भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 227

२०४ ] श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

श्वेत वर्णके दो वस्त्रोंसे आच्छादित कर रखा था। वे सोनेके आभूषणसे विभूषित थे। उन्होंने महती नामक वीणा ले रखी थी, जो उनकी सहचरीकी भाँति बगलमें सटी हुई थी॥ ८॥
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गो हेमयज्ञोपवीतवान् ।
दण्डी कमण्डलुधरः साक्षाच्छक्र इवापरः ॥ ९ ॥
उनके कंधेपर उत्तरीय वस्त्रके रूपमें काला मृगचर्म शोभा पा रहा था। वे सुवर्णमय यज्ञोपवीतसे सुशोभित थे। हाथोंमें दण्ड-कमण्डलु धारण किये हुए थे तथा देखनेमें साक्षात् दूसरे इन्द्रके समान जान पड़ते थे॥ ९॥
भेत्ता जगति गुह्यानां विग्रहाणां ग्रहोपमः।
गाता चतुर्णां वेदानामुद्गाता प्रथमर्त्विजाम् ।
महर्षिर्विग्रहरुचिर्विद्वान् गान्धर्वकोविदः ॥ १०॥
जगत्में गुप्त बातोंका भंडाफोड़ करनेवाले नारदजी युद्ध या विवादकी सूचना देनेवाले ग्रहोंके समान माने जाते हैं। ये चारों वेदोंके गायक तथा मुख्य ऋत्विजोंमें उद्गाता थे, महर्षि होनेपर भी युद्ध देखनेकी रुचि रखते थे और विद्वान् होनेके साथ ही सङ्गीतविद्याके मर्मज्ञ थे॥ १०॥
वैरेकेलिकिलो विप्रो ब्राह्मः कलिरिवापरः ।
देवगन्धर्वलोकानामादिवक्ता महामुनिः ॥ ११॥
दूसरोंको लड़ा देना उनके लिये खिलवाड़ था। वे ब्राह्मण तथा ब्रह्माजीके पुत्र होकर भी दूसरे कलिके समान माने जाते थे। महामुनि नारद देवलोक तथा गन्धर्वलोकके प्रमुख वक्ता (उपदेशक) थे॥ ११॥
स नारदोऽथ ब्रह्मर्षिर्ब्रह्मलोकचरोऽव्ययः ।
स्थितो देवसभामध्ये संरब्धो विष्णुमब्रवीत् ॥ १२
ब्रह्मलोकमें विचरनेवाले वे अविनाशी ब्रह्मर्षि नारद उस समय देव-सभामें खड़े हो रोषावेशमें आकर भगवान् विष्णुसे इस प्रकार बोले—॥ १२॥
अंशावतरणं विष्णो यदिदं त्रिदशैः कृतम् ।
क्षयार्थं पृथिवीन्द्राणां सर्वमेतदकारणम् ॥ १३ ॥
‘सर्वव्यापी नारायण! देवताओंने भूतलके राजाओंका विनाश करनेके लिये जो यह अंशावतार ग्रहण किया है, यह सब निष्फल है॥ १३॥
यदेतत् पार्थिवं क्षत्रं स्थितं त्वयि यदीश्वर ।
नृनारायणयुक्तोऽयं कार्यार्थः प्रतिभाति मे ॥ १४ ॥
‘परमेश्वर ! यह जो भूतलके राजाओंका युद्ध है, वह तो आपपर ही निर्भर है। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि देवताओंके इस प्रयोजनकी सिद्धि नर और नारायणके सहयोगसे ही सम्भव है ॥ १४ ॥
न युक्तं जानता देव त्वया तत्त्वार्थदर्शिना ।
देवदेव पृथिव्यर्थे प्रयोक्तुं कार्यमीदृशम् ॥ १५ ॥
‘देव ! देवाधिदेव ! आप तत्त्वार्थदर्शी हैं, सब कुछ जानते हैं; अतः पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ऐसे उपायका प्रयोग करना, जिसमें आप दोनोंका सहयोग न हो, आपके लिये उचित नहीं है ॥ १५ ॥
त्वं हि चक्षुष्मतां चक्षुः श्लाघ्यः प्रभवतां प्रभुः।
श्रेष्ठो योगवतां योगी गतिर्गतिमतामपि ॥ १६ ॥
‘क्योंकि आप ही नेत्रवालोंके नेत्र हैं, प्रभावशाली पुरुषोंके स्पृहणीय प्रभु हैं, योगवालोंमें श्रेष्ठ योगी हैं तथा गतिशील प्राणियोंकी गति हैं ॥ १६ ॥
देवभागान् गतान्दृष्ट्वा कृत्स्नं सर्वाश्रयो विभुः।
वसुन्धरायाः साहाय्यमंशं स्वं नानुयुञ्जसे ॥ १७ ॥
‘आप सबके आश्रयभूत परमेश्वर हैं, फिर देवताओंके अंशोंको पृथ्वीपर गया हुआ देखकर भी आप वसुधाकी सहायताके लिये अपने अंशको क्यों नहीं नियुक्त करते हैं॥ १७॥
त्वया सनाथा देवांशास्त्वन्मयास्त्वत्परायणाः ।
जगत्यां संचरिष्यन्ति कार्यात् कार्यान्तरं गताः॥ १८ ॥
‘देवताओंके अंश आपके ही स्वरूप तथा आपके ही आश्रित हैं। वे आपसे सनाथ होकर ही पृथ्वीपर एक कार्यसे दूसरे कार्यमें संलग्न रहते हुए विचरण कर सकेंगे॥ १८॥
तदहं त्वरया विष्णो प्राप्तः सुरसभामिमाम् ।
तव संचोदनार्थं वै शृणु चाप्यत्र कारणम् ॥ १९ ॥
‘विष्णो ! मैं जो आपको प्रेरित करनेके लिये बड़ी उतावलीके साथ इस देव-सभामें आया हूँ, इसका भी एक कारण है; उसे सुनिये ॥ १९॥
ये त्वया निहता दैत्याः संग्रामे तारकामये ।
तेषां शृणु गतिं विष्णो ये गताः पृथिवीतलम् ॥ २० ॥
‘विष्णो ! तारकामय-संग्राममें आपके द्वारा जो दैत्य मारे गये थे, वे सब-के-सब पृथिवीतलपर जा पहुँचे हैं; उनकी क्या अवस्था है, सुनिये ॥ २०॥
पुरी पृथिव्यां मुदिता मथुरानामतः श्रुता।
निविष्टा यमुनातीरे स्फीता जनपदैर्युता ॥ २१ ॥
‘पृथ्वीपर मथुरा नामसे प्रसिद्ध एक पुरी है, जो परमानन्दमयी है। वह समृद्धिशालिनी नगरी यमुनाके तटपर बसी हुई है। उसके सब ओर बहुत-से जनपद हैं ॥ २१॥
मधुर्नाम महानासीद् दानवो युधि दुर्जयः ।
त्रासनः सर्वभूतानां बलेन महतान्वितः ॥ २२॥
‘उस पुरीमे पहले मधु नामसे प्रसिद्ध एक महादानव रहता था, जिसे युद्धमे जीतना बहुत ही कठिन था। समस्त प्राणियोंको त्रास देनेवाला वह दानव महान् बलसे सम्पन्न था॥ २२॥
तस्य तत्र महच्चासीन्महापादपसंकुलम् ।

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