विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २०२ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
'उस युद्धसे जो लोग बच जायँगे, उन्हें रातमें अचेत होकर सोते समय भगवान् शङ्करका अंशभूत अश्वत्थामा अग्नितुल्य अस्त्रके तेजसे जलाकर भस्म कर डालेगा ॥ ५७ ॥
अन्तकप्रतिमे तस्मिन् निवृत्ते क्रूरकर्मणि ।
समाप्तमिदमाख्यास्ये तृतीयं द्वापरं युगम् ॥ ५८ ॥
'प्रलयकालके समान वह क्रूरतापूर्ण विनाशकाण्ड जब समाप्त हो जायगा, तब मैं यह कहूँगा कि तीसरा द्वापरयुग समाप्त हो गया ॥ ५८ ॥
महेश्वरांशेऽपसृते ततो माहेश्वरं युगम् ।
शिष्यं प्रवर्तते पश्चाद् युगं दारुणदर्शनम् ॥ ५९ ॥
'परमेश्वर विष्णुके पूर्णतम अंशस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके परमधामको पधारनेपर अत्यन्त भयंकर अन्तिम युग कलिकी प्रवृत्ति होगी, जो देखनेमें बड़ा ही दारुण है ॥ ५९ ॥
अधर्मप्रायपुरुषं स्वल्पधर्मप्रतिग्रहम् ।
उत्सन्नसत्यसंयोगं वर्धितानृतसंचयम् ॥ ६० ॥
'उस समय मनुष्योंमें प्रायः अधर्मकी स्थिति होगी। धर्मको बहुत कम लोग ग्रहण करेंगे। उनमें सत्यका संयोग नहीं रहेगा और सबमें असत्यका संग्रह बढ़ेगा ॥ ६० ॥
महेश्वरं कुमारं च द्वौ च देवौ समाश्रिताः ।
भविष्यन्ति नराः सर्वे लोके न स्थिरायुषः ॥ ६१ ॥
'रुद्र और कुमारकार्तिकेय इन्हीं दो देवताओंका प्रायः सब लोग आश्रय लेंगे। संसारमें वृद्धावस्थातक जीनेवाले (अधिक) न होंगे ॥ ६१ ॥
तदेष निर्णयः श्रेष्ठः पृथिव्यां पार्थिवान्तकः ।
अंशावतरणं सर्वे सुराः कुरुत मा चिरम् ॥ ६२ ॥
'देवताओ ! अतः यही निर्णय सबसे श्रेष्ठ है कि पृथ्वीपर रहनेवाले राजाओंका अन्त कर दिया जाय । इसलिये तुम सब लोग अपने-अपने अंशसे अवतार लो, देर न करो ॥ ६२ ॥
धर्मस्यांशस्तु कुन्त्यां वै माद्र्यां च विनियुज्यताम् ।
विग्रहस्य कलिर्मूलं गान्धार्यो विनियुज्यताम् ॥ ६३ ॥
'धर्मके पक्षमें जो देवता हों, उन्हें कुन्ती और माद्रीके गर्भसे उत्पन्न होनेकी आज्ञा दी जाय । विवाद या युद्धका मूल है कलि, उसे सहायकोंसहित गान्धारीके गर्भसे उत्पन्न होनेके लिये प्रेरित किया जाय ॥ ६३ ॥
एतौ पक्षौ भविष्यन्ति राजानः कालचोदिताः ।
जातरागाः पृथिव्यर्थे सर्वे संग्रामलालसाः ॥ ६४ ॥
'कालसे प्रेरित हुए राजा इन दोनों पक्षोंमेंसे किसी एकका आश्रय लेंगे और पृथ्वीके राज्यकी प्राप्तिके लिये लोभासक्त होकर वे सब-के-सब संग्रामकी लालसा रखेंगे ॥ ६४॥
गच्छत्वियं वसुमती स्वां योनिं लोकधारिणी ।
सृष्टोऽयं नैष्ठिको राज्ञामुपायो लोकविश्रुतः ॥ ६५ ॥
'सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली यह पृथ्वी अब अपने स्थानको चली जाय । इसके भारभूत राजाओंके विनाशके लिये इस लोकप्रसिद्ध उपायका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया गया है' ॥ ६५ ॥
श्रुत्वा पितामहवचः सा जगाम यथागतम् ।
पृथिवी सह कालेन वधाय पृथिवीक्षिताम् ॥ ६६ ॥
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर पृथ्वी भूमिपालोंके वधके लिये कालके साथ जैसे आयी थी, वैसे ही लौट गयी ॥ ६६ ॥
देवानचोदयद् ब्रह्मा निग्रहार्थे सुरद्विषाम् ।
नरं चैव पुराणंर्षिं शेषं च धरणीधरम् ॥ ६७ ॥
सनत्कुमारं साध्यांश्च सुरांश्चाग्निपुरोगमान् ।
वरुणं च यमं चैव सूर्याचन्द्रमसौ तथा ॥ ६८ ॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव रुद्रादित्यांस्तथाश्विनौ ।
ततोऽशानवर्तिन देवाः सर्व एवावतारयन् ॥ ६९ ॥
तदनन्तर ब्रह्माजीने देवद्रोही दानवोंका दमन करनेके लिये देवताओंको प्रेरित किया। उन्होंने पुरातन ऋषि नर, पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग, सनत्कुमार, साध्यगण, अग्नि आदि देवता, वरुण, यम, सूर्य, चन्द्रमा, गन्धर्व, अप्सरा, रुद्र, आदित्य तथा दोनों अश्विनीकुमार—इन सबको अवतार लेनेके लिये प्रेरणा दी। तत्पश्चात् समस्त देवताओंने पृथ्वीपर अपना-अपना अंश उत्पन्न किया ॥ ६७-६९ ॥
यथा ते कथितं पूर्वमंशावतरणं मया ।
अयोनिया योनियाश्च ते देवाः पृथिवीतले ॥ ७० ॥
दैत्यदानवहन्तारः सम्भूताः पुरुषेश्वराः ।
राजन् ! मैंने तुम्हें पहले (आदिपर्व) अंशावतरणके प्रसङ्गमें जैसा बताया है, उसके अनुसार दैत्यों और दानवोंका विनाश करनेवाले वे देवता योनिन और अयोनिरूपसे पृथ्वीपर राजा होकर उत्पन्न हुए ॥ ७० १/२ ॥
क्षीरिकावृक्षसंकाशा वज्रसंहननास्तथा ॥ ७१ ॥
नागायुतबलाः केचित् केचिदोधबलान्विताः ।
गदापरिघशक्तीनां सहाः परिघबाहवः ॥ ७२ ॥
उनके शरीर पिण्डखजूरके समान पुष्ट और वज्रके तुल्य सुदृढ़ थे। उनमेंसे कितने ही दस हजार हाथियोंके समान बलवान् थे। कितने ही बलके अटूट प्रवाहसे सम्पन्न थे। वे गदा, परिघ और शक्तियोंके आघात सह लेनेमें समर्थ थे। उनकी भुजाएँ परिघोंके समान मोटी एवं सुदृढ़ थीं ॥ ७१-७२ ॥
गिरिशृङ्गप्रहर्तारः सर्वे परिघयोधिनः ।
वृष्णिवंशसमुत्पन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७३ ॥