भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

हरिवंशपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २०१


‘समुद्र ! तुम्हें बहुत शीघ्र मेरी इस आज्ञाका पालन करना चाहिये। वहाँ इस गङ्गाके साथ तुम्हारा प्राजापत्य-विधिसे विवाह होगा ॥ ४२ ॥’

वसवः प्रच्युताः स्वर्गात् प्रविष्टाश्च रसातलं ।
तेषामुत्पादनार्थाय त्वं मया विनियोजितः ॥ ४३ ॥

‘आठों वसु स्वर्गसे भ्रष्ट होकर रसातलमें जा पहुँचे हैं। उन्हें मनुष्यरूपमें उत्पन्न करनेके लिये मैंने तुम्हें नियुक्त किया है ॥ ४३ ॥’

अष्टौ ताञ्जाह्नवी गर्भानपत्यार्थे दधात्वियम्।
विभावसोस्तुल्यगुणान् सुराणां प्रीतिवर्धनम् ॥ ४४ ॥

‘अग्निदेवके समान गुणशाली तथा देवताओंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले उन आठों वसुओंको सन्तानरूपसे उत्पन्न करनेके लिये यह गङ्गा तुमसे गर्भ धारण करे ॥ ४४ ॥’

उत्पाद्य त्वं वसूञ्छीघ्रं कृत्वा कुरुकुलं महत्।
प्रवेष्टासि तनुं त्यक्त्वा पुनः सागर सागरीम् ॥ ४५ ॥

‘सागर ! तुम वसुओंको शीघ्र ही जन्म देकर कुरुकुलकी महत्ता बढ़ानेके अनन्तर उस मानवशरीरका त्याग करके पुनः अपने समुद्ररूपमें प्रवेश करोगे ॥ ४५ ॥’

एवमेतन्मया पूर्वं हितार्थं वः सुरोत्तमाः।
भविष्यं पश्यता भारं पृथिव्याः पार्थिवात्मकम्॥ ४६ ॥

‘सुरश्रेष्ठगण ! इस प्रकार मैंने भविष्यमें होनेवाले पृथ्वीके राजसमूहरूपी भारको देखकर तुम्हारे हितके लिये पहले ही यह कार्य कर दिया है ॥ ४६ ॥’

तदेष शान्तनोर्वंशः पृथिव्यां रोपितो मया ।
वसवो ये च गङ्गायामुत्पन्नास्त्रिदिवौकसः ॥ ४७ ॥
अद्यापि भुवि गाङ्गेयस्तत्रैव वसुरुत्तमः ।
सप्तमे वसवः प्राप्ताः स एकः परिलम्बते ॥ ४८ ॥

‘इस तरह भूतलपर शान्तनुके वंशका बीजारोपण मैंने कर दिया है। स्वर्गमें रहनेवाले जो वसु थे, वे गङ्गाके गर्भसे उत्पन्न हो चुके और उनमेंसे ये सात वसु यहाँ आ गये, परंतु एकमात्र आठवाँ वसु गङ्गाका पुत्र होकर अबतक वहाँ पृथ्वीपर ही लटक रहा है ॥ ४७-४८ ॥’

द्वितीयायां स सृष्टायां द्वितीया शान्तनोस्तनुः ।
विचित्रवीर्यो द्युतिमानासीद् राजा प्रतापवान् ॥ ४९ ॥

‘शान्तनुकी दूसरी पत्नी सत्यवतीके साथ पतिका समागम होनेपर भीष्मकी अपेक्षा जो दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ था, उसका नाम विचित्रवीर्य था। वह कुरुकुलका तेजस्वी एवं प्रतापी राजा था ॥ ४९ ॥’

वैचित्रवीर्यौ द्वावेव पार्थिवौ भुवि साम्प्रतम्।
धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च विख्यातौ पुरुषर्षभौ ॥ ५० ॥

‘विचित्रवीर्यके दो ही पुत्र इस समय पृथ्वीपर वर्तमान हैं। वे दोनों ही राजा एवं पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। धृतराष्ट्र और पाण्डु नामसे उनकी ख्याति है ॥ ५० ॥’

तत्र पाण्डोः श्रिया जुष्टे द्वे भार्ये सम्बभूवतुः।
शुभे कुन्ती च माद्री च देवयोषोपमे तु ते ॥ ५१ ॥

‘उनमेंसे पाण्डुकी दो शोभासम्पन्न सुन्दरी पत्नियाँ हैं, जो देवाङ्गनाओंके समान रूपवती हैं। उनके नाम हैं—कुन्ती और माद्री ॥ ५१ ॥’

धृतराष्ट्रस्य राज्ञस्तु भार्यैका तुल्यचारिणी ।
गान्धारी भुवि विख्याता भर्तुर्नित्यं व्रते स्थिता ॥ ५२ ॥

‘राजा धृतराष्ट्रकी एक ही पत्नी है, जो इस भूतलपर गान्धारीके नामसे विख्यात है। वह पतिके समान आचारसे रहनेवाली और सदा पातिव्रत्यधर्मका पालन करनेवाली है ॥ ५२ ॥’

तत्र वंशा विभज्यन्तां विपक्षाः पक्ष एव च ।
पुत्राणां हि तयो राज्ञोर्भविता विग्रहो महान् ॥ ५३ ॥

‘उन दोनों राजाओंके पुत्रोंमें महान् युद्ध होनेवाला है। तुमलोग उन्हींके पक्ष और विपक्षमें पृथक्-पृथक् अपने वंश उत्पन्न करो ॥ ५३ ॥’

तेषां विमर्दे दायाद्ये नृपाणां भविता क्षयः ।
युगान्तप्रतिमं चैव भविष्यति महद् भयम् ॥ ५४ ॥

‘उनके पैतृक राज्यके बटवारेके सम्बन्धमें विवाद होनेपर बड़ा भारी संग्राम छिड़ जायगा और उसमें बहुत-से नरेशोंका विनाश होगा। वह महान् युद्ध प्रलयकालके समान भयंकर एवं संहारकारी होगा ॥ ५४ ॥’

सवलेषु नरेन्द्रेषु शान्तयत्स्वितरेतरम् ।
विविक्तपुरराष्ट्रोघा क्षितिः शैथिल्यमेष्यति ॥ ५५ ॥

‘जब सेनासहित राजालोग उस युद्धमें उपस्थित होंगे, उस समय एक दूसरेसे लड़-भिड़कर उन सबकी शान्ति (मृत्यु) हो जायगी। उस दशामें इस भूतलके सभी नगर और राष्ट्र निर्जन-से हो जायँगे और यह पृथ्वी शिथिलताको प्राप्त हो जायगी ॥ ५५ ॥’

द्वापरस्य युगस्यान्ते मया दृष्टं पुरातनम् ।
क्षयं यास्यन्ति शस्त्रेण मानवैः सह पार्थिवाः ॥ ५६ ॥

‘द्वापरयुगके अन्तमें घटित होनेवाले इस भावी विनाशको मैंने पहलेसे ही देख लिया है। उस समय अपने सैनिक मनुष्योंसहित समस्त भूपाल शस्त्रोंद्वारा विनष्ट हो जायँगे ॥ ५६ ॥’

तत्रावशिष्टान् मनुजान् सुप्तान् निशि विचेतसः।
धक्ष्यते शङ्करस्यांशः पावकेनास्त्रतेजसा ॥ ५७ ॥