विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः २०५
घोरं मधुवनं नाम यत्रासौ न्यवसत् पुरा ॥ २३ ॥
‘वहीं उसका विशाल एवं भयंकर मधुवननामक वन था, जो बड़े-बड़े वृक्षोंसे हरा-भरा रहता था। पूर्वकालमें वह दानव उस मधुवनमें ही निवास करता था ॥ २३ ॥
तस्य पुत्रो महानासील्लवणो नाम दानवः ।
त्रासनः सर्वभूतानां महाबलपराक्रमः ॥ २४ ॥
‘उसका पुत्र लवण नामसे प्रसिद्ध महान् दानव था। वह भी समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न था ॥ २४ ॥
स तत्र दानवः क्रीडन् वर्षपूगाननेकशः ।
स दैवतगणाँल्लोकानुद्वासयति दर्पितः ॥ २५ ॥
‘वह दानव बहुत वर्षोंतक वहाँ क्रीड़ा करता रहा। फिर बलके घमंडमें भरकर देवताओंसहित समस्त लोकोंको उजाड़ने या उद्विग्न करने लगा ॥ २५ ॥
अयोध्यायामयोध्यायां रामे दाशरथौ स्थिते ।
राज्यं शासति धर्मज्ञे राक्षसानां भयावहे ॥ २६ ॥
स दानवो बलश्लाघी घोरं वनमुपाश्रितः ।
प्रेषयामास रामाय दूतं परुषवादिनम् ॥ २७ ॥
‘जिसपर आक्रमण करना किसीके लिये भी असम्भव था, उस अयोध्यापुरीमें जब राक्षसोंको भय देनेवाले धर्मज्ञ दशरथनन्दन श्रीराम राज्य-शासन करते थे, उस समय अपने बलकी प्रशंसा करनेवाले उस लवण नामक दानवने घोर मधुवनका सहारा ले श्रीरामचन्द्रजीके पास एक कटुभाषी दूत भेजा ॥ २६-२७ ॥
विषयासन्नभूतोऽस्मि तव राम रिपुश्च ह ।
न च सामन्तमिच्छन्ति राजानो बलदर्पितम् ॥ २८ ॥
‘(उसके उस दूतने भगवान् श्रीरामसे इस प्रकार कहा—) राम ! मैं तुम्हारे राज्यके निकट रहता हूँ और तुम्हारा शत्रु भी हूँ। प्रायः राजा लोग ऐसे सामन्तको जीवित रखना नहीं चाहते, जो बलके घमंडमें भरा रहता हो ॥ २८ ॥
राज्ञा राज्यव्रतस्थेन प्रजानां हितकाम्यया ।
जेतव्या रिपवः सर्वे स्फीतं विषयमिच्छता ॥ २९ ॥
‘राजोचित व्रतमें स्थित रहकर अपने राज्यको समृद्धिशाली बनानेकी इच्छा रखनेवाले राजाको उचित है कि वह प्रजाके हितकी कामनासे अपने समस्त शत्रुओंको जीतकर काबूमे कर ले ॥ २९ ॥
अभिषेकार्द्रकेशेन राज्ञा रञ्जनकाम्यया ।
जेतव्यानीन्द्रियाण्यादौ तज्जये हि ध्रुवो जयः ॥ ३० ॥
‘जिसके मस्तकके केश राज्याभिषेकसे आर्द्र हुए हों तथा जो प्रजाको प्रसन्न रखना चाहता हो, उस राजाका कर्तव्य है कि वह सबसे पहले अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करे; क्योंकि उनको जीत लेनेके बाद शत्रुओंपर विजय पाना निश्चित है ॥ ३० ॥
सम्यग् वर्तितुकामस्य विशेषेण महीपतेः ।
नयानामुपदेशेन नास्ति लोकसमो गुरुः ॥ ३१ ॥
‘जो उत्तम बर्तावकी इच्छा रखता हो, ऐसे पुरुष विशेषतः पृथ्वीपालक नरेशको नीतिका उपदेश करनेके लिये लोकके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥ ३१ ॥
व्यसनेषु जघन्यस्य धर्ममध्यस्य धीमतः ।
बलज्येष्ठस्य नृपतेर्नास्ति सामन्तजं भयम् ॥ ३२ ॥
‘जो द्यूत और मृगया आदि दुर्व्यसनोंमें दूसरोंकी अपेक्षा निकृष्ट है (अर्थात् जो व्यसनोंसे दूर रहता है), धर्ममें जिसकी मध्यम कोटिकी स्थिति है; परंतु जो बलमे दूसरोंकी अपेक्षा बढ़-चढ़कर है, उस बुद्धिमान् नरेशको कभी सामन्तोंसे भय नहीं प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥
सहजैर्बाध्यते सर्वः प्रवृद्धैरिन्द्रियादिभिः ।
अमित्राणां प्रियकरैर्मोहैरधृतिरीश्वरः ॥ ३३ ॥
‘अपने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए ये इन्द्रियरूपी शत्रु जब बढ़ जाते हैं, तब मोह उत्पन्न करनेवाले हो जाते हैं और शत्रुओंका प्रिय साधन करने लगते हैं; उस दशामे उनके द्वारा सभी धैर्यहीन पुरुषों अथवा राजाओको सदा ही बाधा प्राप्त होती है ॥ ३३ ॥
यत् त्वया स्त्रीकृते मोहात् सगणे रावणो हतः ।
नैतदौपयिकं मन्ये महद् वै कर्म कुत्सितम् ॥ ३४ ॥
‘तुमने जो मोहवश एक नारीके लिये दल-बलसहित रावणका वध कर डाला है, इसे मैं न्यायसंगत नहीं मानता । यद्यपि पराक्रमकी दृष्टिसे वह महान् कर्म है तो भी वास्तवमें वह निन्दित ही है ॥ ३४ ॥
वनवासप्रवृत्तेन यत् त्वया व्रतशालिना ।
प्रहृतं राक्षशानीके नैव दृष्टः सतां विधिः ॥ ३५ ॥
‘तुम वनवासमे प्रवृत्त हुए थे । वनवासी मुनियोंके नियमोंका पालन करनेमें ही तुम्हारी शोभा थी। फिर भी तुमने जो राक्षसोंकी सेनापर प्रहार किया, ऐसा बर्ताव कभी किन्हीं सत्पुरुषोंने किया हो—यह कभी नहीं देखा गया है ॥ ३५॥
सतामक्रोधजो धर्मः शुभां नयति सद्गतिम् ।
यत् त्वया निहता मोहाद् दूषिताश्चाश्रमौकसः॥ ३६॥
‘क्रोधका परित्याग करके साधुपुरुष जिस धर्मका पालन करते हैं, वह उन्हें शुभ सद्गतिकी प्राप्ति कराता है। तुमने जो मोहवश राक्षसोंका वध किया है, इससे सभी आश्रमवासी कलंकित हो गये (तुम्हारे द्वारा व्रत नियमका उल्लङ्घन देखकर दूसरे भी ऐसा ही करने लगेंगे; अतः तुम दुराचारके प्रवर्तक हो गये) ॥ ३६ ॥
स एव रावणो धन्यो यस्त्वया व्रतचारिणा ।
स्त्रीनिमित्ते हतो युद्धे ग्राम्यान् धर्मानवेक्षता ॥ ३७ ॥
‘वह रावण धन्य था, जो युद्धमें ग्राम्य धर्मपर ही दृष्टि