भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

२०० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

‘यह विशाल-लोचना, सर्वाङ्गसुन्दरी, सरिताओंमें श्रेष्ठ मूर्तिमती गङ्गा भी वहाँ तुम्हारी सेवामें उपस्थित होगी ॥२७॥

एवमुक्तस्तु मां क्रुद्धः सोऽभिवीक्ष्यार्णवोऽब्रवीत् ।
मां प्रभो देवदेवानां किमर्थं शप्तवानसि ॥ २८ ॥

‘मेरे ऐसा कहनेपर क्षोभमें भरा हुआ समुद्र मेरी ओर देखकर बोला—‘देवदेवेश्वर ! आपने मुझे शाप क्यों दिया ? ॥ २८ ॥

अहं तव विधेयात्मा त्वत्कृतस्त्वत्परायणः ।
अशपोऽसदृशैर्वाक्यैरात्मजं मां किमात्मना ॥ २९ ॥

‘मेरा यह शरीर तो आपकी आज्ञाका पालक है। आपने ही इसकी रचना की है और यह सदा आपकी सेवामें ही तत्पर रहता है। मैं आपका पुत्र हूँ। आपने स्वयं ही मुझे ऐसे वचनोंद्वारा, जो आपके और मेरे अनुरूप नहीं हैं, शाप कैसे दे दिया ? ॥ २९ ॥

भगवंस्त्वत्प्रसादेन वेगात् पर्वणि वर्धितः ।
यद्यहं चलितो ब्रह्मन् कोऽत्र दोषो ममात्मनः ॥ ३० ॥

‘भगवन् ! आपकी ही कृपासे पूर्णिमाके दिन मैं बड़े वेगसे बढ़ जाता हूँ । ब्रह्मन् ! इस सहज नियमसे प्रेरित होकर यदि मैं अपनी मर्यादासे विचलित हो गया तो इसमें मेरा अपना दोष क्या है ? ॥ ३० ॥

क्षिप्ताभिः पवनैरद्भिः स्पृष्टो यद्यसि पर्वणि ।
अत्र मे किं नु भगवन् विद्यते शापकारणम् ॥ ३१ ॥

‘भगवन् ! आज पूर्णिमाके दिन प्रबल वायुद्वारा फेंके गये मेरे जलसे यदि आपका स्पर्श हो गया, आप भीग गये तो इसमे मुझे शाप प्राप्त होनेका क्या कारण है ? ॥ ३१ ॥

उद्धतैश्च महावातैः प्रवृद्धैश्च वलाहकैः ।
पर्वणा चेन्दुयुक्तेन त्रिभिः क्षुब्धोऽस्मि कारणैः॥ ३२ ॥

‘उठी हुई प्रचण्ड आँधी, बढ़े हुए महान् मेघ और उगे हुए चन्द्रमासे युक्त पूर्णिमाका पर्व-इन तीन कारणोंसे मैं क्षुब्ध ( उद्वेलित ) हो उठा था ॥ ३२ ॥

एवं यद्यपराधोऽहं कारणैस्त्वत्प्रकल्पितैः ।
क्षन्तुमर्हसि मे ब्रह्मञ्छापोऽयं विनिवर्त्यताम् ॥ ३३ ॥

‘ब्रह्मन् ! इस तरह आपके बनाये हुए कारणों (नियमों) से ही क्षुब्ध होकर यदि मैंने अपराध किया है तो आप उसके लिये मुझे क्षमा कर दें और इस शापको लौटा लें ॥

एवं मयि निरालम्बे शापाच्छिथिलतां गते ।
कारुण्यं कुरु देवेश प्रमाणं यद्यवेक्षसे ॥ ३४ ॥

‘देवेश्वर ! मुझे दूसरा कोई सहारा देनेवाला नहीं है। मैं शापसे शिथिल हो गया हूँ। यदि आप शरणागतकी रक्षाका प्रतिपादन करनेवाले प्रमाणपर दृष्टि रखते हैं तो मुझपर अवश्य दया करें ॥ ३४ ॥

अस्यास्तु देवगङ्गाया गां गतायास्त्वदाज्ञया ।
मम दोषात् सदोषायाः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ३५ ॥

‘यह देवनदी गङ्गा आपकी ही आज्ञासे इस भूतलपर अवतीर्ण हुई है। (इसका कोई दोष नहीं है) इसे मेरे दोष-से ही दोषकी भागिनी होना पड़ा है, अतः आप इसपर कृपा करें ॥ ३५ ॥

तमहं श्लक्ष्णया वाचा महार्णवमथाब्रुवम् ।
अकारणज्ञं देवानां त्रस्तं शापानलेन तम् ॥ ३६ ॥

‘महासागर देवताओंके भूभार-हरणरूप उद्देश्यको नहीं जानता था; अतः मेरी शापाग्निमे भयभीत हो उठा था। उस समय मैंने मधुर वाणीद्वारा उसे सान्त्वना देते हुए कहा—॥

शान्तिं व्रज न भेतव्यं प्रसन्नोऽस्मि महोदधे ।
शापेऽस्मिन् सरितां नाथ भविष्यं शृणु कारणम् ॥३७॥

‘महोदधे ! शान्त हो जाओ। तुम्हें डरना नहीं चाहिये। मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। नदीश्वर ! इस शापमें जो भावी कारण (उद्देश्य) है, उसे बताता हूँ, सुनो— ॥ ३७ ॥

त्वं गच्छ भारते वंशे स्वं देहं स्वेन तेजसा ।
आधत्स्व सरितां नाथ त्यक्त्वेमां सागरीं तनुम् ॥ ३८ ॥

‘सरिताओंके स्वामी समुद्र ! तुम अपने तेजसे इस सागर-शरीरको छोड़कर अर्थात् योगबलसे अपने-आपको दो रूपोंमें विभक्त करके (एकसे तो यहाँ रह जाओ और दूसरे रूपसे) जाओ और भरतवंशमें अपने शरीरको गर्भमें स्थापित करो ॥

महोदधे महीपालस्तत्र राजश्रिया वृतः ।
पालयंश्चतुरो वर्णान् रंस्यसे सलिलेश्वर ॥ ३९ ॥

‘जलके स्वामी महासागर ! उस भरतवंशमें भूपाल बनकर राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हो तुम चारों वर्णोंका पालन करते हुए बड़े सुखसे रहोगे ॥ ३९ ॥

इयं च ते सरिच्छ्रेष्ठा बिभ्रती रूपमुत्तमम् ।
तत्कालं रमणीयाङ्गी गङ्गा परिचरिष्यति ॥ ४० ॥

‘यह जो तुम्हारी प्रिया सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा है, यह भी उस समय रमणीय अङ्गोंसे सुशोभित परम सुन्दर रूप धारण करके वहाँ तुम्हारी सेवा करेगी ॥ ४० ॥

अनया सह जाह्नव्या मोदमानो ममाऽऽज्ञया ।
इमं सलिलसंक्लेदं विस्मरिष्यसि सागर ॥ ४१ ॥

‘सागर ! तुम मेरी आज्ञासे वहाँ इस जाह्नवीके साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए मुझे जलसे भिगोनेके कारण मिले हुए इस शापके दुःखको भूल जाओगे ॥ ४१ ॥

त्वरता चैव कर्तव्यं त्वयेदं मम शासनम् ।
प्राजापत्येन विधिना गङ्गया सह सागर ॥ ४२ ॥