भगवान् नारायण और ब्रह्मा जलके भीतर स्थित हो बहुत वर्षोंतक सोते रहे। कभी हिलेतक नहीं ॥ २९ ॥

अथ दीर्घस्य कालस्य तावुभौ मधुकैटभौ।
आजग्मतुस्तमुद्देशं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः ॥ ३० ॥

तदनन्तर दीर्घकाल व्यतीत होनेके पश्चात् वे दोनों भाई मधु और कैटभ उस स्थानपर आये, जहाँ ब्रह्माजी विराजमान थे ॥ ३० ॥

दृष्ट्वा तावसुरौ घोरौ महाकायौ दुरासदौ।
ब्रह्मणा ताडितो विष्णुः पद्मनालेन वै तदा।
उत्पपाताथ शयनात् पद्मनाभो महाद्युतिः ॥ ३१ ॥

उन दुर्जय, विशालकाय एवं भयंकर असुरोंको देखकर ब्रह्माजीने कमलकी नालसे भगवान् विष्णुको ठोंका (उन्हें जग जानेके लिये संकेत किया)। तब महातेजस्वी भगवान् पद्मनाभ शय्यासे उछलकर खड़े हो गये ॥ ३१ ॥

तद् युद्धमभवद् घोरं तयोस्तस्य च वै तदा।
एकार्णवे तदा लोके त्रैलोक्ये जलतां गते ॥ ३२ ॥

उस एकार्णव जगत्में, जब कि तीनों लोक जलमें मिल गये थे, उन दोनों असुरों तथा भगवान् विष्णुमें घोर युद्ध हुआ ॥ ३२ ॥

तदाभूत् तुमुलं युद्धं वर्षसंख्या सहस्रशः।
न च तावसुरौ युद्धे तदा श्रममवापतुः ॥ ३३ ॥

उस समय सहस्रों वर्षोंतक वह तुमुल युद्ध चलता रहा, किंतु वे दोनों असुर युद्धमें थके नहीं ॥ ३३ ॥

अथातो दीर्घकालस्य तौ दैत्यौ युद्धदुर्मदौ।
ऊचतुः प्रीतमनसौ देवं नारायणं हरिम् ॥ ३४ ॥

दीर्घकालतक युद्ध करके वे दोनों रणदुर्मद दैत्य मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और भगवान् नारायण हरिसे इस प्रकार बोले—॥ ३४ ॥

प्रीतौ स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥ ३५ ॥

‘देव! तुम्हारे युद्धसे हम दोनों भाई बहुत प्रसन्न हैं। तुम हमारे लिये स्पृहणीय मृत्यु हो; किंतु हम दोनोंको वहीं मारो, जहाँकी पृथ्वी जलमें डूबी हुई न हो ॥ ३५ ॥

हतौ च तय पुत्रत्वं प्राप्नुयावः सुरोत्तम।
यो ह्यावां युधि निर्जेता तस्यावां विहितौ सुतौ ॥ ३६ ॥

‘सुरश्रेष्ठ! मारे जानेपर हम दोनों आपके पुत्रभावको प्राप्त होंगे; क्योंकि ब्रह्माजीने विधान बना दिया है कि जो हमें युद्धमें जीत ले, हम उसीके पुत्र हों’ ॥ ३६ ॥

स तु गृह्य मृधे दोर्भ्यां दैत्यौ तावभ्यपीडयत्।
जग्मतुर्निधनं वापि तावुभौ मधुकैटभौ ॥ ३७ ॥

उनकी बात सुनकर भगवान् विष्णुने उस युद्धस्थलमें उन दैत्योंको दोनों हाथोंसे पकड़कर दबाया। इससे मधु और कैटभ दोनोंकी मृत्यु हो गयी ॥ ३७ ॥

तौ हतौ चाप्लुतौ तोये वपुर्भ्यामेकतां गतौ।
मेदो मुमुचतुर्दैत्यौ मथ्यमानौ जलोर्मिभिः ॥ ३८ ॥
मेदसा तज्जलं व्याप्तं ताभ्यामन्तर्दधे ततः।
नारायणश्च भगवानसृजत् स पुनः प्रजाः ॥ ३९ ॥

मरनेपर उन दोनोंकी लाशें जलमें डूबकर एक हो गयीं। फिर जलकी लहरोंसे मथित होकर उन दोनों दैत्योंन जो मेद छोड़ा, उससे आच्छादित होकर वहाँका जल अदृश्य हो गया। उसीपर भगवान् नारायणने नाना प्रकारके जीवोंकी सृष्टि की ॥ ३८-३९ ॥

दैत्ययोर्मेदसाच्छन्ना मेदिनीति ततः स्मृता।
प्रभावात् पद्मनाभस्य शाश्वती जगती कृता ॥ ४० ॥

उन दैत्योंके मेदसे सारी पृथ्वी ढक गयी, इसलिये ‘मेदिनी’ नामसे विख्यात हुई। भगवान् पद्मनाभके प्रभावसे यह जगत्के लिये शाश्वत आधार बन गयी ॥ ४० ॥

वराहेण पुरा भूत्वा मार्कण्डेयस्य पश्यतः।
विषाणेनाहमेकेन तोयमध्यात् समुद्धृता ॥ ४१ ॥

पूर्वकालमें वाराहरूप धारण करके इन्हीं भगवान् नारायणने मार्कण्डेयजीके देखते-देखते मुझे एक दाढ़पर उठाकर पानीके भीतरसे बाहर निकाला था ॥ ४१ ॥

हताहं क्रमता भूयस्तदा युष्माकमग्रतः।
बलेः सकाशाद् दैत्यस्य विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ४२ ॥

फिर उस दिन आपलोगोंके सामने ही प्रभावशाली भगवान् विष्णुने अपने पग बढ़ाकर त्रिलोकीको नापते हुए मुझे दैत्यराज बलिके पाससे छीन लिया ॥ ४२ ॥