भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 220

हरिवंशपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ १९७


साम्प्रतं विद्यमानाहमेतमेव गदाधरम् ।
अनाथा जगतो नाथं शरण्यं शरणं गता ॥ ४३ ॥
इस समय भी अत्यन्त कष्टमें पड़कर अनाथ-सी हो रही हूँ और इन्हीं शरणागतवत्सल जगन्नाथ गदाधरकी शरणमें आयी हूँ ॥ ४३ ॥

अग्निः सुवर्णस्य गुरुर्गवां सूर्यो गुरुः स्मृतः ।
नक्षत्राणां गुरुः सोमो मम नारायणो गुरुः ॥ ४४ ॥
अग्नि सुवर्णका गुरु है। सूर्य समस्त किरणोंके गुरु माने गये हैं। नक्षत्रोंके गुरु चन्द्रमा है, परंतु मेरे गुरु ये भगवान् नारायण ही हैं ॥ ४४ ॥

यदहं धारयाम्येका जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
मया धृतं धारयते सर्वमेतद् गदाधरः ॥ ४५ ॥
अकेली मैं जिस चराचर जगत्को धारण करती हूँ, मेरे द्वारा धारण किये गये इस समस्त जगत्को (तथा मुझे भी) भगवान् गदाधर ही धारण करते हैं ॥ ४५ ॥

जामदग्न्येन रामेण भारावतरणेप्सया ।
रोषात् त्रिःसप्तकृत्वोऽहं क्षत्रियैर्विप्रयोजिता ॥ ४६ ॥
इन्होंने ही जमदग्निनन्दन परशुरामके रूपमें प्रकट होकर मेरा भार उतारनेकी इच्छासे रोषपूर्वक मुझे इक्कीस बार क्षत्रियोंसे रहित किया था ॥ ४६ ॥

सास्मि वेद्यां समारोप्य तर्पिता नृपशोणितैः ।
भार्गवेण पितुः श्राद्धे कश्यपाय निवेदिता ॥ ४७ ॥
मैं वही हूँ, जिसे रणयज्ञकी वेदीमे प्रतिष्ठित करके भृगुनन्दन परशुरामने राजाओंके रक्तसे तृप्त किया था और पिताके श्राद्धमे महर्षि कश्यपको मेरा दान कर दिया था ॥ ४७ ॥

मांसमेदोऽस्थिदुर्गन्धा दिग्धा क्षत्रियशोणितैः ।
रजस्वलेव युवतिः कश्यपं समुपस्थिता ॥ ४८ ॥
मैं क्षत्रियोंके रक्तसे भीगी हुई थी। मेरे शरीरसे (मरे हुए राजाओंके) मांस, मेद और अस्थियोंकी दुर्गन्ध फैल रही थी। उसी दशामें रजस्वला युवतीकी भाँति मैं महर्षि कश्यपकी सेवामे उपस्थित हुई ॥ ४८ ॥

स मां ब्रह्मर्षिरप्याह किमुर्वि त्वमवाङ्मुखी ।
वीरपत्नीव्रतमिदं धारयन्ती विषीदसि ॥ ४९ ॥
उस समय ब्रह्मर्षि कश्यपने मुझसे कहा—'वसुधे! क्या कारण है, तू नीचे मुख किये वीर-पत्नीके इस व्रतको धारण करके विषादमें डूबी हुई है?' ॥ ४९ ॥

साहं विज्ञापितवती कश्यपं लोकभावनम् ।
पतयो मे हता ब्रह्मन् भार्गवेण महात्मना ॥ ५० ॥
उस समय मैंने लोकपिता कश्यपजीको यह सूचित किया—'ब्रह्मन्! महात्मा परशुरामने मेरे पतियोंको मार डाला है॥५०॥

साहं विहीना विक्रान्तैः क्षत्रियैः शस्त्रवृत्तिभिः।
विधवा शून्यनगरा न धारयितुमुत्सहे ॥ ५१ ॥
'शस्त्रग्रहण ही जिनकी जीविकाका साधन था, उन पराक्रमी क्षत्रियोंसे हीन होकर मैं विधवा हो गयी हूँ। मेरे सारे नगर राजाओंसे शून्य हो गये हैं, अतः अब मुझमें जीवित रहनेका उत्साह नहीं रह गया है ॥ ५१ ॥

तन्मह्यं दीयतां भर्ता भगवंस्त्वत्समो नृपः ।
रक्षेत् सग्रामनगरां यो मां सागरमालिनीम् ॥ ५२ ॥
'अतः भगवन् ! मुझे ऐसा कोई नरेश पति दीजिये, जो आपके समान ही शक्तिशाली हो और समुद्रसे घिरी हुई मेरी ग्राम और नगरोंसहित रक्षा कर सके' ॥ ५२ ॥

स श्रुत्वा भगवान् वाक्यं बाढमित्यब्रवीत् प्रभुः ।
ततो मां मानवेन्द्राय मनवे स प्रदत्तवान् ॥ ५३ ॥
प्रभावशाली भगवान् कश्यपने मेरी यह बात सुनकर कहा 'बहुत अच्छा' । फिर उन्होंने मुझे राजा मनुके हाथमें दे दिया ॥ ५३ ॥

सा मनुप्रभवं दिव्यं प्राप्यैक्ष्वाकुकुलं नृपम् ।
विपुलेनास्मि कालेन पार्थिवात् पार्थिवं गता ॥ ५४ ॥
इस प्रकार मैं वैवस्वत मनुसे प्रकट हुए दिव्य इक्ष्वाकुकुलमे आ पहुँची। उस कुलके सभी लोग नरेश थे । वहाँ दीर्घकालतक एक राजासे दूसरे राजाके अधिकारमे आती रही ॥ ५४ ॥

एवं दत्तास्मि मनवे मानवेन्द्राय धीमते ।
भुक्ता राजसहस्रैश्च महर्षिकुलसम्मितैः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार मैं बुद्धिमान् राजा मनुके हाथमें सौंपी गयी और महर्षिसमुदायके तुल्य तेजस्वी सहस्रो राजाओंके उपभोगमें आयी ॥ ५५ ॥

बहवः क्षत्रियाः शूरा मां जित्वा दिवमाश्रिताः ।
ते च कालवशं प्राप्य मय्येव प्रलयं गताः ॥ ५६ ॥
बहुत-से शूरवीर क्षत्रिय मुझे जीतकर स्वर्गलोकको चले गये । वे कालके अधीन होकर मुझमें ही लीन हुए थे ॥ ५६ ॥

मत्कृते विग्रहा लोके वृत्ता वर्तन्त एव च ।
क्षत्रियाणां बलवतां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ५७ ॥
जगत्मे मेरे ही लिये युद्धस्थलमें कभी पीठ न दिखानेवाले बलवान् क्षत्रियोंके परस्पर युद्ध हुए हैं और हो रहे हैं ॥ ५७ ॥

एतद् युष्मत्प्रवृत्तेन दैवेन परिपाल्यते ।
जगद्धितार्थं कुरुत राज्ञां हेतुं रणक्षये ॥ ५८ ॥
आपलोगोंके द्वारा परिचालित दैवके द्वारा ही इस जगत्का परिपालन होता है, अतः आप जगत्के हितके लिये

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