विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः १९९
रोचते मे सुरश्रेष्ठा युष्माकमपि निश्चयः ।
सृजध्वं स्वशरीरांशांस्तेजसाऽऽत्मसमान् भुवि ॥ १२ ॥
'सुरश्रेष्ठगण ! तुमलोगोंका जो निश्चय है, वह मुझे भी अच्छा लगता है । तुमलोग भूतलपर अपने ही समान तेजस्वी अपने शरीरके अंशोंको प्रकट करो ॥ १२ ॥
सर्व एव सुरश्रेष्ठास्तेजोभिरवरोहत ।
भावयन्तो भुवं देवीं लब्ध्वा त्रिभुवनश्रियम् ॥ १३ ॥
'श्रेष्ठ देवताओ ! तुम सभी लोग अपने-अपने तेजसे अवतार लो और तीनों लोकोंकी लक्ष्मीको पाकर भूदेवीकी रक्षा करते हुए वहाँ रहो ॥ १३ ॥
पार्थिवे भारते वंशे पूर्वमेव विजानता ।
पृथिव्यां सम्भ्रममिमं श्रूयतां यन्मया कृतम् ॥ १४ ॥
'मैं पृथ्वीपर आनेवाले इस भयको पहलेसे ही जानता था । अतः भूतलपर स्थित भरतवंशके लिये मैंने जो कुछ ( विचार ) किया है, उसे सुनो ॥ १४ ॥
समुद्रेऽहं पुरा पूर्वे वेलामासाद्य पश्चिमाम् ।
आसं सार्धं तनूजेन कश्यपेन महात्मना ॥ १५ ॥
कथाभिः पूर्ववृत्ताभिर्लोकवेदानुगामिभिः ।
इतिवृत्तैश्च बहुभिः पुराणप्रभवैर्गुणैः ॥ १६ ॥
'पहलेकी बात है, मैं पूर्व समुद्रके पश्चिम तटपर अपने पुत्र महात्मा कश्यपके साथ बैठा था । उस समय लोक और वेदका अनुसरण करनेवाली प्राचीन कथाओ तथा बहुत-से उत्तम गुणवाले पौराणिक इतिहासोंकी चर्चाद्वारा मैं समय बिता रहा था ॥ १५-१६ ॥
कुर्वतस्तु कथास्तास्ताः समुद्रः सह गङ्गया ।
समीपमाजगामाशु युक्तस्तोयदमरुतैः ॥ १७ ॥
'उन-उन कथावार्ताओंको कहते-सुनते हुए मेरे समीप मूर्तिमती गङ्गाके साथ मूर्तिमान् समुद्र शीघ्रतापूर्वक आया । उसके साथ मेघोंकी घटा तथा वायुका भी आगमन हुआ था ॥ १७ ॥
स वीचिविषमां कुर्वन् गतिं वेगतरङ्गिणीम् ।
यादोगणविचित्रेण संछन्नस्तोयवाससा ॥ १८ ॥
'वह ऊँची-नीची लहरोंके कारण वेग एवं तरङ्गोसे युक्त अपनी गतिको विषम बनाता हुआ आया था । जलजन्तुओंके कारण विचित्र दिखायी देनेवाले जलरूपी वस्त्रसे उसका शरीर ढका हुआ था ॥ १८ ॥
शङ्खमुक्तामलतनुः प्रवालमणिभूषणः ।
युक्तश्चन्द्रमसा पूर्णः साभ्रगम्भीरनिःस्वनः ॥ १९ ॥
'उसके शरीरकी कान्ति शङ्ख और मुक्ताओंसे अत्यन्त निर्मल दिखायी देती थी । वह मूँगे और मणियोंके आभूषणो से विभूषित तथा पूर्ण चन्द्रमासे संयुक्त होनेके कारण उद्वेलित हो मेघके समान गम्भीर गर्जना कर रहा था ॥ १९ ॥
स मां परिभवन्नेव स्वां वेलां समतिक्रमन् ।
क्लेदयामास चपलैर्लवणैरम्बुविप्रुषैः ॥ २० ॥
'उसने मेरा तिरस्कार-सा करते हुए अपनी मर्यादाका उल्लङ्घन करके अपने चञ्चल एवं नमकीन जलविन्दुओंस मुझे भिगो दिया ॥ २० ॥
तं च देशं व्यवस्थितः समुद्रेऽद्भिरिवमर्दितुम् ।
उक्तः संरब्धया वाचा शान्तोऽसीति मया तदा ॥ २१ ॥
'जब समुद्र अपने उमड़े हुए जलसे उस स्थानको नष्ट-भ्रष्ट करनेके लिये उद्यत हुआ, तब मैंने क्रोधभरी वाणीमें उससे कहा—'तू शान्त हो जा' ॥ २१ ॥
शान्तोऽसीत्युक्तमात्रस्तु तनुत्वं सागरो गतः ।
संहतोर्मितरङ्गौघः स्थितो राजश्रिया ज्वलन् ॥ २२ ॥
'शान्त हो जा' इतना कहते ही समुद्र तनुता ( सूक्ष्मता ) को प्राप्त हो गया । उसकी ऊर्मि और तरङ्गोका प्रवाह दब गया और वह राजलक्ष्मीसे प्रकाशित होता हुआ मेरे समीप खड़ा हो गया ॥ २२ ॥
भूयश्चैव मया शप्तः समुद्रः सह गङ्गया ।
सकारणां मतिं कृत्वा युष्माकं हितकाम्यया ॥ २३ ॥
'फिर मैंने मन-ही-मन पृथ्वीके भार उतारनेके हेतुका विचार करके तुमलोगोंके हितकी कामनासे गङ्गासहित समुद्र-को पुनः शाप देते हुए कहा ॥ २३ ॥
यस्मात् त्वं राजतुल्येन वपुषा समुपस्थितः ।
गच्छार्णव महीपालो राजैव त्वं भविष्यसि ॥ २४ ॥
'समुद्र ! तू राजाके समान शरीर धारण करके मेरे निकट आया है, अतः जा, तू इस पृथ्वीका पालन करनेवाला राजा ही होगा ॥ २४ ॥
तत्रापि सहजां लीलां धारयन् स्वेन तेजसा ।
भविष्यसि नृणां भर्ता भारतानां कुलोद्वहः ॥ २५ ॥
'वहाँ भी अपनी सहज लीलाको धारण किये अपने तेजसे तू मनुष्योंका भरण-पोषण करनेवाला तथा भरतवंशका भार वहन करनेमें समर्थ होगा ॥ २५ ॥
शान्तोऽसीति मयोक्तस्त्वं यच्चासि तनुतां गतः ।
सुतनुर्यशसा लोके शान्तनुस्त्वं भविष्यसि ॥ २६ ॥
'शान्त हो जा' मेरे इतना कहते ही जो तू शान्त होकर तनुता ( सूक्ष्मता ) को प्राप्त हुआ है, इसलिये तू सुन्दर शरीरसे युक्त एवं यशस्वी होकर संसारमें 'शान्तनु' नामसे विख्यात होगा ॥ २६ ॥
इयमप्यायतापाङ्गी गङ्गा सर्वाङ्गशोभना ।
रूपिणी च सरिच्छ्रेष्ठा तत्र त्वामुपयास्यति ॥ २७ ॥