भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 226

हरिवंशपर्व ] चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः २०३


कुरुवंशे च ते देवाः पाञ्चालेषु च पार्थिवाः।
याज्ञिकानां समृद्धानां ब्राह्मणानां च योनिषु ॥ ७४ ॥

वे सब-के-सब पर्वत-शिखरोंद्वारा प्रहार करनेवाले तथा परिघोंसे युद्ध करनेमें कुशल थे। उनमेंसे सैकड़ों-हजारों वीर देवता वृष्णिवंश, कुरुवंश तथा पाञ्चालवंशमें राजा एवं राजकुमारोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे। कितने ही देवता समृद्धिशाली याज्ञिक ब्राह्मणोंके कुलोंमें प्रकट हुए थे ॥ ७३-७४ ॥

सर्वार्थज्ञा महेष्वासा वेदव्रतपरायणाः।
सर्वर्द्धिगुणसम्पन्ना यज्वानः पुण्यकर्मिणः ॥ ७५ ॥

वे सम्पूर्ण अर्थोंके ज्ञाता, महाधनुर्धर, वैदिक व्रतके अनुष्ठानमें तत्पर, समस्त समृद्धिकारी गुणोंसे सम्पन्न, यज्ञकर्ता तथा पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले थे ॥ ७५ ॥

आचालयेयुर्ये शैलान् क्रुद्धा भिन्द्युर्महीत लम्।
उत्पतेयुरथाकाशं क्षोभयेयुर्महोदधिम् ॥ ७६ ॥

वे कुपित होनेपर पर्वतोंको भी हिला सकते थे। पृथ्वीको विदीर्ण कर सकते थे, आकाशमें उड़ सकते थे और समुद्रोंको भी विक्षुब्ध कर सकते थे ॥ ७६ ॥

एवमादिश्य तान् सर्वान् भूतभव्यभवत्प्रभुः।
नारायणे समावेश्य लोकाञ्छान्तिमुपागमत् ॥ ७७ ॥

भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी ब्रह्माजी उन देवताओंको उपर्युक्त आदेश दे भगवान् नारायणको समस्त लोकोंकी रक्षाका भार सौंपकर शान्त हो गये ॥ ७७ ॥

भूयः शृणु यथा विष्णुरवतीर्णो महीतले।
प्रजानां वै हितार्थाय प्रभुः प्राणहितेश्वरः ॥ ७८ ॥

जनमेजय ! समस्त प्राणियोंका हित-साधन करनेमें समर्थ भगवान् विष्णु प्रजावर्गके हितके लिये इस भूतलपर जिस प्रकार अवतीर्ण हुए थे, वह प्रसंग फिर सुनो ॥ ७८ ॥

ययातिवंशजस्याथ वसुदेवस्य धीमतः।
कुले पूज्ये यशस्कर्मा जज्ञे नारायणः प्रभुः ॥ ७९ ॥

राजा ययातिके वंशज बुद्धिमान् वसुदेवके आदरणीय कुलमें यशोवर्धक कर्म करनेवाले भगवान् नारायणने जन्म ग्रहण किया था ॥ ७९ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि देवानांमशावतरणे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें देवताओंका अंशावतरणविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥


चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भगवान् विष्णुके प्रति देवर्षि नारदका वचन—भूलोककी वर्तमान अवस्थाका परिचय देकर भगवान्‌को अवतार ग्रहण करनेके लिये प्रेरित करना

वैशम्पायन उवाच

कृतकार्ये गते काले जगत्यां च यथानयम्।
अंशावतरणे वृत्ते सुराणां भारते कुले ॥ १ ॥
भागेऽवतीर्णे धर्मस्य शक्रस्य पवनस्य च।
अश्विनोर्देवभिषजोर्भागे वै भास्करस्य च ॥ २ ॥
पूर्वमेवावनिगते भागे देवपुरोधसः।
वसूनामष्टमे भागे प्रागेव धरणीं गते ॥ ३ ॥
मृत्योर्भागे क्षितिगते कलेर्भागे तथैव च।
भागे शुक्रस्य सोमस्य वरुणस्य च गां गते ॥ ४ ॥
शङ्करस्य गते भागे मित्रस्य धनदस्य च।
गन्धर्वोरगयक्षाणां भागांशेषु गतेषु च ॥ ५ ॥
भागेष्वेतेषु गगनादवतीर्णेषु मेदिनीम्।
तिष्ठन्नारायणस्यांशे नारदः समदृश्यत ॥ ६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब पृथ्वी और काल दोनों कृतकृत्य होकर चले गये और देवताओंका भरतवंशमें यथोचितरूपसे अंशावतरणका कार्य सम्पन्न हो गया, धर्म, इन्द्र, वायु, देववैद्य अश्विनीकुमार तथा सूर्यदेवका पृथक्-पृथक् भाग जब भूतलपर अवतीर्ण हो गया, देवताओंके पुरोहित बृहस्पतिजी जब उनसे भी पहले ही पृथ्वीपर आ गये, वसुओंके अष्टम भाग भीष्म भी पहले ही पृथ्वीपर अवतीर्ण हो गये, मृत्यु (यम) और कलिके भाग भी जब पृथ्वीपर आ गये, शुक्र, सोम और वरुणके अंश भी भूतलपर अवतीर्ण हो गये, भगवान् शङ्कर, मित्र, कुबेर, गन्धर्व, नाग और यक्षोंके भागांश भी जब पृथ्वीपर आ गये, उपर्युक्त सभी भाग जब आकाशसे पृथ्वीपर उतर आये, तब देवपक्षमें स्थित रहनेवाले देवर्षि नारद भगवान् नारायणके निकट आते हुए दिखायी दिये ॥ १-६ ॥

ज्वलिताग्निप्रतीकाशो वालार्कसदृशेक्षणः।
सव्यापवृत्तं विपुलं जटामण्डलमुद्वहन् ॥ ७ ॥

उस समय उनका तेजस्वी शरीर प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। दोनों नेत्र प्रभातकालके सूर्यकी भाँति लाल थे। वे वामावर्त विशाल जटामण्डल धारण किये हुए थे ॥ ७ ॥

चन्द्रांशुशुक्ले वसने वसानो रुक्मभूषितः।
वीणां गृहीत्वा महतीं कक्षासक्तां सखीमिव ॥ ८ ॥

उन्होंने अपने शरीरको चन्द्रमाकी किरणोंके समान